67   वर्षीय राजेंद्र व्यास मुंबई की ग्रांट रोड के एम.एस. अली मार्ग स्थित भारतनगर परिसर की सोसायटी में अपने परिवार के साथ रहते थे. वह मुंबई की एक मिल में नौकरी करते थे लेकिन मिल बंद हो जाने के कारण उन का झुकाव शेयर बाजार की तरफ हो गया था.

परिवार सुखी और संपन्न था. सोसायटी के लोगों में उन की इज्जत, मानसम्मान और प्रतिष्ठा थी. परिवार में उन की पत्नी सुरेखा व्यास के अलावा 2 बेटियां कीर्ति और शेफाली थीं. उन का कोई बेटा नहीं था, लेकिन उन्हें इस का कोई गम नहीं था. वह अपनी दोनों बेटियों को बेटों जैसा ही प्यार, दुलार करते थे. उन्होंने उन का पालनपोषण भी बेटों की तरह ही किया था.

राजेंद्र व्यास ने दोनों बेटियों को बेटों की तरह शिक्षित कर उन्हें उन के पैरों पर खड़ा किया था. बड़ी बेटी कीर्ति व्यास एमबीए, एलएलबी करने के बाद एक अच्छी पोस्ट पर काम कर रही थी. छोटी बेटी शेफाली भी एक मल्टीनैशनल कंपनी में नौकरी करती थी. सुरेखा गृहिणी के साथसाथ एक अच्छी मां थीं. उन्हें दोनों बेटियों से गहरा प्यार था.

परिवार में किसी चीज की कोई कमी नहीं थी, दिन हंसीखुशी से बीत रहे थे. लेकिन इस साल मार्च महीने में उन के परिवार में एक ऐसी घटना घटी, जिस से पूरे परिवार में मातम छा गया था.

16 मार्च, 2018 की रात राजेंद्र व्यास और उन के परिवार पर भारी थी. उस दिन उन की बेटी कीर्ति सुबह पौने 9 बजे घर से औफिस जाने के लिए निकली थी और देर रात तक वापस नहीं लौटी. सुबह औफिस जाते समय वह किसी बात को ले कर थोड़ा परेशान जरूर थी, लेकिन उस ने परेशानी की वजह किसी से शेयर नहीं की थी. मां सुरेखा के पूछने पर उस ने मुसकरा कर बात टाल दी थी. मां ने भी इस बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया था.

इंतजार की काली रात

दोपहर 12 बजे सुरेखा ने घर पर लगे वाईफाई का पासवर्ड जानने के लिए कीर्ति को फोन किया. लेकिन कीर्ति ने फोन रिसीव नहीं किया. उस का फोन कभी स्विच्ड औफ तो कभी आउट औफ कवरेज आ रहा था.

कई बार फोन करने के बाद भी जब कीर्ति का फोन नहीं लगा तो उन्होंने यह सोचा कि हो सकता है उस ने अपना फोन बंद कर रखा हो. क्योंकि कीर्ति कंपनी में एक बड़ी पोस्ट पर थी.

ऊपर से मार्च का महीना कंपनी की सालाना क्लोजिंग का होता है. वह किसी मीटिंग वगैरह में भी व्यस्त हो सकती थी. उन्होंने सोचा कि यदि वह मीटिंग में होगी तो मीटिंग के बाद खुद ही फोन कर लेगी. पर पूरा दिन बीत गया, न तो कीर्ति का फोन आया और न ही उस ने कोई मैसेज भेजा.

कीर्ति का पूरा परिवार तब परेशान हो गया, जब शेफाली अपने औफिस से घर लौट आई, जबकि कीर्ति का कहीं पता नहीं था. दोनों का औफिस आनेजाने का समय लगभग एक ही था. कीर्ति अपने समय की पाबंद थी.

इसके अलावा वह औफिस से 1-2 बार घर में फोन कर के घर वालों का हालचाल जरूर पूछ लिया करती थी. इस के अलावा अगर उसे देर से आना होता तो इस की जानकारी वह घर वालों को दे दिया करती थी.

society

लापता हुई कीर्ति

जैसेजैसे समय और रात गहरी होती जा रही थी, वैसेवैसे परिवार वालों का दिल बैठता जा रहा था. काफी समय निकल जाने के बाद भी जब कीर्ति घर नहीं पहुंची और न ही उस का कोई फोन आया तो घर वालों ने कीर्ति की कंपनी में फोन कर के उस के बारे में पूछा. वहां से पता चला कि कीर्ति तो आज औफिस आई ही नहीं थी.

यह सुन कर घर में कोहराम मच गया. परिवार के अलावा जिसे भी कीर्ति के औफिस न पहुंचने की खबर मिली, सब स्तब्ध रह गए. घर वालों के अलावा जानपहचान वाले भी कीर्ति की तलाश में लग गए. ऐसी कोई जगह नहीं बची, जहां कीर्ति को नहीं खोजा गया. कीर्ति के साथ काम करने वाले लोग भी घर वालों के साथ मिल कर उसे ढूंढ रहे थे.

सभी यह सोच कर परेशान थे कि कीर्ति सुबह पौने 9 बजे अपनी ड्यूटी के लिए निकली थी तो वह अपने औफिस न पहुंच कर कहां चली गई. सभी का मन किसी अनहोनी को ले कर अशांत था. वह रात कीर्ति के घर वालों के लिए बड़ी बेचैनी भरी गुजरी.

सुरेखा और उन की बेटी शेफाली के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे. पिता राजेंद्र व्यास की हालत भी ठीक नहीं थी. सोसायटी वाले और उन के नातेरिश्तेदार उन्हें धीरज बंधा कर पुलिस के पास जाने की सलाह दे रहे थे.

28 वर्षीय कीर्ति व्यास ने अपनी पढ़ाई पूरी कर जब सर्विस की कोशिश की तो उस की योग्यता के आधार पर उसे बड़ी आसानी से अंधेरी पश्चिम लोखंडवाला स्थित एक जानीमानी कंपनी बीब्लंट (सैलून) में नौकरी मिल गई.

इस कंपनी की सीईओ और एमडी दोनों मशहूर फिल्म अभिनेत्री शबाना आजमी और जावेद अख्तर के बेटे फरहान अख्तर की पूर्वपत्नी अनुधा भवानी अख्तर थीं.

इस कंपनी का फिल्मी सितारों और बड़ेबड़े उद्योगपतियों के बीच एक बड़ा नाम है. यहां हेयर कटिंग और ब्यूटी के लिए आने वालों को 3 हजार से ले कर 10 हजार रुपए तक देने पड़ते हैं. इस कंपनी की दिल्ली, कोलकाता और चेन्नै सहित कई महानगरों में 50 से अधिक शाखाएं हैं, कंपनी का हेडऔफिस मुंबई में है.

यह कंपनी बड़े फिल्मी सितारों, उद्योगपतियों, टीवी कलाकारों आदि की हेयरकटिंग और ब्यूटी ड्रेसिंग का काम तो करती ही है, इस के अलावा टीवी और फिल्मों का फाइनैंस और ऐक्टिंग की कोचिंग क्लासें भी चलाती है.

यहां कोचिंग में आने वालों को 6 महीने की कोचिंग दी जाती है, जिस की फीस 3 लाख से ले कर 8 लाख रुपए के बीच होती है. कंपनी का सालाना टर्नओवर कई करोड़ का होता है.

बीब्लंट की फाइनैंस मैनेजर और लीगल एडवाइजर थी कीर्ति

इस कंपनी में कीर्ति व्यास लगभग 5 साल पहले आई थी. उस ने अपनी मेहनत और जिम्मेदारी से कंपनी के सीईओ और एमडी का दिल कुछ महीनों में ही जीत लिया था. कंपनी में उस की नियुक्ति फाइनैंस मैनेजर के पद पर हुई थी, लेकिन थोड़े ही दिनों में उसे कंपनी का लीगल एडवाइजर भी बना दिया गया था. कीर्ति की मेहनत से कंपनी को काफी लाभ हुआ था और टर्नओवर भी बढ़ गया था.

कंपनी के काम के प्रति वह जिम्मेदार और पाबंद तो थी ही, साथ ही वह वहां के कर्मचारियों के प्रति भी सख्त थी. काम में किसी भी प्रकार की ढिलाई या लापरवाही उसे जरा भी पसंद नहीं थी. कंपनी की लीगल एडवाइजर और फाइनैंस मैनेजर होने के नाते वह किसी भी प्रकार का निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र थी. कंपनी के भले के लिए वह हर उस शख्स के प्रति सख्त थी जो लापरवाह रहता था. वह यह नहीं देखती थी कि कोई सीनियर है या जूनियर.

