मूर्तियों के देश भारत में किसी राज्य की सरकार बदलने पर मूर्तियां उखाड़ने का पहली बार खतरनाक दृश्य उभर कर सामने आया है. यह एक नए खतरे की आहट है.

वैसे तो देश में सत्ता बदलते ही दफ्तरों में तसवीरें बदलने का पुराना रिवाज है पर मूर्ति के बदले मूर्तियां तोड़नेफोड़ने का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह किसी सभ्य लोकतांत्रिक युग का नहीं, मध्ययुगीन सोच को जाहिर करता है. देश में तरक्की का नहीं, जड़ता का दौर दिखाईर् दे रहा है जहां मूर्तियों को नफरत की वजह से तोड़ा जा रहा है. मूर्ति तोड़े जाने की पहली घटना त्रिपुरा की राजधानी अगरतला से 90 किलोमीटर दूर बेलोनिया के सैंटर औफ कालेज स्क्वायर में स्थापित व्लादिमीर लेनिन की मूर्ति को जेसीबी मशीन से गिराने से घटी. राज्य में वामपंथ को हरा कर भाजपा को जीत हासिल किए महज 48 घंटे ही बीते थे कि भारत माता की जय का नारा लगाती भीड़ ने इसे ढहा दिया. 2013 में वामपंथी पार्टी ने जब चुनाव जीता था तब इस प्रतिमा को लगाया था.

इस के बाद दक्षिण त्रिपुरा के सबरूम में लेनिन की एक और मूर्ति गिरा दी गई. देखतेदेखते देश के कई हिस्सों से मूर्तियों को तोड़ने, गिराने की खबरें आने लगीं. प्रतिक्रियास्वरूप, पश्चिम बंगाल के कोलकाता में वामपंथी समर्थकों ने जनसंघ के संस्थापक श्यामाप्रसाद मुखर्जी की प्रतिमा पर कालिख पोत दी और उसे तोड़ने का प्रयास किया.

इसी बीच तमिलनाडु में वेल्लूर के तिरुपत्तूर तालुका में द्रविड़ आंदोलन के प्रवर्तक ई वी रामास्वामी पेरियार की प्रतिमा को हथौड़े से तोड़ दिया गया. उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले के मवाना क्षेत्र में भीमराव अंबेडकर की मूर्ति नष्ट कर दी गई. फिर केरल से महात्मा गांधी की प्रतिमा का चश्मा और चेन्नई से अंबेडकर की प्रतिमा के तोड़े जाने की खबरें आईं.

जिन नेताओं की प्रतिमाएं तोड़ी गईं उन में एक रूसी क्रांतिकारी लेनिन के आंदोलन ने पूरी दुनिया की तसवीर बदल दी थी. धर्म और पूंजीपतियों के गठजोड़ को तोड़ कर वे समानता के पक्षधर थे. पेरियार दक्षिण भारत के तर्कवादी, जातिविरोधी नेता थे. वे द्रविड़ आंदोलन के प्रवर्तक और मूर्तिपूजा विरोधी थे. वे बराबरी का समाज चाहते थे. इस तरह, परस्पर विरोधी विचारधारा को स्वीकार न कर पाने वाली नफरतभरी विध्वंसक प्रतिक्रियाएं देखी गईं. हालांकि ऊपरी तौर पर दिखावे के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन घटनाओं की निंदा की और गृहमंत्री राजनाथ सिंह को इस पर कड़ी कार्यवाही करने का निर्देश दिया, लेकिन फिर भी एक लोकतांत्रिक देश में विरोधी वैचारिक प्रतीकों को खंडित किए जाने के लिए भाजपा सरकार के अंधभक्तों की जम कर आलोचना की गई और सरकार के विकास के दावों पर सवाल उठने लगे.

समाज में उथलपुथल आज विश्व नई तकनीक, आर्थिक विकास, शिक्षा और नए कौशल प्रबंधन में जुटा दिखाईर् दे रहा है जबकि भारत मूर्तियों में आजादी खोज रहा है. देश के नक्शे को भले ही भाजपा ने तकरीबन भगवा रंग दिया हो और अपने एकछत्र राज पर गर्व कर रही हो पर तरक्की व सुधार के उस के दावे हवाहवाई दिखाई दे रहे हैं.

देशभर में व्यापारी, किसान, बेरोजगार व महिलाएं सड़कों पर आंदोलनरत हैं. कितनी ही समस्याएं मुंहबाए खड़ी हैं. दूसरी ओर, मंदिर निर्माण, गौरक्षा, लवजिहाद, दलितों पर हमले, योग, आयुर्वेद, संस्कृत शिक्षा, पीएनबी घोटाला, बैंकों का कर्ज घोटाला आदि सुर्खियों में छाए हुए हैं. आम लोग हताश व निराश हैं. हिंदू संगठनों की बढ़ती तादाद, उन की धमकियां, सोशल मीडिया और सड़कों पर भगवा झंडे, माथे पर भगवा पट्टी धारण जैसी कट्टरता का सैलाब दिखाई दे रहा है. चारों ओर तर्कहीन, अवैज्ञानिक बातों का स्वरराग सुना जा रहा है. यह कोई और नहीं, खुद सरकार और उस के समर्थक कर रहे हैं.

सचाई पर मिथक थोपना केंद्रीय मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री सत्यपाल सिंह ने डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत को खारिज करते हुए फरमाया कि यह आधार अवैज्ञानिक है, क्योंकि हमारे पूर्वजों ने यह नहीं कहा अथवा लिखा कि उन्होंने किसी बंदर को मानव बनते देखा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मुंबई में एक अस्पताल के कार्यक्रम में दावा कर चुके हैं कि हाथी के सिर वाले गणेश का होना इस बात का सुबूत है कि प्राचीन भारत में प्लास्टिक सर्जरी का ज्ञान था. उन्होंने महाभारत के हवाले से कहा था कि तब लोगों को जेनेटिक्स का पता था.

उधर, राजस्थान के शिक्षा मंत्री वासुदेव देवनानी ने दावा किया था कि गाय ही एकमात्र ऐसा प्राणी है जो औक्सीजन लेती है और औक्सीजन छोड़ती है. यह सरकार का विज्ञान पर हमला है. सरकार और भाजपा के लोग बारबार धर्म की किताबों के उदाहरण दे कर, हिंदुत्व की बात कर देश को फिर से प्राचीनकाल में ले जाना चाहते हैं. वे चाहते हैं कि पौराणिक मिथकों को लोग सत्य इतिहास मान लें और तभी के पुरातन नियमकानून आज भी चलें जिन में वर्णवाद मुख्य है. भाजपा सरकार इसी तरह के अवैज्ञानिक विचारों में देश को उलझाए रखना चाहती है. ऐसे पुराने विचारों के साथ भाजपा देशभर के 33 प्रतिशत लोगों के वोटों के बल पर एकछत्र छा गई है और बाकी बहुसंख्यक लोगों पर अपने विचार ही नहीं थोपना चाहती, बल्कि उन्हें डरा कर, धमका कर अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहती है.

भाजपा के लिए धर्म व्यक्तिगत आस्था का विषय नहीं है, बल्कि परंपरागत सांस्कृतिक पहचान की राजनीति का प्रमुख तत्त्व है. यह अतीत की सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने और बदलाव को रोकने का साधन है. मूर्तियां इस देश में शासकों के लिए हमेशा से चमत्कारी लाभ देने वाली रही हैं. मूर्तियों से समाज के एक वर्ग को इकट्ठा किया जा सकता है तो दूसरे वर्ग को अलगथलग भी रखा जा सकता है. मूर्तियां प्रेम, शांति, सहिष्णु, एकता की वाहक नहीं बल्कि नफरत, भेदभाव, हिंसा, खूनखराबा की पर्याय हैं. मूर्तियां अंधविश्वास, ढोंग, पाखंड का खेल हैं. भोलीभाली जनता इस खेल की कठपुतली मात्र है. आजादी के बाद मूर्तियों को ले कर हजारों दंगे, मौतें हो चुकी हैं. सब से ज्यादा गांधी और अंबेडकर की मूर्तियां क्षतिग्रस्त की गईं. कट्टर हिंदुत्व का इन नेताओं और इन के समर्थकों के साथ मतभेद कायम रहा है और रहेगा.

मूर्ति युग की शुरुआत ईसापूर्व की पहली शताब्दी में 33 वैदिक और सैकड़ों पौराणिक देवीदेवताओं को पहचान लिया गया था. प्राचीन हिंदू गं्रथों में मूर्तियों का जिक्र नहीं है. चंद्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल के दौरान बड़ा सांस्कृतिक विकास हुआ. रामायण और महाभारत जैसे तमाम धार्मिक स्रोतों का इस अवधि के दौरान संग्रहण किया गया. इस दौर में वास्तुकला, मूर्तिकला और चित्रकला में उपलब्धियां हासिल होने लगीं. फिर तो धीरेधीरे देशभर में न सिर्फ मंदिर और मूर्तियों की भरमार हो गई, बल्कि गलीचौराहों पर नेताओं की प्रतिमाएं स्थापित करने का सिलसिला भी चल पड़ा.

धार्मिक मूर्तियों का बड़े पैमाने पर कारोबार शुरू हो गया. मूर्तियों के प्रति लोगों में धार्मिक आस्था उत्पन्न की गई. यह काम यों ही संभव नहीं था. मूर्तियों को चमत्कारी बताया गया. उन की पूजा करने पर मनोकामना पूर्ण होने के दावे प्रचारित किए गए. बिना कुछ किए सबकुछ पाने की भूखी अंधविश्वासी जनता मूर्ख बनती गई और धर्म के धंधेबाजों का कारोबार चल पड़ा.

आजादी के बाद के दशकों में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, भीमराव अंबेडकर जैसे नेताओं की प्रतिमाएं स्थापित करने का दौर चला. साथ ही साथ उन जातियों को भी मूर्तिपूजा की ओर धकेल दिया गया जिन्हें नीच, अछूत, अधम, पापी समझा गया. शूद्र, दलित जातियों को उन्हीं के पौराणिक पात्र पूजने को दे दिए गए. जातियों ने अपनेअपने पूर्वज और महापुरुष बांट लिए और उन की प्रतिमाएं स्थापित करा दीं. ऊंची जातियों ने मनु महाराज, परशुराम जैसे, शूद्रों ने शाहूजी महाराज, शिवाजी, ज्योतिबा फूले और दलितअछूतों ने वाल्मीकि, अंबेडकर को पूजना शुरू कर दिया.

बौद्धों और जैनियों में मूर्तिपूजा निषेद्ध होने के बावजूद बड़े पैमाने पर प्रतिमाएं स्थापित की गईं. इस तरह मूर्तियों के नाम पर धर्म के धंधेबाजों का कारोबार फलनेफूलने लगा.

अभी देश में हजारों करोड़ रुपए खर्च कर मूर्तियां खड़ी की जा रही हैं. अहमदाबाद में ‘स्टैच्यू औफ यूनिटी’ का बजट 3,000 करोड़ रुपए और मुंबई में शिवाजी की प्रतिमा पर 3,600 करोड़ रुपए खर्च किए जा रहे हैं. राममंदिर निर्माण का बजट अभी सामने आया नहीं है पर वह भी निश्चित ही हजारों करोड़ का होगा. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रामसीता की मूर्ति लगाने की बात कर रहे हैं. देश में गरीबों के लिए स्कूलों, अस्पतालों और उन के विकास के लिए फंड नहीं है जबकि मूर्तियों में हजारों करोड़ रुपए बरबाद किए जाते हैं.

