उफ, इतनी गरमी. गाड़ी को भी आज ही खराब होना था. जेब देखी तो पर्स भी नदारद. सिर्फ 5 रुपए का नोट था. अब तक 3 टैंपो को इसलिए छोड़ चुका था कि सवारियां बाहर तक लटक रही थीं. पर इस बार अपना मन मजबूत किया कि बेटा राजीव, टैंपो में इसी तरह सवार हो कर घर पहुंचना पड़ेगा. सो, इस बार मैं भी बाहर ही लटक गया. थोड़ी देर में खिसकतेखिसकते बैठने की जगह मिल ही गई.

यह क्या, सामने वाली सीट पर बैठी सवारी जानीपहचानी सी लग रही थी. उन दिनों उस के चेहरे पर मृगनयनी सुदंरता के साथ गुलाब की कली से अधखिले होंठों पर हर क्षण मधुर मुसकान फैली रहती थी. लंबे, काले, घुंघराले बाल कभीकभी हवा के साथ गोरे चेहरे को ऐसे ढक लेते थे जैसे काली घटा में छिपा चांद हो. जिस के नाखून भी काबिलेतारीफ हों, उस रूपलावण्य को कैसे भुलाया जा सकता है. यदि मैं कवि होता तो उस पर शृंगार रस की कविता या गजल कह डालता.

राजपूत घराने से संबंध रखने वाली चंद्रमणि 9वीं कक्षा से बीकौम तक मेरे साथ पढ़ी थी. स्कूल स्तर तक तो उस से विशेष बोलचाल नहीं थी, पर कालेज में एक अच्छे दोस्त की भांति बोलचाल के साथसाथ खाली पीरियड में हम कैंटीन में बैठ कर चाय भी पिया करते थे. हमारे विभाग में 40 लड़के व सिर्फ 5 लड़कियां थीं. एक बार बारिश के मौसम में सब ने मिल कर पिकनिक का कार्यक्रम बनाया. 2-3 लैक्चरर भी हमारे साथ थे. 5-7 छात्रों के अतिरिक्त पूरी कक्षा ही थी. तभी एक लड़की बोली कि चंद्रमणि, आज गाना सुनाएगी. इतने में सब ने शोर मचाना शुरू कर दिया. सभी उसे गाने को कहने लगे. एक बार मैं ने भी धीरे से कहा, तब उस ने गाना ‘बाबुल की दुआएं लेती जा, जा तुझ को सुखी संसार मिले, मायके की कभी न याद आए ससुराल में इतना प्यार मिले…’ सुनाया. एक तो गाने के बोल, दूसरे उस की दर्दभरी आवाज ने सब की आंखें नम कर दी थीं.

‘यह मुरझाया चेहरा, उलझे बिखरे बाल, सूनी आंखें जिन में कभी सुखद सपने बसा करते थे, ये फीकेफीके रंग के कपड़े. क्या यह वही ताजा गुलाब सी खिली रहने वाली चंद्रमणि है?’ मैं सोच रहा था.

‘‘मालवीय नगर, मालवीय नगर, सैक्टर 5,’’ टैंपो पर हाथ मारता हुआ लड़का जोर से चिल्लाया तो हम दोनों ही टैंपो से उतर गए.

मैं ने कहा, ‘‘चंद्रमणि.’’

उस ने धीरे से ऊपर देखते हुए कहा, ‘‘राजीव, तुम ने मुझे पहचान लिया?’’

‘‘चंद्रमणि, अगर मैं पहल न करता तो तुम मुझे पहचान कर भी मुझ से बात नहीं करती?’’

जैसे उस की चोरी पकड़ी गई हो. वह कुछ पल रुक कर बोली, ‘‘नहीं…नहीं, ऐसी बात नहीं. तुम यहां कैसे? पहले कभी नहीं देखा? मैं तो काफी समय से टैंपो से ही आतीजाती हूं.’’

‘‘मैं यहां 1 साल से हूं. सीए कर चुका हूं. जौहरी बाजार में औफिस है. वहां से वापस आते वक्त यूनिवर्सिटी के बाहर गाड़ी खराब हो गई, सो आज टैंपो से आया हूं. तुम्हारी यह हालत देख कर मैं कुछ समझ नहीं पा रहा.’’ तभी उस ने कहा, ‘‘मेरा घर आ गया. फिर कभी बात करेंगे.’’ घर क्या यह तो मात्र एक कमरा था जिस की हालत भी कुछ अच्छी नहीं थी. घर पहुंचते ही सविता बोली, ‘‘क्या बात है राज, आज इतने लेट व परेशान?’’

