सरिता विशेष

ढलती जवानी में लाखों रुपए खर्च कर के अपना मेकओवर करवाने वाली महिलाओं की तरह ही मंदिरों का मेकओवर करवाने का चलन आजकल जोरों पर है. मुंबई शहर के  सब से पुराने मंदिरों में एक ढाकलेश्वर मंदिर के निवासी महादेव भी मेकओवर करवा कर माडर्न भगवानों की जमात में शामिल हो चुके हैं. हम किसी से कम नहीं की तर्ज पर यह मेकओवर 10-20 लाख रुपए का नहीं पूरे 2 करोड़ रुपए का करवाया गया है.

ध्यान रहे 174 साल पुराने ढाकलेश्वर महादेव का और उन के निवास स्थान का मेकओवर आईएसओ 9001-2000 की गाइडलाइंस के तहत किया गया है ताकि मंदिर में हाई प्रोफेशनल स्टैंडर्ड अपनाए जा सकें. भगवान का स्टैंडर्ड मेंटेन करने में कमर कस चुके मंदिर ट्रस्ट के जनरल मैनेजर चंचल चौधरी ने बताया कि मंदिर के मेकओवर में करीब 2 करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं.

सबकुछ भगवान की मर्जी

आखिर सर्व शक्तिमान भगवान को भी माडर्न जमाने के चलन के हिसाब से अपने निवासस्थान के लिए आईएसओ सर्टिफिकेट की जरूरत पड़ ही गई. इसलिए शायद सब बातों में भगवान की मर्जी को मानने वाले भक्तों को इस बार भी भगवान ने अपनी मर्जी बता दी होगी. हर साल अपने आलीशान भवनों में कुछ नया करवाने वाले भक्तों के सामने भगवान महादेव को 174 साल पुराना मंदिर बेकार लगने लगा होगा और भगवान भी अपने 174 साल पुराने निवास में रहतेरहते ऊब गए होंगे सो मंदिर में स्टैंडर्ड का बदलाव चाहते होंगे.

नए पैटर्न और डिजाइन की चाहत रखने वाले भक्तों की बातें सुनसुन कर भगवान का मन भी नए डिजाइन और सुंदर साजसज्जा वाले मंदिर में रहने का हो आया हो इसलिए उन्होंने डिजाइनर पैटर्न से सुसज्जित मंदिर बनवाने की अपनी इच्छा अपने भक्तगणों को बता दी होगी.

अपने नादान भक्तों द्वारा फैलाई गंदगी भगवान को पहले रास आती होगी, अब माडर्न जमाने में मौल कल्चर देख चुके साफसुथरे माहौल में रहने वाले भक्तों की तर्ज पर उन्हें वह गंदगी रास नहीं आ रही हो, इसलिए उन्होंने भक्तों से इंटरनेशनल मापदंडों पर खरे उतरने वाली साफसफाई की डिमांड कर दी या फिर उन्हें चढ़ावे में मिलने वाले जेवरातों और मोटी रकम पर किसी अंडर वर्ल्ड डौन की नजर पड़ चुकी हो जिस के चलते उन्हें सिक्योरिटी की जरूरत पड़ गई और उन्होंने भक्तों से इंटरनेशनल तौरतरीकों वाली सिक्योरिटी की मांग रख दी हो.

संभव यह भी है कि भगवान खुद के व्यक्तित्व में बदलाव चाहते हैं? जाहिर है, माडर्न जमाने में कुछ अलग, कुछ नया और कुछ हट कर न किया जाए तो बेकार है. उस की कमीज मेरी कमीज से उजली क्यों? यही सोच रखते हुए भगवान ने अनुभव किया होगा कि स्टाइल अपनाने में भक्तगण पीछे नहीं तो भक्तों की रचना करने वाले भगवान भी पीछे क्यों रहें भला?

आज के जमाने में स्टाइल और अंदाज ही तो है, जो एक भगवान को अन्य भगवानों से अलग पहचान, प्रतिष्ठा देता है. भगवान के लिए यह जरूरी भी है कि उन की प्रतिष्ठा भक्तों के मन में बनी रहे, लिहाजा, उन्होंने अपने अमीर भक्तों से डिमांड रख दी होगी कि अब से मेरे मंदिर में भी सबकुछ इंटरनेशनल नियमकायदे से होना चाहिए. आखिर मेरी इज्जत तुम्हारी इज्जत है. लिहाजा, भक्तगण भी भगवान की शानोशौकत में कोई कमी नहीं रखना चाहते. भगवान की डिमांड से भौचक्के बेचारे भक्त इस डर से कि कहीं भगवान नाराज न हो जाएं आननफानन में शानशौकत केनए पैमाने बनाने में जुट गए और उन की नजर में आईएसओ सर्टिफिकेट लेना भी उसी शानशौकत का एक नया स्टाइल है.

अमीरों के भगवान

दरअसल, शानोशौकत स्टाइल का ही हिस्सा तो है और स्टाइल दिखाने का जिम्मा अमीरों के वश में ही है. यह स्टाइल उन के कपड़ों, खानपान, रहनसहन से प्रदर्शित होता है तो ऐसे प्रदर्शन में अमीरों के भगवान क्यों पीछे रहें? इसलिए शौकीन भक्तों के भगवान को भी उन के महंगे शौक लगते देर नहीं लगती.

जब भगवान के भक्त उन्हें भोग लगाते हैं तो देशी घी, काजू, मेवा, बादाम और पांचों मगज तो उस में होते ही हैं साथ ही भोग बनाने वाली और लगाने वाली कमसिन हो इस का भी ध्यान रखा जाता है. आखिर वे अमीरों के भगवान हैं कोई राह चलते भिखारी या दासीपुत्र के नहीं कि जो दे दिया, जब दे दिया वे खा लेंगे.

फिर अमीरों के भगवान कोई छोटेमोटे मंदिर में तो बसते नहीं, जहां कपड़ों की भी जरूरत नहीं होती. जहां नारियल के भाव दोगुने होने पर नारियल के बदले माथा झुका कर भक्त भगवान से यह कह कर माफी मांग लेता है कि क्या करूं भगवान, गरीब हूं, नारियल महंगा हो गया है इसलिए आज केवल सिर झुका रहा हूं.

यह तो हाई प्रोफाइल भक्तों के भगवान हैं जिन के स्टैंडर्ड के भक्त स्टैंडर्ड का चढ़ावा चढ़ाते हैं. लिहाजा, स्टैंडर्ड के भक्तों के समान स्टैंडर्ड के भगवान को भी तरहतरह के चेंज चाहिए होते हैं. स्टैंडर्ड के भगवान भी अपने भक्तों की देखादेखी शानशौकत से सजनेसंवरने की फिराक में रहते हैं. तरहतरह की ज्वैलरी का शौक भी भगवान को तभी चढ़ता है, जब उन के हाईफाई अमीर भक्त उन्हें चढ़ाते हैं.

अब महंगी ज्वैलरी है, कपड़े हैं, शानशौकत है और मंदिर वही पुराना बदरंग. बात कुछ जमती नहीं, इसलिए मंदिर का कायाकल्प करना तो जरूरी ही था. सबकुछ स्टैंडर्ड का हो तो कायाकल्प भी तो स्टैंडर्ड का होना चाहिए. लिहाजा, खुले दिल से रुपए खर्च किए गए. भगवान भी यह बात जानते ही होंगे कि इस देश में बुनियादी जरूरतों के लिए किसी के पास पैसे नहीं हैं, लेकिन करोड़ों रुपए मंदिरों की साजसज्जा में तो खर्च किए जा सकते हैं इसलिए उन के भक्त जहां से जैसे भी पैसों का इंतजाम करें उन्हें इस से क्या लेनादेना. भक्तों ने चढ़ाया गया पैसा पसीना बहा कर कमाया हो, किसी की जेब काट कर या गला दबा कर, भगवान को इस से क्या सरोकार. उन्हें भी तो स्टाइल और स्टैंडर्ड का खयाल रखना है, ताकि कोई और भगवान उन से आगे न हो जाए. इस देश की बिगड़ी हुई जवान पीढ़ी की तरह ही हमारे भोलेभाले भगवान को स्टाइल और चमकदमक का चस्का लग चुका है.