मूर्ति विरोधी आंदोलन

जहां तक मूर्तिविरोधी आंदोलन की बात है, हिंदू परंपराओं में नास्तिक चार्वाक ने सब से पहले देवीदेवताओं की मूर्तियों के ढोंग को खारिज किया. बाद में आर्य समाज और ब्रह्म समाज आंदोलन ने मूर्तियों का विरोध किया. आजादी के पहले से ही, लगभग 70 सालों से, ‘सरिता’ मूर्तिपूजा के पाखंड की पोल खोलती आ रही है. पत्रिका का यह आंदोलन जारी है. मौजूदा समय में मूर्तिपूजा विरोधी आंदोलन की सब से अधिक जरूरत है, लेकिन कहीं कोई दूसरी बड़ी आवाज नहीं सुनाई देती. चारों ओर हिंदुत्व के नगाड़ों के शोर में मूर्तिभंजकों की आवाज सुनाई ही नहीं पड़ रही. राजनीतिक पार्टियों के लिए मूर्तियां चमत्कारी साबित होती हैं, वे चाहे नेताओं की हों या देवीदेवताओं कीं. लेकिन मूर्तियां समाज के लिए कभी फायदेमंद रही हों, दिखाई नहीं दिया.

एक प्रतिमा किसी वर्ग के लिए सम्माननीय है तो वही दूसरे के लिए नफरत का कारण. इस तरह के सामाजिक विभाजन का फायदा धर्म के धंधेबाज उठाते आए हैं. सरकार पुरोहितों के आदेशों पर चलने लगती है.

पेशवा राज से समानता

मौजूदा शासन और राजनीतिक व सामाजिक माहौल पेशवा राज से मिलताजुलता दिखाई देता है. 18वीं शताब्दी के प्रारंभ में शाहूजी महाराज ने मराठा की राजधानी सतारा में स्थापित कर ली थी. पर शासन के सारे अधिकार पेशवा बालाजी विश्वनाथ के हाथों में सौंप दिए थे. यहीं से पेशवा राज का प्रारंभ हो गया था. मराठों का शूद्र राजा नाममात्र का प्रमुख था. सत्ता का केंद्र पेशवा बन गए थे और पुणे का महत्त्व बढ़ गया था. पेशवा काल में सामाजिक स्थिति अत्यधिक अव्यवस्थित थी. छुआछूत, ऊंचनीच, रूढि़वादी बुराइयां चरम पर थीं. चारों ओर अज्ञानता, अंधविश्वास, खोखली आस्था का अंधकार व्याप्त था. शूद्रों, अछूतों और स्त्रियों को पढ़ने की इजाजत नहीं थी. स्त्रियों की स्थिति दयनीय थी. समाज भाग्यवादी बन कर छोटे से दायरे में संकुचित हो गया था.

पेशवाओं के समय समाज अस्थिरता और असुरक्षा के दौर से गुजर रहा था. उस में जड़ता आ गई थी. पेशवाओं से पहले सामाजिक विषमता के दुष्परिणाम दलितों को छोड़ कर अन्य शूद्र जातियों को एक सीमा तक ही सहन करने पड़ते थे पर पेशवाकाल में ब्राह्मणों, खासतौर से चितपावन ब्राह्मणों का, समाज के राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक व धार्मिक क्षेत्र में बड़े पैमाने पर आधिपत्य था.

उस समय पेशवा ब्राह्मणों की संख्या कुल आबादी के 5 प्रतिशत से अधिक नहीं थी. फिर भी संख्या में कहीं अधिक दलितों, शूद्रों को किसी भी गलती पर हाथी के पैर से कुचलवा दिया जाता था. शूद्रों को थूकने के लिए गले में मिट्टी की हांडी बांधनी पड़ती थी. वे उसी हांडी में थूक सकते थे. इन लोगों को सूर्योदय से पहले और सूर्यास्त के बाद सड़क पर चलने की इजाजत नहीं थी. शूद्रों, दलितों को तालाबों से पानी भरने से रोका जाता था.

कर्मकांड, तंत्रमंत्र, शकुनअपशकुन का बाजार गरम था. यही कारण था कि शिक्षा, व्यापार और कला के क्षेत्र में पेशवाकाल एकदम खाली रहा. दूसरी ओर यूरोप में पुनर्जागरण और औद्योगिक क्रांति के कारण ज्ञानविज्ञान के क्षेत्र में युगांतकारी बदलाव हो रहे थे.

भारत में कारोबारी संसाधन और संभावनाएं बहुत हैं. इसे भांप कर पुर्तगाली, डच, अंगरेज भारत आए और विकास दिखने लगा. मुगलों के किए कार्य आज भी नजर आ रहे हैं. इन का मुख्य मकसद अपने धर्र्म का विस्तार करना नहीं था, व्यापार और साम्राज्य को नया आधार देना था.

हिंदुत्ववादी विस्तार के प्रयास

आज हमारे देश की हिंदू राष्ट्रवादी सरकार हिंदुत्ववादी विस्तार करना चाहती है. वह पेशवा राज व्यवस्था पर चलती दिख रही है. वैसा ही सबकुछ देखा जा सकता है. हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में भेदभाव और पढ़ाई में बाधा डालने का विरोध करने के चलते रोहित वेमुला जैसे युवाओं को आत्महत्या करने के लिए मजबूर किया जाता है. गैरबराबरी के खिलाफ आवाज उठाने पर सहारनपुर में दलित युवक चंद्रशेखर को देशद्रोेह के आरोप में जेल में डाल दिया जाता है. जेएनयू में गैरबराबरी और झूठे राष्ट्रवाद के खिलाफ बोलने पर छात्रों को देशद्रोही बताया जाता है और उन पर मुकदमा कायम कर दिया जाता है. गाय की खाल उतारने पर ऊना में दलितों पर अमानुषिक कहर ढाया जाता है. लेकिन कभी किसी ऊंची जाति के ब्राह्मण को अनर्गल बोलने पर जेल में नहीं डाला गया है.

दरअसल, मूर्तियों का यह झगड़ा धर्म के निठल्ले, समाज में गैरबराबरी चाहने वाले धंधेबाजों और मेहनतकश व समानता के पैरोकारों के बीच है, जिन की मूर्तियां तोड़ी गईं उन में लेनिन, पेरियार, अंबेडकर मेहनत और समानता के लिए संघर्ष करने वाले लोग थे और वे समाज में भेदभाव, शोषण का खात्मा कर मेहनतकश व बराबरी वाले समाज की स्थापना का सपना देख रहे थे.

आज इस बात का ध्यान रखा जाता है कि प्राचीन सामाजिक व्यवस्था कायम रहे, पुनर्स्थापित हो. उसे सुधारें नहीं. अगर बदलने का प्रयास हो तो उसे डरा, धमका कर नियंत्रित रखा जाए. दलित मूंछ रखे तो पुराणों के अनुसार वह ऐसा नहीं कर सकता. मुसलमानों को पशुवध से रोका जाए. हिंदू धर्र्म से अलग विचार वालों के महापुरुषों की मूर्तियों को तोड़ा जाए. ऐसा चाहने वाला देश का वह वर्ग है जो सदियों से बिना कामधाम किए लोगों की मेहनत पर मुफ्त में ऐश करता आया है. लेनिन, पेरियार, अंबेडकर की मूर्तियां नष्ट करने वाले ऐसी ही निकम्मी सोच के समर्थक हैं जो देश में दूसरों की कमाई पर पलते आ रहे हैं.

सत्ता में आरएसएस की घुसपैठ सरकार की योजनाएं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस का थिंकटैंक बना रहा है. भ्रष्ट नेता, नौकरशाह और कौर्पोरेट तथा धर्म की खाने वाले बिना कुछ किए दौलत कूट रहे हैं. वे बेईमानी, चोरी, घोटाले और खालीपीली बातें बना कर मौज कर रहे हैं. दूसरी ओर 65 प्रतिशत मेहनतकश वर्ग दिक्कतें झेल रहा है. वह रोजीरोटी और रोजमर्रा की जरूरतों के लिए जद्दोजेहद कर रहा है.

5 प्रतिशत निकम्मों द्वारा देश, समाज पर वर्चस्व रखने की कोशिश के चलते 65 प्रतिशत मेहनती, हुनर वाले लोगों की उत्पादन क्षमता पर असर पड़ रहा है. इस से देश व समाज को नुकसान हो रहा है. मोदी जब आए थे तब लगा था कि देश में अब उत्पादकता बढे़गी. उन के आते ही मेक इन इंडिया, स्टार्टअप, स्टैंडअप इंडिया, जैसी कई योजनाएं सामने आईं पर अब इन पर कोई बात नहीं हो रही. देश में विकास की कोरी बातें बहुत प्रचारित की जा रही हैं. यह विकास नहीं, जड़ता का दौर है. वैज्ञानिक और सामाजिक विकास धर्म के कारोबार पर चोट पहुंचाता है. आज हर देश में बैठा धर्म का व्यापारी विकासविरोधी है. वह शासकों को और जनता को धर्म के जाल में उलझाए रखने में कामयाब दिख रहा है.

हमारे यहां साफ देखा जा सकता है कि कुछ भगवाधारी हिंदुत्व के विस्तार में जुटे हुए हैं मानो उन्हें सरकार ने नियुक्त कर रखा है. अयोध्या में राममंदिर निर्माण के लिए श्रीश्री रविशंकर बाबरी मसजिद के नेताओं से सुलह के स्वंयभू मध्यस्थ बने नजर आ रहे हैं. सहमति न होने पर देश को सीरिया बनाने की धमकी दे रहे हैं. रामदेव स्वदेशी व्यापार के ऐंबैसेडर की तरह योग, आयुर्वेद को प्रचारित कर रहे हैं. उत्तर प्रदेश में महंत सरकार धर्मनिरपेक्षता को धता बता कर ईद न मनाने पर गर्व कर रही है यानी महंत महोदय गैरहिंदू वर्ग के खिलाफ नफरत का इजहार कर रहे हैं. निकम्मे लोगों की मौज देख कर मेहनती लोगों की उत्पादक क्षमता पर असर पड़ना स्वाभाविक है.

बहुसंख्यक आबादी पर अपना वर्चस्व थोपने, उसे अपने अनुसार चलाने में दिख रही उन की सफलता से देश जिहालत की ओर ही बढे़गा. यह वर्ग कभी नहीं चाहता कि देश में मेहनत, समानता की बात करने वाले नेता और उन के समर्थक शक्तिशाली बनें तभी लेनिन की मूर्ति ढहा कर वे आजाद होने का जश्न मना रहे थे.

भाजपा, संघ देश में एक विचारधारा थोपना चाहते हैं. इस से नफरत व अराजकता का माहौल तैयार हो रहा है. यह खतरनाक है. इस से निश्चिततौर पर देश की उत्पादकता पर बुरा असर पड़ेगा, काम करने वाले लोग हतोत्साहित होंगे. बिना उत्पादन करने वाले लोग भरपूर पैसा बनाते दिखेंगे तो मेहनती लोगों पर बुरा असर होगा ही. इन हालात से निबटना ही होगा. मेहनतकशों के वर्चस्व से ही किसी देश, समाज की तरक्की हो सकती है.

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