सरिता विशेष

कोई भी गलत काम ज्यादा दिनों तक नहीं चल सकता. एक न एक दिन उस का भंडाफोड़ हो ही जाता है. बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के बालिका संरक्षण गृह में बालिकाओं के शोषण की घटना इस का ताजा उदाहरण है. अगर टाटा इंस्टीट्यूट औफ सोशल साइंसेज (टिस) की टीम वहां नहीं जाती तो पता नहीं वहां बालिकाओं के साथ शोषण कब तक और चलता.

बात फरवरी, 2018 की है. मुंबई के टाटा इंस्टीट्यूट औफ सोशल साइंसेज की इकाई ‘कोशिश’ ने मुजफ्फरपुर जिले के ‘सेवा संकल्प समिति’ के बालिका संरक्षण गृह का औडिट किया. इस संरक्षण गृह में 44 लड़कियां रहती थीं. औडिट के दौरान टीम ने पाया कि संरक्षण गृह का रखरखाव सही नहीं है और वहां रह रही बच्चियों के साथ दुर्व्यवहार किया जाता है. दुर्व्यवहार ही नहीं, बल्कि टीम को शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना की शिकायतें भी मिलीं.

औडिट करने के बाद टिस ने अपनी रिपोर्ट समाज कल्याण विभाग को सौंप दी. इस से पहले नवंबर 2017 में ‘कोशिश’ के स्टेट कोआर्डिनेटर कायम मासूमी, सुनीता बिस्वास और आसिफ इकबाल इसी बालिका गृह में आए थे. तब यहां डरीसहमी बालिकाओं ने टीम के सदस्यों को बताया था कि उन का दैहिक शोषण किया जाता है. टिस ने अपनी औडिट रिपोर्ट में बालिकाओं की उसी पीड़ा का उल्लेख किया था.

टिस की सनसनीखेज रिपोर्ट पढ़ कर समाज कल्याण विभाग के निदेशक देवेश शर्मा उछल गए. उस औडिट रिपोर्ट में कुछ ऐसा उल्लेख किया गया था कि उसे जो भी पढ़ता, चौंके बिना नहीं रह पाता. टिस ने अपनी औडिट रिपोर्ट में उल्लेख किया था कि मुजफ्फरपुर बालिकागृह में रह रही 44 लड़कियों में से 42 की मैडिकल जांच कराए जाने पर उन में से 34 लड़कियों के साथ दुष्कर्म किए जाने की पुष्टि हुई है.

संरक्षण गृह की 34 लड़कियों के साथ दुष्कर्म होना कोई छोटीमोटी बात नहीं थी. मामला प्रकाश में आते ही जिला ही नहीं बल्कि पूरे राज्य में भूचाल खड़ा हो सकता था. मीडिया अलग से नाक में दम कर देती. काफी सोचविचार कर निदेशक शर्मा ने टिस की औडिट रिपोर्ट को हलके में लिया. उन्होंने रिपोर्ट को ठंडे बस्ते के हवाले कर दिया और कान में रूई डाल कर चुपचाप बैठ गए.

रिपोर्ट पर 4 महीने तक कोई काररवाई न होता देख टाटा इंस्टीट्यूट औफ सोशल साइंसेज की ‘कोशिश’ टीम परेशान हो गई. लेकिन वह चुप नहीं बैठी. टीम ने 26 मई, 2018 को 100 पेज की सोशल औडिट रिपोर्ट बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के अलावा पटना और मुजफ्फरपुर जिला प्रशासन को भी भेज दी.

चूंकि रिपोर्ट अब शासन तक पहुंच चुकी थी और जिला प्रशासन उसे दबा नहीं सकता था. इस से औडिट रिपोर्ट को ठंडे बस्ते के हवाले करने वाले समाज कल्याण विभाग के निदेशक देवेश शर्मा की आंखों से नींद उड़ गई. जिला प्रशासन सिर के बल दौड़ने लगा. इस से पहले कि देवेश शर्मा पर कोई गाज गिरती, उन्होंने अपनी भूल स्वीकारते हुए कहा कि वह रिपोर्ट को हलके में ले रहे थे, जो उन की बड़ी भूल थी.

मुक्त कराई गईं लड़कियां

इस के बाद 31 मई, 2018 को जिला प्रशासन ने सेवा संकल्प एवं विकास समिति के बालिका संरक्षण गृह से 46 किशोरियों को मुक्त कराया. मुक्त कराई गई किशोरियों को पटना, मोकामा और मधुबनी के संरक्षण गृहों में भेज दिया गया.

देवेश शर्मा ने बालिका गृह का संचालन कर रहे एनजीओ के मालिक और सरगना ब्रजेश ठाकुर, सरगना की पर्सनल असिस्टैंट मधु, बालिका गृह की अधीक्षिका इंदु कुमारी, सीडब्ल्यूसी के अध्यक्ष दिलीप कुमार वर्मा, समिति की कार्यकर्त्री किरण, मंजू, मीनू, हेमा, नेहा, चंदा समेत 11 लोगों के खिलाफ महिला थाने में दुष्कर्म की धारा एवं पोक्सो एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया. मामले की जांच महिला थाने की प्रभारी ज्योति कुमारी ने खुद संभाली.

बालिका संरक्षण गृह में बड़े पैमाने पर चल रहे देहव्यापार के खुलासे के बाद जिले के आला अफसरों आईजी (जोन) सुनील कुमार, डीआईजी अनिल कुमार सिंह, एसएसपी हरप्रीत कौर, एसपी (सिटी) उपेंद्रनाथ वर्मा और डीएसपी (सिटी) आनंद कुमार मुकुल के होश फाख्ता थे. अधिकारियों ने किशोरियों को न्याय दिलाने के लिए कमर कस ली थी.

बालिका गृह से मुक्त कराई गई किशोरियों को मोकामा नाजरथ अस्पताल में भरती कराया गया, जहां उन का इलाज शुरू हुआ. जांच अधिकारी ज्योति कुमारी किशोरियों के बयान लेने के लिए अस्पताल पहुंच गईं. किशोरियों के बयान से हैरान कर देने वाला सच सामने आया.

किशोरियों ने बताया कि बालिका गृह में काम करने वाली महिला कर्मचारी न केवल उन के साथ होने वाले रेप में साथ देती थीं, बल्कि खुद भी बच्चियों का यौनशोषण करती थीं. महिला कर्मचारी उन के साथ बेहद अमानवीय व्यवहार किया करती थीं.

एक 16 साल की किशोरी मीरा ने जांच अधिकारी को बताया कि बालिका गृह में खाने में नींद की गोलियां मिला कर देने के बाद उन के साथ गलत काम किया जाता था. सुबह जागने के बाद गुप्तांग में असहनीय दर्द होता था. तब देखभाल करने वाली वहां की इंदु आंटी उन्हें बताती थी कि उन के साथ गलत काम किया गया है.

इलाजरत पीडि़त किशोरियों के संबंध में मनोचिकित्सक ने जांच अधिकारी ज्योति कुमारी को बताया कि यौनशोषण होने के कारण कई किशोरियां एसटीडी (सैक्सुअल ट्रांसमिटेड डिजीज) से पीडि़त हो गई हैं. उन में से सब से ज्यादा बैड वेटिंग (बिस्तर पर पेशाब कर देना) से पीडि़त हैं. सभी का इलाज किया जा रहा है. बैड वेटिंग सभी लड़कियों में एक कौमन बीमारी के रूप में सामने आई.

बीमारी देख कर यह पता चलता है कि सभी के दिलोदिमाग में यौनशोषण घर कर गया है और इसी वजह से उन के साथ यह समस्या आ रही है. जब तक पीडि़त किशोरियां इस त्रासदी से निकल कर बाहर नहीं आएंगी, तब तक ऐसे ही पीडि़त रहेंगी.