कीर्ति व्यास को गायब हुए अब तक 24 घंटे से अधिक हो चुके थे, लेकिन उस की कोई खबर नहीं मिली थी. घर वालों के सामने अब सिर्फ पुलिस के पास जाने का रास्ता बचा था. लाचार और मजबूर हो कर कीर्ति के पिता राजेंद्र व्यास अपने नातेरिश्तेदारों और कंपनी के कुछ लोगों के साथ थाना डी.बी. मार्ग पहुंचे. उन्होंने थानाप्रभारी से मिल कर उन्हें सारी बातें बताईं. थानाप्रभारी ने उन की बातें सुनने के बाद कीर्ति के अपहरण का मामला दर्ज करवा दिया.

मामला एक हाईप्रोफाइल कंपनी की अधिकारी से जुड़ा हुआ था, इसलिए थानाप्रभारी किसी भी तरह का जोखिम नहीं लेना चाहते थे. उन्होंने अपने अधिकारियों के अलावा पुलिस कंट्रोल रूम को मामले की जानकारी दे दी. थानाप्रभारी ने वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश पर मामले की जांच तेजी से शुरू कर दी.

पुलिस ने कीर्ति के घर से ले कर औफिस तक सभी सीसीटीवी कैमरों की फुटेज, कीर्ति के फोन की काल डिटेल्स हासिल कर उस की कंपनी के सभी कर्मचारियों के बयान लिए. लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात रहा.

वह मामले को जितना सुलझाने की कोशिश कर रहे थे, उतना ही वह उलझता जा रहा था. जैसेजैसे समय बढ़ता जा रहा था, वैसेवैसे उन के वरिष्ठ अधिकारियों का दबाव भी बढ़ता जा रहा था. पुलिस अपने तरीके से मामले की जांच तो कर ही रही थी, लेकिन कीर्ति के घर वाले भी उस की तलाश में गलियों और उपनगरों में कीर्ति के पोस्टर ले कर भटक रहे थे.

वह उपनगरों के अस्पतालों, रेलवे स्टेशनों की खाक छान रहे थे. कीर्ति के हजारों पोस्टर छपवा कर मुंबई के गलीमोहल्लों के साथ सभी सार्वजनिक जगहों और वाहनों पर चिपकवा दिए गए. प्रिंट और इलैक्ट्रौनिक मीडिया का भी सहारा लिया गया. लेकिन आशा की कोई किरण नजर नहीं आई.

सूरज हर दिन निकलता था. रात हर रोज होती थी. मगर कीर्ति के घर वालों का दर्द कम होने का नाम नहीं ले रहा था.

घर वालों का धैर्य जवाब देने लगा

जैसेजैसे कीर्ति व्यास के मामले को ले कर समय निकलता जा रहा था, वैसेवैसे कीर्ति के परिवार वालों का सब्र टूटता जा रहा था. जब एक महीने से अधिक का समय हो गया तो उन का धैर्य टूट गया. स्थानीय पुलिस से उन का भरोसा उठ चुका था. वे अपने परिवार के साथ पुलिस कमिश्नर दत्तात्रेय पड़सलगीर से मुलाकात कर मामले को क्राइम ब्रांच को सौंपने का निवेदन किया.

पुलिस कमिश्नर दत्तात्रेय पड़सलगीर इस मामले पर पहले से ही नजर बनाए हुए थे, उन्होंने मामले की गंभीरता को देखते हुए जौइंट पुलिस कमिश्नर संजय सक्सेना और डीसीपी (क्राइम) दिलीप सावंत को मामले की जांच की जिम्मेदारी सौंप दी. क्राइम ब्रांच ने मामले की गहनता से जांच शुरू कर दी. अब तक इस संबंध में फेसबुक, वाट्सऐप और ट्विटर पर काफी कुछ कहासुना जा चुका था.

बीब्लंट की मालिक सीईओ अनुधा भवानी अख्तर और बीब्लंट कंपनी को जानने वाले लोगों ने ट्वीट कर के कीर्ति के विषय में जानकारी देने की अपील के साथसाथ पुलिस की जांच पर तमाम प्रश्नचिह्न खड़े किए थे. यह हाईप्रोफाइल केस एक तरह से क्राइम ब्रांच की प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया था.

क्राइम ब्रांच यूनिट-2 के सीनियर पीआई प्रशांत राजे ने सहायक पीआई अर्जुन जगदाले, एपीआई सचिन माने, संतोष कदम, हैडकांस्टेबल संजीव गुडेवार, हृदयनाथ मिश्रा, प्रशांत सिढमे, प्रमोद शिर्के और राजेश सोनावाले के साथ इस मामले की कडि़यों को जोड़ना शुरू किया.

उन्होंने अपनी जांच की शुरुआत उन्हीं सूत्रों से की, जिन पर स्थानीय पुलिस कर चुकी थी. उन्होंने कीर्ति के घर वालों के बयान और कीर्ति के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स का बारीकी से अध्ययन किया तो जांच में कई खामियां नजर आईं.

society

कीर्ति के घर वालों के बयान के अनुसार कीर्ति सुबह सवा 9 बजे की विरार लोकल ट्रेन से ग्रांट रोड से अंधेरी जाया करती थी. लेकिन घटना वाले दिन सुबह उसे लेने के लिए उस की इमारत के नीचे ब्राउन कलर की एक फोर्ड ईकोस्पोर्ट्स कार आई थी, जिस के कांच पर काले रंग की फिल्म चढ़ी हुई थी. इस से अंदर बैठे लोग दिखाई नहीं दे रहे थे. यह कार कीर्ति की कंपनी की मैनेजर खुशी सेजवानी की थी.

लेकिन उन्होंने जांच टीम को जो बयान दिया था, वह विश्वसनीय नहीं था. उन्होंने कहा था कि वह उस दिन कंपनी के अकाउंटेंट सिद्धेश तम्हाणकर के साथ ग्रांट रोड अपने एक व्यक्तिगत काम से आई हुई थी.

लौटते समय उन्होंने कीर्ति को यह सोच कर अपने साथ लिया कि वह भी उन के साथ औफिस चली चलेगी. उस के साथ रहने से रास्ते का टाइम भी पास हो जाएगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

रोड जाम होने के कारण कीर्ति ने यह कह कर उन की कार छोड़ दी कि वह औफिस के लिए लेट हो जाएगी. जबकि सीसीटीवी कैमरे की फुटेज में ऐसा कुछ नहीं था. उस समय रोड साफ था.

जांच में यह भी पता चला कि उस दिन कीर्ति का मोबाइल फोन वरली के भारतनगर में बंद हुआ था. जिस समय उस का फोन बंद हुआ, उसी समय खुशी सेजवानी और सिद्धेश तम्हाणकर के फोन की लोकेशन भी भारतनगर में पाई गई.

पुलिस को इस बात पर शक हो गया कि जब वह ट्रेन से गई थी तो उस का मोबाइल वरली में क्या कर रहा था. और उन दोनों का फोन उस के साथ क्यों था. इन सब सवालों के जवाब के लिए सिद्धेश तम्हाणकर और खुशी सेजवानी को क्राइम ब्रांच के औफिस बुलाया गया. लेकिन वे पुलिस के सवालों का संतोषजनक जवाब नहीं दे पाए, जिस से पुलिस को उन पर शक हो गया.

खुल गया हत्या का राज

संदेह पुख्ता करने के लिए पुलिस ने खुशी सेजवानी की फोर्ड ईकोस्पोर्ट्स कार को कब्जे में ले कर जांच के लिए सांताक्रुज की फोरैंसिक लैब में भेज दिया. परीक्षण में कार की डिक्की के अंदर खून के कुछ धब्बे पाए गए, जिस का डीएनए किया गया तो वह कीर्ति के डीएनए से मैच हो गया.

इस के बाद तो उन दोनों पर शक की कोई गुंजाइश नहीं बची. अब स्थिति साफ हो चुकी थी. पुलिस ने खुशी सेजवानी और सिद्धेश से पूछताछ की तो उन्होंने कीर्ति की हत्या करने की बात स्वीकार कर ली. उस की हत्या की उन्होंने जो कहानी बताई, वह दिल दहला देने वाली थी—

27 वर्षीय सिद्धेश तम्हाणकर अपने पूरे परिवार के साथ परेल, मुंबई के लालबाग में रहता था. उस के पिता सीताराम तम्हाणकर नौकरी से रिटायर हो चुके थे. पूरे परिवार की जिम्मेदारी सिद्धेश के ऊपर थी. परिवार वालों का वह एकलौता सहारा था.

वह कंपनी में अपना काम ठीक से नहीं करता था. कंपनी के काम के बजाय उस का मन इधरउधर अधिक रहता था. कंपनी के सारे अकाउंट की जिम्मेदारी उस की थी, लेकिन वह अपनी जिम्मेदारी के प्रति जरा भी गंभीर नहीं था.

कीर्ति व्यास के काम को देखते हुए बीब्लंट कंपनी ने कीर्ति को जो जिम्मेदारियां दी थीं, वह उन का बड़ी ईमानदारी से पालन करती थी. अपने दूसरे सहयोगियों को भी वह कंपनी के प्रति निष्ठावान बनने की सलाह देती थी. वह खुद तो मेहनत करती ही थी, दूसरे कर्मचारियों से भी मेहनत करवाती थी जिस से कंपनी के कई लोग उस से खुश नहीं थे.

सिद्धेश तम्हाणकर भी उन्हीं में से एक था लेकिन कीर्ति को इस की कोई परवाह नहीं थी. कीर्ति ने 5 सालों में बीब्लंट कंपनी में अपनी एक खास जगह बना ली थी, जबकि कंपनी के अंदर 10-15 सालों से काम कर रहे लोग ऐसी जगह नहीं बना पाए थे. मेहनत की वजह से कीर्ति को कंपनी के कई अधिकार मिल गए थे. कंपनी की सीईओ और एमडी उस से काफी प्रभावित थीं.

कंपनी के सारे लोगों से कीर्ति का व्यवहार मधुर व सरल था. बाहर से आनेजाने वाले लोग भी कीर्ति को भरपूर मानसम्मान देते थे. लेकिन सिद्धेश तम्हाणकर के साथ ऐसा नहीं था, क्योंकि कीर्ति ने जब कंपनी का काम संभाला था, तब से सिद्धेश तम्हाणकर की मनमानी पर रोक लग गई थी.

कीर्ति ने पहले तो सिद्धेश तम्हाणकर की काम के प्रति लापरवाही पर उसे कई बार समझाया, लेकिन सिद्धेश पर उस की बातों का कोई असर नहीं हुआ. उस का रवैया पहले जैसा रहा. वह कंपनी के कामों पर ध्यान नहीं देता था.

जलन बन गई ज्वाला

सरकार ने जब से जीएसटी लगाई तो सिद्धेश की परेशानी और ज्यादा बढ़ गई. क्योंकि जीएसटी की गणना उस की समझ से परे थी. पहले तो थोड़ीबहुत लापरवाही चल जाती थी, लेकिन जीएसटी में लापरवाही की कोई गुंजाइश नहीं थी. काम सही ढंग और समय से पूरा करना ही पड़ता था.

जीएसटी की कम समझ होने के कारण सिद्धेश के अकाउंट में बहुत सारी गलतियां तो होती ही थीं, काम भी समय से नहीं हो पाता था. इस से कंपनी के नुकसान के साथसाथ बदनामी का भी डर था. चेतावनी के बाद भी सिद्धेश ने जब अपने काम में सुधार नहीं किया तो कीर्ति ने उसे कंपनी से निकालने का नोटिस दे दिया.

इस नोटिस से सिद्धेश बौखला गया. नौकरी जाने के बाद उस का और उस के परिवार का क्या होगा, सोच कर वह परेशान रहने लगा. कोई रास्ता न देख उस ने उसी कंपनी में काम करने वाली अपनी दोस्त खुशी सेजवानी से सलाह की.

बाद में वह कंपनी के सीईओ व एमडी अनुधा अख्तर के पास गया. लेकिन बात नहीं बनी. इस पर उस ने अपनी नौकरी जाने के डर से कीर्ति व्यास के प्रति एक खतरनाक निर्णय ले लिया था. उस ने सोचा कि क्यों न कीर्ति को ही खत्म कर दिया जाए. न रहेगा बांस और न बजेगी बांसुरी. उसे लग रहा था कि कीर्ति के न रहने से शायद उस की नौकरी भी रहे. इस काम में उस की मदद करने के लिए खुशी भी तैयार हो गई.

37 वर्षीय खुशी सेजवानी बीब्लंट कंपनी में कोचिंग क्लासेज के मैनेजर के पद पर काम करती थी. कंपनी में जितना महत्त्व कीर्ति का था, उतना ही महत्त्व खुशी का भी था. सेजवानी मुंबई सांताक्रुज पश्चिम के एस.बी. रोड स्थित एक अपार्टमेंट में अपने एकलौते बेटे के साथ रहती थी.

उस के पति एक कामयाब बिजनैसमैन थे. काम के सिलसिले में वह अकसर बाहर ही रहते थे. परिवार संभ्रांत और संपन्न था. घर पर नौकरनौकरानी थे. किसी भी चीज की कोई कमी नहीं थी. सिद्धेश और खुशी की गहरी दोस्ती थी. इतने बड़े अपराध में खुशी सेजवानी ने सिद्धेश का साथ क्यों दिया, पुलिस इस बात की जांच कर रही है.

अपराध की राह पर सिद्धेश और खुशी

16 मार्च, 2018 को सिद्धेश की नौकरी का आखिरी दिन था. इस के पहले कि कीर्ति कंपनी में आ कर सिद्धेश पर काररवाई करती, सिद्धेश और खुशी योजनानुसार अपनी कार ले कर कीर्ति के घर के पास पहुंच गए. फिर खुशी ने कीर्ति को फोन कर के कहा कि वह किसी काम से भारतनगर आई थी. काम खत्म हो जाने के बाद अब औफिस जा रही है. अगर उसे भी औफिस चलना हो तो आ जाए, साथसाथ चले चलेंगे.

कीर्ति औफिस जाने की तैयारी कर ही रही थी. खुशी का फोन आने के बाद उस ने उस के साथ चलने की हामी भर दी और फटाफट तैयार हो कर उस की गाड़ी में पहुंच गई.

गाड़ी खुशी सेजवानी चला रही थी, कीर्ति उस के बराबर में बैठ गई. सिद्धेश पीछे वाली सीट पर बैठा था. कुछ दूर चलने के बाद खुशी सेजवानी ने कीर्ति को मनाने की काफी कोशिश की कि वह सिद्धेश को दिया नोटिस वापस ले ले, लेकिन वह इस के लिए तैयार नहीं हुई. तब पीछे की सीट पर बैठे सिद्धेश ने कीर्ति के गले में सीट बेल्ट डाल कर हत्या कर दी.

कीर्ति की हत्या करने के बाद खुशी ने कार अपने घर पर ला कर खड़ी कर दी और उस पर कवर डाल कर दोनों औफिस चले गए. मगर कंपनी के काम में उन का मन नहीं लग रहा था. उस दिन खुशी सेजवानी 4 बजे ही अपने औफिस से घर के लिए निकल गई. कार में शव होने के कारण सिद्धेश भी शाम 5 बजे के करीब खुशी के घर पहुंच गया.

मौका देख कर वे कीर्ति की लाश कार से निकाल कर घर के अंदर ले गए. फिर उसे ठिकाने लगाने के मकसद से उन्होंने लाश के 3 टुकड़े किए. फिर उन्हें कार की डिक्की में डाल कर चेंबूर के माहुल इलाके में ले गए. वहां आगे जा कर उन्होंने कीर्ति की लाश के तीनों टुकड़े नाले में डाल दिए. फिर उन्होंने कार की अच्छी तरह धुलाई करा ली.

बाद में कीर्ति के घर वालों के साथ वे दोनों भी उस की तलाश करने का नाटक करने लगे.

सिद्धेश तम्हाणकर और खुशी सेजवानी से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने 5 मई, 2018 को उन की निशानदेही पर कीर्ति का बैग, मोबाइल फोन, कुछ नकदी भी बरामद कर ली. फिर उन दोनों के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 201, 341, 363, 364 और 34 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर उन्हें न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया.

कथा लिखे जाने तक पुलिस कीर्ति के शव के टुकड़ों को काफी कोशिशों के बाद भी बरामद नहीं कर पाई थी. माना जा रहा है कि वे टुकड़े नाले में बह कर कहीं आगे निकल गए होंगे. फिर भी पुलिस की कोशिश जारी है.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित