भारत अपने 69वें गणतंत्र की सालगिरह का जश्न मना रहा है और 10 आसियान देशों को आमंत्रित कर जंबूद्वीपे भरत खंडे की बात की जा रही है लेकिन वहीं, देश में अलगअलग जातियों की ताकत और अहंकार सिर चढ़ कर बोल रहा है और हर गली में दसियों गुट बनवाए जा रहे हैं. जातीय सेनाएं अपनीअपनी अस्मिता की हुंकार भर रही हैं. सरकारें, राजनीतिक दल और धार्मिक संगठन भी छोटीबड़ी जातियों के साथ खड़े हैं. जातियां अपनी बात को जातीय अस्मिता से जोड़ने में कामयाब दिखाई दे रही हैं. ताकत के बल पर लोकतंत्र पर धर्मतंत्र हावी हो रहा है.

‘पद्मावत’ फिल्म को ले कर राजपूत समुदाय के विरोध डरावने हालात की ओर इशारा कर रहे हैं. यह झूठे, खोखले जातीय अहंकार के बल पर पुरानी परंपराएं फिर थोपने की कोशिश है. फिल्म को रोकने के लिए जिस तरह से विरोध और उपद्रव प्रायोजित किया गया, उस से देश को जातीय ताकत के पुनर्जन्म का एहसास हुआ है.

राजपूत संगठनों के विरोध के बीच फिल्म ‘पद्मावत’ करीब 7 हजार सिनेमाघरों में रिलीज हुई. पर 8 राज्यों में उग्र प्रदर्शन, तोड़फोड़, आगजनी और चक्काजाम हुए. दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात, जम्मूकश्मीर, उत्तर प्रदेश में उपद्रव किए गए. हरियाणा के गुरुग्राम में उपद्रवी भीड़ ने तो एक स्कूली बस ही फूंक दी.

फिल्म पर पाबंदी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के 2 बार आए आदेशों के बावजूद ‘पद्मावत’ राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात और गोवा में रिलीज नहीं हुई. सिनेमाघर मालिकों के संगठन मल्टीप्लैक्स एसोसिएशन औफ इंडिया ने तोड़फोड़ के डर से इन राज्यों में फिल्म नहीं दिखाने का ऐलान किया था.

करणी सेना ने धमकियां देनी शुरू कर दीं. मध्य प्रदेश में सैकड़ों राजपूत स्त्रियों से जौहर करने की गीदड़ भभकी दिलवा दी. क्षत्रिय महिला संघ की सैकड़ों महिलाओं ने जयपुर में सिरसी रोड पर प्रदर्शन किया. 30 नवंबर, 2017 को राजस्थान बंद रखा गया. कोटा के एक सिनेमाहौल में तोड़फोड़ की गई.

4 राज्यों के खिलाफ न्यायालय की अवमानना की याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई. याचिका में कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद राजस्थान, मध्य प्रदेश, हरियाणा और गुजरात में लगातार हिंसा हो रही है. राज्य सरकारें पूरी तरह इन घटनाओं को रोकने में नाकाम रही हैं जबकि सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि कानून व्यवस्था बनाए रखना राज्यों की जिम्मेदारी है.

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फिल्म का विरोध

शुरू में ही जनवरी 2017 में जयपुर में फिल्म की शूटिंग के दौरान राजपूत करणी सेना के कुछ सदस्यों ने फिल्म का विरोध किया था और जयगढ़ किले में फिल्म की शूटिंग के सैट पर तोड़फोड़ की. उन्होंने आरोप लगाया कि फिल्म में ऐतिहासिक तथ्यों के साथ छेड़छाड़ की गई है. फिल्म निर्माताओं ने यह आश्वासन दिलाया कि फिल्म में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है. इस के बावजूद शूटिंग नहीं होने दी तो निर्मातानिर्देशक संजय लीला भंसाली फिल्म की शूटिंग करने के लिए महाराष्ट्र चले गए.

मार्च 2017 में फिर कोल्हापुर में फिल्म के सैट पर तोड़फोड़ की गई और आग लगा दी गई जिस से प्रोडक्शन सैट, वेशभूषा और गहने आदि जल गए. फिल्म का प्रोडक्शन बजट 160 करोड़ से बढ़ कर 200 करोड़ रुपए पहुंच गया. जयगढ़ किले में फिल्म की शूटिंग के दौरान श्रीराजपूत करणी सेना ने सैट पर तोड़फोड़ करने के अतिरिक्त संजय लीला भंसाली के साथ बदसुलूकी की थी. रणवीर सिंह के अलाउद्दीन खिलजी और दीपिका पादुकोण के रानी पद्मावती के किरदार के बीच ड्रीम सीक्वैंस फिल्माए जाने की खबर पर हंगामा हुआ था.

हरियाणा भाजपा के मुख्य मीडिया समन्वयक सूरजपाल अमु ने फिल्म में रानी पद्मावती की भूमिका निभा रहीं दीपिका पादुकोण और निर्माता संजय लीला भंसाली का सिर काट कर लाने वाले को 10 करोड़ रुपए का इनाम देने का ऐलान किया था. ऐसे किसी ऐलान करने वाले को राष्ट्रद्रोह के झूठे आरोप में नहीं पकड़ा गया जो आज फैशन बना हुआ है.

क्या थीं आपत्तियां

फिल्म को ले कर मुख्यतया 2 आपत्तियां थीं. कहा गया कि फिल्म में पद्मावती और अलाउद्दीन खिलजी के बीच एक रोमांटिक सपने वाला दृश्य फिल्माया गया है. दूसरी आपत्ति पद्मावती को दरबार में नाचते हुए दिखाए जाने पर है. करणी सेना द्वारा कहा गया कि राजपूत रानी नृत्य कैसे कर सकती है और बिना घूंघट के कैसे दिख सकती है, यह राजपूत संस्कृति और गर्व के खिलाफ है.

विवाद बढ़ा तो सैंसर बोर्ड ने फिल्म ‘पद्मावती’ का नाम बदल कर ‘पद्मावत’ कर दिया, पर विरोध कर रही करणी सेना के सामने सरकार से ले कर विपक्ष तक सभी बेबस नजर आए. यह जातीय दबदबा है कि इस के पीछे सुनियोजित धार्मिक, राजनीतिक व सामाजिक गणित है.

करणी सेना की करनी

राजस्थान में करणी सेना का 2006 में गठन हुआ था. इस के लगभग 10 लाख सदस्य होने का दावा किया जाता है. ‘पद्मावत’ के विरोध के बहाने सेना ने दूसरे राज्यों में भी अपनी पहुंच बना ली. पिछले 12 सालों के दौरान करणी सेना कई मौकों पर इस तरह की गतिविधियों में शामिल रही है पर पहली बार इस का असर इतना व्यापक देखा गया. भले ही सर्वोच्च न्यायालय ने ‘पद्मावत’ को रिलीज करने के लिए सभी राज्यों को सख्त निर्देश दिए हों पर न तो सरकार और न ही विपक्ष करणी सेना के खिलाफ रुख जाहिर करने का साहस दिखा पा रहे हैं. अंदरूनी तौर पर कांग्रेस और भाजपा दोनों दलों के नेता फिल्म के विरोध का समर्थन कर रहे हैं.

अभी लोकेंद्र सिंह कालवी के गुट वाला श्रीराजपूत करणी सेना और अजीत सिंह ममदोली के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय राजपूत करणी सेना समिति सब से मुख्य विरोधी संगठन हैं. इन राजपूत संगठनों ने सब से पहला सार्वजनिक आंदोलन ‘जोधाअकबर’ फिल्म के विरोध में किया जिस में इन्हें सफलता मिली.

पिछले साल राजस्थान में गैंगस्टर आनंदपाल सिंह की पुलिस एनकांउटर में मौत के बाद करणी सेना के आंदोलन के सामने राज्य सरकार को झुकना पड़ा था. राजपूत समुदाय से ताल्लुक रखने वाले गैंगस्टर आनंदपाल सिंह के समर्थन में राजपूत संगठन आ जुटे और मौत की सीबीआई जांच की मांग की गई. इस पर राज्य सरकार ने पहले तो सीबीआई जांच से साफ इनकार कर दिया पर बाद में इस जाति के बढ़ते दबाव के चलते उसे सीबीआई जांच का आदेश देना पड़ा.

इसी तरह दूसरी छोटीबड़ी जातियां भी आजकल अपनीअपनी ताकत के सहारे अपनी बातें मनवाने में कामयाब हो रही हैं. मजे की बात यह है कि हर जाति व्यापक कट्टर हिंदू अस्मिता से खुद को जोड़ने में सफल हो रही है.

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पद्मावत और जौहर

फिल्म ‘पद्मावत’ सूफी संत मलिक मुहम्मद जायसी की ‘पद्मावत’ रचना पर आधारित है. पद्मावत 1540 ई. की रचना है जबकि इतिहास के अनुसार, चित्तौड़ पर खिलजी के हमले की घटना 1303 ई. की है. पद्मावत में चित्तौड़ की प्रसिद्ध रानी पद्मावती का वर्णन किया गया है जो रावल रतन सिंह की पत्नी थी. पद्मावत रचना के अनुसार, चित्तौड़ पर अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण का कारण रानी पद्मावती के अनुपम सौंदर्य के प्रति उस का आकर्षण था. आखिर खिलजी चित्तौड़ के किले पर अधिकार करने में कामयाब हो गया. राणा रतन सिंह युद्ध में मारे गए और उन की पत्नी पद्मनी अन्य स्त्रियों के साथ जलती आग में कूद कर भस्म हो गई जिसे ‘जौहर’ नाम दिया गया.

बिना फिल्म देखे ‘पद्मावत’ फिल्म के बारे में यह धारणा बना दी गईर् कि इस में राजपूतों के शौर्य, साहस और बलिदान को कम कर के दिखाया गया है. रानी पद्मावती के ऐतिहासिक किरदार के साथ छेड़छाड़ का आरोप लगाया गया. राज्यों में जारी हिंसा से केंद्र सरकार ने खुद को अलग कर लिया था.

पिछले कुछ समय से अलगअलग जातियां अपनीअपनी अस्मिता के प्रचार में कामयाब होती नजर आई हैं. फिल्म का विरोध कर रही करणी सेना राजपूतों की प्रतिष्ठा की हुंकार भर कर खुद को कट्टर हिंदू भावना से जोड़ने में सफल दिखाई दे रही है. ‘पद्मावत’ के विरोध के दौरान उस के सदस्यों को राजपूतों के साथ हिंदुओं के भी सम्मान के रूप में पेश किया गया है.

जातीय अस्थिरता के बहाने

राजपूत समुदाय द्वारा ‘पद्मावत’ का विरोध पौराणिक पाखंडी जातीय मानसिकता की मजबूती का संदेश है. इस समुदाय के साथ जिस तरह से कट्टर हिंदू संगठन और भाजपा सरकारें खड़ी दिखाई दे रही हैं, वह जताता है कि ताकत के बल पर जातीय अहंकार को भुना कर पौराणिक चढ़ावा संस्कृति की पुनर्स्थापना की जाएगी. ‘पद्मावत’ को ले कर विरोध पर उतरी राजपूत जाति ही नहीं, पिछले कुछ समय से अपनीअपनी मांगों के लिए आंदोलनरत जातियां जिस तरह अपनी आन, बान व अस्मिता को कायम रखने में कामयाब दिखाई दे रही हैं वह सदियों पुरानी वर्णव्यवस्था की कमजोर पड़ रही परंपराओं को फिर से मजबूत करने का संकेत ही है.

कुछ समय से मनुस्मृति और गीता का महिमागान बढ़ गया है. गीता को पाठ्यक्रम में लागू करने की मांग की जा रही है. इन ग्रंथों में वर्णव्यवस्था की पैरवी की गई है और जाति को ईश्वर की देन माना गया है.

असल में पिछले कुछ समय से देश में जातीय अहंकार उबल रहा है. जाट पिछड़ा आरक्षण की मांग को ले कर राजस्थान, हरियाणा, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में आंदोलनरत हैं. वे आएदिन ट्रेन, बस, सड़क रास्ता जाम, तोड़फोड़ और हिंसा पर उतारू दिखाई दे रहे हैं. वे अपनी ताकत के बल पर सरकारों को झुकाने में सफल दिखते हैं. सरकारें और राजनीतिक  दल जाटों की आरक्षण की मांग के समर्थन में खड़े हैं. कोई विरोध की हिम्मत नहीं दिखा पाता है.

गुजरात और मध्य प्रदेश में पटेल, पाटीदार अपनी जातीय अस्मिता की बात कर सरकारी नौकरियों में आरक्षण के लिए आंदोलन कर रहे हैं. उन के आगे शासन, प्रशासन पंगु बना दिखता है.

राजस्थान में गुर्जर जनजाति में आरक्षण के लिए सरकार और राजनीतिक दलों को अपनी ताकत का लोहा मनवा चुके हैं. गुर्जरों की ताकत के आगे कोई राजनीतिक दल विरोध की स्थिति में नहीं है.

उधर, महाराष्ट्र में मराठा जातियां पिछड़ा वर्ग में शामिल होने की कवायद में अपनी शक्ति का एहसास कराने में पीछे नहीं हैं.

दलितों का दमन

इस दौर में बराबरी की मांग करने वाले दलितों का दमन चरम पर है. अभिव्यक्ति की आजादी का हनन जारी है. दलितों को अलगथलग रखने के लिए उन पर हिंदू कट्टरपंथियों द्वारा हिंसात्मक वारदातों को अंजाम दिया जा रहा है. सदियों से रह रहे दलितों को संदेश दिया जा रहा है कि तुम दलित हो. सदियों से रह रहे दलित की तरह रहो. मूंछें रख कर ठाकुर बनने की कोशिश मत करो. परंपरा में तुम्हारे लिए मंदिरों में प्रवेश निषिद्ध है. मंदिर में प्रवेश कर तुम ब्राह्मण मत बनो. पढ़ाईलिखाई मत करो. बराबरी और हक  की आवाज मत उठाओ वरना कुचल दिए जाओगे. छुआछूत के पैरोकारों द्वारा जातीय, धार्मिक मतभेदों को हवा दी जा रही है. आतंक पैदा किया जा रहा है.

इसी तरह मुसलमानों को दोयम दर्जे का मान लिया गया है. उन्हें पाकिस्तानी बताया जा रहा है. लवजिहाद के नाम पर मुसलिम युवाओं को प्रताडि़त किया जाता है. मवेशियों, मीट के व्यापार को प्रतिबंधित किया जा रहा है.

इन की श्रेणी में स्त्रियों को भी शामिल कर लिया गया है. औरतों के साथ यौन हिंसा की बढ़ती वारदातें बताती हैं कि स्त्री केवल भोग की वस्तु है. मर्द जब चाहे, जहां चाहे उसे उपभोग कर सकता है. स्त्री पाप की गठरी है. मर्द की चेरी है. उसे बराबरी का अधिकार नहीं है. शास्त्रों के अनुसार उस की मुक्ति पुरुष के चरणों में है. साधुसंतों, गुरुओं की सेवा करना ही उस का धर्म है. छोटी लड़कियों को आश्रमों में दान में दे दिया जाता है. यह प्राचीन परंपरा है, इस का पालन करना होगा.

तमाम नए कानूनों और कानूनों में संशोधनों के बावजूद स्त्रियों पर बढ़ती यौनशोषण की घटनाओं के पीछे धार्मिक संकीर्ण सोच ही है जो औैरतों को बराबर मानने से रोकती है. स्त्री को ले कर दोयम दर्जे की सामाजिक सोच हमारी सदियों पुरानी परंपरा में शामिल है.

हालांकि इन कट्टर जातियों का परस्पर टकराव फिलहाल अधिक दिखाई नहीं दे रहा पर इस में देर नहीं लगेगी. ‘पद्मावत’ को ले कर राजपूत समुदाय किसी दूसरी जाति से नहीं लड़ रहे. जाट, पाटीदार, गुर्जर, मराठा जातियां भी अन्य जातियों से टकराती नहीं नजर आ रहीं पर विभाजन स्पष्ट दिखता है. जातियां अपनेअपने अस्तित्व, अपनीअपनी अस्मिता का झंडा उठाए घूम रही हैं.

ताकत के सहारे जातियों का यह अपनाअपना अलग राग 69वें गणतंत्र को अंगूठा दिखा रहा. इतने सालों के बावजूद जाति व्यवस्था के उन्मूलन के बजाय इसे कायम रखने व ज्यादा मजबूत करने की कोशिशें की जा रही हैं और सरकार का पूरा खुला व छिपा समर्थन साथ है. कट्टर होते समाज की भय उत्पन्न करने वाली स्थिति है. राजनीतिक दलों ने जातियों को ताकतवर बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. शिक्षा, नौकरियों में आरक्षण, चुनावी टिकट वितरण जैसे कामों में राजनीतिक दल सत्ता के लिए जातियों को बढ़ावा देते रहे हैं.

संविधान बनाम पौराणिक परंपराएं

‘मनुस्मृति’ और ‘गीता’ को वास्तव में भारतीय संविधान से ऊपर मानने वाले कम नहीं हैं. हिंदूराष्ट्र के नारे बुलंद किए जा रहे हैं. भाजपा के कई नेताओं द्वारा भेदभाव वाली वर्णव्यवस्था की पैरवी करने वाले ग्रंथ ‘गीता’ को राष्ट्रीय किताब और उसे पाठ्यक्रमों में लागू करने की बातें उठाई जाती रही हैं. हिंदुओं  के साधुसंत, गुरु और शंकराचार्य तक जातिव्यवस्था स्थापित करने वाले हिंदू धर्मग्रंथों की परंपराओं को चलाने का आह्वान करते सुने जा सकते हैं. राष्ट्रवाद को, देशभक्ति को, हिंदू से जोड़ दिया गया है. भारत का अर्थ हिंदू पौराणिक देश बना दिया गया है.

जातिव्यवस्था स्थापित करने वाले हिंदू ग्रंथ ‘मनुस्मृति’ का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एम एस गोलवरकर जैसे कट्टरपंथियों ने महिमामंडन किया. संघ के नेताओं ने 1947 में ही भारतीय संविधान का इस आधार पर विरोध किया कि जब हमारे पास ‘मनुस्मृति’ के रूप में एक अद्भुत संविधान मौजूद है तो हमें नए संविधान की जरूरत क्या है.

हिंदू नेता आचार्य धर्मेंद्र ने भी कहा था कि हिंदुस्तान में हिंदूद्रोह निसंदेह देशद्रोह है. केंद्र सरकार को फिल्म ‘पद्मावत’ पर प्रतिबंध लगा कर फिल्मकार पर मुकदमा दर्ज करना चाहिए.

हिंदू नेता गाहेबगाहे धर्म की परंपराओं की स्थापना पर बल देते रहे हैं. गीता को मनुस्मृति का छोटा संस्करण माना गया है. वहीं, भाजपा सरकार गीता का प्रचारप्रसार करने में जुटी हुईर् है. इस के नेताओं द्वारा गीता की प्रतियां बांटी जा रही हैं.

करणी सेना, शिवसेना, महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना, भीम सेना, राम सेना, दलित सेना, गुर्जर सेना, भीम आर्मी, जाट महासभा, राजपूत महासभा, क्षत्रिय महासभा, दुर्गा वाहिनी, हिंंदू वाहिनी, केसरिया वाहिनी, हनुमान दल, बजरंग दल जैसे अनगिनत जातीय, वर्र्ग आधारित संगठन बने हुए हैं. यह बंटे हुए समाज की सब से बड़ी मिसाल है. ये सब जाति व्यवस्था को ही मजबूत कर रहे हैं और सोच यह है कि जातियां मजबूत होंगी तो हिंदू धर्म खुद ही मजबूत होगा, जबकि होगा उलटा ही. आपसी फूट सदा देश को गुलाम बनाती रही है और जातियों का गणित ऐसा है कि न स्थिर सरकार रहेगी न सुशासन.

इन जातियों के अलगअलग देवीदेवता हैं. जातियों ने अपनेअपने ऊंचे, नीचे अवतारों को भी बांट लिया है. सब से ऊंची जाति वालों के लिए विष्णु, उस से नीचे वाले शूद्रों के लिए शिव, हनुमान, शनि, साईंबाबा. इसी तरह जातियों के आधार पर इन के गुरु भी बना दिए गए जो सवर्ण, पिछड़ों और दलितों में बंटे हुए हैं और अपनीअपनी दुकानें सफलतापूर्वक चला रहे हैं.

भारतभूमि में लोग तपश्चर्या करते थे, यज्ञ, हवन करते थे, परलोक के लिए आदरपूर्वक दान देते थे. पुरोहित कथावाचन करते थे. यजमान कथा सुनते थे, कर्मकांड कराते थे. सब वर्णव्यवस्था के अनुसार अपनाअपना कर्म करते थे.

हिंदू राष्ट्रवाद के पैरोकार देश में फिर से इस परंपरा की पुनर्स्थापना करना चाहते हैं जिस में हिंदू धर्मग्रंथों के मूल्यों और चढ़ावों का बोलबाला हो. वह उन वैदिक मूल्यों को पुनर्जीवित करना चाहते हैं जिन का एक लोकतांत्रिक, आधुनिक वैज्ञानिक समाज में कोई स्थान नहीं हो सकता.

चढ़ावा संस्कृति की वापसी

इस देश में राजामहाराजाओं के समय धर्म के हुक्म पर चलने की परंपरा रही है. राजाओं के दरबार में पुरोहित धार्मिक सलाहकार होते थे. राजा उन्हीं के सलाहमशवरे पर पूरा राजपाट चलाते थे. राजाओं को इतना आशंकित कर के रखा जाता था कि पुरोहित की सलाह के बिना वे कोई भी फैसला नहीं करते थे. राजा दशरथ से ले कर मराठों की अष्टप्रधान व्यवस्था तक ऐसा ही माहौल था.

चित्तौड़ के रावल रतन सिंह समेत तब के राजाओं के दरबार में भी पुरोहित नियुक्त थे. उन्हीं की सलाह पर रानियों को जलती चिताओं पर चढ़ा दिया जाता था.

इतिहास के अनुसार, महमूद गजनवी के समय से राजस्थान और गुजरात में जौहर की परंपरा शुरू हुई थी. हालांकि तब तक भारत के ताजातरीन इतिहास की उम्र डेढ़ हजार साल हो चुकी थी और इसलाम के आने के पहले एक हजार साल के दौरान हिंदू राजाओं के बीच सैकड़ों बार तलवारें खनक चुकी थीं. उत्तर भारत में हर्षवर्द्धन व महमूद गजनवी के बीच के करीब 500 साल तक राजामहाराजा एकदूसरे से ईंट से ईंट बजाते रहे.

महमूद गजनवी जब हिंदूकुश में अनंगपाल को परास्त कर के पंजाब होता हुआ राजस्थान में घुसा तो उस के खिलाफ मोरचे खुले, पर राजस्थान में उसे कोई बड़ा युद्ध नहीं लड़ना पड़ा. राजा खुद को और अपनी प्रजा को किले के अंदर कर दरवाजा बंद कर लेता. कुछ दिन घेरेबंदी चलती, कुछ झड़पें होतीं और एक समय ऐसा आता कि बाहर से कोई मदद न मिलने के कारण दुश्मन की घेराबंदी किले के अंदर मौत का साया बन जाती. तब विवशतावश राजा को अपनी सेना के साथ किले से बाहर आ कर लड़ना पड़ता, जिस से सिर्फ मौत मिलती. किले के अंदर राजा की दोचार सौ रानियां, राजकुमारियां बचतीं और बचते कुछ लाचार बुजुर्ग और उन के बीच कुल ब्राह्मण होता था जो सब औरतों की चिताएं तैयार करवाता, उन्हें जलवाता. तब उन चिताओं पर डेढ़ साल से ले कर 90 साल तक की बुढि़या जौहर करतीं.

राजपूत समाज सती परंपरा का पोषक रहा है. 1987 में राजस्थान के सीकर जिले में देवराला में हुए रूपकंवर सती कांड ने देश को झकझोर दिया था. तब यही समुदाय रूपकंवर की चिता पर तलवारों के साथ पहरा देता रहा. चिता की परिक्रमा में जुटा रहा और सती का खूब महिमामंडन किया गया. अब  ‘पद्मावती’  के नाम पर भी राजपूत समाज जातीय अस्मिता की बात कर रहा है. यह कैसी आन, बान, शान है?

समाज में सामंती अहंकार, भेदभाव, नफरत, हिंसा के उन्मादी लोगों की भुजाएं सियासी और सामाजिक ताकत  पाती रही हैं. यह सब हिंदुत्व के नाम पर हो रहा है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ चाहता है जातिव्यवस्था बनी रहे और धर्म में चढ़ावे की परंपरा और मजबूत हो. चढ़ावे के समर्थक हिंदू संगठन इस काम में सफल होते दिख रहे हैं.

प्राचीन परंपराओं को जिंदा कौन रखना चाहता है, चढ़ावा पाने वाले. हिंदुत्व के पहरेदार धर्म की दुकानदारी में मंदी नहीं आने देना चाहते. अब जब देश में हिंदू राष्ट्रवादियों की सरकार है तो पुरानी परंपराएं न सिर्फ जिंदा की जाएंगी, उन को कायम रखने का प्रयास भी किया जाएगा. ‘पद्मावत’  के विरोध में उतरे राजपूत समुदाय के साथ हिंदू संगठन सतीप्रथा का महिमामंडन चाहते हैं.

धर्म के ठेकेदार चाहते हैं कि सती के मंदिर बनें और वहां भरपूर चढ़ावा आए ताकि पुरोहितों के लिए हलवापूरी का इंतजाम कायम रहे. यह चढ़ावा संस्कृति दलितों को भी बेच दी गई है और वे अपने अनैतिक अपौराणिक देवीदेवताओं को पूजने व उन पर पैसा बरसाने को तैयार हो गए हैं.

भाजपा राज्य सरकारें इसीलिए विरोधियों के पक्ष में खामोश हैं. हिंदू संगठन करणी सेना के साथ हैं क्योंकि चढ़ावा को बढ़ावा देना है. आखिर हिंदुत्व की खोई हुई पहचान लौटानी है. चढ़ावा रहेगा, तभी हिंदुत्व बचेगा. चढ़ावा से ही हिंदुत्व चलेगा.

यह स्थिति भारत में ही नहीं है, विश्वभर में इतिहास में पीछे जाने की सनक बढ़ रही है. असहमति के खिलाफ हिंसक मोरचे पनप गए हैं. संवैधानिक विचारधारा और समाज की सोच में अंतराल बढ़ रहा है. यह अंतराल किसी क्रांतिकारी बदलाव का नहीं है, यह कट्टरता और उदारता का है. हमारा संविधान उदारता की गुंजाइश देता है और यह तभी लागू हो सकता है जब उस के मानने वाले उदार हों. दुख की बात है कि देश में सामाजिक, धार्मिक ही नहीं, राजनीतिक उदारता भी  दम तोड़ रही है.

फिल्मकार, चित्रकार, बुद्धिजीवी वर्ग को अभिव्यक्ति की आजादी के लिए केवल संवैधानिक संस्थाओं पर भरोसा करने के बजाय गैरसरकारी संगठनों का भी सहारा लेना पड़ रहा है. जातीय, धार्मिक संगठन हैं कि वे फिल्मकारों को धमका रहे हैं और परोक्ष चेतावनी भी दे रहे हैं.

धर्म, जाति के नाम पर इस तरह की गैरसंवैधानिक हिंसक हरकतें भारत की कैसी सभ्यता का दर्शन करा रही है, रचना और विचारों का जवाब श्रेष्ठ विचार और रचना से दिया जा सकता है, लेकिन उपद्रव, हिंसा, प्रतिबंध की जिद पर अड़ा समाज कैसी सभ्यता स्थापित कर रहा है?

आज विज्ञान के दौर में, गणतंत्र लागू होने के लगभग 7 दशकों बाद भी, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता एवं एकता की मूल अवधारणा वाले भारतीय संविधान के ऊपर धर्म की व्यवस्था चाहने वाले हावी दिखाई दे रहे हैं. चढ़ावा चाहने वाले अपनी ताकत सिद्ध करते हुए धर्म की अमानवीय, असमानता और बर्बर परंपराओं की पुनर्स्थापना करने के प्रयासों में सफल होते दिखाई दे रहे हैं तो यह इस देश के लोकतांत्रिक संविधान की नहीं, समाज की कमजोरी है.

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