सविता मेरे जरा भी लेट होने पर बहुत चिंतित हो जाती थी. मैं ने कहा, ‘‘पानी.’’ वह फौरन पानी का गिलास ले आई व चाय की ट्रे भी साथ ही ले आई जैसे चाय भी सविता की तरह मेरी ही प्रतीक्षा में हो. पानी पी कर मैं ने कहा, ‘‘सविता, अगर आज मैं अपनी गाड़ी से आता तो वह सब नहीं होता जो आज हुआ.’’ सविता बोली, ‘‘जरा मैं भी तो सुनूं आज ऐसा क्या हो गया?’’

इतने में बेटे के रोने की आवाज सुन उस ने तेजी से अंदर की ओर कदम बढ़ा दिए. इतने में फिर मन का घोड़ा बेलगाम हो, दौड़ने लगा. अगर आज गाड़ी खराब न होती तो चंद्रमणि से मुलाकात कैसे होती. पर अब इस बात की बेचैनी थी कि अब कैसे दोबारा उस से मुलाकात हो ताकि उस के अतीत के बारे में कुछ जान सकूं. आखिर पिछले 7 साल में ही ऐसा क्या घटनाक्रम घूम गया…चंद्रमणि के पिता आर्थिक दृष्टि से तो संपन्न ही थे. मैं पिछले 7 सालों में कालेज की जिंदगी को कितना पीछे छोड़ आया था. बीकौम के बाद 7 साल से सीए की प्रैक्टिस कर रहा हूं. शादी हुए भी 2 साल हो चुके हैं. सविता एक पढ़ीलिखी, सुसंस्कृत परिवार से है. हमारा एक बेटा है जो एक साल का हो चुका है. सविता को भी चंद्रमणि के बारे में यह जानकारी थी कि वह स्वयं सुंदर थी उतना ही सुंदर गाती भी थी. सविता सोनू को गोद में ले आई व मुझ से बोली, ‘‘राज, आज कुछ सोच रहे हो?’’ बस, जैसे मैं उस के पूछने का ही इंतजार कर रहा था. अपनी सारी उलझन उस को कह सुनाई.

इस पर वह बोली, ‘‘अरे, इस में इतना परेशान होने की क्या बात है? आखिर तुम उस के दोस्त हो. जब वह पास ही रहती है तो एक दिन जा कर मिल आना, सारी गुत्थी सुलझ जाएगी.’’ मैं ने सोचा कि सुलझ जाएगी या और उलझ जाएगी, पता नहीं. फिर मैं ने सविता से पूछा, ‘‘तुम नहीं चलोगी?’’ ‘‘नहीं, पहली बार मेरा जाना उचित नहीं. वह खुल कर बात नहीं कर पाएगी.’’ दस्तक के साथ ही चंद्रमणि ने साबुन से सने हाथों से दरवाजा खोला. कुछ असमंजस में साड़ी के पल्लू से हाथ पोंछते हुए बोली, ‘‘अरे, आओ राजीव.’’ पलंग के सहारे एक पुरानी सी कुरसी रखी थी, उस पर बैठने का इशारा किया. चारपाई पर एक छोटी बच्ची सो रही थी. मैं कमरे के खालीपन व दयनीय स्थिति से कुछ समझने की कोशिश कर रहा था. तभी चंद्रमणि के हाथ में 2 चाय के प्याले देख कर बोला, ‘‘अरे, बैठते ही चाय बना लाई. क्या बात है, जल्दी भगाना चाहती हो?’’

इस पर वह ठंडी सांस ले कर बोली, ‘‘आज अरसे बाद तो कोई हितैषी आया है, उसे भला जल्दी जाने को क्यों कहूं.’’ चाय का प्याला हाथ में दे कर वह स्वयं जमीन पर बैठ गई. मैं अपनी उत्सुकता पर ज्यादा काबू नहीं रख सका और सीधे ही पूछ बैठा, ‘‘मैं तुम्हारी पिछली जिंदगी के बारे में जानना चाहता हूं?’’

‘‘राजीव, आज इतने सालों बाद मिले हो, क्यों मेरे घावों को हरा करना चाहते हो?’’

‘‘मैं तुम्हारे घावों को हरा नहीं करना चाह रहा, मैं सिर्फ एक दोस्त के नाते तुम्हारी मदद करना चाहता हूं.’’ ‘‘जब मेरी अपनी परछाईं ही मेरा साथ छोड़ गई तो तुम मेरी क्या मदद कर पाओगे? मुझ से ज्यादा दुखी इस दुनिया में और कौन होगा?’’

