प्रोफैसर अमर्त्य सेन ने एक बार कहा था, ‘‘भारत एकमात्र ऐसा देश है जो अशिक्षित व स्वास्थ्यहीन श्रमबल के आधार पर वैश्विक आर्थिक शक्ति होने की कोशिश कर रहा है. ऐसा किसी देश में कभी नहीं हुआ. यह असंभव है.’’ अमर्त्य सेन का यह तंज समझने की जरूरत है और सरकार को कोरी लफ्फाजी वाले वादों, दावों, 56 इंच का सीना, विश्वगुरु का सपना और पौराणिक काल की संस्कृति व धर्म के बखान व सब्जबाग दिखाने के बजाय शिक्षा व रोजगार की मूलभूत कमियों को दूर कर नए सार्थक, स्वस्थ रोजगार के अवसर मुहैया कराने पर जोर देने की जरूरत है.

मध्य प्रदेश माध्यमिक शिक्षा मंडल द्वारा आयोजित 10वीं और 12वीं की परीक्षाओं के नतीजे इस साल चौंका देने वाले थे. हर किसी को यह जानकर सुखद आश्चर्य हुआ था कि इस साल 10वीं में 65.54 और 12वीं में 68.07 फीसदी छात्र उत्तीर्ण हुए. केवल एक साल में कुल कामयाब छात्रों की संख्या 12 लाख 54 हजार 920 के लगभग है. इस से सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस दौर के युवा पढ़ाई पर जरूरत से ज्यादा ध्यान दे रहे हैं. इन छात्रों को कम उम्र में समझ आ  गया है कि अगर अच्छी नौकरी चाहिए तो लगन और मेहनत से पढ़ाई करनी जरूरी है.

हर साल की तरह इस साल भी मैरिट में आए छात्रछात्राओं के इंटरव्यू न्यूज चैनल्स व अखबारों ने दिखाए व छापे. शिवपुरी जैसे पिछड़े जिले से टौप पर रहे 12वीं के ललित पचौरी की इच्छा सिविल सेवा में जाने की है तो 10वीं की टौपर रही विदिशा की अनामिका साध सौफ्टवेयर इंजीनियर बनना चाहती है. मोटी तनख्वाह वाली प्राइवेट या रसूखदार सरकारी नौकरी मैरिट से चूक गए छात्रों का भी ख्वाब है. इस के लिए उन्हें समझ आ गया है कि आइंदा और ज्यादा मेहनत से पढ़ना है.

अच्छे नतीजे देने में घटिया क्वालिटी की पढ़ाई के लिए बदनाम सरकारी स्कूलों के छात्र भी पीछे नहीं रहे. 300 के लगभग बनी विभिन्न संकायों की मैरिट में 43 छात्र सरकारी स्कूलों के थे. उन का परीक्षा परिणाम भी 50 फीसदी के लगभग रहा.

इन आंकड़ों को देखते हुए यह बात तो स्पष्ट हो जाती है कि छात्र चाहे वे गांवदेहात के हों या शहरों के, किसी भी कीमत पर प्रतिस्पर्धा से पिछड़ना नहीं चाहते. उन्हें यह एहसास है कि अच्छे जौब का रास्ता अच्छे नंबरों से हो कर जाता है, इसलिए 10वीं और 12वीं जैसे बोर्ड के इम्तिहानों में फेल होना मंजिल तक पहुंचने में अड़ंगा ही है.

पर मंजिल है कहां

छात्रों की मेहनत और कामयाबी वाकई बेमिसाल है जिस पर फख्र करना स्वाभाविक बात है. लेकिन यह बात, कामयाब छात्रों का आंकड़ा देखते व उन के भविष्य के लिहाज से कम चिंताजनक भी नहीं कही जा सकती.

मिसाल मध्य प्रदेश की ही लें, वहां पहले से ही डेढ़ करोड़ के लगभग बेरोजगार युवा धूल फांक रहे हैं. मिसाल देशभर की लें, तो बेरोजगारों की तादाद 18 करोड़ का चिंताजनक आंकड़ा छू रही है. इन में पढ़ेलिखे युवाओं की तादाद ज्यादा है.

मोदी सरकार काफी समय से विश्वभर की आर्थिक एजेंसियों के हवाले से भारत में बढ़ते रोजगार व जीडीपी ग्रोथ का ढोल पीटती रही है. लेकिन विश्वबैंक की एक रिपोर्ट ‘जौबलैस ग्रोथ-2018’ मोदी सरकार के कथन से परदा हटा रही है. रिपोर्ट के मुताबिक, देश की आर्थिक व्यवस्था को डूबने से बचाने के लिए हर साल करीब 80 लाख नौकरियों की जरूरत है. अगर यह आंकड़ा पूरा नहीं हुआ तो देश बेरोजगारों की हताशा व तादाद से टूट जाएगा.

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रिपोर्ट की मानें तो 2015 में भारत की रोजगार दर 52 प्रतिशत थी, जबकि नेपाल (81 प्रतिशत), मालदीव (66 प्रतिशत), भूटान (65 प्रतिशत) और बंगलादेश जैसे देश भारत से बेहतर स्थिति में थे. इस सूची में भारत से सब ऊपर व बेहतर थे. साल 2017 में करीब 18.3 लाख भारतीय बेरोजगारों का यह आंकड़ा 2019 तक 189 लाख हो जाएगा.

ऐसे में 10वीं, 12वीं या स्नातक स्तर पर कामयाब हो रहे लाखों छात्रों की फौज इस तादाद में और इजाफा करेगी. उत्तीर्ण हुए युवाओं के चेहरों की मासूमियत, जिस में नौकरी और बेहतर जिंदगी के ख्वाब झलकते हैं, के साथ क्या न्याय हो पाएगा? जाहिर है, नहीं. ऐसे में इस अन्याय का जिम्मेदार कौन है, इस सवाल का स्पष्ट जवाब ढूंढ़ पाना टेड़ी खीर है.

यह भी एक स्थापित तथ्य है कि बोर्ड इम्तिहानों में हर साल छात्रों की भागीदारी बढ़ती है जिसे स्पष्ट शब्दों में कहें तो देशभर में हर साल 2 करोड़ के लगभग बेरोजगार स्कूलों और कालेजों से किसी बेकार प्रौडक्ट की तरह निकलते हैं.

देश में इस वक्त बेरोजगारों की संख्या 18 करोड़ है. इस मेंलगभग 12 करोड़ शिक्षित बेरोजगार हैं. दरअसल, बेरोजगारों की समस्या से नजात पाने के लिए सरकार को स्किल डैवलपमैंट व लघु उद्योगों को बढ़ावा देना चाहिए. युवाओं को नौकरी लायक बनाने के लिए वोकेशनल प्रशिक्षण के जरिए इन कीस्किल डैवलप करने के बजाय सरकार विज्ञापनबाजी में ही उलझी दिखती है. हालांकि रोजगार का सीधा संबंध शिक्षा से है लेकिन बेहतरीन नतीजों के बीच छिपी शिक्षा जगत की कमियों की अनदेखी करने के चलते नौकरियां कम हो रही हैं.

उद्योग संगठन एसोचैम व यस इंस्टिट्यूट की जौइंट स्टडी के मुताबिक, भारत की महज 16 प्रतिशत कंपनियां संस्थान के भीतर प्रशिक्षण देती हैं जबकि चीन में यह काम 80 प्रतिशत कंपनियां कर रही हैं. यहां तक कि विश्व के 200 शीर्ष विश्वविद्यालयों में भारत के सिर्फ 2 शिक्षण संस्थान (आईआईटी दिल्ली व दिल्ली विश्वविद्यालय) जगह बना पाते हैं.

स्टडी के मुताबिक, देश की मेधावी प्रतिभाएं रिसर्च व स्टडी के लिए विकसित देशों में चली जाती हैं. करीब 6 लाख भारतीय विद्यार्थी विदेश में पढ़ाई कर रहे हैं और वहां 20 अरब डौलर सालाना खर्च करते हैं. जाहिर है जो प्रतिभाएं बचती हैं वे स्किल में कमजोर होती हैं. ऐसे लोग अव्वल नंबर ला कर भी देश में कुछ उल्लेखनीय व प्रोडक्टिव कार्य नहीं कर पाते.

इसी स्टडी के अनुसार, भारतीय उच्चशिक्षा क्षेत्र रोजगार के अल्पस्तर, रिसर्च की कमी व उद्यमिता के सीमित विकल्पों का शिकार है. जाहिर है इस से नजात पाने के लिए उच्चशिक्षा सिस्टम को विश्वस्तर का बनाने व भविष्य आधारित तकनीकी शैक्षणिक रूपरेखा बनाने की दरकार है. सरकार इस मोरचे पर भी पूरी तरह से फेल नजर आती है.

इसीलिए नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद बेरोजगारों की फौज में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है. वजह साफ है कि मोदी सरकार का ध्यान विस्फोटक होती इस समस्या पर है ही नहीं. प्रसंगवश यह उल्लेखनीय है कि इन्हीं नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के लिए 2 करोड़ युवाओं को रोजगार देने का वादा किया था जिसे ले कर वे युवाओं के भी निशाने पर हैं.

मध्य प्रदेश के ललित पचौरी और अनामिका साध का सरकारी या अच्छी प्राइवेट नौकरी करने का ख्वाब पूरा होगा, इस का उन के मैरिट में होने से कोई संबंध नहीं. फिर बाकी लाखों छात्रों के भविष्य के बारे में सोच कर दहशत ही होती है. यह सोचना एकदम बेमानी या निरर्थक नहीं कि, क्या फायदा ऐसी पढ़ाई से जो एक ऐसी बीमार अर्थव्यवस्था और सिस्टम में पलबढ़ रही है जो खुद कैंसर जैसी घातक व जानलेवा बीमारी सरीखी है.

बेरोजगार युवाओं के साथ छलकपट और उन्हें सब्जबाग दिखाना क्या गुनाह नहीं, इस सवाल का जवाब बहुत पेचीदा नहीं है. यह सच है कि सरकार सभी युवाओं को नौकरी नहीं दे सकती क्योंकि उस के पास नौकरियां सीमित हैं लेकिन परेशानी और अफसोस की बात यह है कि वह प्राइवेट सैक्टर से भी रोजगार के मौके छीन रही है और ऐसा वह खुद मानती भी है.

मध्य प्रदेश बेरोजगार सेना के एक पदाधिकारी राज ठाकुर की मानें तो लोकतंत्र में नौकरी, रोजगार या व्यवसाय के मौके उपलब्ध कराना सीधेतौर पर सरकार की जिम्मेदारी होनी चाहिए. युवाओं का काम तो पढ़लिख कर डिगरी या सर्टिफिकेट हासिल करना होता है.

यह आक्रोशित जवाब मुमकिन है सरकार के प्रति ज्यादती लगे, लेकिन सरकार और दूसरी एजेंसियों के बयानों और आंकड़ों पर गौर करें तो साफ लगता है कि पढ़ाने की जिम्मेदारी तो वह ठीकठाक तरीके से निभा रही है, लेकिन रोजगार के मोरचे पर मुंह छिपाती रहती है.

भयावह हैं हालात

लाख कोशिशों के बाद भी सरकार बेरोजगारी पर अपनी असफलता को छिपा नहीं पा रही है जिस से युवाओं में सुखद भविष्य को ले कर एक अजीब सी बेचैनी और आशंका है.

यह बेचैनी अगर वक्त रहते दूर नहीं हुई तो सरकार को बड़े पैमाने पर युवाओं का हिंसक आक्रोश झेलने के लिए तैयार रहना चाहिए. यह बात अपनी जगह ठीक है कि सरकार सभी बेरोजगारों को नौकरी नहीं दे सकती लेकिन यह बात भी उतनी ही सच है कि सरकार प्राइवेट सैक्टर में रोजगार के मौके बजाय पैदा करने के, उन्हें खत्म कर रही है. ऐसा करने के पीछे उस के राजनीतिक, आर्थिक और दीगर स्वार्थ हो सकते हैं लेकिन शुतुरमुर्ग की तरह आंखें बंद कर लेने से मुसीबत टलने वाली नहीं.

देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 50 के दशक के उत्तरार्ध में लखनऊ में एक आयोजन में साफतौर पर माना था कि हर साल 10 लाख पढे़लिखे युवा शिक्षण संस्थानों से निकल रहे हैं लेकिन सरकार के पास देने के लिए 10 हजार नौकरियां भी नहीं हैं.

तब देश नयानया आजाद हुआ था और आबादी 40 करोड़ के लगभग थी. अब हालत यह है कि आबादी 130 करोड़ के लगभग है जिस में से 18 करोड़ लोग हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं यानी बेरोजगार हैं. इन में भी युवाओं की संख्या तकरीबन 14 करोड़ है. तब देशभर के कुल स्नातकों की संख्या भी उतनी नहीं थी जितने आज एक साल में निकलते हैं.

भारत की आबादी में 65 प्रतिशत हिस्सा 35 साल से कम उम्र के युवाओं का है यानी दुनिया के सब से बड़े लोकतंत्र होने के नाते हमारे पास सब से ज्यादा रोजगार पैदा करने के अवसर हैं. लेकिन हम फिर भी फेल हो रहे हैं.

दूसरी एजेंसियों की रिपोर्ट्स के अलावा खुद सरकार का श्रम विभाग यह स्वीकार कर चुका है कि देश में 12 करोड़ लोग बेरोजगार हैं. जिन के चलते भारत दुनिया के सब से ज्यादा बेरोजगारों का देश बन गया है. श्रम विभाग ने यह भी माना है कि साल 2015-16 में बेरोजगारी की दर 5 साल के उच्चतम स्तर पर पहुंची.

दिलचस्प बात सरकार की यह स्वीकारोक्ति थी कि इन 12 करोड़ बेरोजगारों में से वह महज 1 लाख 35 हजार लोगों को ही नौकरी दे पाई है. श्रम विभाग की एक रिपोर्ट में यह भी माना गया है कि स्वरोजगार के मौके घटे हैं और नौकरियां कम हुई हैं.

वित्तीय वर्ष 2012 से 2016 के बीच रोजगार के लिए 8.41 करोड़ लोग आए लेकिन श्रमशक्ति में बढ़ोतरी केवल 2.01 करोड़ की रही. इस में भी कामकाजी उम्र वाली आबादी का 24 प्रतिशत हिस्सा श्रमशक्ति से जुड़ा, वहीं 76 प्रतिशत इस से बाहर रहा.

संयुक्त राष्ट्र श्रम संगठन की एक रिपोर्ट में पहले ही यह चेतावनी दी जा चुकी है कि साल 2018 में भारत में बेरोजगारी और बढ़ सकती है जो बेरोजगार युवाओं के लिए खतरे की घंटी है.

वर्तमान सरकार सिर्फ नए रोजगार पैदा करने के मामले में फेल नहीं है, बल्कि लाखों की संख्या में रिक्त पदों को भरने में भी वह नाकाम नजर आती है. सरकारी व गैरसरकारी आंकड़ों के मुताबिक, फिलहाल देश में लगभग 14 लाख डाक्टरों की कमी है, करीब 40 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में 6 हजार से भी ज्यादा पद खाली हैं, आईआईटी, आईआईएम व एनआईटी में हजारों पद खाली हैं. वहीं शेष इंजीनियरिंग कालेजों में 27 प्रतिशत शिक्षकों की जरूरत है और करीब 12 लाख स्कूली शिक्षकों के पद खाली हैं. अगर ये तमाम खाली पद भी सरकार युवाओं से भर दे तो बेरोजगारी पर किसी हद तक अंकुश लगाया जा सकता है.

नोटबंदी ने निगलीं नौकरियां

कांग्रेस के शासनकाल में भी बेरोजगारी थी और आज भी है, लेकिन यह अचानक हैरतअंगेज तरीके से बढ़ी है तो इस के लिए मौजूदा सरकार द्वारा लिए गए कुछ जिद्दी व अदूरदर्शी फैसले हैं, जिन में से पहला नोटबंदी और दूसरा जीएसटी लागू करना है.

सैंटर फौर मौनिटरिंग इंडियन इकोनौमी यानी सीएमआईई के एक सर्वे की मानें तो 8 नवंबर, 2016 से लागू नोटबंदी के बाद जनवरी 2017 से ले कर अप्रैल 2017 तक तकरीबन 15 लाख लोगों को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा था यानी हर रोज 450 लोगों की नौकरियां गईं. 4 महीने के इस सर्वे में संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्र शामिल किए गए थे.

कहां तो 2014 के लोकसभा चुनावप्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी ने हर साल एक करोड़ युवाओं को नौकरी देने का वादा किया था और कहां अब हर साल लाखों की लगीलगाई नौकरियां भी जा रही हैं. हालांकि बेरोजगारी की भयावह बदहाली को सरकार कौशल विकास जैसी योजनाओं से ढकने की कोशिश कर रही है पर वह उस में कामयाब नहीं हो पा रही है.

नोटबंदी के बाद जीएसटी के फैसले ने आग में घी डालने का काम किया. किराने के छोटे दुकानदारों से ले कर बड़ी नामी कंपनियों ने छंटनी शुरू कर दी तो इस के पीछे उन की अपनी मजबूरियां थीं जो इस फैसले से पैदा हुई थीं. व्यापारियों और कंपनियों को अपने खर्चे कम करने के लिए भी मजबूर होना पड़ा तो इस की गाज हर किसी पर गिरी.

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नोटबंदी और जीएसटी की जुगलबंदी से प्राइवेट सैक्टर में नौकरियां घटीं जिस का खमियाजा रोजगार छिनने की शक्ल में सामने आया और हर नियोक्ता ने कर्मचारी हटाए जिस के काम का भार दूसरे कर्मचारियों पर पड़ा यानी नौकरी करने की शर्त अब गधे की तरह बोझ ढोते रहने की भी हो गई है.

इन फैसलों से किसी को कोई फायदा हुआ होता तो भी एकदफा बात समझ आती, लेकिन बेरोजगारी बढ़ने का नुकसान साफसाफ दिख रहा है.

मौजूदा सरकार ने रोजगारपरक योजनाओं की झड़ी लगाई तो लगा कि देश के युवाओं को रोजगार मिल जाएगा लेकिन परिणाम ढाक के तीन पात वाला ही रहा. ‘मेक इन इंडिया’ के जरिए नौकरियां पैदा करने की बड़ीबड़ी बातें की गईं. इस के जरिए अनुसूचित जातियों, जनजातियों व महिलाओं में उद्यमिता के माध्यम से रोजगार पैदा करने का वादा था. लेकिन आज देश के सफल स्टार्टअप्स में इन तबकों की मौजूदगी शून्य है.

स्किल इंडिया भी रोजगार मूलक योजना के तौर पर प्रचारित की गई. कहा गया कि 2022 तक 40 करोड़ युवाओं को ट्रेनिंग दी जाएगी लेकिन सच सब के सामने है.

पढ़ाई का फायदा क्या

विश्वबैंक की एक रिपोर्ट, ‘वर्ल्ड डैवलपमैंट रिपोर्ट 2018 : लर्निंग टू रियलाइज एजुकेशंस प्रौमिस’ में बताया गया है कि भारत उन 12 देशों की सूची में नंबर 2 पर आता है जहां दूसरी कक्षा के छात्र एक छोटे से पाठ का एक शब्द भी नहीं पढ़ पाते. वहीं, 5वीं कक्षा के आधे छात्र दूसरी क्लास के पाठ्यक्रम के लैवल की किताब ठीक से नहीं पढ़ पाते हैं.

शिक्षा, ज्ञान का यह संकट सिर्फ नैतिक स्तर पर शर्मनाक नहीं है, आर्थिक संकट पर भी है, क्योंकि इसी लचर शिक्षा ढांचे से निकले छात्र बड़े हो कर नौकरियों के लिए भटकेंगे और देश का आर्थिक विकास चौपट कर देंगे.

साल 2011 की जनगणना के बाद तत्कालीन सरकार ने बेरोजगारी पर जो आंकड़े जारी किए थे उन के मुताबिक 20 से 29 साल की उम्र तक के 42 फीसदी युवा बेरोजगार थे. नई सरकार का एक साल में एक करोड़ नौकरियां देने का वादा तो छलावा साबित हुआ ही, हर साल एक करोड़ बेरोजगारों का बढ़ना नीम चढ़े करेले जैसी बात है.

ऐसे में क्या मध्य प्रदेश माध्यमिक शिक्षा मंडल की परीक्षाओं में पास हुए 12 लाख से भी ज्यादा छात्रों या अन्य सीबीएसई व दूसरे राज्यों के बोर्ड्स से उत्तीर्ण हुए छात्रों की कामयाबी पर खुश होना चाहिए. देशभर के छोटेबड़े सभी राज्यों के माध्यमिक शिक्षा मंडलों सहित सीबीएसई के उत्तीर्ण छात्रों की संख्या मिला कर देखा जाए तो इस साल कोई 2 करोड़ युवाओं ने 10वीं और 12वीं के इम्तिहान पास किए हैं, इन में से लगभग 50 लाख स्नातक स्तर की पढ़ाई करेंगे.

यानी देश में इस साल डेढ़ करोड़ नए शिक्षित बेरोजगार पैदा हो गए हैं. उन की पीठ यह कहते ईमानदारी से थपथपाई नहीं जा सकती कि पढ़ोगेलिखोगे तो बनोगे नवाब या पढ़लिख कर कुछ बन जाओगे.

यह सोच कर दहशत होना स्वाभाविक है कि ये युवा क्या करेंगे और इन के अंधकारमय भविष्य का जिम्मेदार कौन है. अगर सरकार या मौजूदा सिस्टम इस की जिम्मेदारी नहीं लेता तो पढ़ाईलिखाई का फायदा क्या. तसवीर उम्मीद से ज्यादा भयावह है कि ये युवा अपने ख्वाब दफन करते पैंटशर्ट में मजदूरी करते नजर आएंगे.

देश का भविष्य कहे जाने वाले इन युवाओं को अगर मजदूरी ही करनी थी या फिर पकौड़े ही बेचने थे तो इन की पढ़ाईलिखाई के माने क्या? इस पर हर कोई खामोश है. खामोश तो अभी युवा भी हैं जो कभी गुस्से या भड़ास में फट पड़ें तो हालात किसी सरकार के काबू में आने वाले नहीं.

युवाओं के नजरिए से देखें तो उन की पहली प्राथमिकता सरकारी नौकरी होती है, क्योंकि वह एक व्यवस्थित जीवन व भविष्य की गारंटी होती है पर दिक्कत यह है कि सरकार के पास कुल 2 फीसदी नौकरियां हैं जिस के लिए विकट की मारामारी मची रहती है.

सब से ज्यादा 53 फीसदी युवाओं को रोजगार कृषि क्षेत्र से मिलता है लेकिन वह अस्थायी होता है. अलावा इस के, खेतीकिसानी भी तेजी से चौपट हो रही है. गांवदेहात के लोग खेत और जायदाद बेच कर शहरों की तरफ भाग रहे हैं. इस के पीछे उन की एक बड़ी मंशा बच्चों को पढ़ालिखा कर कुछ बना देने की है.

उन्हें नहीं मालूम कि अब पढ़ाईलिखाई रोजगार की गारंटी नहीं रही. हो सिर्फ इतना रहा है कि ग्रामीणों की दूसरी पीढ़ी थोड़ा पढ़लिख कर शहरों की मजदूर बनती जा रही है.

ठीक यही हाल दूसरी तरह से प्राइवेट सैक्टर का है जो 36 फीसदी नौकरियां देता है. जो युवा सरकारी नौकरी हासिल नहीं कर पाते वे प्राइवेट कंपनियों में नौकरी कर लेते हैं. इन में व्यावसायिक और तकनीकी स्नातकों की संख्या ज्यादा है. ये प्राइवेट नौकरियां भी अनिश्चितता की शिकार हैं और पहले की तरह आकर्षक तनख्वाह वाली अब नहीं रह गई हैं.

जैसेजैसे बेरोजगारों की भीड़ बढ़ी वैसेवैसे इन प्राइवेट कंपनियों, जिन में आईटी कंपनियां ज्यादा हैं, ने पैकेज का आकार घटाना शुरू कर दिया. जिस पद पर नियुक्त कर्मचारी को पहले एक लाख रुपए महीना दिए जा रहे थे उस पर 4 लोगों को रख कर 25-25 हजार रुपए दिए जाने लगे. इस से बेरोजगारी तो घटी पर पगार भी कम हुई. सरकारें चाहें तो इस फार्मूले से सबक ले सकती है कि भारीभरकम पगार वाली नौकरियां खत्म करें और फिक्स पे का सिद्धांत लागू करें. हालांकि यह शोषण ही है लेकिन बेरोजगारी से तो अच्छा है.

मुद्दे की बात शिक्षा का उद्देश्य क्या है, यह जानना है तो जवाब साफ है कि कोई भी युवा कोई ज्ञानी, महर्षि या पंडित बनने के लिए पढ़ाईलिखाई नहीं करता. वह सिर्फ और सिर्फ अच्छी नौकरी के लिए पढ़ाई करता है. वह भी न मिले तो विश्वगुरु और आर्थिक शक्ति बनने का सपना देख रहे देश में पीएचडीधारक भी पेट पालने के लिए अपना शोध भूलभाल कर चपरासी, माली व ड्राइवर तक बनने को तैयार रहते हैं.

छोटे पदों के लिए बड़ी मारामारी

इस साल मुंबई में 1,137 पुलिस कौंस्टेबल्स की नौकरियां निकलीं तो आवेदकों की संख्या 2 लाख हो गई. आश्चर्य व दुख की बात यह है कि इन आवेदनों में योग्यता से ऊपर के आवेदक बहुत थे. इन में 423 इंजीनियरिंग, 167 उम्मीदवार एमबीए और 543 पोस्टग्रेजुएट थे, हालांकि योग्य उम्मीदवार 12वीं पास पर्याप्त था. अगर ये तमाम डिगरीधारी अपनी काबिलीयत से कम स्तर की नौकरियों के लिए आवेदन कर रहे हैं तो साफ है कि शिक्षित तबके में बेरोजगारी कितने चरम पर है.

‘जौबलैस ग्रोथ’ रिपोर्ट के अनुसार, साल 2005 से 2015 के बीच भारत में पुरुष रोजगार दर में बड़ी गिरावट दर्ज हुई है. जाहिर है यह गिरावट इन्हीं पढ़ेलिखे, बेहतर रिजल्टधारी युवाओं पर भारी पड़ी.

हर महीने 13 लाख नए लोग कामकाज करने की उम्र में प्रवेश कर जाते हैं. यानी एक करोड़ 56 लाख नए युवा हर साल रोजगार के लिए कतारों में खड़े दिखते हैं.

इस की पहली बड़ी मिसाल सितंबर 2015 के तीसरे सप्ताह में देखने में आई जब उत्तर प्रदेश विधानसभा सचिवालय में चपरासी के 368 पद निकले थे. भरती के लिए न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता 5वीं पास थी.

उम्मीद से परे इन पदों के लिए 23 लाख आवेदन आए थे. साथ ही 5वीं पास आवेदकों की संख्या महज 53,420 थी जबकि 2 लाख के लगभग उच्चशिक्षित युवाओं को सरकारी दफ्तर का चपरासी बनना मंजूर था. जब इंटरव्यू देने वाले बेरोजगारों की भीड़ कतार में लगी तो सरकार को समझ आया कि 23 लाख इंटरव्यू लेतेलेते तो 4 साल निकल जाएंगे और इस दौरान कई उम्मीदवार नौकरी की उम्र पार कर चुके होंगे. अलावा इस के अच्छाखासा प्रशासनिक अमला अपने कामधाम छोड़ कर इंटरव्यू ही लेता रहेगा. नतीजतन, ये भरतियां रद्द कर दी गई थीं.

पर युवाओं के लिहाज से यह वाकेआ शर्मनाक था, क्योंकि कोई भी युवा चपरासी जैसी छोटी नौकरी के लिए अपनी जवानी पढ़ाई में नहीं झोंक देता और न ही कोई पीएचडी इसलिए करता कि बहुत सा ज्ञान बटोरने व शोध करने के बाद वह टेबल साफ करे, दफ्तर में झाड़ूपोंछा करे और साहबों को चाय, कौफी, पानी व पानसिगरेट ला कर दे.

यहां बात छोटेबड़े काम की अहमियत की नहीं, बल्कि युवाओं के स्वाभिमान की है जिस से समझौता करने के लिए किस हद तक जा कर उन्हें झुकना पड़ रहा है. प्रसंगवश लौर्ड मैकाले को कोसते रहने का रिवाज उल्लेखनीय है कि उस ने शिक्षाव्यवस्था ऐसी बना दी थी जो सिर्फ बाबू यानी क्लर्क पैदा करती है. अंगरेज शासन करने भारत आए थे, उन का असल मकसद प्राकृतिक संपदा और संसाधनों का दोहन था. वे चूंकि व्यापारी थे, इसलिए उन्हें सामान ढोने वाले और उस की गिनती कर हिसाबकिताब करने वाले युवा चाहिए थे.

पर आजाद भारत के कर्ताधर्ताओं ने कौन सा तीर मार लिया और शिक्षापद्धति में कौन सी उल्लेखनीय क्रांति ला दी कि उस में शैक्षणिक योग्यता के हिसाब से नौकरी मिलने लगी. उलटे, बाबू की जगह शासक, चपरासी, ड्राइवर, माली और दूसरे छोटे पदों पर नौकरी करने के लिए युवाओं को विवश कर रहे हैं.

उत्तर प्रदेश से शुरू हुआ यह सिलसिला अभी थमा नहीं है, न ही इस के थमने के आसार नजर आ रहे हैं. पिछले साल नवंबरदिसंबर में मध्य प्रदेश की अदालतों में भी छोटे पदों पर भरती के लिए खासे पढ़ेलिखे, उच्चशिक्षित जब मुंह लटकाए लाइन लगाए नजर आए तो नए पढ़ेलिखे के भविष्य का अंदाजा सहज लगाया जा सकता है. इन हालात को ध्यान में रखते हुए मध्य प्रदेश बोर्ड की 10वीं और 12वीं की परीक्षाओं को पास कर चुके युवाओं को बधाई देने से पहले यह सोचनेसमझने की जरूरत है कि कहीं उन्हें बेवकूफ तो नहीं बनाया जा रहा.

बढ़ती और विकराल होती बेरोजगारी का संभावित विस्फोट सरकार से छिपा नहीं है पर उस के पास ऐसी कोई जादू की छड़ी नहीं है जिसे घुमाते ही करोड़ों युवाओं को रातोंरात वह नौकरी दे सके या रोजगार के मौके पैदा कर सके.

हर कोई इस बात को समझ रहा था कि जब पहले की कांग्रेसी सरकारें युवाओं के लिए कुछ खास नौकरी या रोजगार के अवसर पैदा नहीं कर पाईं तो मोदी सरकार से बहुत ज्यादा उम्मीदें लगाना उस से ज्यादती होगी. इसलिए बेरोजगारी को ले कर कभी किसी ने मोदी सरकार को न तो जरूरत के मुताबिक कोसा और न ही उस की खिल्ली उड़ाई.

हालांकि मनमोहन सिंह की सरकार के आखिरी 2 सालों यानी 2012-13 में 7.41 लाख नए रोजगार आए जबकि श्रम मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक, 2015-16 में रोजगार सृजन मात्र 1.55-2.13 लाख रहा. तुलना करिए और समझ जाइए कि हम आगे बढ़े या खाई में गिरे.

लेकिन एक मौके पर खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब यह कहा कि युवा पकौड़े तलें तो उन की हंसी अब तक लोग उड़ाते रहते हैं. नरेंद्र मोदी की यह सलाह उन के भक्तों के गले भी नहीं उतरी थी कि वे इस में कौन सा जीवनदर्शन ढूंढें.

पकौड़े बेच कर पेट भरना कतई जिल्लत या जलालत की बात नहीं पर नरेंद्र मोदी की खिल्ली उड़ने की असल वजह यह थी कि वे युवाओं से बड़े सपने देखने की बात नहीं कर रहे थे. वे यह नहीं कह रहे थे कि युवा डाक्टर, अफसर, इंजीनियर या साइंटिस्ट बनें या फिर अपनी कंपनियां और फैक्टरियां शुरू करें जिस से दूसरे युवाओं को भी रोजगार मिले.

प्रधानमंत्री के मुख से पकौड़े को पेशा बनाने की राय व्यक्त की गई तो युवाओं का तिलमिलाना स्वाभाविक बात थी कि उन्होंने इतनी पढ़ाई कोई खोमचा या ठेला लगाने के लिए नहीं की और पढ़ाई पर उन के अभिभावकों ने इसलिए लाखों रुपए नहीं खर्चे थे कि उन की संतानें चौराहों पर पकौड़े तलती नजर आएं.

विपक्ष ने जगहजगह पकौड़े बना कर विरोधप्रदर्शन किया, यह एक अनिवार्य राजनीतिक प्रतिक्रिया थी. लेकिन देश का प्रधानमंत्री युवाओं को पकौड़े बेचने का मशवरा दे, इस से युवाओं का स्वाभिमान आहत हुआ था और नरेंद्र मोदी की छवि को गहरा धक्का भी लगा था.

घाटे में अभिभावक

पढ़ाईलिखाई जरूरत से ज्यादा महंगी हो चली है, यह बात किसी सुबूत की मुहताज नहीं है और न ही यह कि शिक्षा अब, वजहें जो भी हों, पूरी तरह कारोबार हो चली है.

शिक्षा का भारीभरकम खर्च अधिकतर अभिभावक उठा भी रहे हैं तो इस के पीछे उन की मंशा समाज को एक अच्छा नागरिक देने की ही होती है जो शिक्षित हो कर कहीं अच्छी नौकरी कर देश की तरक्की में अपना योगदान देते सम्मानजनक जीवन जी रहा होता है. यह कितना बड़ा भ्रम था, यह बात जब साबित होती है तो मांबाप पर क्या गुजरती है, यह तो वही जानते हैं. अपने बेरोजगार युवा बेटे या बेटी की हालत देखते हुए उन का कलेजा मुंह को आने लगता है.

सच तो यह है कि सरकार से बदतर और विस्फोटक होते हालात संभल नहीं रहे हैं. एक बारूद भीतर ही भीतर युवाओं के दिलोदिमाग में रोजगार और नौकरी को ले कर सुलग रहा है जो कब फट पड़े, कहा नहीं जा सकता.

बेरोजगारी की मौजूदा हालत तो चिंताजनक है ही, लेकिन सब से बड़ी चिंता इस बात की है कि जिस तरह हर माह/साल युवाओं की लाखोंकरोड़ों की नई फौजें नौकरियों के लिए कतारों में लग रही हैं उसे आने वाले समय में सरकार कैसे संभालेगी. अब तक तो युवा गांवकसबों में बेरोजगारी के दिन काट रहे थे पर अब शिक्षित व संपन्न होतेहोते ये शहरों की तरफ कूच कर रहे हैं, जबकि शहर पहले से ही बेरोजगारों से गले तक डूबे हुए हैं. ऐसे में इन की भारी भीड़ देश में उठापटक या कहें हिंसक विद्रोह पैदा कर सकती है.

यह सवाल सिर्फ मोदी सरकार के लिए ही नहीं है, बल्कि कोई भी सरकार भला इतनी बड़ी आबादी वाले देश के करोड़ों युवा बेरोजगारों से कैसे निबटेगी? कहीं ऐसा न हो कि आने वाले समय में यही बेरोजगार व शिक्षित युवा देश में अशांति का माहौल पैदा करें. और जिस तरह राजनीतिक दल इन की ऊर्जा, शक्ति व बेरोजगारी का इस्तेमाल अपने राजनीतिक एजेंडों को साधने के लिए कर रहे हैं, उस से भी युवाओं को बहुत दिनों तक बहलायाफुसलाया नहीं जा सकेगा. हाल यह होगा कि एक दिन

यही परेशान, हिंसक व खालीजेब युवा अपना आक्रोश देश के संसाधनों, व्यवस्था व शांति पर उतारेगा. यह भविष्य के लिए खतरे की घंटी है.

– साथ में राजेश कुमार

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