सरिता विशेष

पहले बसाई जाती है, फिर खाली कराई जाती है, झुग्गी बस्ती से कुछ ऐसे वफा निभाई जाती है.

यह खेल न जाने कितने सालों से बदस्तूर चल रहा है. अब तो अतिक्रमण को ले कर सुप्रीम कोर्ट के तेवर भी तीखे हैं. वह कहता है कि दिल्ली की सड़कें साफ चाहिए ताकि सड़क व फुटपाथों पर चलने वालों को राहत मिले.

अदालत ने यह भी कहा कि सार्वजनिक जगहों और अनऔथराइज्ड कालोनियों मे गैरकानूनी निर्माण पर फौरन रोक लगे.

सुप्रीम कोर्ट की इस सख्त टिप्पणी से दिल्ली की सियासत में एक तरह की लड़ाई चल रही है. भारतीय जनता पार्टी, आम आदमी पार्टी और कांग्रेस तीनों के बीच एकदूसरे पर आरोप लगाने का सिलसिला शुरू हो गया है.

आरोपप्रत्यारोप की इस राजनीति में गरीब लोगों का नुकसान होता है. बड़ी गाज तो उन गरीबों पर पड़ती है जो रहते भी कब्जाई जगह पर हैं और खातेकमाते भी कब्जाई जगह पर ही.

मान लीजिए कोई आदमी किसी झुग्गीझोंपड़ी बस्ती में रहता है, जहां उस पर यह तलवार हमेशा लटकती रहती है कि कब सिर से छत हट जाए. अगर किसी सड़क किनारे वह छोलेकुलचे बेचने का ठेला लगाता है, तो वहां भी उसे यही डर सताता रहेगा कि कब ‘कमेटी वाले’ अपनी गाड़ी लेकर आ धमकेंगे और उस का तामझाम फेंक कर सामान अपने साथ ले कर चलते बनेंगे या कभी ऐसा सरकारी फरमान ही न आ जाए कि भविष्य में कोई भी सड़क किनारे, फुटपाथ पर अपना?ठेला लगा कर सामान नहीं बेच पाएगा.

यहां पर ऐसे लोगों का कतई पक्ष नहीं लिया जा रहा है जो कानून या सरकार के बनाए कानून की धज्जियां उड़ा कर सड़कों पर अतिक्रमण करते हैं पर अगर सभी को रोजीरोटी कमाने, सिर पर छत होने का बुनियादी हक है, तो फिर ऐसे लोगों के साथ तो ज्यादती ही कही जाएगी जो मेहनत की कमाई से अपनी जिंदगी गुजरबसर करना चाहते हैं. उन का कुसूर बस इतना है कि उन्हें अपनी ईमानदारी की कमाई सड़क या फुटपाथ का एक छोटा सा हिस्सा घेर कर करनी पड़ रही है.

यहां एक और बात गौरतलब है कि सड़कों पर सामान बेचने वालों के ग्राहक भी गरीब या मिडिल क्लास होते हैं. इन में से बहुत से ऐसे होते हैं जो अपने घरगांव से आ कर दिल्ली जैसे बड़े शहर में छोटी नौकरी और कम तनख्वाह पर अपना परिवार पालते हैं. बहुत से तो रोजाना ऐसे ठेलों पर खाना खाते हैं, क्योंकि यहां से उन्हें खाना सस्ता जो पड़ता है.

मिसाल के तौर पर कोई आदमी सड़क किनारे छोलेभटूरे का ठेला लगाता है और एक प्लेट 30 रुपए की देता है. अगर कोई आदमी जिस की तनख्वाह 12 हजार रुपए महीना है, 25 दिन नौकरी करने आता है और रोजाना उसी आदमी से छोलेभटूरे खाता है तो वह 25 दिन में 30 रुपए प्लेट के हिसाब से 750 रुपए के छोलेभटूरे खाता है.

अब अगर सड़क पर से सभी ठेले वालों को हटा दिया जाए तो उस आदमी को किसी रैस्टोरैंट में जाना पड़ेगा जहां हो सकता है कि छोलेभटूरे की एक प्लेट की कीमत 60 रुपए हो यानी 25 दिन में वह आदमी 1500 रुपए का खाना खाएगा. मतलब उस का खर्चा दोगुना हो जाएगा.