‘‘दुख कह देने से दिल का भार कम हो जाता है चंद्रमणि.’’ वह बताने लगी, ‘‘मेरे बीकौम करने के बाद की बात है. एक दिन मेरे मातापिता ने वैष्णो देवी जाने का कार्यक्रम बनाया. दूसरे दिन वे ड्राइवर को ले कर निकल पड़े. लौटने समय ट्रक व गाड़ी की टक्कर में ड्राइवर सहित तीनों घटनास्थल पर ही खत्म हो गए. शक्ल तक पहचानी नहीं जा रही थी. कहने को तो सोनाचांदी, खेतखलिहान, हवेली सबकुछ था. लाखों की जायदाद थी पर वसीयत न होने से सबकुछ चाचा, ताऊ ने हड़प लिया.

‘‘ताऊजी ने अमीर खानदान के इकलौते वारिस से मेरी शादी करा दी क्योंकि लड़के वालों को दानदहेज की जरूरत तो थी नहीं, बस, मैं पसंद आ गई. बड़ी धूमधाम से हमारी शादी कर दी गई. मेरे पति राजेश मुझे से बहुत प्यार करते थे. सास, ससुर भी अच्छे ही लगे थे. शादी के 2 माह बाद ही की बात है. हमारा कमरा ऊपर था. राजेश रात को सोने ऊपर आए तो उन्हें चक्कर आने लगे. थोड़ी देर बाद ही बोले कि मेरा जी घबरा रहा है. मैं ने कहा कि छत पर जरा खुली हवा में बैठने से ठीक रहेगा. बस, इतने में ही उन्हें खून की उलटी हुई. यह देख कर मैं एकदम घबरा गई व दौड़ कर पिताजी को बताया. उन्होंने उसी समय डाक्टर को बुला लिया व उन्हें अस्पताल ले गए. 2-3 दिन की सारी जांच के बाद पता चला कि उन्हें ‘ब्लड कैंसर’ है. बस, उसी दिन से मुझे मनहूस माना जाने लगा. ‘‘डाक्टर ने मुझे सारी बातें बताईं. राजेश की जिंदगी के अंतिम पड़ाव में मैं उसे खुश रखूं, यह भी सलाह दी. अब तो मेरी अग्निपरीक्षा थी. घर पर सब का व्यवहार मेरे प्रति बेहद रूखा व तनावपूर्ण था. पर मैं सारी परेशानियों को अपने सीने में दफन किए मुसकराना सीख गई, क्योंकि राजेश को मेरा उदास चेहरा कभी नहीं भाया करता था. ‘‘राजेश की हालत बराबर गिरती जा रही थी, कई बार खून चढ़ चुका था पर उन्हें बीचबीच में खून की हलकीहलकी सी उलटी हो जाया करती थी. इस से ज्यादा परेशानियों का पहाड़ मुझ पर और भला क्या टूट सकता था.

‘‘मैं मां बनने वाली थी, इस बात से राजेश बहुत खुश थे, कहते कि हमारे बेटी होनी चाहिए जिस का नाम तुम मणि रखना क्योंकि वह तुम जैसी सुंदर व सुशील बनेगी. राजेश बच्चे के होने तक उसे देखने के लिए जिंदा रहना चाहते थे. जैसेतैसे बच्चा होने के दिन नजदीक आते गए, मैं राजेश की जिंदगी के तेजी से कम होते दिनों के एहसास से सिहर उठती थी. ‘‘एक दिन राजेश को बेचैनी ज्यादा ही हो गई थी. मैं पास ही बैठी उन का सिर व पीठ सहला रही थी, पर किसी भी तरह उन्हें आराम नहीं आ रहा था. मैं अपनेआप को बेबस समझ रही थी कि तभी राजेश बोले, ‘काश, मैं उसे देख पाता.’ कहतेकहते उन की आंखों से आंसू व आवाज से बेबसी झलकने लगी. मैं अब झूठी हंसी हंसतेहंसते बहुत थक चुकी थी. मेरे भी आंसू रुक नहीं रहे थे. न ही मेरे पास हिम्मत बची थी जो मैं राजेश को दे पाती. बस, क्रूर नियति के हाथों मजबूर, अपनी बरबादी को अपनी तरफ बढ़ते देख राजेश को अपने सीने में इस तरह छिपाए थी कि काश, ऐसा कुछ हो जाए व मैं इस खेल में जीत जाऊं, पर नहीं, नियति को यह मंजूर नहीं था.

‘‘डाक्टर आए तो राजेश को यों बच्चे की तरह मुझ से लिपटा देख कर बोले कि क्या बात है? तबीयत कैसी है? मैं ने कहा कि बहुत घबराहट थी, किसी भी तरह बेचैनी कम नहीं हो रही थी. शायद इस स्थिति में थोड़ा आराम मिला है. डाक्टर को उन्हें यों गतिहीन देख समझते देर न लगी. मेरे सिर पर हाथ रख कर बोले, ‘बेटी, इन्हें अपने से दूर करो. मुझे देखना है.’ ‘‘मैं इस बात के लिए तैयार न थी, यह सोच कर कि उन्हें तकलीफ होगी. इतने में नर्स ने डाक्टर का इशारा पा कर उन्हें मुझ से दूर कर पलंग पर लिटा दिया. डाक्टर ने स्टेथस्कोप लगा कर देखा व बिना कुछ बोले मुंह तक चादर ढक कर चले गए. नर्स ने एक परदा पलंग के चारों ओर लगा दिया. अब तो मेरी आंखें फटी की फटी रह गईं जैसे बीच बाजार किसी ने मेरा सबकुछ लूट लिया हो. मैं अपने नाथ के बिना अनाथ हो गई थी. मुझे अपने चारों तरफ का माहौल बेमानी सा लगने लगा था.

‘‘अभी उन्हें गुजरे 15 दिन भी नहीं बीते थे. एक दिन मैं अपने कमरे में सो रही थी. कुछ आहट सुन मेरी नींद खुली तो पिताजी को पलंग पर बैठे पाया. यह क्या, उन के मुंह से शराब की गंध पा, मेरे पैरों तले धरती खिसक गई. मैं बड़ी मुश्किल से अपनेआप को उन से बचा कर सास की शरण में भागी. उन्हें यह सबकुछ बताया तो वे बोलीं, ‘अरे, इस में इतना डरने की क्या बात है. यह भरपूर जवानी और खूबसूरती दुनिया वालों के काम आए उस से तो तेरे अपने ससुर क्या बुरे हैं.’ मैं माताजीमाताजी करते रोती रही पर वे बस इतना कह कर कमरे से बाहर चली गईं कि यह तो राजपूत घरानो में होती आई रीत है. ‘‘बस, उस रोज जो घर छोड़ा, आज तक मुड़ कर पीछे नहीं देखा. यों जिल्लत की जिंदगी जी कर रोज मरने से तो अच्छा है एक ही बार मरूं. राजेश की यह अमानत व ममता मुझे मरने नहीं देती. तुम नहीं जानते राजीव, मैं किस तरह हर घड़ी इन पुरुषों की खाल में छिपे भेडि़यों से अपनेआप को बचाती रही हूं. अब मुझे इस बेटी की चिंता खाए जा रही है. मेरी समझ में नहीं आता कि मैं क्या करूं. अब तो मैं इतनी टूट चुकी हूं कि मुझे अच्छेबुरे इंसान की भी पहचान नहीं रही.’’ चंद्रमणि की आंखों से अविरल अश्रुधारा बह रही थी जिसे रोकना न उचित था, न ही मेरे वश में था, ‘‘हिम्मत रखो, हम तुम्हारे हितैषी हैं,’’ इतना कह कर मैं लौट आया.

घर आ कर सविता को चंद्रमणि का सारा अतीत कह सुनाया. सविता के नेत्र भी सजल हो उठे. वह बोली, ‘‘सच, नारी की सब से बड़ी दुश्मन भी नारी ही है व सब से बड़ी हमदर्द भी नारी ही है. नारी के दुख को नारी ही समझ सकती है.’’ तभी जैसे सविता को एकदम कुछ याद आया हो. एक अंतर्देशीय पत्र पकड़ाते हुए बोली, ‘‘लो, तुम्हारे प्यारे जयसिंह का.’’ मेरी खुशी का तो ठिकाना न था. जल्दीजल्दी पत्र पढ़ा व बोला, ‘‘अरे सुनो, जय अगले महीने की 25 तारीख को जयपुर यूनिवर्सिटी में किसी सैमिनार में भाग लेने आ रहा है व उस के बाद 2-4 दिन ठहरेगा, मजा आ जाएगा. सविता तुम्हें मालूम है उस की व मेरी शादी…’’

सविता बीच में ही हंस कर बोल पड़ी. ‘‘हांहां, एक ही दिन हुई थी और इसीलिए वह हमारी शादी में नहीं आ सका. तुम दोनों एकदूसरे को बहुत प्यार करते हो. पर पिछले 1 साल से दोनों के बीच समाचारों का आदानप्रदान नहीं हो सका.’’ और सविता व राजीव जोर से हंसे. पिछले कुछ दिनों से सविता व चंद्रमणि का मेलजोल काफी बढ़ गया था. अब तो चंद्रमणि जब स्कूल जाती तो अपनी बेटी को सविता के पास ही छोड़ जाती व स्कूल से आ कर थोड़ी देर के लिए मेरे बेटे को अपने साथ ले जाती. दोनों बच्चों को भी एकदूसरे का साथ मिल गया था. सो, वे भी खुश रहने लगे थे. चंद्रमणि सविता को भाभी कह कर बुलाती व सविता उसे स्नेह से चंद्र कह कर पुकारती. एक दिन मैं औफिस से जल्दी आ गया था. देखा सविता बड़े अधिकार से चंद्रमणि से कह रही थी, ‘‘देखो चंद्र, तुम्हें कल से 1 सप्ताह की छुट्टी लेनी होगी क्योंकि इन के एक दोस्त सैमिनार के लिए 5 दिनों के लिए जयपुर आ रहे हैं और तुम्हें काम में मेरा हाथ बंटाना होगा.’’

चंद्रमणि बोली, ‘‘भाभी, आप चिंता मत कीजिए,’’ इतना कह कर दोनों बच्चों को ले वह कर चली गई. चंद्रमणि व सविता आपस में तो बहुत बातचीत करती थीं पर जिस दिन चंद्रमणि ने अपने अतीत की व्यथा मुझे कह सुनाई थी, उस के बाद से वह मुझ से एक मर्यादा में ही संक्षिप्त बात करती थी. यह मेरे परिवार व स्वयं मेरे लिए भी उचित था. उस रोज मैं सुबह से ही बड़ा खुश था. सविता को यह करना, वह करना की हिदायत देते नहीं थक रहा था. आखिर वह घड़ी आ ही गई. मैं बड़ी ही फुरती से टैक्सी की ओर लपका और जय के उतरते ही उसे गले लगा लिया. बरसों बाद मिले 2 मित्रों की भांति हम दोनों ही अपने जज्बातों पर काबू न रख सके. तभी सविता की ओर नजर गई तो देखा उस ने जय के बेटे को बड़े स्नेह से अपनी गोद में ले रखा था. उस मासूम, सफर से थके व उदास बच्चे को देख एकाएक मुझे कुछ ध्यान आया, ‘‘अरे यार, भाभी कहां हैं? क्यों, साथ नहीं लाया?’’

मेरी बात का जवाब दिए बगैर वह सविता की ओर देख कर बड़े आदर से, ‘‘नमस्ते भाभी,’’ बोला. इस पर सविता बोल पड़ी, ‘‘आप इन्हें बैठने तो दीजिए. सारी बातें खड़ेखड़े ही करेंगे?’’

तब जय बोला, ‘‘भाभी ठीक कह रही हैं?’’ सविता पानी ले आई. पानी पीते हुए मैं फिर पूछ उठा, ‘‘अब तो बता तू इतने छोटे से बेटे को अकेले कैसे ले आया, भाभी को क्यों नहीं लाया?’’

अब जय ठंडी सांस खींच कर बोला, ‘‘यार, क्या बताऊं, बेटे के पैदा होते ही उस ने दम तोड़ दिया था…घर पर सुबह से शाम तक तो आया के पास रह जाता है पर अब इतने दिन कैसे और किस के पास छोड़ता इस 8 महीने के बच्चे को? फिर यहां तो कोई औपचारिकता भी नहीं, मैं ने सोचा कुछ दिन भाभी को ही तकलीफ देनी होगी.’’ सविता उस बच्चे को अपनी गोद में सोया देख सजल नेत्रों से उस के सिर पर ममत्व का हाथ फेरते हुए बोली, ‘‘भैया, कैसी बात करते हैं आप भी? इस में तकलीफ कैसी?’’ मैं बड़े ही दुखी मन से बोला, ‘‘क्या यार, तुझ पर इस कदर परेशानी आई और मुझे पता तक नहीं.’’

जय बोला, ‘‘अरे, अभी कौन सी परेशानियां खत्म हो गई हैं. मैं ही जानता हूं कि आया के भरोसे कैसे मैं इस बच्चे की परवरिश कर रहा हूं. सच, बिना मां के बच्चे को पालना बड़ा मुश्किल होता है.’’ तभी चंद्रमणि चायनाश्ते की ट्रे ले कर अंदर आते हुए जैसे ही नजर उठा कर अभिवादन करने को हुई तो एकदम चौंक कर बोली, ‘‘अरे, जयसिंह तुम?’’

जयसिंह बोला, ‘‘अरे चंद्रमणि, तुम यहां…और तुम्हारा यह हाल…?’’ सविता बात का रुख बदलने के अंदाज से बोली, ‘‘अरे, सब की चाय ठंडी हो रही है, चाय पिएं.’’ मैं सविता को खाने की तैयारी करने को कह कर थोड़ी देर जय के साथ घूमने निकल गया. टहलते हुए ही मैं ने जय को चंद्रमणि की सारी दास्तां कह सुनाई. चंद्रमणि को भी सविता से जय के बारे में सब पता चल गया था. शाम को खाना खाते वक्त मुझे लगा जैसे सविता मन ही मन किसी बड़ी गुत्थी को सुलझाने की कोशिश कर रही हो, पर मुझे उस समय उस से बात करने का मौका नहीं मिल पाया. रात को सविता ने आखिर अपनी चुप्पी तोड़ी. मैं और जय सोने चले गए तब सविता ने चंद्रमणि की मानसिकता जानने का प्रयास करते हुए उस से पूछा, ‘‘चंद्र, तुम्हारा जय के बारे में क्या खयाल है.’’ इस पर चंद्रमणि बोली, ‘‘भाभी, मैं तो अपनी जिंदगी उन के प्यार की यादों के सहारे ही गुजार लूंगी.’’

सविता बोली, ‘‘देखो चंद्र, यह बात सचाई से परे है. आज की सचाई यह है कि सिर्फ यादों के सहारे जिंदगी नहीं निकल सकती. जिंदगी जीने के लिए एक सशक्त सहारे की जरूरत होती है और फिर यह जरूरत सिर्फ तुम्हारी नहीं, जय की भी है. बच्चों को भी मांबाप दोनोें का प्यार चाहिए. यह उन के जीवन के विकास व आत्मविश्वास के लिए जरूरी है. चंद्र, ठंडे दिमाग से व्यावहारिक तौर पर सोचो.’’ इस पर चंद्रमणि कुछ नहीं बोली. सुबह 8 बजे ही जय को सैमिनार में पहुंचना था. सो, मैं उसे छोड़ने चला गया. सविता व चंद्रमणि दोनों बच्चों व घर से निवृत्त हो कर बैठीं तो सविता ने चंद्रमणि से पूछा, ‘‘चंद्र, क्या हम तुम्हारे व जय के साथ एक आदर्श परिवार की कल्पना कर सकते हैं?’’

इस पर चंद्रमणि धीरे से जय के बेटे राहुल व अपनी बेटी रोहिणी पर निगाह डालते हुए बोली, ‘‘भाभी, शायद आप ठीक ही सोचती हैं.’’ सविता ने जय को भी मना लिया. जय व चंद्र ने आपस में बातचीत की व एकदूसरे के विचार जाने. फिर 2 ही दिन में सविता के कुशल निर्देशन में जय व चंद्र की कानूनन शादी हो गई. आज फिर चंद्रमणि उतनी ही सुंदर व सौम्यता की प्रतिमूर्ति लग रही थी. दोनों के चेहरे फूल से खिल उठे थे. चंद्रमणि की आंखें कृतज्ञता का आभास दे रही थीं. जय को भी अपनी दोस्ती पर फख्र हो रहा था. जय अपनी बेटी रोहिणी व चंद्रमणि अपने बेटे राहुल को गोद में उठाए विदा लेने के लिए गाड़ी की तरफ बढ़े. मैं ने देखा, सविता की आंखों में आंसू थे. आज वह अपनी ननद को विदा कर रही थी. कोई भाभी अपनी सगी ननद को भी इतनी खुशी क्या दे पाई होगी जितनी सविता ने अपनी मुंहबोली ननद को दी थी. आज मेरे मन में सविता के लिए प्रेम का सागर उमड़  पड़ा था. मैं उस को अपनी पत्नी के रूप में पा कर अपनेआप को धन्य समझ रहा था. आज इन की विदाई के समय भी गाड़ी में वही गीत बज रहा था, ‘बाबुल की दुआएं लेती जा…’

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