सरिता विशेष

युवतियों को बराबर की शिक्षा और रोजगार के बल पर लड़कों के समान सामाजिक और आर्थिक अवसर व ईनाम मिलने का कानूनन हक है. लेकिन जमीनी हकीकत इस से कोसों दूर है, फिर चाहे वह भारत में हो या फिर अफ्रीका में, हौलीवुड में हो या आस्ट्रेलिया की संसद में. इसी असमानता के कारण युवतियों को कई बार विरोध करना पड़ता है, अपने लिए आवाज उठानी पड़ती है. आज की युवती अपने लिए केवल शिक्षा और रोजगार ही नहीं, युवकों के बराबर आजादी भी मांग रही है.

नीति आयोग के अध्यक्ष का कहना है कि 10 प्रतिशत वार्षिक वृद्धि के  लिए देश में ह्यूमन डैवलैपमैंट इंडैक्स में सुधार होना चाहिए जिस में भारत 180 देशों में  130वें स्थान पर है. इस इंडैक्स में बराबरी को भी एक मानक माना जाना है.

विश्वभर में यौन अधिकारों को मानवाधिकारों से जोड़ कर देखा जाता है. एक लड़की पहले एक मानव है और उस के भी बराबर के अधिकार हैं. कहने को तो हम कह देते हैं कि हमारे यहां युवतियां युवकों के बराबर हैं, लेकिन जब बात युवतियों को उन की पसंद, उन के अपने शरीर पर हक देने की आती है तो क्या उन को मनमरजी करने का अधिकार मिलता है? इस विषय की असलियत जानने के लिए समाज के अलगअलग पहलुओं से जुड़ीं कुछ महिलाओं के विचार जानने की कोशिश करते हैं.

महिला सशक्तीकरण की बात

पुणे की सिंबायोसिस इंटरनैशनल यूनिवर्सिटी की प्रोफैसर डा. सारिका शर्मा बताती हैं, ‘‘कहने को तो हम सब कहते हैं कि हमारे लिए बेटों और बेटियों में कोई फर्क नहीं है, लेकिन जब बात जमीनी सचाई की आती है तब युवकयुवतियों के लिए अलग नियम होते हैं. युवतियों के लिए अकसर कुछ अनकहे नियम होते हैं, जिन का उन्हें पालन करना होता है. जैसा कि फिल्म ‘पिंक’ में दिखाया गया कि युवकयुवतियों द्वारा किए गए एक ही काम के लिए समाज का नजरिया  बदल जाता है. उदाहरणस्वरूप, युवक सिगरेट पिएं तो सिर्फ उन के स्वास्थ्य की हानि की चिंता होती है, वहीं अगर युवती सिगरेट पिए तो उस के चालचलन तक बात पहुंच जाती है.’’

जहां तक सारिका का मां की हैसियत से प्रश्न है, वे बेटी को उस का कैरियर चुनने का, अपनी इच्छा के मुताबिक कपड़े पहनने का या फिर बाहर आनेजाने का पूरा अधिकार देती हैं. लेकिन यदि उन की बेटी उन्हें अपने बौयफ्रैंड से मिलवाए तो उस के लिए वे तैयार नहीं हैं.

वे मानती हैं कि महिला सशक्तीकरण के कई रास्ते हैं. आज युवतियां फौज में जा रही हैं, हवाईजहाज उड़ाने के साथसाथ सड़क पर ट्रक भी दौड़ा रही हैं और फाइटर जैट तक उड़ा रही हैं. लेकिन सैक्स की मनमानी का अधिकार देना उन की दृष्टि में आजादी नहीं है.

डा. सारिका कहती हैं, ‘‘अभी हमारा समाज इस स्तर तक नहीं पहुंचा है जहां युवतियों की शारीरिक इच्छाओं की पूर्ति को हम सहज स्वीकार सकें. यदि इस समय हम अपनी बेटियों को ऐसी आजादी देंगे तो समाज में उन्हें कई मुसीबतें झेलनी पड़ सकती हैं.’’

नोएडा के एक स्कूल में अंगरेजी की अध्यापिका व फ्रीलांस क्विजीन ऐक्सपर्ट साक्षी शुक्ला बेबाकी से कहती हैं, ‘‘आज हम एक ऐसे युग में जी रहे हैं जहां महिला सशक्तीकरण एक अहम मुद्दा है. ऐसे में युवतियों को सैक्स के बारे में जागरूक करना चाहिए. एक ओर सैक्स एजुकेशन की बात होती है, जबकि दूसरी तरफ घर के अंदर इस विषय पर बात करने में भी मातापिता हिचकिचाते हैं. परंतु यदि सच में समाज में बदलाव लाना है, तो युवतियों को उन के अपने शरीर पर अधिकार की अनुमति देनी होगी.

‘‘सैक्स एक कुदरती प्रक्रिया है. एक महिला का सम्मान, उस की इज्जत सिर्फ उस की सैक्सुऐलिटी में ही नहीं है. समय आ गया है कि समाज अपनी इज्जत महिला के जननांगों में नहीं, बल्कि उस के बौद्धिक विकास में ढूंढ़े, उस के फैसले लेने की क्षमता में खोजे.’’

साक्षी आचार्य चाणक्य से सहमत हैं कि 5 वर्षों तक बच्चों को लाड़ करो, किशोरावस्था तक उन पर कड़े नियम लगाओ और फिर उस के मित्र बन जाओ. साक्षी कहती हैं, ‘‘आज हमें ‘मेरा शरीर मेरे नियम’ जैसे कैंपेन का हिस्सा बनना चाहिए, क्योंकि यदि लोग खुद इस का हिस्सा नहीं बनेंगे तो बदलते हालात में युवतियां बागी होने को मजबूर हो जाएंगी.

‘‘किशोरावस्था में गर्भधारण और फिर गर्भपात, यौनशोषण या यौनउत्पीड़न आदि से युवतियों को सही समय पर यौन संबंधी जानकारी दे कर बचाया जा सकता है और इस का सही समय तभी आरंभ हो जाता है जब युवतियां किशोरावस्था में कदम रखती हैं.’’

बराबर के हों नियम

फिनलैंड की एक बहुद्देशीय कंपनी में कार्य कर चुकीं रिंपी नरूला कहती हैं, ‘‘महिला होने के नाते मैं यह अनुभव करती हूं कि हमारे समाज में युवकों की तुलना में युवतियों को कम आजादी मिलती है.

‘‘मातापिता को अपने घर की चारदीवारी के अंदर युवकयुवतियों में फर्क नहीं करना चाहिए. उन्हें दोनों के लिए समान नियम लागू करने चाहिए. यदि एक घर में युवक को देररात तक बाहर आनेजाने की इजाजत है तो युवती को भी होनी चाहिए. और यदि युवतियों की इज्जत को खतरा लगता है तो फिर युवकों को भी देररात बाहर नहीं निकलने दिया जाना चाहिए.

सरिता विशेष

‘‘आखिर युवकों के कारण ही तो युवतियों की इज्जत को खतरा होता है न. यदि नियम हों तो बराबर के हों. कुछ लोगों की ऐसी सोच होती है कि यदि युवतियों को पूरी आजादी दे दी जाएगी तो वे बिगड़ जाएंगी, यह सोच गलत है.

‘‘युवतियों पर भरोसा रखें, उन्हें संस्कार के साथ प्यार, विश्वास और इज्जत दें. उन में आत्मविश्वास जगाएं और फिर नतीजा देखें. युवतियों को घरेलू संस्कार देना हर परिवार अपना कर्तव्य समझता है, क्योंकि उन्हें गृहस्थी संभालनी होती है. लेकिन एक युवती की कुछ अपनी इच्छाएं भी हो सकती हैं. तो वह भी परिवार की जिम्मेदारी है कि वह युवतियों को अपनी ऐसी इच्छाओं को सुरक्षा के साथ कैसे पूरा करना है, यह सिखाए.

‘‘आजादी देने से युवतियां बिगड़ जाएंगी, यह जरूरी नहीं है. हां, वे अपनी सोच को अंजाम जरूर देंगी और इस के लिए जैसे समाज युवकों को स्वीकारता है वैसे ही उसे युवतियों को भी स्वीकारना होगा.’’

जिम्मेदारीभरी आजादी

मुंबई के टिस्स (टाटा इंस्ट्टियूट औफ सोशल साइंसैस) की मनोवैज्ञानिक मोना उपाध्याय अपने बेटाबेटी में पूरी तरह बराबरी रखती हैं. ऐसा वे एक सजग मां होने के नाते करती हैं. जब उन का बेटा कालेज में पढ़ने गया तब, और फिर जब बेटी दूसरे शहर कालेज गई तब उन्होंने अपने दोनों बच्चों से निजी वार्त्तालाप किया जिस में उन्होंने दबेढके रूप से यह बात उठाई कि दूसरी जगह, परिवार से दूर रहने पर, उम्र की इस दहलीज पर हो सकता है कि बच्चों के दिल को कोई भा जाए और उन के कदम बहक जाएं.

ऐसे में उन्हें यह यकीन होना चाहिए कि उन का परिवार उन के फैसले में साथ रहेगा, लेकिन साथ ही उन्हें यह एहसास भी होना चाहिए कि उन के जीवन के प्रति उन का कर्तव्य है कि वे सही फैसला लें. जो भी फैसला वे लेंगे उस का खमियाजा उन्हें खुद अपने जीवन में भुगतना होगा. उस के लिए परिवार के सदस्य उन की कोई सहायता नहीं कर सकेंगे.

मोना यह जानने को भी आतुर हैं कि यदि कदम आगे बढ़े तो उस की वजह क्या रही? एक मनोवैज्ञानिक होने के नाते वे मानती हैं कि सैक्स एक कुदरती प्रक्रिया है और उसे भावनात्मक बनाना जरूरी नहीं है. फि र भी दिल टूटता है तो उसे जोड़ना खुद ही होता है. वे अपनी बेटी को टूटे दिल को संभालने के गुर जरूर सिखाना चाहेंगी. दिल टूटने का मतलब जीवन का अंत नहीं.