हैरानी की बात तो यही है कि सर्व मर्मज्ञ भगवान को यह बात न भी समझ में आए पर मुझ जैसी मूढ़मति खूब समझ सकती है कि क्यों पंडेपुजारी भगवान को ऐसा चस्का लगाते हैं? धर्म के धंधे को चमकाने के लिए पुजारी भगवान का जितना स्टैंडर्ड का लोकलुभावन और प्रभावशाली रूप जनता के सामने पेश करेंगे, मंदिर में आने वाली जनता भी भगवान को उतना ही सराहेगी, उतना ही चढ़ावा पुजारियों के हिस्से में आएगा. इसलिए ही भक्तों की मौडर्न मंशा और चढ़ावे की खातिर इस पुराने मंदिर का कायाकल्प कर इसे मौडर्न मंदिर का नया रूप दिया गया है. इतना ही नहीं इसे आईएसओ 2001 का सर्टिफिकेट भी दिया गया.

वाह रे, स्टैंडर्ड के भक्तगणों, अब तुम्हारे स्वार्थ के कारण भगवान को यह दिन भी देखने थे. ऐसे हाईफाई भक्तों के लिए अपने भगवान को सच्चा, प्रभावशाली और स्टैंडर्ड का भगवान दिखाने के लिए लोगों द्वारा प्रमाणित करवाना आवश्यक है क्योंकि ऐसी प्रमाणिकता मिलने पर ही उन के भगवान दूसरे भगवानों की तुलना में विश्वसनीय और खरे उतरेंगे, उन का स्टैंडर्ड भी बढ़ेगा. जितने स्टैंडर्ड के भगवान उतनी ही ज्यादा उन के दरबार में अर्जी लगाने वालों की भीड़ होगी.

सब से बड़ी बात यह है कि अपने इस स्टैंडर्ड को मेंटेन करने के चलते सर्वशक्तिमान भगवान पंडेपुजारियों के बंधक बन जाते हैं. उन्हें बंधक बनाने के लिए, अपने इशारों पर नचाने के लिए ऐसा शौक उन्हें पुजारी  लगाते हैं? यह बात भगवान को समझ में आए या न आए लेकिन जिस के मन में ईश्वर के प्रति थोड़ी सी भी आस्था है, उसे समझ आते देर नहीं लगती कि मंदिरों की सारी व्यवस्था पैसे के इर्दगिर्द ही है. जिस के पास पैसा है भगवान भी उसी का है .

इसलिए लगता तो ऐसा ही है कि अपने गरीब भक्तों की दुविधा की ओर से आंखें मूंदें और अमीरों की गिरफ्त में आए अपने व्यक्तित्व को चमकाने में लगे आज के आधुनिक भगवान की इच्छा भी इसी में है. उन की मर्जी और भी साफतौर पर इसलिए दिखाई देती है क्योंकि वे अपना नाम ले कर मजे करने वालों को लूटपाट करने का अवसर देते रहे हैं और आगे भी देते रहेंगे. भले ही इस से मंदिर के चढ़ावे पर निर्भर रहने वाले निखट्टुओं की संख्या बढ़ जाए और देश में  मेहनतकश लोगों का अकाल पड़े, भगवान को क्या फर्क पड़ेगा? उन्हें तो इस से भी कोई फर्क नहीं पड़ता कि स्वार्थी, निकम्मे उन्हें प्रसन्न कर के अपनी तिजोरियां भरते रहें.

भगवान के स्टैंडर्ड अमीर भक्तों के पास उन को खुश करने के एक से एक बेहतरीन उपाय हैं. इसलिए नई संस्कृति के माडर्न और स्टैंडर्ड के भगवान ने भी मौका भांपते हुए अपना फायदा पहले देखना सीख लिया है कि जो उन्हें सब से बढि़या बेहतरीन सेवा प्रोवाइड करवाएगा वे भी अपने आशीर्वादस्वरूप उस की तिजोरियां भरवाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे.