पारिवारिक जिम्मेदारी संभालने के लिए यहां कोई होना चाहिए, मैं बहुत तनाव में हूं. थक चुका हूं, इसलिए जा रहा हूं.’

‘विनायक मेरे विश्वासपात्र हैं, सब प्रौपर्टी इन्वेस्टमेंट वही संभाले. किसी को तो परिवार की ड्यूटी करनी है तो वही करेगा. मुझे उस पर विश्वास है. मैं कमरे में अकेला हूं और सुसाइड नोट लिख रहा हूं. किसी के दबाव में आ कर नहीं लिख रहा हूं, कोई इस के लिए जिम्मेदार नहीं है.’

बीती 12 जून की दोपहर इंदौर के पौश रिहायशी इलाके सिलवर स्प्रिंग स्थित अपने घर में आत्महत्या करने वाले मशहूर संत भय्यूजी महाराज के 2 सुसाइड नोट मिले थे. दोनों में कोई खास फर्क नहीं है. सिवाए इस के कि दूसरे को एक कुशल संपादक की तरह संपादित कर छोटा कर दिया है और भाव बिलकुल नहीं बदले हैं. डायरी के पन्नों पर लिखे ये सुसाइड नोट बयां करते हैं कि भय्यूजी महाराज किस भीषण तनाव और द्वंद्व से गुजर रहे होंगे. अंतिम समय में उन्हें सिर्फ 2 चीजों परिवार और प्रौपर्टी की चिंता थी. उन्होंने अपनी प्रतिष्ठा भक्तों और बाद के परिणामों पर अगर सोचा होगा तो तय है कि उन्हें अपनी समस्या का कोई हल नहीं सूझ रहा होगा. 12 जून की दोपहर जैसे ही 50 वर्षीय भय्यूजी महाराज की आत्महत्या की खबर आई तो लोग स्तब्ध रह गए. अपना जीवन फिल्मी स्टाइल में गुजार चुके इस संत ने आत्महत्या भी फिल्मी स्टाइल में की. फोरैंसिक रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने गोली अपनी दाईं कनपटी पर मारी थी लेकिन वह सिर के बीचोंबीच लगी और आरपार हो गई थी.

उस वक्त उन के आलीशान घर में बुजुर्ग मां के अलावा कुछ वफादार सेवादार ही थे जिनमें से एक का जिक्र उन्होंने अपने सुसाइड नोट में किया है. धमाके की हल्की सी आवाज आई, लेकिन किसी को उम्मीद नहीं थी कि यह हल्का सा धमाका किस चीज का है. कुछ देर बाद उधर भय्यूजी महाराज की पत्नी डा. आयुषि आईं और भय्यूजी महाराज को ढूंढने लगीं.

आमतौर पर अपने कमरे में रहने वाले भय्यूजी महाराज वहां नहीं दिखे तो आयुषी ने एक एक कर सारे कमरे और टौयलेट बाथरूम तक में उन्हें देखा. बेटी कुहू का कमरा अंदर से बंद था जो खटखटाने पर नहीं खुला तो आयुषि ने सेवादारों को आवाज लगाई. विनायक और दूसरा वफादार सेवादार योगेश भागेभागे आए और दरवाजा तोड़ डाला. अंदर का दृश्य देख कर तीनों हतप्रभ रह गए, पलंग पर भय्यूजी महाराज की लाश पड़ी थी. सिर से रिसा खून चेहरे और बिस्तर पर बह रहा था.

वक्त सवालजवाब या सोचविचारी का नहीं था, इसलिए तुरंत एंबुलेंस बुलाई गई और भय्यूजी महाराज को इंदौर के नामी बौंबे हौस्पिटल ले जाया गया. अस्पताल में डाक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया तो आयुषि दहाड़े मार कर रोतेरोते बेसुध हो गईं और दोनों सेवादार जड़ हो कर रह गए. अस्पताल से खबर मिलने पर पुलिस वहां आई और भय्यूजी महाराज की मौत की पुष्टि के बाद खबर आम हो गई. इस हाईप्रोफाइल संत की आत्महत्या से देश भर में सनाका खिंच गया.

सवालों के ढेर पर भय्यूजी महाराज की आत्महत्या

कौन थे भय्यूजी महाराज और कैसे देखते ही देखते करोड़ों भक्तों के आदर्श बन गए? और वह प्रौपर्टी कितनी थी, जिस की जिम्मेदारी वह विनायक को सौंपना चाहते थे, इन सवालों के जवाबों के अलावा उस तनाव और पारिवारिक कलह की वजहें जानना जरूरी है. इससे भी पहले यह जानना जरूरी है कि मौत के दिन क्याक्या हुआ था.