अगर अपने दफ्तर से रैस्टोरैंट तक बस से आनेजाने में 20 रुपए खर्च होंगे तो 25 दिन के हिसाब से उस का 500 रुपए का ऐक्स्ट्रा खर्च बढ़ जाएगा. छोलेभटूरे वाला तो बेरोजगार हुआ ही इस गरीब ग्राहक का भी खर्चा बढ़ गया. 750 और 500 रुपए जोड़ लो तो 1250 रुपए महीना की चपत.

अब छोलेभटूरे का ठेला लगाने वाले की बात करते हैं. सड़क से ठेला उठा तो रोजगार गया. अगर वह किसी ऐसी झुग्गी बस्ती में रहता है जो सरकारी जमीन पर गैरकानूनी तौर पर बनी है तो उसे यह डर भी लगा रहेगा कि कल को झुग्गी खाली करने का सरकारी फरमान न आ जाए.

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झुग्गी बस्तियों की बदहाली

इस मुद्दे पर बात करने से पहले यह जान लें कि अतिक्रमण क्यों होता है. दरअसल, यह समस्या देश की तरक्की के मौडल में खामियों और उस से गांवदेहात के लोगों का अपना घरबार छोड़ने से जुड़ी है. आजादी के बाद से धीरेधीरे लोगों का शहरों की ओर भागना देखा गया है. आजादी के बाद यह कानून तो बना दिया गया कि हमारे देश के किसी भी नागरिक को कहीं भी बसने का हक है लेकिन जो गरीब पहले जंगली इलाकों में रहते थे उन को नैशनल पार्क या अभयारण्य घोषित करते वक्त यह तय नहीं किया गया कि अब वहां रहने वाले लोग कहां बसाए जाएंगे. ऐसे लोगों के पास जमीन का कोई पट्टा नहीं था, इसलिए न वे घर के रहे और न घाट के.

सरिता विशेष

जंगलों का दोहन भी लोगों को शहरों की ओर भागने की वजह बना. ईंधन, फर्नीचर और घर बनाने के लिए शहरों में लकडि़यों की मांग बढ़ गई. इस से आदिवासियों को सब से ज्यादा नुकसान हुआ.

पिछले 20 सालों में तो गांवदेहात के लोगों का बड़े शहरों की ओर भागना हद से ज्यादा बढ़ा है. रोजगार की कमी, पढ़ाईलिखाई की बदहाली और डाक्टरी इलाज में खामियां इस की खास वजहें रही हैं.

जातिवाद के जहर की तो पूछिए ही मत. शहरों में जानवरों की तरह गंदी बस्तियों में रहने वाले ज्यादातर लोग निचले तबके के होते हैं. वे गांव में भी सताए जाते हैं और शहरों में भी उन्हें इज्जत की जिंदगी नहीं मिल पाती है. इस की वजह यह रही है कि गांवदेहात में खेतीबारी महंगी होती गई तो इस के साथसाथ हस्तशिल्प, कुटीर व लघु उद्योग भी उजड़ते गए.

नतीजतन, लोग बसों, रेलों में लद कर, ठुंसठुंसा कर शहरों की ओर भागने लगे. वहां रहने की समस्या आई तो जिस को जहां जगह मिली उस ने वहां अपना तंबू तान दिया. नेताओं को ऐसे लोग पकेपकाए वोट लगे तो पुलिस और दूसरे सरकारी विभागों को आमदनी का आसान जरीया.

नौकरशाही ने तिकड़में लड़ा कर ऐसे लोगों को सरकारी जमीनों पर झुग्गियों के रूप में बसा दिया, तो नेताओं ने उन्हें अपनी सरपरस्ती में बेखौफ रहने की इजाजत दे दी. अमीरों को सस्ते में नौकर, सब्जी वाले, प्रैस वाले, चौकीदार, साफसफाई करने वाले मिलने लगे तो उन्होंने भी ऐसी बस्तियों पर कभी नाकभौं नहीं सिकोड़ी.

लेकिन जब बेतरतीब बसी ऐसी सड़ांध मारती बस्तियों की बदबू आसपास के इलाकों में फैलने लगी, लोग बीमार होने लगे, अपराध बढ़ने लगे, आबोहवा खराब होने लगी तो ये गरीब शहर पर कोढ़ की तरह दिखने लगे.

धरती पर अगर नरक देखना हो तो गैरकानूनी तौर पर बसी ऐसी झुग्गी बस्तियों में आप का स्वागत है. यहां के ज्यादातर परिवार चूंकि छोटी जाति के होते हैं इसलिए उन के सपने भी झुग्गी की टुच्ची औकात के बन कर रह जाते हैं. मर्द रोजीरोटी के लिए खोमचा लगाते हैं, दिहाड़ी मजदूरी करते हैं, कहीं किस्मत अच्छी हुई तो ठेकेदारी या ड्राइवरी कर लेते हैं. औरतें बड़े घरों में बरतन मांजने, साफसफाई का काम करती हैं तो बच्चे सरकारी स्कूल में इसलिए भेज दिए जाते हैं ताकि सारा दिन आवारागर्दी करने से बच जाएं.

दिल्ली के मंगोलपुरी इलाके में जी ब्लौक की झुग्गी बस्ती बहुत पुरानी है. यह एक नाले के आसपास बसी है, जिस में बदहाली का आलम अपनी हद पर है. पहले जो झुग्गियां तिरपाल या कच्ची छत की बनी थीं अब पक्के घरों में तबदील हो चुकी हैं. किसी भी गली में घुस जाओ, दड़बों से बेतरतीब बने छोटेछोटे घर आप को घूरते नजर आएंगे. कुछ ने तो 3-4 मंजिलें भी खड़ी कर दी?हैं.

वहां तकरीबन 30-35 साल से रह रही एक माई ने बताया, ‘‘हम जब यहां आए, तब 2-3 झुग्गियां थीं. नाले की जमीन थी, इसलिए सड़क से 6-7 फुट नीची थी. बरसात के मौसम में पानी भर जाता था. एक तरह से जंगल ही था. हमारे गांव में जमीन नहीं थी. खाने के लाले पड़ने लगे तो काम की तलाश में यहां आ गए. अब तो यही हमारा घर है.’’

यहां तकरीबन सभी लोगों के आधारकार्ड बन चुके?

हैं. घरों में बिजलीपानी के मीटर हैं पर सीवर नहीं डाले गए हैं. शौचालय की समस्या है. पास में ही एक सार्वजनिक शौचालय जरूर है, जहां एक आदमी की ड्यूटी भी लगती है. पर औरतों की समस्या यह है कि देर रात में वे अपने बच्चों खासकर लड़कियों को कैसे वहां शौच के लिए भेजें.

अंधेरा होने के बाद तो वहां नशेडि़यों का जमघट लग जाता है. शौचालय की देखभाल करने वाला आदमी अगर उन्हें जाने को कहता है तो वे लड़ाईझगड़े पर उतारू हो जाते हैं.

एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करने वाले दीपक ने बताया, ‘‘इस झुग्गी बस्ती में सब से बड़ी समस्या सीवर की है. कुछ लोगों ने बड़े नाले में कनैक्शन करा कर अपना शौचालय बनवा लिया तो ठीक, नहीं तो बाहर सार्वजनिक शौचालय में जाना पड़ता है. अगर घर के नीचे गड्ढा खुदवा कर बनवाना चाहें तो बाद में सफाई कराने में दिक्कत आती है.

‘‘अगर सरकार इसी जमीन पर यहां रहने वाले लोगों को 12-12 गज के प्लाट किसी कालोनी की तरह काट कर दे दे तो यहां का नक्शा बदल सकता है. स्मार्ट शहर से पहले स्मार्ट झुग्गी बस्तियां बनाना जरूरी है.’’

सरकारी लोगों के रवैए से गुस्साई एक औरत सरला देवी ने बताया, ‘‘अगर हम अपनी समस्याएं ले कर सरकारी विभाग में जाते हैं तो वे कहते हैं कि यह हमारा काम नहीं है. पहला दूसरे के पास और दूसरा तीसरे के पास भेज देता?

है. नेता के नुमांइदे आते हैं, नाले की भी सफाई के फोटो खींच कर सोशल मीडिया पर डाल कर वाहवाही बटोर लेते हैं, लेकिन गंदगी वहीं की वहीं रहती है.

‘‘हम औरतों ने अपनी मेहनत से कच्ची झुग्गियों को इन छोटेछोटे घरों में बदला है. अगर हमें यहां से हटा दिया गया तो हम कहीं के नहीं रहेंगे. गांव में जमीन नहीं है. यहां छत नहीं है. हम गरीबों की कहीं कोई सुनवाई नहीं होती है.’’

भारत सरकार के सर्वे 2011 के मुताबिक, दिल्ली की तकरीबन 15 फीसदी आबादी झुग्गी बस्तियों में रहती है. आंकड़ों की बात करें तो दिल्ली में तकरीबन 7 सौ एकड़ एरिया में झुग्गियां हैं, जिन में 10 लाख के आसपास लोग रहते हैं. दिल्ली में तकरीबन 90 फीसदी झुग्गियां सरकारी जमीन पर बसी हैं, जिन में से 40 फीसदी दिल्ली नगरनिगम और लोक निर्माण विभाग, 28 फीसदी रेलवे और 16 फीसदी दिल्ली सरकार की जमीन पर कायम हैं.

इस तरह दिल्ली में तकरीबन 860 झुग्गी बस्तियां हैं. तकरीबन 1700 ऐसी कच्ची कालोनियां हैं जो हमेशा से सरकार की अनदेखी का शिकार रही हैं.

राजनीतिक दल इन लोगों की भलाई की तो छोडि़ए, इन के नाम पर अपनी सियासी रोटियां सेंकते हैं. भारतीय जनता पार्टी आरोप लगाती है कि दिल्ली की केजरीवाल सरकार केंद्र सरकार की योजनाओं का फायदा दिल्ली की पुनर्वास बस्तियों और झुग्गीझोंपड़ी में रहने वालों तक पहुंचने ही नहीं देती है.

इस पार्टी का कहना है कि केंद्र सरकार के अर्बन रिनुअल फंड से कई राज्यों के साथ ही नोएडा व गुड़गांव में भी झुग्गी बस्तियों में तरक्की के काम किए हैं या कराए जा रहे हैं, पर दिल्ली के झुग्गी वालों को इस फंड से कोई फायदा नहीं मिला है.

इस के उलट दिल्ली सरकार कहती है कि केंद्र सरकार और दिल्ली के उपराज्यपाल उसे कोई काम ही नहीं करने देते हैं. नगरनिगम पर विपक्ष

का कब्जा है जो उस के द्वारा किए जाने वाले काम खासकर गरीबों की भलाई के कामों में हमेशा अड़ंगा अड़ाता है.

ऐसे में जब कभी सुप्रीम कोर्ट अतिक्रमण को ले कर सख्त होता है तो आननफानन झुग्गी बस्तियों का वजूद मिटाने और वहां के बाशिंदों को कहीं दूसरी जगह बसाने की कवायद शुरू हो जाती है. लेकिन यह सब करना क्या आसान काम है?

यह एक कड़वी सचाई है कि दिल्ली में गैरकानूनी तरीके से बसाई गई झुग्गीझोंपड़ी बस्तियों को खाली कराने और वहां के बाशिंदों को दोबारा कहीं ओर बसाने का तरीका बड़ा पेचीदा है. इस में तमाम तरह की प्रशासनिक चुनौतियां होती हैं.

2 बड़ी समस्याएं इस तरह हैं. पहली, एक नोडल एजेंसी होने के बावजूद ऐसी बस्तियों को दोबारा बसाने का काम विभिन्न सरकारी एजेंसियों के जिम्मे होता है, जिन के बीच तालमेल की कमी दिखाई देती है, जिस से इस सब में तमाम तरह की रुकावटें पैदा होती हैं. दूसरी, इस तरह की झुग्गीझोंपड़ी बस्तियों में रहने वालों को अपने हकों का पता नहीं होता है. मसलन, हटाए गए लोगों में से किसकिस को दोबारा बसाया जाएगा? बस्ती खाली कराने का कानूनी तरीका क्या है? इन सब बातों की उन्हें जानकारी नहीं होती है.

सरकारी जमीन पर बसी झुग्गीझोंपड़ी बस्तियों को वहां से हटाने और कहीं ओर बसाने की जिम्मेदारी दिल्ली नगरनिगम, दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड, लोक निर्माण विभाग, केंद्रीय लोक निर्माण विभाग जैसी सरकारी संस्थाओं पर होती है.

मान लीजिए सरकार को कोई सड़क चौड़ी करनी है और इस की जिम्मेदारी वह लोक निर्माण विभाग को सौंपती है. लेकिन वहीं पर एक ऐसी झुग्गीझोंपड़ी बस्ती है जिस का कुछ हिस्सा सड़क को चौड़ा करने में रुकावट पैदा कर रहा है तो लोक निर्माण विभाग उस हिस्से से अतिक्रमण हटाने के लिए क्या करेगा? क्या वह उन लोगों को कोई आधिकारिक नोटिस भेजेगा या किसी तरह का आदेश दिखाएगा या वहां जा कर इतना कह देगा कि हम यह हिस्सा ढहाने जा रहे हैं, आप अपना इंतजाम कर लो. अगर बस्ती वाले लोग समय मांगते हैं तो क्या उन्हें कानूनन समय दिया जाता?है या आपसी समझ से जगह खाली करने पर सहमति बन जाती है?

‘सैंटर फौर पौलिसी रिसर्च’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली के आरके पुरम सैक्टर 7 इलाके में सोनिया गांधी कैंप झुग्गीझोंपड़ी बस्ती थी. 25 फरवरी, 2013 को लोक निर्माण विभाग के इंजीनियरों ने इस कैंप के बाशिंदों को बताया कि वे बस्ती का उत्तरपूर्वी हिस्सा ढहाने जा रहे?हैं.

लोगों को बताया गया कि बस्ती का यह हिस्सा लोक निर्माण विभाग की जमीन पर था और एक सड़क चौड़ी करने के लिए उन्हें उस की जरूरत थी.

हालांकि लोगों को न तो कोई आधिकारिक नोटिस और न ही किसी तरह का कोई आदेश दिखाया गया. जब इंजीनियरों ने कहा कि वे मकान ढहाने का काम फौरन शुरू करना चाहते हैं तो बस्ती के लोगों ने थोड़ा समय मांगा. इंजीनियर मान गए.

एक हफ्ते बाद यानी 6 मार्च, 2013 को इंजीनियर निर्माण ढहाने का काम शुरू करने के लिए कैंप पहुंचे. कुछ लोगों ने थोड़ा समय और मांगा तो 30 मार्च, 2013 तक साजोसामान हटाने वाली एक चिट्ठी पर उन के दस्तखत करा लिए गए. चिट्ठी में लिखा था कि अगर वे 30 मार्च तक ऐसा नहीं करेंगे तो लोक निर्माण विभाग उन के घरों को ढहा देगा.

यहां मामले में पेंच था कि बस्ती वालों के मुताबिक लोक निर्माण विभाग ने वह चिट्ठी खुद तैयार की थी और उन से दस्तखत करने को कहा था, जबकि विभाग के स्टाफ का दावा था कि बस्ती के लोग चिट्ठी तैयार करने में भागीदार थे.

बस्ती वालों ने यह भी बताया कि उन्होंने उस जमीन से, जिसे लोक निर्माण विभाग अपनी बता रहा था, 30 मार्च, 2013 तक अपना सामान हटा लिया था. पर न तो उस दिन लोक निर्माण विभाग की तरफ से झुग्गियां ढहाने के लिए कोई आया और न ही अप्रैल महीने के शुरुआती दिनों में ही कोई आया. लिहाजा, लोग अपनी झुग्गियों में वापस आ गए.

15 अप्रैल, 2013 को लोक निर्माण विभाग ने बिना कोई सूचना दिए तकरीबन 35 झुग्गियों को ढहा दिया. झुग्गियां तोड़े जाने के साथसाथ कैंप के बाशिंदों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले शौचालयों में पानी की सप्लाई वाले पाइप हटा दिए गए. इस से शौचालय बेकार हो गए.

22 अप्रैल, 2013 को लोक निर्माण विभाग के 2 इंजीनियर आए और एक नई चौड़ी सड़क के लिए जमीन का सीमांकन कर गए. बस्ती वालों के कहने के बावजूद उन्हें सीमा दिखाने वाला कोई भी दस्तावेज या नक्शा नहीं दिखाया गया. तभी लोक निर्माण विभाग द्वारा किराए पर रखा हुआ एक प्राइवेट ठेकेदार कुछ मजदूरों और सामान के साथ वहां पहुंचा और उस ने तय की गई सीमा के साथसाथ एक दीवार बनानी शुरू कर दी. एक बुलडोजर और एक ट्रक में ढहाई हुई झुग्गियों का मलबा हटाने का काम भी शुरू कर दिया.

इस तरह झुग्गियां ढहाने के मामले में लोक निर्माण विभाग, दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड और इलाके के विधायक की ओर से अलगअलग जवाब आए. लोक निर्माण विभाग के एक सीनियर इंजीनियर ने एक इंटरव्यू में दावा किया कि उन के विभाग ने किसी झुग्गी को नहीं हटाया है, बल्कि सिर्फ ‘अतिक्रमण को हटाया’ है. उन्होंने आगे कहा कि विभाग की जमीन से अतिक्रमण हटाना उन का काम था.

जिस इंजीनियर की निगरानी में झुग्गियों को ढहाया गया था, वह इस बात पर कायम रहा कि उजड़े परिवारों को दोबारा बसाने में लोक निर्माण विभाग का कोई रोल नहीं है और इस की जिम्मेदारी दिल्ली विकास प्राधिकरण या दिल्ली नगरनिगम की थी.

दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड के एक बड़े अफसर ने बताया कि अगर किसी सरकारी प्रोजैक्ट के लिए कोई बस्ती ढहाए जाने की जरूरत है तो जिस एजेंसी की जमीन पर वह बस्ती बसी है, उसे ऐसा कदम उठाने की ठोस वजह देनी पडे़गी. इस के साथ ही एजेंसी को बस्ती के बाशिंदों के रहने के लिए कोई औप्शनल इंतजाम करते हुए उन्हें दोबारा बसाना होगा.

लोक निर्माण विभाग के मुताबिक, ‘राइट औफ वे’ के आधार पर यह पूरी प्रक्रिया जायज थी. यह कदम मौजूदा सड़कों के अतिक्रमण हटाने की मंशा से उठाया गया था.

‘राइट औफ वे’ के नियमों के चलते झुग्गियों को हटाते वक्त वहां के लोगों और बाकी एजेंसियों को सूचित करना लोक निर्माण विभाग के लिए जरूरी नहीं था. अतिक्रमण हटाने के लिए विभाग को नोटिस देने की जरूरत नहीं, चाहे अतिक्रमण एक झुग्गी का हो या एक बंगले का. विभाग को सिर्फ इलाके के एसएचओ को पुलिस मुहैया कराने के लिए कहना पड़ता है, ताकि झुग्गियों को ढहाने के दौरान कोई हिंसा न भड़के.

इस के बाद विधायक ने लोगों की तोड़ी गई झुग्गियों की लिस्ट तैयार करने को कहा और लिस्ट के साथ अपनी पहचान से जुड़े दस्तावेज भी लगाने को कहा. कुछ दिन बाद कैंप से विस्थापित हुए लोगों ने ढहाई गई झुग्गियों का ब्योरा विधायक के दफ्तर जा कर जमा करा दिया. विधायक ने कहा कि किसी भी तरह की मदद मिलने में कुछ महीने का समय लग सकता है.

8 मई, 2013 को झुग्गी वाले विधायक के पास दोबारा पहुंचे. विधायक ने उन्हें आश्वासन दिया कि तोड़ी गई झुग्गियों के बदले उन्हें पुनर्वास नीति के तहत नरेला में फ्लैट दिए जाएंगे. 10 मई या 15 मई, 2013 को सोनिया गांधी कैंप में एक रजिस्ट्रेशन कैंप लगाया जाएगा जहां पर जिन लोगों की झुग्गियां तोड़ी गई हैं उन को ‘टाइम ऐलौटमैंट स्लिप’ दी जाएगी. लाभार्थी परिवार को फ्लैट लेने के लिए 72 हजार रुपए देने होंगे. फ्लैट हासिल करने के लिए तोड़ी गई झुग्गियों के मालिकों को अपने मतदान प्रमाणपत्र देने होंगे जो यह साबित कर सकें कि वे पिछले 8-10 सालों से सोनिया गांधी कैंप में रह रहे थे.

लेकिन बताई गई किसी तारीख पर कोई भी रजिस्ट्रेशन कैंप नहीं लगाया गया. झुग्गी वाले दोबारा विधायक की चौखट पर गए. विधायक ने बताया कि उन्होंने दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड से पूछा था कि जिन परिवारों की झुग्गियां तोड़ी गई हैं उन्हें पुनर्वास के तौर पर दूसरी जगह क्यों नहीं दी गई है?

विधायक के मुताबिक, दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड ने जवाब में कहा था कि झुग्ग्यों को ढहाने का काम लोक निर्माण विभाग द्वारा किया गया और जिस के बारे में उस विभाग ने उन्हें कोई सूचना नहीं दी. इसी के चलते दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड ने प्रभावित परिवारों के लिए कोई पुनर्वास योजना तैयार नहीं की.

जब एक झुग्गीझोंपड़ी बस्ती की केवल 35 तोड़ी गई झुग्गियों को दोबारा बसाने में इतना झमेला था, तो सोचिए कि पूरी दिल्ली की ऐसी बस्तियों में रहने वाले लोगों को कहीं दूसरी जगह बसाने के लिए कितने पापड़ बेलने पड़ेंगे.

सुप्रीम कोर्ट दिल्ली को खूबसूरत बनाना चाहता है, सड़कें साफसुथरी देखना चाहता है, वह सरकार को चेतावनी देते हुए यह भी कहता है कि दिल्ली के आम लोग मवेशी नहीं हैं पर दिल्ली की जो एकतिहाई जनता कब्जाई गई कालोनियों या झुग्गी बस्तियों में रहती है, क्या उसे एक झटके में दिल्ली से बाहर फेंक दिया जाए?

लोग अपना घरबार छोड़ कर शहरों में मस्ती मारने नहीं आते हैं. वहां उन्हें रोजगार नहीं मिलता इसलिए उन्हें कंक्रीट के जंगल में बंधुआ मजदूर बनना भी मंजूर होता है, ताकि उन के परिवार का पेट पल सके. शहर में जहां वे अपना छोटा सा आशियाना बसाते?हैं वहां उन्हें रोजमर्रा की चीजों की जरूरत होती है, सस्ती चीजों की, इसलिए शहरों में यह अतिक्रमण दिखाई देता है. गैरकानूनी बस्तियां बस रही?हैं, सरकार की नाक के नीचे. सड़कों पर ठेले वालों का मजमा लगता है, ताकि दूसरे गरीब भी अपनी जरूरतों का सामान कम दाम पर खरीद सकें, कम पैसों में वे अपने पेट की आग बुझा सकें.

ऐसे लाखों लोगों को शहर की खूबसूरती बढ़ाने के लिए बलि का बकरा बनाना कहां की अक्लमंदी है, जबकि इस देश में किसी को कहीं भी रहनेबसने का बुनियादी हक मिला हुआ है. क्या ऐसे लोगों की कीमत उस गमले से भी गईगुजरी है जो शहर की शान बढ़ाने के लिए सड़क किनारे फुटपाथ की शोभा बढ़ाता है.