2 मई, 2018 को बुधवार था. उस दिन मुंबई के मशहूर पत्रकार ज्योतिर्मय डे (जे. डे) हत्याकांड में सजा सुनाई जानी थी. यह केस विशेष मकोका अदालत के जस्टिस समीर अदकर की अदालत में चल रहा था और इस में माफिया डौन छोटा राजन सहित 11 आरोपी थे. मामला चूंकि एक वरिष्ठ पत्रकार और माफिया डौन से जुड़ा था, इसलिए फैसला सुनने के लिए अदालत में काफी भीड़ थी. दोनों पक्षों के वकीलों और सभी आरोपियों सहित उन के घर वाले भी मौजूद थे.

जब सजा के लिए बहस शुरू हुई तो सरकारी वकील प्रदीप घरात ने अपनी दलील देते हुए अदालत से कहा, ‘‘योर औनर, ज्योतिर्मय डे की हत्या आम हत्या नहीं बल्कि यह एक दुर्लभतम मामला है, क्योंकि इस में माफिया सरगना ने एक वरिष्ठ पत्रकार की हत्या कराई. अगर इन अपराधियों को कड़ी सजा नहीं दी गई तो पत्रकारों के लिए काम करना कठिन हो जाएगा. पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है. लोकतंत्र की सफलता के लिए निर्भीक और स्वतंत्र पत्रकारिता जरूरी है.’’

सरकारी वकील प्रदीप घरात ने आगे कहा, ‘‘ज्योतिर्मय डे की बहन लीना बीमार रहती है. न कोई उस का इलाज कराने वाला है और न देखभाल करने वाला.’’

प्रदीप घरात ने इस मामले को दुर्लभतम बताने के बाद छोटा राजन सहित सभी दोषियों के लिए सख्त से सख्त सजा की मांग की. दूसरी ओर बचावपक्ष ने दोषियों की उम्र, कुछ के छोटेछोटे बच्चे होने और कुछ के घर वालों की बीमारी का हवाला देते हुए उन के साथ नरमी बरतने की दलील दी.

इस सुनवाई में एक खास बात यह भी थी कि दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद छोटा राजन के लिए वीडियो कौन्फ्रैंसिंग की व्यवस्था की गई थी, ताकि वह अदालत की काररवाई और बहस को देख भी सके और जवाब भी दे सके.

बता दें कि जे. डे की 11 जून, 2011 को मुंबई के पवई में उस समय गोली मार कर हत्या कर दी गई थी, जब वह मोटरसाइकिल से घर जा रहे थे. छोटा राजन के इशारे पर जे. डे की हत्या के लिए सतीश कालिया ने 7 लोगों का गिरोह बना कर कार और बंदूकों का इंतजाम किया था. बाद में इन लोगों ने ही जे. डे की हत्या की थी. इन सभी पर हत्या की धारा 302, आपराधिक साजिश की धारा 120बी और सबूत नष्ट करने की धारा 204 और विभिन्न धाराओं के अलावा मकोका व शस्त्र कानून के तहत केस चल रहा था.

यहां यह भी स्पष्ट कर दें कि छोटा राजन को नवंबर 2015 में सीबीआई द्वारा इंडोनेशिया के बाली से भारत लाया गया था. पिछले साल ही दिल्ली की एक अदालत ने छोटा राजन को फरजी पासपोर्ट मामले में 7 साल की सजा सुनाई थी. नवंबर, 2015 से ही वह तिहाड़ जेल में बंद था.

सजा पर बहस के बाद न्यायाधीश सतीश अदकर ने जे. डे की हत्या के मामले में 9 लोगों को दोषी करार दिया, जबकि 2 आरोपियों जिग्ना वोरा और जोसेफ को संदेह का लाभ दे कर बरी कर दिया.

जिग्ना पर आरोप था कि उन्होंने छोटा राजन से न केवल जे. डे की शिकायत की थी, बल्कि उन की मोटरसाइकिल की नंबर प्लेट और उन के घर की सूचना भी उस तक पहुंचाई थी. उन पर यह भी आरोप था कि उन्होंने छोटा राजन को जे. डे के खिलाफ भड़काया था और इसी सिलसिले में जोसेफ के मोबाइल से इंडोनेशिया में बैठे छोटा राजन से बात की.

मकोका अदालत के फैसले के बारे में जानने से पहले जे. डे की हत्या की वजह जान लें. 25 नवंबर, 2011. शनिवार का दिन था. उस समय सुबह के लगभग 4 बजे थे. महानगर मुंबई के उपनगर घाटकोपर की सड़कों पर सन्नाटा छाया हुआ था. इक्कादुक्का वाहन उधर से गुजरते थे तो थोड़ी देर के लिए सन्नाटा टूट जाता था.

तभी मुंबई क्राइम ब्रांच की कई गाडि़यां तेजी से आईं और एक इमारत के नीचे खड़ी हो गईं. गाडि़यों से उतर कर कुछ पुलिस वाले नीचे खड़े हो गए और कुछ उस इमारत के एक फ्लैट में चले गए.

जिस फ्लैट में पुलिस गई थी, वह मुंबई के सुप्रसिद्ध अंगरेजी दैनिक एशियन एज की ब्यूरो प्रमुख और वरिष्ठ पत्रकार जिग्ना वोरा का था. पुलिस अफसरों ने जिग्ना वोरा से काफी देर तक पूछताछ की.

पुलिस ने उन के घर की तलाशी भी ली. पूछताछ और तलाशी के बाद उन लोगों ने जिग्ना का लैपटौप और मोबाइल अपने कब्जे में ले कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया.

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इस पुलिस काररवाई में मुंबई पुलिस के तत्कालीन कमिश्नर अरूप पटनायक, जौइंट पुलिस कमिश्नर (क्राइम) दिवंगत हिमांशु राय, एडीशनल सीपी देवेन भारती, एसीपी अशोक दुराफे, क्राइम ब्रांच यूनिट 5 और 6 के वरिष्ठ इंसपेक्टर अरुण चव्हाण, श्रीपद काले, रमेश महाले और उन के सहायक शामिल थे.

इन लोगों ने जिग्ना वोरा की गिरफ्तारी मुंबई के बहुचर्चित वरिष्ठ पत्रकार ज्योतिर्मय नेपियन कुमार उर्फ जे. डे हत्याकांड के सिलसिले में की थी. जे. डे सुप्रसिद्ध अंगरेजी और गुजराती अखबार दैनिक मिड डे के ब्यूरो प्रमुख और सहायक संपादक थे.

जिग्ना वोरा की गिरफ्तारी जे. डे हत्याकांड के एक प्रमुख गवाह के बयान और 5 महीनों की जांचपड़ताल के आधार पर की गई थी. पुलिस ने जिग्ना को जे. डे की हत्या और हत्या की साजिश रचने के आरोप में भादंवि की धारा 302,120बी, 34 और मकोका के अंतर्गत गिरफ्तार किया था. जिग्ना वोरा को गिरफ्तार कर के क्राइम ब्रांच के हैड औफिस लाया गया. पुलिस ने उन्हें उसी दिन मकोका अदालत में पेश कर के विस्तृत पूछताछ के लिए रिमांड पर ले लिया.

मुंबई के अंगरेजी दैनिक मिड डे के वरिष्ठ पत्रकार ज्योतिर्मय डे की हत्या 11 जून, 2011 को लगभग 2 बजे मुंबई के पवई इलाके में उस समय हुई थी, जब वह घाटकोपर में रह रही अपनी मां और बहन से मिल कर मोटरसाइकिल से पवई स्थित अपने फ्लैट पर लौट रहे थे. उस दिन जे. डे जब हीरानंदानी गार्डन के पास पहुंचे, तभी कुछ अज्ञात लोगों ने गोली मार कर उन की हत्या कर दी थी.

जे. डे मुंबई के मशहूर पत्रकार थे. यही वजह थी कि उन की हत्या होते ही यह खबर मुंबई भर में फैल गई. सूचना मिलते ही मुंबई पुलिस, क्राइम ब्रांच के अधिकारी और उन की टीमें घटनास्थल पर पहुंच गईं. हत्या चूंकि एक जानेमाने वरिष्ठ पत्रकार की हुई थी, इसलिए पुलिस ने इस मामले को बहुत गंभीरता से लिया था. जे. डे की हत्या के बाद तत्कालीन पुलिस आयुक्त अरूप पटनायक, क्राइम ब्रांच सीआईडी के जौइंट पुलिस आयुक्त हिमांशु राय, एडीशनल सीपी देवेन भारती, डसीपी विश्वास राव नागरे और एसीपी अशोक दुराफे आदि सभी वरिष्ठ अधिकारी घटनास्थल पर पहुंचे थे.

वहां जे. डे की मोटरसाइकिल गिरी पड़ी थी और उस के पास ही गोलियों से छलनी उन की लाश पड़ी थी. अधिकारियों ने अपनेअपने नजरिए से घटनास्थल का निरीक्षण किया. प्राथमिक काररवाई के बाद पोस्टमार्टम के लिए जे. डे की लाश अस्पताल भेज दी गई.

उन की मोटरसाइकिल को भी पुलिस ने केस प्रौपर्टी बना कर अपने कब्जे में ले लिया. इस के साथ ही थाना पवई में जे. डे की हत्या का मुकदमा दर्ज हो गया.

वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश पर इस मामले की जांच की जिम्मेदारी पुलिस और क्राइम ब्रांच सीआईडी की यूनिट नंबर 5 और 6 के सीनियर इंसपेक्टर अरुण चव्हाण और श्रीपद काले को सौंपी गई.

इंसपेक्टर अरुण चव्हाण और श्रीपद काले ने पूरी जिम्मेदारी के साथ पत्रकार जे. डे हत्याकांड की जांच शुरू कर दी. लेकिन तात्कालिक रूप से उन्हें कोई कामयाबी नहीं मिली. उन्होंने पत्रकार जे. डे का मोबाइल फोन, लैपटौप, डायरी, कंप्यूटर की हार्डडिस्क आदि चीजें अपने कब्जे में ले कर उन का निरीक्षण किया. लेकिन इस का कोई नतीजा नहीं निकला.

जे. डे को मौत के घाट उतारने वालों की गिरफ्तारी न होने से पत्रकारों में रोष था. उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण और तत्कालीन गृहमंत्री आर.आर. पाटिल को एक ज्ञापन सौंपा, जिस में इस मामले की जांच सीबीआई को सौंपने की मांग की गई.

इस उलझी हुई जांच के दौरान जे. डे के एक मित्र पत्रकार ने इंसपेक्टर रमेश महाले को एक ऐसी बात बताई, जिसे जानने के बाद उन्हें उम्मीद की किरणें नजर आने लगीं. उस पत्रकार ने उन्हें बताया कि जे. डे की जेब हमेशा एकएक रुपए के सिक्कों से भरी रहती थी. उस ने यह भी बताया कि जे. डे कुछ खास तरह की खबरों के लिए अपने मोबाइल की जगह पीसीओ से फोन किया करते थे.

पुलिस इंसपेक्टर रमेश महाले ने उस पत्रकार की बातों को गंभीरता से लिया. उन्होंने पत्रकार जे. डे के घाटकोपर स्थित घर से ले कर पवई तक के रास्ते में पड़ने वाले उन सभी पीसीओ बूथों के काल डिटेल्स निकलवाए, जिन रास्तों से जे. डे का आनाजाना था. इन पीसीओ के काल रिकौर्ड्स में एक नंबर बारबार आ रहा था.

उस नंबर की जांच की गई तो यह नंबर अरुण डाके का निकला जो अंडरवर्ल्ड सरगना छोटा राजन के लिए काम करता था. यह नंबर 3 जून से ले कर 11 जून तक के काल रिकौर्ड्स में मिला था.

पत्रकार जे. डे की हत्या में छोटा राजन का नाम जुड़ते ही क्राइम ब्रांच ने डाके पर शिकंजा कस दिया. जल्दी ही डाके को गिरफ्तार भी कर लिया गया.

अरुण डाके से पूछताछ की गई तो जे. डे हत्याकांड का खुलासा हो गया. उस के बयान के आधार पर पुलिस और क्राइम ब्रांच ने छोटा राजन के खास शूटर रोहित थंगप्पन जोसेफ उर्फ सतीश कालिया सहित जे. डे हत्याकांड से जुड़े 11 अभियुक्तों को गिरफ्तार कर लिया.

लेकिन ये वे लोग थे, जिन्होंने जे. डे की रेकी कर के उन्हें मौत के घाट उतारा था. इन लोगों की जे. डे से कोई व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं थी. इस का मतलब जे. डे की हत्या की साजिश रचने वाला कोई और ही था.

गिरफ्तार किए गए लोगों से यह जरूर पता चल गया था कि जे. डे की हत्या माफिया डौन छोटा राजन के इशारे पर की गई थी. लेकिन इस की वजह साफ नजर नहीं आ रही थी. यह वजह जानने के लिए पुलिस ने छोटा राजन के उन सभी गुर्गों के फोन रिकौर्ड करने शुरू किए, जो किसी न किसी रूप में छोटा राजन से जुड़े थे.

पुलिस का यह प्रयास रंग लाया. अपने सभी गुर्गों को एकएक कर गिरफ्तार होते देख अंडरवर्ल्ड डौन छोटा राजन बौखला गया था. पुलिस द्वारा अदालत में दी गई चार्जशीट के अनुसार, उस ने जे. डे की हत्या से जुड़े अपने एक गुर्गे विनोद असरानी उर्फ विनोद चेंबूर के भाई को फोन कर के वरिष्ठ पत्रकार जिग्ना वोरा को गाली देते हुए कहा कि इस औरत के भड़काने में आ कर मैं ने अपना एक दोस्त तो खो ही दिया, साथ ही अपने लिए एक बड़ी मुसीबत भी मोल ले ली है.

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यह बात क्राइम ब्रांच ने टेप करवा ली थी. चेंबूर में ही विनोद असरानी उर्फ विनोद चेंबूर का उमा पैलेस नाम से बीयर बार था, जहां जे. डे को बुला कर उन्हें उन लोगों से मिलवाया गया था, जो उन की हत्या करने वाले थे. इन लोगों में सतीश कालिया शामिल नहीं था, क्योंकि वह जे. डे को जानता था.

पुलिस अधिकारियों ने विनोद असरानी उर्फ चेंबूर के भाई को क्राइम ब्रांच बुला कर उस का बयान लिया. चार्जशीट के अनुसार, उस के बयान के आधार पर उसे सरकारी गवाह बना लिया गया. उस के बयान से ही जिग्ना वोरा का नाम सामने आया.

जे. डे की हत्या में शामिल सभी लोगों को पहले ही गिरफ्तार कर के जेल भेजा जा चुका था. अब जिग्ना वोरा की बारी थी. चार्जशीट के हिसाब से जब छानबीन शुरू हुई तो पुलिस को जिग्ना के खिलाफ सबूत मिलने शुरू हो गए. अंतत: जे. डे की हत्या के लगभग 6 महीने बाद जिग्ना वोरा को गिरफ्तार कर लिया गया.

क्राइम ब्रांच अधिकारियों की जांचपड़ताल और जिग्ना वोरा के पुलिस को दिए बयान के अनुसार वरिष्ठ पत्रकार ज्योतिर्मय डे की हत्या की जो कहानी पता चली वह कुछ इस तरह थी—

जिग्ना जितेंद्र वोरा खूबसूरत और महत्त्वाकांक्षी महिला थीं. उन का जन्म एक प्रतिष्ठित और संभ्रांत परिवार में हुआ था. वह पढ़ाईलिखाई और बातचीत में काफी तेजतर्रार महिला थीं. उन्होंने मुंबई के एक सुप्रसिद्ध कालेज से बड़े अच्छे नंबरों से एलएलबी और एलएलएम किया था.

विवाह के बाद वह अपने पति जितेंद्र वोरा के साथ दुबई चली गई थीं. जितेंद्र वोरा का दुबई में कारोबार था. विवाह के कुछ दिनों बाद तक तो उन दोनों का दांपत्य जीवन बड़ी हंसीखुशी से बीता, लेकिन बाद में किन्हीं कारणों से दोनों के बीच दरार आ गई और फिर जल्दी ही तलाक हो गया.

पति से तलाक लेने के बाद जिग्ना मुंबई आ कर रहने लगीं. अलग होने के बाद जिग्ना के सामने भविष्य का सवाल था. सोचविचार कर उन्होंने अपने भविष्य को ध्यान में रख कर अपने कैरियर के लिए पत्रकारिता को चुना.

जिग्ना वोरा ने अपना शुरुआती कैरियर उसी मिड डे अखबार से शुरू किया था, जिस में जे. डे पहले से ही काम कर रहे थे. जे. डे उस अखबार के लिए क्राइम की खबरें कवर करते थे. जिग्ना वोरा के पास चूंकि एमए, एलएलबी की डिग्री थी, इसलिए मिड डे में उन का चयन अदालत और राजनीति की खबरों की कवरेज के लिए किया गया था. लेकिन जिग्ना वोरा यह बात अच्छी तरह जानती थीं कि जो बात क्राइम बीट की कवरेज में है, वह किसी अन्य बीट में नहीं है.

यही वजह थी कि जिग्ना वोरा के मन के किसी कोने में क्राइम की खबरों को कवर करने की लालसा दबी थी. वह चाहती थीं कि उन्हें क्राइम की खबरों को कवर करने का मौका दिया जाए. लेकिन उन का नेटवर्क ऐसा नहीं था कि वह क्राइम की खबरें कवर कर सकतीं. जे. डे से मदद की उन्हें कोई उम्मीद नहीं थी. क्योंकि सही मायने में पत्रकार वही होता है जो दाएं हाथ की बात बाएं हाथ को पता न चलने दे.

जिग्ना वोरा की यह इच्छा तब पूरी हुई, जब वह मिड डे छोड़ कर एशियन ऐज अखबार में गईं. एशियन ऐज के संपादक हुसैन जैदी थे, जो पहले इसी अखबार में क्राइम ब्यूरो चीफ रह चुके थे. जैदी ने जिग्ना से कहा कि वह क्राइम की खबरें कवर करें. चूंकि जिग्ना स्वयं भी यही चाहती थीं, इसलिए उन्हें आसानी से क्राइम बीट मिल गई.

जिग्ना ने जब क्राइम बीट में काम करना शुरू किया तो जल्दी ही उन की जानपहचान छोटा राजन गिरोह के करीबी माने जाने वाले फरीद तानशा, विक्की मल्होत्रा और पाल्सन जोसेफ से हो गई.

मुंबई में क्राइम की खबरें कवर करने वाले पत्रकार पुलिस के उच्चाधिकारियों और अंडरवर्ल्ड सरगनाओं के बीच अपनी जगह बना कर रखते हैं और अपने इन संबंधों पर गर्व भी महसूस करते हैं. पुलिस द्वारा अदालत को दिए गए जांच रिकौर्ड के अनुसार, ऐसी ही लालसा जिग्ना वोरा के मन में भी थी. वह किसी भी तरह अंडरवर्ल्ड सरगनाओं के बीच पहुंचना चाहती थीं.

हालांकि जिग्ना वोरा फरीद तानशा, विक्की मल्होत्रा और जोसेफ पाल्सन को पिछले लगभग 3 सालों से जानती थीं और उन से बातें करती रहती थीं. फरीद तानशा से तो जिग्ना वोरा का घर जैसा रिश्ता बन गया था. वह उस के घर आतीजाती थीं और उस की दोनों पत्नियों को भाभीजान कहा करती थीं.

छोटा राजन गिरोह के लोगों से जिग्ना के भले ही संबंध बन गए थे, लेकिन छोटा राजन से उन की कभी बात नहीं हुई थी. जिग्ना वोरा में शायद इतनी हिम्मत भी नहीं थी कि छोटा राजन से बात कर सकें. दरअसल वह इस बात को अच्छी तरह जानती थीं कि माफिया डौन से बातचीत करने में कहीं कुछ गड़बड़ हो गई, तो लेने के देने पड़ जाएंगे.

अदालत में पेश रिकौर्ड के अनुसार, जिग्ना वोरा अभी छोटा राजन तक पहुंचने का रास्ता खोज ही रही थीं कि एक दिन उन्होंने टीवी पर छोटा राजन का इंटरव्यू देखा. यह इंटरव्यू एक ऐसे पत्रकार ने लिया था, जो जिग्ना से कमतर और नया था.

इस से जिग्ना को लगा कि जब एक छोटा सा पत्रकार छोटा राजन तक पहुंच सकता है तो वह क्यों नहीं. उन्होंने मन ही मन सोचा कि जिन लोगों से वह मिलती हैं, अगर उन्हीं को माध्यम बना कर छोटा राजन तक पहुंचने की कोशिश करें तो यह काम मुश्किल नहीं होगा.

यह बात दिमाग में आने के बाद जिग्ना वोरा ने अपने मन की बात फरीद तानशा से कही. लेकिन फरीद तानशा उन्हें यह कह कर टालता रहा कि किसी दिन मौका देख कर छोटा राजन से उन की बात करा देगा. इसी बीच फरीद तानशा डी कंपनी के छोटा शकील से मिल गया. इस चक्कर में भरत नेपाली गिरोह ने उस की हत्या करवा दी थी.

फलस्वरूप छोटा राजन का इंटरव्यू जिग्ना के लिए एक सपना सा बन कर रह गया. अपने इस तथाकथित सपने को पूरा करने के लिए जिग्ना ने पाल्सन जोसेफ का सहारा लिया. इस के लिए वह पाल्सन जोसेफ पर दबाव डालने लगीं. पुलिस चार्जशीट के मुताबिक, जिग्ना वोरा के ज्यादा दबाव डालने पर आखिरकार पाल्सन जोसेफ ने उन का फोन नंबर अंडरवर्ल्ड डौन छोटा राजन को दे कर अनुरोध किया कि वह जिग्ना से बात कर ले.

पाल्सन जोसेफ के नंबर देने के कुछ दिनों बाद जिग्ना वोरा के फोन पर छोटा राजन का फोन आ गया. इस के बाद अंडरवर्ल्ड डौन छोटा राजन और जिग्ना वोरा के बीच बातचीत का सिलसिला जुड़ गया.

अदालत में दिए गए आरोपपत्र के अनुसार, जब अंडरवर्ल्ड डौन छोटा राजन का पहला फोन आया था तो जिग्ना वोरा काफी खुश हुई थीं. इस के बाद वह छोटा राजन को अकसर फोन करने लगी थीं. बातचीत के दौरान वह माफिया डौन से अंडरवर्ल्ड के बदलते समीकरणों के बारे में पूछती रहती थीं. इस के अलावा वह छोटा राजन या मुंबई के दूसरे डौनों से संबंधित छपने वाली खबरों की सच्चाई जानने के लिए भी राजन से संपर्क करती रहती थीं.

बातचीत के दौरान जिग्ना वोरा अंगरेजी न जानने वाले छोटा राजन से जब तब छपी जे. डे की खबरों का न केवल जिक्र करती थीं, बल्कि उन खबरों का उसे विस्तार से अर्थ भी समझाया करती थीं.

पुलिस की चार्जशीट के अनुसार जिग्ना वोरा और जे. डे की रंजिश घटना के 2 साल पहले तब शुरू हुई थी, जब जिग्ना ने एक दिन जे. डे को अपने खास खबरी फरीद तानशा के साथ देख लिया था. इस से जिग्ना वोरा को यह वहम हो गया था कि जे. डे उन के संपर्कों को अपना बनाने की कोशिश कर रहे हैं. जबकि हकीकत यह थी कि फरीद तानशा जे. डे का पुराना खबरी था.

अंडरवर्ल्ड डौन छोटा राजन के गिरोह में जे. डे की गहरी पैठ थी. जे. डे ने उस की कई खबरें छापी थीं. यहां तक कि छोटा राजन ने खुद ही जे. डे को अपने गिरोह के कई सदस्यों से मिलवाया भी था. कह सकते हैं कि एक समय ऐसा भी था जब छोटा राजन और जे. डे के रिश्ते काफी मधुर हुआ करते थे.

लेकिन जिग्ना वोरा ने छोटा राजन के गिरोह के बीच अपनी पैठ बनाने के लिए जे. डे और छोटा राजन के मधुर संबंधों को बिगाड़ने में बड़ी भूमिका निभाई.

अदालत में पेश दस्तावेजों के अनुसार, वैसे तो जिग्ना वोरा काफी समय से छोटा राजन को जे. डे के खिलाफ भड़का रही थीं, लेकिन उन दोनों का मधुर रिश्ता तब और बिगड़ गया, जब जे. डे ने 28 अप्रैल से 5 मई, 2011 के बीच यूरोप और कई देशों में घूमने जाने का प्रोग्राम बनाया. जे. डे ने तय किया था कि अपने इस प्रोग्राम के दौरान वह छोटा राजन से मिलेंगे.

इस बीच बातचीत के बाद दोनों का लंदन में मिलना भी तय हो गया था. वजह यह थी कि जे. डे छोटा राजन पर एक किताब लिखना चाहते थे. लेकिन सब कुछ पहले से तय होने के बाद भी छोटा राजन जे. डे से मिलने लंदन नहीं गया. दरअसल जिग्ना वोरा ने छोटा राजन से बात कर के उस के मन में यह भय बैठा दिया था कि अगर वह लंदन गया तो उस की हत्या हो जाएगी. जबकि ऐसी कोई बात नहीं थी.

जिग्ना को जे. डे के इस टुअर की जानकारी थी. बातचीत के दौरान छोटा राजन ने जब जिग्ना से जे. डे के लंदन और कई देशों के टुअर का जिक्र किया तो उन्होंने ऐसा जाहिर किया जैसे उन्हें जे. डे के इस टुअर के बारे में बहुत पहले से जानकारी है.

बातोंबातों में उन्होंने छोटा राजन को बताया कि जे. डे ड्रग माफिया इकबाल मिर्ची से मिला हुआ है और इकबाल मिर्ची उस की हत्या करना चाहता है. जिग्ना ने छोटा राजन को यह भी बताया कि यह जे. डे और इकबाल मिर्ची की मिलीभगत है.

जिग्ना की बातों से छोटा राजन के मन में डर बैठ गया और वह जे. डे से मिलने लंदन नहीं गया. जे. डे चूंकि छोटा राजन के विश्वास पात्र थे. इसलिए यह बात जान कर राजन को बहुत दुख हुआ. वह जे. डे से नाराज हो गया. बस यहीं से राजन और जे. डे के बीच दरार आ गई. यह दरार तब और गहरी हो गई जब जे. डे ने लंदन से लौट कर अपने अखबार में यह खबर छापी कि दाऊद पाकिस्तान छोड़ कर दुबई भाग गया है. इस के बाद जिग्ना वोरा ने लादेन की मौत के बाद राजन से दाऊद की लोकेशन का इंटरव्यू झटक लिया था.

बस यहीं से राजन को ले कर जे. डे और जिग्ना वोरा की कलम की लड़ाई शुरू हो गई. अपने विदेश के टुअर से लौटने के बाद तो जे. डे ने जैसे राजन पर हमला ही बोल दिया था. 30 मई, 2011 को जे. डे ने अपने लेख में लिखा कि डौन छोटा राजन को अब तीर्थयात्रा पर चले जाना चाहिए. दूसरा लेख जे. डे ने 2 जून, 2011 को लिखा कि राजन अब बूढ़ा हो गया है. जिग्ना वोरा ने इन दोनों लेखों की कटिंग छोटा राजन को भेज दीं. इस से राजन बौखला गया. उसे सब से अधिक गुस्सा 2 जून को छपी खबर ‘राजन बूढ़ा हो गया’ पर आया था. अदालत में पेश आरोपपत्र के अनुसार, उस ने जे. डे को सबक सिखाने के लिए जिग्ना वोरा से उन के घर और औफिस का पता मांगा.

जिग्ना वोरा घाटकोपर में जहां रहती थीं, वहां से जे. डे का घर दूर नहीं था. इसलिए उन्होंने जे. डे के घर और उन की मोटरसाइकिल का नंबर छोटा राजन को दे दिया. जे. डे का पताठिकाना पाने के बाद छोटा राजन ने अपने आदमियों को उन की रेकी कर के उन का गेम करने का आदेश दे दिया.

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इसी बीच जिग्ना वोरा अपने औफिस से 10 दिन की छुट्टी ले कर बाहर चली गईं. जे डे की हत्या की खबर उन्हें तब मिली जब वह कोलकाता में थीं. लेकिन जिग्ना वोरा ने इस खबर को कोई महत्त्व नहीं दिया और वह वहां से सिक्किम चली गईं.

जे. डे की हत्या को ले कर मुंबई के सभी पत्रकारों ने अपनेअपने अखबारों में खबरें लिखीं, साथ ही खूब शोरशराबा भी किया. लेकिन एक बड़े अखबार की संवाददाता होते हुए भी जिग्ना ने जे. डे की हत्या से संबंधित न तो कोई खबर लिखी और न किसी पुलिस अधिकारी से संपर्क किया.

10 दिन बाद टुअर से लौट कर वह अपने औफिस गईं और उन्होंने क्राइम ब्रांच की जांच को गुमराह करने के लिए ड्रग माफिया इकबाल मिर्ची पर संदेह जाहिर करते हुए जे. डे की हत्या की खबर छापी. लेकिन यह खबर उन के लिए उलटी पड़ी. इस से जांच अधिकारियों का ध्यान उन पर जम गया. लेकिन इसी बीच जे. डे के हत्यारों की गिरफ्तारी शुरू हो चुकी थी, जिस की वजह से पुलिस का ध्यान जिग्ना वोरा की तरफ से हट गया था.

जिग्ना वोरा यह जान चुकी थीं कि उन की गिरफ्तारी कभी भी हो सकती है. इसलिए वह अपने खिलाफ सभी सबूतों को मिटाने में जुट गईं.

लेकिन फिर भी जांच अधिकारियों ने कुछ सबूत जुटा कर जिग्ना वोरा को गिरफ्तार कर लिया. विस्तृत पूछताछ के बाद जिग्ना वोरा को जे. डे हत्याकांड का प्रमुख आरोपी बनाया और अदालत पर पेश कर के जेल भेज दिया गया. जिग्ना पर पुलिस ने मकोका भी लगाया.

मुंबई क्राइम ब्रांच ने 7 जुलाई, 2011 को इस केस के आरोपियों पर महाराष्ट्र कंट्रोल औफ आर्गनाइज्ड क्राइम एक्ट (मकोका) लगाया. लंबी जांच के बाद क्राइम ब्रांच ने राजेंद्र सदाशिव निखलजे उर्फ छोटा राजन और नारायण सिंह बिष्ट, जो कि फरार था, के खिलाफ कोर्ट में चार्जशीट पेश की. इस के बाद क्राइम ब्रांच ने 3 दिसंबर, 2011 को अदालत को जिग्ना वोरा के खिलाफ सप्लीमेंट्री चार्जशीट सौंपी. जुलाई, 2012 में जिग्ना वोरा को जमानत मिल गई.

केस के चलते 10 अप्रैल, 2012 को लंबी बीमारी के बाद जेल में ही एक आरोपी असरानी की मौत हो गई. करीब 5 साल बाद 8 जून, 2015 को अदालत ने 22 आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड विधान की धारा 302, 120बी, 34, आर्म्स एक्ट और मकोका के अंतर्गत चार्ज फ्रेम किया.

25 अक्तूबर, 2015 को इस केस के मुख्य अभियुक्त छोटा राजन को सीबीआई ने इंडोनेशिया के बाली से अरेस्ट किया और भारत ले आई, लेकिन उसे अन्य केसों की वजह से लाया गया था. हालांकि बाद में 5 जनवरी, 2016 को जे. डे मर्डर केस भी सीबीआई को ट्रांसफर कर दिया गया था. 31 अगस्त, 2017 को विशेष मकोका अदालत ने छोटा राजन के खिलाफ चार्ज फ्रेम किया.

 

लंबी चली सुनवाई और बहस के बाद 22 फरवरी, 2018 को अभियोजन पक्ष ने इस केस में अपनी बहस पूरी की. बाद में 2 अप्रैल, 2018 को मकोका कोर्ट ने वीडियो कौन्फ्रैंसिंग के जरिए सीआरपीसी की धारा 313 के अंतर्गत तिहाड़ जेल में बंद छोटा राजन का फाइनल स्टेटमेंट दर्ज किया. 3 अप्रैल, 2018 को बचावपक्ष ने अपनी अंतिम बहस पूरी की. उसी दिन जस्टिस समीर अदकर ने 2 मई, 2018 को इस केस का फैसला सुनाने की घोषणा की.

2 मई, 2018 को जस्टिस समीर अदकर ने खचाखच भरी अदालत में अपना फैसला सुनाया. उन्होंने इस केस में दोषी ठहराए गए छोटा राजन, सतीश कालिया, अनिल बाघमोड, अभिजीत शिंदे, निलेश शिंदे, अरुण डाके, मंगेश अगवाने, सचिन गायकवाड़ और दीपक सिसौदिया को आजन्म कारावास की सजा सुनाई. साथ ही सभी पर 26-26 लाख रुपए का जुरमाना भी लगाया.

जस्टिस समीर अदकर ने सबूतों के अभाव में जिग्ना वेरा और जोसेफ पाल्सन को संदेह का लाभ दे कर बरी कर दिया. साथ ही अदालत ने जे. डे की बहन लीना को 5 लाख रुपए देने का भी आदेश दिया ताकि वह अपना इलाज करा सकें. सजा सुनाते समय न्यायाधीश ने वीडियो कौन्फ्रैंसिंग के जरिए जब छोटा राजन से पूछा कि कुछ कहना चाहते हो तो उस ने बस इतना ही कहा, ‘ठीक है.’?

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