सरिता विशेष

देश बदल रहा है. शहरों में ही नहीं बल्कि गांवों में भी अब शादी के लिए लड़कियों की कमी होने लगी है. इस से लड़कों की शादियां अटक रही हैं. ज्यादातर परिवारों में लड़कियों की तादाद कम होने लगी है. एक लड़की या एक लड़के से ही परिवार पूरा होने लगा है. गांवों में रहने वाले परिवार अब शहरों में पहुंच गए हैं. ऐसे में आम परिवार की लड़कियां स्कूल जाने लगी हैं.

गांव के किसी स्कूल को देखेंगे तो साफ हो जाएगा कि वहां पढ़ने वालों में लड़कियों की तादाद ज्यादा होती जा रही है. ऐसे में अब मांबाप अपनी लड़कियों की शादियां करने के लिए लड़के को ही नहीं बल्कि उस के परिवार की माली हालत को भीदेखतेपरखते हैं. ऐसे में कम काबिल लड़कों की शादियां नहीं हो रही हैं. उत्तर भारत के कुछ राज्यों खासतौर पर हरियाणा, राजस्थान, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में लड़कों के सामने ऐसे हालात बनने लगे हैं.

ऐसे में ये लड़के दूर के प्रदेशों से खरीद कर लड़कियां लाते हैं और उन से शादी कर लेते हैं. गैर प्रदेशों से लाई गई लड़कियों में यह सुविधा रहती है कि वे इन के पास गुलामों की तरह रहती हैं.

दरअसल, उत्तर भारत के ये प्रदेश मर्दवादी सोच से प्रभावित होते हैं. वे औरतों को बराबरी का दर्जा नहीं देना चाहते. इस वजह से उन के लिए खरीद कर लाई गई लड़कियां शादी के लिए सब से उपयोगी होती हैं.

खरीद कर लाई लड़कियों से शादी करने वालों में ऐसे लोग भी होते हैं जो कम उम्र में शादी करने के बाद अकेले हो गए. उन में से कुछ का पत्नी से विवाद हो गया या पत्नी छोड़ कर चली गई या फिर पत्नी की मौत हो गई. ऐसे में दूसरी शादी के लिए खरीद कर लाई गई लड़कियां उन्हें सही लगती हैं.

इस तरह के लड़कों में हर जाति और धर्म के लोग हैं. सब से ज्यादा खराब हालत पिछड़ी जातियों की है. पिछड़ी जातियों की रोजीरोटी पहले खेती पर ही टिकी होती थी. आज भी ये परिवार खेती पर ही टिके हैं. पर अब खेती में मुनाफा कम होने लगा है. ये परिवार खेती को छोड़ कर शहरों में बस रहे हैं. ऐसे में ये काफी गरीब होते जा रहे हैं. अब इन परिवारों के लड़कों को लड़की खरीद कर शादी करना आसान लगने लगा है.

हरियाणा और पंजाब में कई सालों से ऐसे मामले सामने आ रहे हैं. ज्यादातर ऐसे मामले तभी सामने आते हैं जब किसी तरह का कोई झगड़ा हो या फिर मामला पुलिस तक पहुंच जाए.

आमतौर पर खरीदी गई लड़की से शादी करने वाले लोग समाज के सामने इस बात को नहीं मानते हैं कि लड़की खरीदी गई है. ये लोग चोरीछिपे शादी करते हैं. लड़की को अपने घरों में छिपा कर रखते हैं.

ये लोग शादी के लिए ऐसी लड़की पसंद करते हैं जो इन के जैसी दिखती हो. यही वजह है कि दक्षिण भारत के प्रदेशों की लड़कियों को यहां नहीं लाया जाता. पश्चिम बंगाल और असम की जगह बिहार, झारखंड और छत्तीसगढ़ की लड़कियां ज्यादा पसंद की जाती हैं. वहां की लड़कियां हिंदी बोल और समझ लेती हैं. उन का रंग भी साफ होता है. ऐसे में कुछ ही दिनों में वे यहां का रहनसहन सीख कर परिवार के बीच हिलमिल जाती हैं. समाज को यह बताना आसान होता है कि वह किसी दूर के रिश्तेदार की लड़की है.

यही वजह है कि लड़की खरीद कर शादी करने के मामले में बिहार, झारखंड और छत्तीसगढ़ की लड़कियां ज्यादा डिमांड में होती हैं.

दूसरा पहलू यह भी है कि शादी के नाम पर खरीदी गई लड़कियों में बहुत सी कई बार आगे बेच दी जाती हैं, जो जिस्मफरोशी के बाजार में पहुंच जाती हैं.

जानकार मानते हैं कि पहले बेची गई लड़कियां केवल जिस्मफरोशी के बाजार में ही जाती थीं, पर अब वे शादी कर के दुलहन भी बनने लगी हैं. लड़की के परिवार के लिए यह माने नहीं रखता कि वह कहां जा रही है. वे तो गरीबी से छुटकारा पाने के लिए अपनी लड़की को बेचने की कोशिश करते हैं. ऐसे ज्यादातर मामले सामने नहीं आते.

निशाने पर गरीब प्रदेश

छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले में कुनकुनी थाने में एक  आदिवासी लड़की ने शिकायत दर्ज कराई कि उसे नौकरी दिलाने के नाम पर ओडिशा ले जाया गया. वहां उस से जबरन शादी कर के बाद में जिस्मफरोशी के धंधे में उतार दिया गया.

पता चला कि यह ऐसी अकेली घटना नहीं है, बल्कि तमाम लड़कियों को नौकरी के नाम पर बाहर ले जाया जाता है और वहां उन को शादी का झांसा दे कर फंसाया जाता है.

छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि ओडिशा, आंध्र प्रदेश, असम, पश्चिम बंगाल, झारखंड, मध्य प्रदेश और बिहार राज्यों से लड़कियों को किसी न किसी तरह का लालच दे कर दूसरे राज्यों में ले जाया जाता है, जहां पर वे नौकरी करने जाती हैं. इस के बाद इन लड़कियों को शादी से ले कर जिस्मफरोशी तक के जाल में फंसा दिया जाता है. कई बार ऐसी लड़कियां घरेलू नौकरानी बन कर जोरजुल्म का शिकार होती हैं.

उत्तर भारत के कुछ राज्यों जैसे हरियाणा, पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान में लड़कियों की कमी है. कई नौजवानों की तो लड़कियों की कमी की वजह से शादियां अटकी होती हैं. ऐसे में वे लोग गरीब और आदिवासी प्रदेशों से लड़कियों की खरीदारी करते हैं.

गरीब और आदिवासी प्रदेशों में कई ऐसी प्लेसमैंट एजेंसियां हैं जो नौकरी दिलाने के नाम पर लड़कियों को दूसरे प्रदेशों में भेजती हैं. ये प्लेसमैंट एजेंसियां अब नौकरी के बजाय शादी के लिए लड़कियों को बाहर भेजने लगी हैं.

ये लोग लड़कियों के घर वालों को समझाते हैं कि लड़की नौकरी के लिए जा रही है. इस के बदले में उन को कभीकभी एकमुश्त और कभीकभी हर महीने पैसे पाने का लालच दिया जाता है.

बड़े शहरों में जाने वाली लड़कियां घरेलू नौकरी करती हैं या फिर जिस्मफरोशी के बाजार में पहुंच जाती हैं. अब छोटेबड़े शहरों के साथसाथ गांव और कसबों में यहां की लड़कियां जाने लगी हैं. ये लोग शादी के नाम पर लड़कियों को ले जाते हैं. असल में इन जगहों पर अब लड़कियों की कमी होने लगी है.

बेरोजगार, नशेड़ी और बिगड़ैल किस्म के लड़कों को अपने समाज की अच्छी लड़कियां शादी के लिए नहीं मिल रही हैं. ऐसे में गरीब लड़कियों को खरीद कर शादी करना उन की मजबूरी हो गई है.

गरीबी है वजह

शादी के लिए खरीद कर आने वाली लड़कियां गरीब परिवारों से होती हैं. वे शादी के बाद हर तरह का जोरजुल्म सहने को तैयार होती हैं. कम उम्र की लड़कियां बड़ी उम्र के मर्दों के साथ शादी करने को तैयार हो जाती हैं. इन मर्दों को अपने समाज की लड़कियां नहीं मिलतीं.

गरीब प्रदेशों की रहने वाली लड़कियों के मातापिता कुछ हजार रुपयों के लालच में अपनी लड़की बाहर भेज देते हैं. उन को इस बात का सुकून होता है कि उन की लड़की भूखी नहीं मरेगी और उन को भी कुछ पैसे मिल जाएंगे. इस काम में लड़की के परिवार को तैयार करने का काम वहां उन के ही समाज के लोग और नातेरिश्तेदार करते हैं.

असम से आई एक लड़की लखनऊ के एक परिवार में रहती है. वह सही से हिंदी भी नहीं बोल पाती है. पहले यह लड़की एक घरेलू नौकर बन कर आई थी, बाद में वहीं एक आदमी उस से शादी करने को तैयार हो गया.

वह लड़की बताती है, ‘‘मेरे घर में रहने के लिए एक छप्पर भी सही तरह का नहीं था. साल में कुछ महीने ही हम भरपेट खाना खाते थे. मेरी 5 बहनें हैं. मेरी बड़ी बहन कोलकाता गई थी. वहां से जो पैसे मिले उस से एक छप्पर वाला मकान बना था.

‘‘जब मैं बड़ी हुई तो मेरे एक रिश्तेदार ने मुझे यहां भेज दिया. मैं सालभर में कुछ पैसे अपने घर भेजती थी. 3 साल में मैं ने यहां का रहनसहन सीख लिया. अब कुछकुछ हिंदी बोल लेती हूं.

‘‘जब मैं यहां आई थी तब मेरी उम्र 14 साल थी. मेरे मालिक बहुत अच्छे थे. मेरे पति उन के घर आतेजाते थे. उन्होंने इच्छा जाहिर की थी कि वे मुझ से शादी करना चाहते हैं. इन 4 सालों में मैं अपने घर कभी नहीं गई. मेरे घर वाले शुरू में कभीकभी मेरे बारे में पूछते भी थे, पर अब कोई नहीं आता. जो पैसे मैं उन्हें भेजती थी, यह भी नहीं पता कि वे उन तक पहुंचते भी थे या नहीं. हो सकता है कि अब मेरी छोटी बहन को भी कहीं भेज दिया हो.

‘‘मैं ने शादी की बात मान ली. मैं शादी कर के बहुत खुश हूं. मेरे लिए शादी के साथ घरपरिवार का मिलना ही बड़ी बात है. मेरे लिए पति की उम्र का कुछ साल बड़ा होना माने नहीं रखता. यहां लोग बोलते हैं कि खरीद कर लाई लड़की से शादी हुई है.

‘‘यह सुन कर अजीब लगता है. पर यह उस दुख से काफी बेहतर है जो गरीबी में अपने परिवार में सहन करने पड़े थे. घरेलू नौकर से अब मैं शादीशुदा हो गई. मुझे एक पहचान मिल गई. मैं बाकी बातें भी भूल जाऊंगी और धीरेधीरे बाकी लोग भी शायद भूल जाएंगे.

‘‘गरीब लड़कियों के लिए देह धंधे के दलदल में जाने से बेहतर है कि वे किसी जरूरमंद से शादी कर के उस का घर बसा दें.’’

कई बार बिकती हैं

छत्तीसगढ़ में अपनी संस्था के साथ आदिवासी इलाकों में काम कर रहे समाजसेवी दीनानाथ कहते हैं, ‘‘लड़की के घर वालों को केवल पैसों से मतलब होता है. जहां ज्यादा पैसा मिलता है, वे वहां लड़की भेजने को तैयार हो जाते हैं. हम लोग भी इन बातों को समझते हैं.

‘‘हम लड़कियों के मांबाप को समझाते हैं कि नौकरी के नाम पर भेजने से अच्छा है कि शादी के लिए लड़की को भेज दो. शादी कम से कम 18 साल की उम्र में होती है. मांबाप इस उम्र तक लड़की को घर में रख ही नहीं पाते.

‘‘यहां की लड़कियां ज्यादा से ज्यादा 13 से 15 साल की उम्र में ही बाहर चली जाती हैं. कुछ मांबाप तो 10 साल की उम्र में ही लड़की को बाहर भेजने को तैयार हो जाते हैं.

‘‘ऐसे में कई परिवार अपने लड़के से आधी उम्र की लड़की को ले जाते हैं, फिर कुछ सालों के बाद उन की शादी करा देते हैं. शादी की उम्र होने तक कई बार तो ये लड़कियां कईकई बार बिक चुकी होती हैं.

‘‘सैक्स के नाम पर इन्हें तरहतरह के समझौते करने पड़ते हैं. एक रात में कईकई ग्राहकों को खुश करना पड़ता है. कुछ ही सालों में ये बूढ़ी हो जाती हैं. उन्हें जिंदगी में कभी घरपरिवार का सुख नहीं मिलता, जबकि खरीदी गई दुलहन को शादी के बाद हर सुख मिलता है. ऐसे में शादी के लिए बिकना ज्यादा पसंद किया जा रहा है.’’

छत्तीसगढ़ सरकार ने प्राइवेट प्लेसमैंट एजेंसी ऐक्ट 2013 तैयार किया है. अगस्त, 2014 में इसे लागू भी किया गया. इस के बाद भी अभी तक प्लेसमैंट एजेंसियां अपनी तरह से ही काम कर रही हैं. वे अब मानव तस्करी के अड्डे बन गई हैं.

लड़कियों की खरीदफरोख्त के मामले में पश्चिम बंगाल पहले, ओडिशा दूसरे और छत्तीसगढ़ तीसरे नंबर पर आता है.

एक निजी संस्था द्वारा किए गए सर्वे से पता चलता है कि छत्तीसगढ़ का जशपुर इलाका लड़कियों की खरीदफरोख्त का बहुत बड़ा अड्डा बन गया है. जिले से हर साल तकरीबन 7 हजार लड़कियों को बड़े शहरों में खरीदाबेचा जाता है.

267 गांवों के सर्वे में यह भी सामने आया है कि 70 फीसदी लड़कियां नाबालिग थीं. बाकी भी 18 साल के आसपास थीं. लड़कियों के बेचने में उन के जानपहचान वाले होते हैं. लड़कियों के मांबाप को भी यह पता होता है कि अब लड़की को वापस नहीं आना है.ऐसे में वे एकमुश्त पैसे लेने का काम करते हैं.

शादियों से बदले हालात

समाजसेवी दीनानाथ कहते हैं, ‘‘पहले जहां लड़कियां केवल बिकने के बाद जिस्मफरोशी के बाजार में जाती थीं, वहीं अब वे शादी के लिए भी खरीदी जाने लगी हैं. ऐसे में गरीब लड़कियां इज्जत भरी जिंदगी गुजरबसर करने लगी हैं.’’