मोना अपनी बेटी को बेटे के समान आजादी देने के पक्ष में हैं. साथ ही, वे यह भी चाहती हैं कि बेटी अपने जीवन में भावनाओं में बह कर कोई गलत फैसला न ले. इस से निबटने का हथियार है बच्चों से बातचीत. यदि परिवार में बातचीत है तो कोई ठोस कदम उठाने से पहले बच्चे मातापिता से अपने दिल की बात कहने में हिचकिचाएंगे नहीं. परिवार की महिला का यह कर्तव्य है कि वह पूरे परिवार में खुली बातचीत का माहौल कायम करे. फिर चाहे वह बेटी को पीरिएड्स में पैड्स की जरूरत की बात हो या अपने दिल का हाल सुनाने की.

डेल कंपनी की सीनियर कंसल्टैंट पल्लवी बताती हैं, ‘‘विदेशों में बेटे की गर्लफ्रैंड हो या बेटी का बौयफ्रैंड, दोनों को घर आने की आजादी होती है. अंतर्राष्ट्रीय महिला स्वास्थ्य संगठन सैक्सुअल अधिकार को मानवाधिकार के रूप में देखता है. सैक्स हमारे जीवन का एक अहम हिस्सा है, लेकिन इतना भी महत्त्वूपर्ण नहीं कि सारी जिंदगी उस के आसपास ही डोलें और न इतना हलका होता है कि उस के बारे में सोचा भी न जाए.’’

सैक्सुअल अधिकार अपने शरीर पर अधिकार की एक खास भावना है. पल्लवी अपने बच्चों को उन के शरीर पर अधिकार देने के पक्ष में हैं. अपने शरीर पर अपना अधिकार एक बड़ा कौंसैप्ट है जो जितनी जल्दी समझ में आए उतना ही बेहतर है. यह जीवन में आगे चल कर बच्चों को भावनात्मक रूप से ताकतवर बनाता है और इस के चलते वे जिंदगी के कई अहम फैसले लेने में सक्षम होते हैं जो उन्हें शारीरिक व मानसिक तौर पर प्रभावित करते हैं.

जागरूक बेटियों को दें आजादी

दिल्ली के द्वारका कोर्ट में पारिवारिक मामलों की वकालत कर रहीं रजनी रानी पुरी कहती हैं, ‘‘कैसे दोहरे मापदंड हैं हमारे समाज में, जहां युवतियों को बौयफ्रैंड रखने पर बदचलन कहा जाता है जबकि युवकों को गर्लफ्रैंड रखने पर मर्द कहा जाता है. मेरी सहेली के बेटे की गर्लफ्रैंड घर आती है, कमरे का दरवाजा बंद कर वे दोनों घंटों बिता देते हैं और घर वाले हंस कर छेड़ते हैं कि चाय की जरूरत है क्या. लेकिन उसी सहेली की बेटी ने जब अपने बौयफ्रैंड को परिवार से मिलवाना चाहा तो हंगामा मच गया.

‘‘उस सहेली से जब मैं ने इस दोहरे मापदंड पर सवाल किया तो उस के पास एक ही सवाल था, लड़की के साथ घर की इज्जत जुड़ी होती है. माना कि कुदरती रूप से युवती सैक्स के मामले में कमजोर है, क्योंकि उस की बात पकड़ में आ सकती है जबकि युवक आसानी से बच जाता है, लेकिन इस से बचने के लिए हमें अपनी बेटियों को यौनशिक्षा देनी चाहिए, उन्हें उन के यौन अधिकारों से परिचित करवाना चाहिए.

‘‘हमारा पुरुषप्रधान समाज युवकों को शौर्ट्स पहनने पर कूल कहता है जबकि युवतियों को चरित्रहीन. उन्नति की ओर बढ़ते हमारे समाज की करनी और कथनी में बहुत अंतर है. समाज की कट्टर सोच को ध्यान में रखते हुए युवतियों को समान अधिकार पाने के लिए बहुत होशियारी के साथ जीवन के फैसले लेने होंगे. इस के लिए उन्हें बचपन से ही जागरूक करना मातापिता की जिम्मेदारी है.’’

समाज बदल रहा है और युवतियों को आजादी मिलने लगी है, कहीं कम तो कहीं ज्यादा. लेकिन आजादी मुफ्त नहीं होती, उस की कीमत अदा करनी पड़ती है और वह कीमत होती है जिम्मेदारी. केवल आजादी के नारे लगाने से आजादी नहीं मिल सकती. जिन्हें आजादी की गुहार लगानी आती है, उन्हें आजादी मिलने से पहले अपनी जिम्मेदारी भी निभानी होगी. यह जिम्मेदारी है अपने जीवन के प्रति, अपने परिवार की खुशियों और ख्वाहिशों के प्रति, ताकि आगे चल कर समाज को अपने बदलने पर कोई पछतावा न हो.