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जो हुआ था उस से साफ लग रहा है कि भय्यूजी महाराज का खुदकुशी करने का फैसला और वजह तात्कालिक नहीं थे. वे वाकई लंबे समय से भीषण तनाव में थे. 12 जून को तो उन्होंने इस तनाव से मुक्ति पाने का आखिरी फैसला लिया था.

दोपहर कोई सवा 12 बजे भय्यूजी महाराज अपने कमरे से निकले और सीधे बेटी कुहू के कमरे में चले गए थे. इस के पहले उन्होंने अपने कमरे से 3 ट्वीट किए थे. कुहू इसी दिन पुणे से इंदौर आने वाली थी जिसे ले कर भय्यूजी महाराज कुदरती तौर पर खुश थे क्योंकि उन की लाडली करीब 3 महीने बाद घर आ रही थी.

कुहू के कमरे को अस्तव्यस्त देख उन्हें गुस्सा आया तो उन्होंने नौकरों को फटकार लगाई कि आज कुहू आने वाली है और अभी तक उस के कमरे की साफ सफाई नहीं हुई है. गुस्सा उतारने के बाद उन्होंने शेखर को बुला कर अब तक आई फोन काल की डिटेल्स लीं.

उन्होंने उस से कहा कि सभी को कह दो कि कुछ देर बाद बात करूंगा. तब तक उन्हें डिस्टर्ब न किया जाए. गौरतलब है कि अपने लिए आई फोन काल्स खुद भय्यूजी महाराज रिसीव नहीं करते थे. यह जिम्मेदारी बीते कई सालों से शेखर उठा रहा था.

डीआईजी हरिनारायणचारी मिश्रा और आईजी (इंटेलीजेंस) मकरंद देउस्कर इस खुदकुशी की जांच में जुट गए, जिन के पास बताने को कुछ नहीं था और जो था वह पुलिस जांच के पहले ही आम हो गया था. हादसे के बाद घर में मौजूद लोगों के बयान लेने के बाद पुलिस इन बातों की पुष्टि भर कर पाई कि हां, भय्यूजी महाराज पारिवारिक कलह की वजह से तनाव में थे और इसी के चलते उन्होंने खुदकुशी की.

भय्यूजी महाराज का वास्तविक नाम उदय सिंह देशमुख था. उदय सिंह मालवांचल के पुराने शहर शुजालपुर में एक जमींदार घराने में 1968 में पैदा हुए थे. उदय सिंह न केवल खूबसूरत थे बल्कि बेइंतहा प्रतिभाशाली और महत्त्वाकांक्षी भी थे. किशोरावस्था तक तो उन्होंने खेती किसानी में दिलचस्पी ली लेकिन फिर पढ़ाई पूरी करने के बाद मुंबई चले गए और वहां एक प्राइवेट कंपनी में अच्छे पद पर नौकरी कर ली.

मुंबई वाकई मुंबई है जो एक बार जिसे अपने मायाजाल में फंसा लेती है उसे आसानी से नहीं छोड़ती. छोटे से पिछड़े कस्बे से आए उदय सिंह को मुंबई की रंगीनियां भा गईं. अपने खूबसूरत चेहरेमोहरे के दम पर उन्होंने मौडलिंग की दुनिया में भी किस्मत आजमाई. सियाराम जैसी नामी सूटिंग कंपनी ने उन्हें मौका दिया लेकिन उदय सिंह प्रोफेशनल मौडल नहीं बन पाए.

कामयाबी फिल्मी सी

मुंबई में नौकरी करते उदय सिंह को लगा था कि दौलत और शोहरत ही सब कुछ है. बाकी सब मिथ्या है. बस इतना सोचना भर था कि उन्होंने संन्यास लेने का फैसला ले लिया. हैरत की बात यह है कि उन का कोई धार्मिक या आध्यात्मिक गुरु नहीं था अलबत्ता वे दत्तात्रेय को अपना आदर्श मानते थे.

दत्तात्रेय एक पौराणिक पात्र हैं जिन के बारे में कहा और माना जाता है कि वे ब्रह्मा, विष्णु और महेश के संयुक्त अवतार थे. दत्तात्रेय हर किसी से कुछ न कुछ सीखने के लिए उसे अपना गुरु मान लेते थे, जिन में पशुपक्षी तक शामिल होते थे. सूर्य की उपासना करने वाले भय्यूजी महाराज संत जीवन की शुरुआत में कभी जल समाधि लेने के लिए भी मशहूर थे.

हिंदी के अलावा धाराप्रवाह अंग्रेजी, मराठी, मालवी और निमाड़ी भाषा बोलने वाले उदय सिंह के प्रवचनों को लेक्चर कहा जाता था. उन का आध्यात्मिक सफर छोटे से स्तर से शुरू हो कर बड़े मुकाम तक जा पहुंचा. जिस के चलते वह इतने कम वक्त में अपार दौलत और शोहरत के मालिक बन गए थे. इस सब की कल्पना खुद उदय सिंह ने भी नहीं की थी जो भय्यूजी महाराज के नाम से विख्यात हो गए थे.

नाम के लिहाज से देखें तो भय्यूजी महाराज के भक्तों और अनुयायियों की संख्या करोड़ों में जा पहुंची थी. और दाम के लिहाज से आंकें तो मौत के दिन तक उन के पास एक हजार करोड़ रुपए से भी ज्यादा की संपत्ति थी. मालवांचल और महाराष्ट्र के सभी प्रमुख शहरों में उन के आश्रम खुल चुके थे.

मध्य प्रदेश की औद्योगिक राजधानी इंदौर को अपना ठिकाना भय्यूजी महाराज ने बनाया था तो इस की एक बड़ी वजह उन की महाराष्ट्र से जुड़े रहने की इच्छा थी. क्योंकि उन के भक्तों में खासी संख्या महाराष्ट्रियनों की है.

मौडर्न संत थे भय्यूजी महाराज

भय्यूजी महाराज के शौक शाही भी थे और कलात्मक भी. घुड़सवारी और तीरंदाजी के शौकीन भय्यूजी महाराज भजन अच्छा गाते थे और लिखते भी सरल भाषा में थे. सुसाइड नोट को संपादित उन्होंने शायद इसी वजह के चलते किया था कि बात अनावश्यक रूप से बड़ी न लगे.

भय्यूजी महाराज के लेक्चर दरअसल ब्रह्म या ईश्वर आधारित न हो कर मनोवैज्ञानिक ज्यादा होते थे. वे भक्तों को उत्साहित करते, उन में जोश भर देते थे. जब वे बोलते थे यानी लेक्चर देते थे तो ऐसा लगता था मानो साक्षात डेल कार्नेगी या स्वेट मार्टन की आत्मा उन में आ गई है.

उन्हें बस करना इतना होता था कि इन दो अहम दार्शनिकों के विचारों को हिंदू धर्म और संस्कृति से जोड़ना और उन्हें उस क्षेत्रीय भाषा में प्रस्तुत करना होता था, जहां वे लेक्चर दे रहे होते थे.

सीधेसीधे कहा जाए तो भय्यूजी महाराज एक तरह से मेंटर थे, जो आमआदमी की नब्ज पकड़ कर बात करते थे. आप परेशान क्यों हैं, यह बात अगर कोई धर्मगुरु मंच से बता दे और समस्याओं का गैरईश्वरीय हल भी सुझाए तो लोगों का नैराश्य भाव स्वाभाविक रूप से दूर हो जाएगा. यही भय्यूजी महाराज करते थे. सनातन धर्म और धार्मिक कर्मकांडों पर उन का ज्यादा जोर कभी नहीं रहा. अलबत्ता बातबात में वे दत्तात्रेय को जरूर घसीट लाते थे.

जादूटोना, तंत्रमंत्र और ज्योतिष से परे भी समस्याओं का कोई हल होता है, यह बात हमेशा से ही जिज्ञासा का विषय रही है. लोगों की इसी कमजोरी को भय्यूजी महाराज ने खूब भुनाया और देखते ही देखते छा गए. जहां से वे गुजरते थे वहां उन के पैर छूने वालों की लाइन लग जाती थी. लोगों की तकलीफें दूर करने वे शहरशहर प्रवचन शिविर लगाने लगे थे.

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इंदौर के बापट चौराहे पर उन्होंने सद्गुरु दत्त परमार्थिक ट्रस्ट बनवाया था. आश्रम चौबीसों घंटे खुला रहता था. इंदौर आने वाली हर बस या ट्रेन से उन का कोई न कोई भक्त उतरता था. उसे देख आटोरिक्शा वाले तुरंत ताड़ लेते थे कि यह भय्यूजी महाराज का भक्त है.

भय्यूजी महाराज का नाम लोग इज्जत से लेते थे तो इस की वजह सिर्फ इतनी नहीं थी कि उन्होंने अकूत दौलत कमा ली थी बल्कि यह भी थी कि कमाए गए पैसे का बड़ा हिस्सा वे गरीबों और जरूरतमंदों पर खर्च करते थे. इस से हालांकि उन का कारोबार और बढ़ता था, लेकिन उन के जज्बे को इस से नहीं तौला जा सकता.

कुछ हट कर काम किए भय्यूजी ने

इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने महाराष्ट्र के सोलापुर जिले के पंढरपुर इलाके की वेश्याओं के 51 बच्चों को बतौर पिता अपना नाम दिया था. आमतौर पर संत और धर्मगुरु वेश्याओं से परहेज ही करते हैं, लेकिन समाज के इस जरूरी तबके की अनिवार्यता की अहमियत समझते हुए उन्होंने यह अनूठी पहल कर एक तरह से जोखिम ही उठाया था.

महाराष्ट्र के ही बुलढाना जिले के खामगांव में उन्होंने एक आवासीय स्कूल भी बनवाया था, जिस में करीब 700 आदिवासी बच्चे पढ़ते हैं. मुमकिन है इस के पीछे उन की एक मंशा ग्राहकों की भीड़ बढ़ाना भी रही हो लेकिन इस से कुछ गरीब आदिवासी बच्चों की जिंदगी तो संवरी और संभली, इस में कोई शक नहीं.

बुलढाना में पारधी जाति के आदिवासी रहते हैं जो चोरी और अपराधी प्रवृत्ति के लिए कुख्यात हैं. ये लोग न तो कभी मुख्यधारा से जुड़े और न ही मुख्यधारा हांकने वालों ने चाहा कि यह तिरस्कृत जाति उन से जुड़े.

पारधी सहसा ही किसी बाहरी आदमी पर विश्वास नहीं करते, यही भय्यूजी महाराज के साथ भी हुआ. जब उन्होंने स्कूल खोलने की घोषणा की और निर्माण कार्य भी शुरू हो गया तो उन्हें पारधियों का विरोध भी झेलना पड़ा. लेकिन भय्यूजी महाराज घबराए नहीं. एक बार तो पारधियों ने पथराव कर उन्हें भगा दिया था लेकिन वे अपनी जिद पर अड़े रहे और इस में उन्हें कामयाबी भी मिली.

कृषक परिवार से ताल्लुक रखने के कारण वह किसानों की परेशानियां अच्छी तरह समझते थे लिहाजा उन्होंने मध्यप्रदेश के धार और देवास जिलों में लगभग एक हजार तालाब खुदवाए और हर जगह गरीब किसानों को खादबीज वगैरह भी बंटवाए थे. पूजने के लिए इतने काम काफी थे, लेकिन भय्यूजी महाराज का एक अलग चेहरा उस वक्त सामने आया, जब उन्होंने इंदौर में आयोजित हुई धर्मसंसद की आलोचना की थी.

मठों और व्यक्ति पूजा के आलोचक भय्यूजी महाराज का दूसरा चेहरा और दोहरा व्यक्तित्व उस वक्त भी सामने आया था, जब उन्हें उज्जैन में आयोजित सिंहस्थ मेले में आमंत्रित नहीं किया गया था. इस से वह दुखी थे. जाहिर है लीक से हट कर वे इसलिए चल रहे थे कि नाम मिले और उन की चरचा हो और ऐसा हुआ भी. व्यक्ति पूजा को अपराध मानने वाले भय्यूजी महाराज हर गुरु पूर्णिमा पर अपनी पूजा धूमधड़ाके से करवाते थे.

जिंदगी शानोशौकत की

इस खूबसूरत और हैंडसम युवा संत की व्यक्तिगत जिंदगी शानोशौकत और शौकों से भरी रही. भय्यू जी महाराज नएनए मौडल की कारों और महंगी स्विस घडि़यों के शौकीन थे. मर्सिडीज और औडी जैसी कारों में चलने वाले इस संत के हाथ में हमेशा रोलेक्स घड़ी जरूर होती थी.

भक्तों और अनुयायियों के लिए वे इसी लिहाज से अजूबे थे कि जब वह उन के बीच होते थे तो खालिस संत होते थे, लेकिन लग्जरी लाइफ जीते थे. परंपरागत संतों की छवि तोड़ने वाले भय्यूजी महाराज कभी कभी ट्रैक सूट, पैंट शर्ट में भी नजर आते थे. अच्छे और महंगे कपड़ों का शौक भी उन्हें था.

उन के घर और आश्रम में भी आधुनिक सुखसुविधाओं के तमाम गैजेट्स मौजूद थे. भक्तों की सहूलियत का वे उसी तरह ध्यान रखते थे जैसे दुकानदार ग्राहकों का रखता है यानी वे ग्राहक ही भगवान हैं, के सिद्धांत पर चलते थे.

करोड़ोंअरबों की आमदनी का हिसाब भय्यू जी महाराज को मुंह जुबानी याद रहता था और इस से ज्यादा उन्हें यह याद रहता था कि मीडिया को यह गिनाना कि वे संत के रूप में समाजसेवी और पर्यावरणविद हैं जो भक्त से गुरु दक्षिणा में एक पेड़ लगाने को जरूर कहता है.

ब्रांडिंग के इन अनूठे तरीकों ने भय्यूजी महाराज को कामयाबी के आसमान तक पहुंचा दिया, जहां उस के पास वह सब कुछ होता है जिस की ख्वाहिश हर कोई करता है.

महत्त्वाकांक्षी भय्यूजी महाराज को संन्यास लेते ही ज्ञान की एक बात जरूर समझ आ गई थी कि अगर ब्रांडेड बाबा बनना है तो राजनेताओं और फिल्मी हस्तियों से जरूर संपर्क बढ़ाओ, नहीं तो जिंदगी भर पंडाल लगा कर उपदेश देते रहने से खास कुछ हासिल नहीं होने वाला.

संतों और नेताओं का समीकरण बेहद संतुलित है कि जिस संत के पीछे जितनी ज्यादा भीड़ नजर आती है, उसे भुनाने के लिए नेता भी उस के आगेपीछे दौड़ने लगते हैं. जब संन्यास के 3-4 सालों में ही भय्यूजी महाराज ने अपने दम पर अनुयायियों की खासी भीड़ जुटा ली तो साल 2000 के आसपास महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख की नजर उन पर पड़ी.

दोनों की नजरें मिलीं और विलासराव उन पर मेहरबान हो गए. फलस्वरूप सियासी गलियारों में भय्यूजी महाराज का नाम और इज्जत से लिया जाने लगा. उन्हें महाराष्ट्र सरकार ने राज्य अतिथि का दरजा दे दिया. फिर देखते ही देखते उन के पीछे महाराष्ट्र कांग्रेस के तमाम छोटेबड़े नेता नजर आने लगे, जिन में पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल, केंद्रीय मंत्री शरद पवार और पृथ्वीराज चह्वाण जैसे बड़े नाम शामिल थे.

लेकिन भय्यूजी महाराज को अहसास था कि अगर उन पर एक बार कांग्रेसी संत होने का ठप्पा लग गया तो दुकान चलाना मुश्किल हो जाएगा, लिहाजा उन्होंने कांग्रेस से इतर और पींगें बढ़ानी शुरू कीं. अपने घर और आश्रम के दरवाजे उन्होंने भाजपा और शिवसेना के अलावा अछूतों की पार्टी मानी जाने वाली आरपीआई के लिए भी खोल दिए.

महाराष्ट्र के शेर कहे जाने वाले शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे के अंतिम संस्कार में भय्यूजी महाराज परिवार सहित सक्रिय दिखे थे, तब यह स्पष्ट हुआ था कि वे सभी राजनैतिक दलों के हैं. उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे से उन की नजदीकियां कभी किसी सबूत की मोहताज नहीं रहीं.

मिला राज्यमंत्री का दरजा

इस का यह मतलब नहीं था कि भय्यूजी महाराज कांगे्रस, भाजपा या शिवसेना की विचारधारा से सहमत हो गए थे, बल्कि इस का मतलब यह था कि उन के भक्तों को वोटों की शक्ल में बदलते हुए हर कोई देखना चाहता था.

जल्द ही भाजपाई नेता भी उन से जुड़ने लगे. इन में केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी, स्मृति ईरानी, पंकजा मुंडे और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के नाम प्रमुख हैं. अपनी अलग पार्टी एनसीपी बना लेने के बाद भी शरद पवार भय्यूजी महाराज के दरबार में हाजिरी लगाते रहे. अलबत्ता रामदास अठावले इकलौती राजनैतिक हस्ती थे, जो उन के अंतिम संस्कार में शामिल होने इंदौर पहुंचे थे.

फिल्मी हस्तियों में मशहूर गायिका लता मंगेशकर उन की मुरीद थीं तो अभिनेता मिलिंद गुणाजी और गायक बप्पी लहरी भी उन के अनुयाई हो गए थे.

राजनीतिक स्तर पर पहली दफा भय्यूजी महाराज उस वक्त सुर्खियों में आए थे, जब अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी उपवास तुड़वाने के लिए यूपीए सरकार ने उन्हें भी आमंत्रित किया था. तब मंच पर वे अलग ही चमक रहे थे. गुजरात के मुख्यमंत्री रहे नरेंद्र मोदी का सद्भावना उपवास तोड़ने की भी जिम्मेदारी उन्हें ही सौंपी गई थी.

इसी साल अप्रैल में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जिन 5 बाबाओं को राज्यमंत्री का दरजा दिया था, उन में से एक भय्यूजी महाराज भी थे, लेकिन उन्होंने इस पेशकश को ठुकरा दिया था. उन की मौत के बाद कांग्रेसी यह कह कर हमलावर हुए थे कि भय्यूजी महाराज ने मध्य प्रदेश सरकार के दबाव में आ कर आत्महत्या की है. यह दांव ज्यादा चला नहीं, क्योंकि उन की खुदकुशी की वजह कुछ और ही थी.

दूसरी शादी के बाद शुरू हुआ बुरा वक्त

कुल मिला कर भय्यूजी महाराज काफी कुछ हासिल कर चुके थे और आम भक्तों की परेशानियां सुलझाने का अपना काम बखूबी कर रहे थे. लेकिन उन के इर्द गिर्द रहने वाले चुनिंदा लोग ही जानते थे कि दुनियाभर की समस्याएं सुलझाने वाले भय्यूजी महाराज से खुद अपने घर की कलह लाख कोशिशों के बाद भी नहीं सुलझ रही है.

अपनी कामयाबी के दिनों में भय्यूजी महाराज ने जो दौलत और शोहरत हासिल की, वह कभी किसी सबूत की मोहताज नहीं रही. लेकिन उन का बुरा वक्त दूसरी शादी के बाद शुरू हुआ, जब  उन्होंने अप्रैल 2017 में आयुषि शर्मा से शादी की थी. उन की पहली पत्नी माधवी निंबालकर का निधन पुणे में 22 जनवरी, 2015 को हुआ था, जिन से उन्हें एक बेटी हुई थी.

अपनी बेटी कल्याणी का घर का नाम उन्होंने प्यार से कुहू रखा था. एक साधारण पिता की तरह वे कुहू को बहुत चाहते थे और कुहू भी उन्हें इतना चाहती थी कि पिता की दूसरी शादी बरदाश्त नहीं कर पाई.

आयुषि शर्मा मूलत: शिवपुरी के धनियारवाना कस्बे की रहने वाली हैं और उन के पिता अतुल शर्मा कुंडोली नदनबारा मिडिल स्कूल में शिक्षक हैं. पढ़ाई पूरी करने के बाद आयुषि ने कुछ दिन बैंक में नौकरी की और फिर कैरियर संवारने की गरज से पीएच.डी. करने लगीं.

इसी शोध के सिलसिले में उन का भय्यूजी महाराज के घर और आश्रम में आनाजाना शुरू हुआ था. इंदौर में वह एक हौस्टल में रहती थीं और उन की दोस्ती कई लड़कों से भी थी, जिन की जन्मकुंडली पुलिस खंगाल रही है.

भय्यूजी महाराज व्यस्तता के चलते ऐसे शोधार्थियों को ज्यादा वक्त नहीं दे पाते थे, लिहाजा आयुषि की मां और बहन के संपर्क में आई और घंटों उन से बतियाती रहती थीं. इसी दौरान वह भय्यूजी महाराज की बहनों रेणुका और अनुराधा के संपर्क में आईं.

इधर परिजन देख रहे थे कि माधवी की मौत के बाद भय्यूजी महाराज का दिल दुनियादारी से उचटने लगा है तो वे चिंतित हो उठे. भय्यूजी महाराज की एक बहन जिन्हें आयुषि अक्का कहती हैं, ने एक दिन आयुषि के सामने यह प्रस्ताव रख उसे चौंका दिया कि क्या वह उन के भाई से शादी करेंगी.

उम्र में भय्यूजी महाराज से आधी यानी 24 साल की आयुषि के लिए यह फैसला लेना कोई कठिन काम नहीं था. भय्यूजी महाराज का साम्राज्य और वैभव वह पहले ही देख चुकी थीं. प्रस्ताव कुछकुछ ऐसा ही था जैसे किसी झोपड़ी में रहने वाली गरीब कन्या को राजकुमार से शादी करने का मौका मिल रहा हो.

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आयुषि तैयार हो गईं तो भय्यूजी महाराज भी उसे देख कर इनकार नहीं कर पाए. वह थी ही इतनी कमसिन और चंचल कि किसी भी विश्वामित्र की तपस्या भंग करने की क्षमता रखती थीं.

कुहू इस शादी के लिए जरा भी तैयार नहीं थी. यहां भय्यूजी महाराज ने जिंदगी में पहला गच्चा खाया, जो यह सोच रहे थे कि 15 साल की कुहू आज नहीं तो कल आयुषि को मां मान ही लेगी, पर हुआ उलटा. जब शादी के बाद पहली दफा आयुषि घर आई तो गुस्साई कुहू ने पूजा का सामान फेंक दिया.

इस के बाद तो इंदौर बाईपास स्थित सिलवर स्प्रिंग फेज स्थित बंगला नंबर एक किसी पारिवारिक टीवी धारावाहिक का स्टूडियो बन गया, जहां सौतेली मां और बेटी में जम कर कलह होती थी. दोनों एकदूसरे से शक्ल न देखने की हद तक नफरत करती थीं. इन 2 पाटों के बीच पिस रहा था, वह शख्स जिस के आगे करोड़ों लोग श्रद्धा से सिर झुकाते थे और मानते थे कि भय्यूजी महाराज के पास हर परेशानी के ताले की चाबी है.

निस्संदेह भय्यूजी महाराज आयुषि को चाहते थे, लेकिन कुहू पर तो वे जान छिड़कते थे. उन्होंने बहुत कोशिश की कि मांबेटी झगड़े नहीं करें. इस बाबत वे कुछ भी करने तैयार थे लेकिन ऐसा क्या करें जिससे बिल्लियों की तरह लड़ती मांबेटी मान जाएं यह बताने वाला कोई नहीं था.

पुणे में रह कर पढ़ाई कर रही कुहू का खून हर वक्त यह सोचतेसोचते जल रहा होता था कि बाबा आयुषि के साथ घूमफिर रहे होंगे, यह कर रहे होंगे, वह कर रहे होंगे. कोई दूसरी औरत आ कर उस की मां माधवी की जगह ले और रानियों सा हुक्म चलाए, यह उसे किसी भी कीमत पर मंजूर नहीं था.

इस बाबत वह सेवादारों की सेवाएं लेती थी, यह बात पुलिस पूछताछ में उजागर हुई थी. लेकिन आयुषि भी कम नहीं थी, उस ने भी एक सेवादार को इस काम के लिए नियुक्त कर रखा था कि वह भय्यूजी महाराज और आयुषि की फोन पर हुई बातचीत का ब्यौरा उसे दे.

शुरूशुरू में तो आयुषि यह सोच कर अपमान के घूंट पीती रही कि बच्ची है, भड़ास निकल जाएगी तो ठीक हो जाएगी. इस बाबत भय्यूजी महाराज भी उसे समझाते रहते थे, जिन की एक बड़ी परेशानी यह थी कि उन की दूसरी शादी को भक्तों और परिवारजनों ने भी सहज नहीं स्वीकारा था. कई परिवारजन तो उन के इस फैसले से इतने नाराज थे कि उन्होंने भय्यूजी महाराज से कन्नी काटनी शुरू कर दी थी.

घरेलू कलह बढ़ी तो भय्यू जी महाराज घबरा उठे. आखिरकार उन्होंने बीच का रास्ता यह निकाला कि कुहू को पढ़ाई के लिए विदेश भेज दिया जाए. इस सिलसिले में वे खुदकुशी वाले दिन इंदौर के एक होटल में एक महिला से मिले भी थे, जो अपने बेटे को पढ़ाई के लिए विदेश भेजने वाली थी.

हादसे के एक दिन पहले वे पुणे भी जाने वाले थे, लेकिन बीच रास्ते से ही उन्हें लौटना पड़ा था. क्योंकि बारबार उन के पास किसी का फोन आ रहा था, जिसे सुन कर वह परेशान हो रहे थे. ये फोन किस के थे, इन पंक्तियों के लिखे जाने तक पुलिस ने यह उजागर नहीं किया था. पुलिस टीम भय्यूजी महाराज का कंप्यूटर, लैपटाप, टैबलेट और मोबाइल जांच के लिए जब्त कर चुकी थी.

उन का फोन अटैंड करने वाले शेखर ने पुलिस को दिए अपने बयान में बताया था कि ऐसा पहली बार हुआ था, जब गुरुजी ने फोन खुद अटैंड किए और जब भी काल आई तो कार में मौजूद हम सब लोगों को नीचे उतार कर अकेले में बात की.

अगर यह वाकई खुदकुशी है तो संभावना इस बात की भी ज्यादा है कि ये फोन आयुषि और कुहू के ही रहे होंगे. इन तीनों के बीच क्या खिचड़ी पक रही थी, यह खुलासा भी इन पंक्तियों के लिखे जाने तक नहीं हो पाया था.

पुलिसिया पूछताछ में ही सेवादारों ने यह बात बताई थी कि भय्यूजी महाराज कुछ दिनों से पैसों की तंगी से इतने जूझ रहे थे कि कुछ दिन पहले उन्होंने अपनी औडी कार 20 लाख रुपये में बेची थी और अपने एक मालदार भक्त से 10 लाख रुपए उधार मांगे थे.

अलबत्ता पुलिस को दिए बयानों में आयुषी और कुहू के बीच खटास और भड़ास खुले तौर पर उजागर हुई. दोनों भय्यूजी महाराज के पार्थिव शरीर के पास 3 फीट के अंतर से बैठी थीं और एकदूसरे की तरफ देख भी नहीं रही थीं. दोनों के बीच किसी तरह की बातचीत का तो कोई सवाल ही नहीं था.

कुहू ने जोर दे कर यह कहा कि उस के बाबा की मौत की जिम्मेदार आयुषि ही है, उसे जेल में डाल देना चाहिए.

दूसरी ओर आयुषि ने बताया कि कुहू ने उसे कभी मां नहीं माना और हमेशा उस से और उस की 5 महीने की बेटी से नफरत करती रही. यहां गौरतलब है कि आयुषि से पैदा हुई भय्यूजी महाराज की बेटी की बात आश्रम के विश्वसनीय लोग और परिवारजन ही जानते थे.

कलह की समस्याएं इतनी उलझीं कि भय्यूजी को करना पड़ा सुसाइड

आखिरकार 12 जून को पत्नी और बेटी की कलह से तंग आकर उन्होंने खुदकुशी कर ली. कुहू और आयुषी दोनों अलगअलग भय्यूजी महाराज की लाश पर विलाप करती रहीं. इस बीच जम कर अफवाहें उड़ीं और भक्तों का इंदौर आने का सिलसिला शुरू हो गया. 13 जून को भय्यूजी महाराज का विधिविधान से अंतिम संस्कार हो गया, जिस की सारी रस्में कुहू ने पूरी कीं.

इस दिन राजनेताओं का दोगलापन भी उजागर हुआ. उन का कोई दिग्गज भक्त उन के अंतिम संस्कार में शामिल होने इंदौर नहीं आया. अब चर्चा शुरू हुई कि भय्यूजी महाराज की बेशुमार दौलत की, जिस के बारे में वफादार सेवादार विनायक ने कह कर खुद को विवाद से दूर कर लिया कि जैसा परिवार कहेगा, वह वैसा ही करेगा.

भय्यूजी महाराज के परिवारजनों की एक मीटिंग में यह तय हुआ कि आयुषि को गुरुजी की जायदाद का 30 और कुहू को 70 फीसदी मिलेगा. लेकिन जल्द ही सूर्योदय आश्रम के प्रवक्ता तुषार पाटिल ने इस अफवाह को यह कहते खारिज कर दिया कि अभी ऐसा कोई फैसला नहीं हुआ है.

पुलिस जांच जारी थी, जिस में कुछ नया निकलने की उम्मीद किसी को नहीं दिख रही, सिवाय इस के कि दुनिया भर के लोगों की परेशानियां सुलझाने वाले भय्यूजी महाराज अपने ही घर की कलह नहीं सुलझा पाए तो ऐसे धर्म और अध्यात्म के माने क्या जिस के दम पर उन्होंने अपना एक अलग साम्राज्य स्थापित किया था.

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