कानून के दायरे में आए संचालक और उन के साथी

बहरहाल, 2 जून, 2018 को जांच अधिकारी ज्योति कुमारी ने एनजीओ के मालिक और मुख्य आरोपी ब्रजेश ठाकुर और संस्था से जुड़े 8 लोगों को महिला थाने बुला कर पूछताछ शुरू की. उसी दिन बालिका संरक्षण गृह को सील भी कर दिया.

पूछताछ के बाद 9 आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया. गिरफ्तारी की सूचना मिलते ही संस्था की पीए कही जाने वाली मधु और दिलीप कुमार वर्मा भूमिगत हो गए. इधर गिरफ्तार आरोपियों को अदालत में पेश किया गया, जहां अदालत ने सभी को न्यायिक अभिरक्षा में भेज दिया. इधर फरार आरोपी मधु और दिलीप कुमार वर्मा की गिरफ्तारी के लिए पुलिस ने जगहजगह इश्तहार लगवाए. इतना ही नहीं, पुलिस उन की संपत्ति की कुर्की की काररवाई करने में भी जुट गई.

चूंकि यह कोई छोटामोटा मामला नहीं था, बल्कि मुजफ्फरपुर से प्रकाशित होने वाले दैनिक अखबार ‘प्रात: कमल’ के मालिक और मीडिया जगत के सिंडीकेट ब्रजेश ठाकुर से जुड़ी हुई बहुचर्चित घटना थी, जिस की पहुंच सत्ता के ऊंचे गलियारों तक थी. जिस के एक इशारे पर बड़ेबड़े सफेदपोश माथा टेकने के लिए समर्पित रहते थे.

ब्रजेश ठाकुर के सिंडीकेट की खेवनहार उस की अपनी हनीप्रीत कही जाने वाली महिला मित्र मधु थी. सरगना ब्रजेश के सारे अच्छेबुरे कामों का लेखाजोखा वही रखती थी, इसलिए यह मामला तूल पकड़ने लगा.

आगे की कहानी बताने से पहले ब्रजेश ठाकुर और उस की हनीप्रीत कही जाने वाली महिला दोस्त मधु के जीवन के रंगीन पन्नों का यहां उल्लेख करना अनिवार्य है, इस तरह था—

करीब 55-60 वर्षीय ब्रजेश ठाकुर मूलरूप से मुजफ्फरपुर का रहने वाला है. उस के पिता का नाम राधामोहन ठाकुर था. उन की सालों पहले असामयिक मौत हो गई थी. वह एक सच्चे समाजसेवक थे. इसी सेवा से ओतप्रोत हो कर वह समाज के लिए कुछ ऐसा करना चाहते थे, जिस से दुनिया से विदा होने के बाद भी लोग उन्हें याद करें.

इसी सोच को साकार रूप देने के लिए उन्होंने रोशनाई से भरी कलम को अपने हाथों में उठा लिया और चल पड़े पत्रकारिता की दोधारी तलवार जैसी दुरूह राह पर. पत्रकारिता जगत में राधामोहन ठाकुर बड़े नाम के रूप में विख्यात हुए. समाज के छोटेबड़े तबके में उन की अलग पहचान बनी. लोगों का उन्हें प्यार और सम्मान मिला.

राधामोहन ने सन 1982 में मुजफ्फरपुर से एक हिंदी अखबार ‘प्रात:काल’ का बीजारोपण किया. राधामोहन ठाकुर की पत्रकारों के बीच अच्छी पहचान बनने लगी. बिहार में छोटे अखबारों को शुरू करने वाले शुरुआती नामों से नाम राधामोहन ठाकुर का नाम बड़े सम्मान से लिया जाने लगा. धीरेधीरे राधामोहन ठाकुर ने अपने रसूख का इस्तेमाल कर के अपने अखबार के लिए सरकारी विज्ञापन लेने शुरू कर दिए. इन विज्ञापनों से राधामोहन ठाकुर ने खूब पैसे बनाए और उस पैसे को रियल एस्टेट में लगा दिया.

पिता की उपलब्धि का लाभ उठाया ब्रजेश ने

राधामोहन ठाकुर पत्रकारिता जगत के मंझे हुए बड़े खिलाड़ी बन चुके थे. जब उन्होंने रियल एस्टेट के व्यवसाय में हाथ डाला तो वहां भी कुंदन बन कर दमकने लगे. जबकि उन्हें इस कारोबार की कोई जानकारी नहीं थी. उस समय रियल एस्टेट का शुरुआती दौर था और उस दौर में राधामोहन ठाकुर ने इस से भी खूब पैसा बनाया.

बताया जाता है कि उसी दौरान राधामोहन ठाकुर बीमार पड़े तो फिर स्वस्थ नहीं हो सके और फिर एक दिन उन की मृत्यु हो गई. पिता की मौत के बाद विरासत उन के बेटे ब्रजेश ठाकुर ने संभाली. पैसा पहले से ही विरासत में मिला था, साथ ही पिता का रसूख भी, इसलिए ब्रजेश ठाकुर के हाथ में कमान आते ही उस ने रियल एस्टेट के कारोबार को तो संभाला ही, एक कदम आगे बढ़ कर राजनीति में भी हाथ आजमाना शुरू कर दिया.

बिहार के बाहुबली नेता आनंद मोहन से ब्रजेश ठाकुर की गहरी छनती थी. दोनों बचपन के दोस्त थे. ब्रजेश ठाकुर ने आनंद मोहन की अंगुली पकड़ कर राजनीति की पिच पर पारी खेलनी शुरू की. उसी दौरान 1993 में जब आनंद मोहन ने जनता दल से अलग हो कर अपनी ‘बिहार पीपुल्स पार्टी’ बनाई तो ब्रजेश ठाकुर उस में शामिल हो गया.

1995 में बिहार में विधानसभा के चुनाव हुए तो ब्रजेश ठाकुर मुजफ्फरपुर की कुड़हानी विधानसभा सीट से बिहार पीपुल्स पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा. लेकिन उसे चुनाव में करारी हार का सामना करना पड़ा. इतना ही नहीं, उस के बाद भी वह कभी कोई चुनाव नहीं जीत सका.

सन 2004 में मुखिया आनंद मोहन ने अपनी पार्टी का कांग्रेस के साथ विलय कर दिया. इस के बाद ब्रजेश ठाकुर के चुनाव लड़ने के रास्ते बंद हो गए, लेकिन उस की आनंद मोहन से नजदीकी बरकरार रही. साथ ही राजद और जदयू नेताओं के साथ भी उस का उठनाबैठना जारी रहा.

जब आनंद मोहन को गोपालगंज के जिलाधिकारी जी. कृष्णैया की हत्या में जेल हो गई तो भी ब्रजेश ठाकुर आनंद मोहन से मिलने जेल में जाता रहा. इतना ही नहीं, जबजब आनंद मोहन की जेल बदली गई, ब्रजेश आनंद मोहन के साथ खड़ा दिखा और उसे आर्थिक मदद भी पहुंचाता रहा.

उसी दौरान ब्रजेश ठाकुर ने अपनी सामाजिक संस्था ‘सेवा संकल्प’ और ‘विकास समिति’ की नींव डाल दी थी और दोनों संस्थाएं घुटनों के बल रेंगने लगी थीं. तब तक ब्रजेश ठाकुर की संस्था में मधु की एंट्री हो चुकी थी.

इसी बीच ब्रजेश ठाकुर ने अपने अखबार ‘प्रात:कमल’ का मालिक अपने बेटे राहुल आनंद को बना दिया था. पुलिस के मुताबिक, ब्रजेश ठाकुर खुद अपने अखबार में सिर्फ पत्रकार बन कर रह गया था. इसी दौरान ब्रजेश ठाकुर की किस्मत ने एक नई ऊंचाई को छुआ.

सूत्रों के मुताबिक, सन 2005 में जब नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री बने तो ब्रजेश ठाकुर ने मुजफ्फरपुर में अपने घर बेटे राहुल आनंद के जन्मदिन की पार्टी दी. इस पार्टी में शामिल होने के लिए उस वक्त के बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी पहुंचे थे. ब्रजेश ठाकुर ने यह पार्टी अपना सियासी रसूख दिखाने के लिए आयोजित की थी. इस कार्यक्रम के जरिए उस ने एक तीर से 2 निशाने लगाए थे.

पहला यह कि उस के अखबार को सरकारी विज्ञापन बड़े पैमाने पर मिलते रहें. दूसरा यह कि अपने बेटे राहुल आनंद को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के जरिए राजनीति के अखाड़े में उतार सके. इस के बाद प्रात:कमल जैसे अखबार को और ज्यादा सरकारी विज्ञापन मिलने लगे और उसे बिहार सरकार की ओर से मान्यताप्राप्त पत्रकार का तमगा भी मिल गया.

इतना होने के बावजूद ब्रजेश ठाकुर के अंदर का सियासी कीड़ा मरा नहीं था. उस की खुद की सियासी पारी शुरू होने से पहले ही खत्म तो हो गई. ब्रजेश जान चुका था कि राजनीति उस के भाग्य में नहीं है, इसलिए बेटे को इस अखाड़े में उतार दिया. उस ने सन 2016 में बेटे राहुल आनंद को जिला परिषद के चुनाव में कुड़नी से उतार दिया.

बेटे को उतारा राजनीति के मैदान में

चुनाव हुआ और राहुल आनंद ने जीत दर्ज कर ली. बेटे के राजनीतिक संरक्षण से ब्रजेश ठाकुर को बल मिलने लगा, क्योंकि ब्रजेश ठाकुर सेवा संकल्प एवं विकास समिति एनजीओ चलाता था, जिस में बालिका गृह भी था.

बहरहाल, आइए अब सेवा संकल्प की हनीप्रीत कही जाने वाली मधु के जीवन पर रोशनी डालते हैं. कौन है मधु? आखिर वह कैसे ब्रजेश ठाकुर तक पहुंची? उस के भी जीवन की कहानी किसी फिल्मी कहानी से कम रोमांचक नहीं है.

37 वर्षीया मधु मुजफ्फरपुर की ही रहने वाली थी. वह ब्रजेश ठाकुर के संपर्क में 17 साल पहले आई थी. उन दिनों मधु की जिंदगी कठिनाइयों के दौर से गुजर रही थी. किशोरावस्था में पिता का साया सिर से उठने के बाद वह अपनी मां के साथ मुजफ्फरपुर के चर्चित चतुर्भुज मोहल्ले में रहने लगी.

यह मोहल्ला रेडलाइट एरिया के नाम से कुख्यात था और आज भी है. उस समय मुजफ्फरपुर के चतुर्भुज मोहल्ले में औपरेशन उजाला चला था. इस औपरेशन को चलाने वाली प्रशिक्षु आईपीएस अधिकारी दीपिका सूरी थीं.

दीपिका सूरी एक कड़क अफसर थीं, जिन का नाम मुजफ्फरपुर के लोग आज भी लेते हैं. उन्होंने चतुर्भुज के रेडलाइट एरिया में सुधार के लिए बड़ा काम किया था. प्रशिक्षु आईपीएस ने मोहल्ला सुधार समिति का गठन कराया, जिस में ब्रजेश ठाकुर और मधु सहित 12 लोग सदस्य बने थे.

मोहल्ला सुधार समिति की देखरेख में वहां जागरुकता अभियान चलने लगा. इसी दौरान 90 के दशक में ब्रजेश ठाकुर और मधु करीब आए थे. उन में काफी मधुर संबंध स्थापित हो गए थे. तब ब्रजेश ठाकुर की शादी भी नहीं हुई थी. वह कुंवारा और गबरू जवान था.

मधु बनी खेवनहार

सरिता विशेष

मधु बेहद खूबसूरत और जवान थी तो ब्रजेश ठाकुर भी कम रसिक नहीं था. वह मधु पर मर मिटा था. मधु भी ब्रजेश की दीवानी हो गई थी. फिर क्या था? मधु की मजबूरी और दीवानगी को उस ने कैश करना शुरू कर दिया. मधु को आगे कर के ब्रजेश ने अधिकारियों से गैरकानूनी कई काम कराए और अपनी संस्था और अखबार के लिए पैसे बटोरे.

बाद में जब ब्रजेश की शादी हो गई तो मधु को ले कर उस का पारिवारिक जीवन खतरे में आ गया. मधु की वजह से ब्रजेश ठाकुर और उस की पत्नी के बीच कई बार झगड़े हुए. इस झगड़े के कारण दोनों के संबंधों में दरार आ गई थी. फिर भी ब्रजेश ने उस से संबंध नहीं तोड़ा.

ब्रजेश ठाकुर ने मधु के साथ वफादारी निभाई. आगे चल कर ब्रजेश ठाकुर ने मधु को पहचान दिलाने के लिए चतुर्भुज में ही ‘सेवा संकल्प’ और ‘विकास समिति’ के अलावा वामा शक्ति वाहिनी के नाम से एक और स्वयंसेवी संगठन बनाया और मधु को इस का निदेशक बना दिया.

संगठन का काम चतुर्भुज स्थान में सुधार के कार्य चलाना था. संस्था का उद्देश्य बाजार में बिकने वाली लड़कियों को मुक्त कराना और एड्स को ले कर जागरुकता जैसे कार्यक्रम शामिल थे.

वामा शक्ति वाहिनी की ओर से कई तरह के सामाजिक कार्यक्रम समाज को दिखाने के लिए चलाए जाते थे. लेकिन परदे के पीछे कुछ और ही होता था. संस्था में सिर छिपाने आई पीडि़त और मजबूर लड़कियों को डराधमका और मारपीट कर देहव्यापार के नरक में धकेल दिया जाता था.

बाद में जब राज से परदा उठा और पीडि़त लड़कियों ने अपनी जुबान खोली, तब जा कर पता चला कि यौनशोषण कराने में निदेशिका मधु मुख्य किरदार निभाती थी. इस मामले का परदाफाश होने के बाद मधु भूमिगत हो गई. उस का अब तक पता नहीं चला कि वह जिंदा भी है या उस के साथ कोई अनहोनी घट चुकी है.

अगर जिंदा है तो कहां है, क्योंकि ब्रजेश ठाकुर के सारे बुरे कामों की एकलौती राजदार वही है. वही गलत धंधे से कमाई गई दौलत का हिसाबकिताब रखती थी. मधु के गिरफ्तार होते ही ब्रजेश ठाकुर के चेहरे से कई नकाब उतर जाएंगे, जिस पर उस ने मुखौटा चढ़ा रखा है.

बहरहाल, 25 जून, 2018 को 22 बच्चियों के बयान कोर्ट में दर्ज कराए गए. बच्चियों ने कोर्ट के समक्ष बयान देते हुए बताया कि जब वह गलत काम करने के लिए तैयार नहीं होती थीं तो उन के साथ मारपीट की जाती थी. उन्हें नशीली दवाएं खिला कर उन के साथ दुष्कर्म किया जाता था. पीडि़ताओं ने बताया कि मंगलवार का दिन उन के लिए बेहद यातना भरा होता था. उस दिन बड़े सर का कहर उन पर आफत बन कर टूटता था.

इस बाबत पुलिस पहले ही अपनी जांच कर चुकी थी. जांच के दौरान पता चला कि सीडब्ल्यूसी के अध्यक्ष दिलीप कुमार वर्मा को ही बड़े सर के नाम से जाना जाता था. दिलीप के अलावा समाज कल्याण विभाग का अधिकारी रवि रोशन और विकास कुमार भी बालिका गृह में मुंह काला करने आते थे. पीडि़त किशोरियों ने उन के फोटो देख कर उन्हें पहचान भी लिया.

बालिका गृह रेप कांड बड़ा मामला बन गया था. इस कांड में बड़ेबड़े सफेदपोश नेता और पुलिस अधिकारियों के नाम उछलने लगे थे. मामले में बड़े लोगों के संलिप्त होने की वजह से लोगों को सिविल पुलिस की निष्पक्ष जांच पर अंदेशा था, इसलिए इस केस की जांच सीबीआई से कराए जाने के लिए 3 जुलाई, 2018 को कोर्ट में एक याचिका दायर की गई. 9 जुलाई, 2018 को पटना हाईकोर्ट ने बिहार सरकार से इस मामले में जवाब मांगा.

19 जुलाई को पटना कोर्ट में बच्चियों की पेशी हुई. उस दौरान कोर्ट के सामने एक बच्ची ने बयान दिया कि बालिका गृह में एक किशोरी के साथ बलात्कार किया गया. उस के बाद उस की हत्या कर दी गई और लाश बालिका गृह में ही दफना दी गई. बच्ची के सनसनीखेज बयान के बाद मामला और गरमा गया.

इस के बाद विपक्षियों ने हंगामा खड़ा किया. सच्चाई का पता लगाने के लिए अगले दिन पोक्सो कोर्ट ने साहू रोड स्थित बालिका गृह में मृत किशोरी के शव की खोज के लिए जमीन खोदने का आदेश दिया. 5 फीट गहरी खुदाई की गई लेकिन शव कहीं नहीं मिला. यही नहीं यह मामला संसद में भी उठा.

शुरू हुई सीबीआई जांच

24 जुलाई को लोकसभा में केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि अगर बिहार सरकार चाहे तो हम सीबीआई जांच के लिए तैयार हैं. 26 जुलाई को बिहार सरकार के मुखिया नीतीश कुमार ने इस मामले की सीबीआई से जांच कराने की सिफारिश की. केंद्रीय गृहमंत्री  ने बिहार सरकार की सिफारिश मंजूर कर ली और घटना की जांच के लिए सीबीआई को हरी झंडी दे दी.

28 जुलाई, 2018 को आईजी (जोन) सुनील कुमार और डीआईजी अनिल कुमार सिंह ने बालिका गृह का निरीक्षण किया. इस दौरान डीएसपी (सिटी) आनंद कुमार मुकुल, महिला थानाप्रभारी ज्योति कुमारी के साथ अन्य पुलिस पदाधिकारी मौजूद थे. आईजी के निरीक्षण के क्रम में ही एफएसएल व मैडिकल टीमें भी वहां पहुंचीं.

वैज्ञानिक तरीके से साक्ष्य एकत्रित करने के लिए पहुंची एफएसएल टीम ने पहले बारीकी से कमरे का निरीक्षण किया. इस के बाद किशोरियों के बैड सहित बालिका गृह के सभी कमरों में लगे बैड की चादर, गद्दों के साथ ही अन्य कपड़ों के दाग पर कैमिकल लगा कर जांच की.

इस के बाद दागधब्बे युक्त चादर, तौलिए, तकियों के खोल आदि को जब्त कर लिया. यही नहीं, एफएसएल टीम ने कमरे में मौजूद हैंगर पर लटके कपड़ों की भी कैमिकल लगा जांच की. वहां मौजूद बरतन और ग्लासों को भी जांच के दायरे में लाया गया. पूरी जांचपड़ताल की फोटो व वीडियोग्राफी भी कराई गई.

29 जुलाई को सीबीआई की टीम पटना पहुंची. टीम का नेतृत्व एसपी जे.पी. मिश्र कर रहे थे. पटना पहुंच कर उन्होंने एक नया मुकदमा आरोपियों के खिलाफ दायर किया. बालिका गृह मामले की कमान संभालते ही सीबीआई टीम 30 जुलाई की शाम 4 बजे साहू रोड पहुंची. एसपी जे.पी. मिश्रा खुद टीम का नेतृत्व कर रहे थे. उन के साथ केस की जांच अधिकारी इंसपेक्टर विभा कुमारी, इंसपेक्टर राजेश कुमार, ए.के. सिन्हा सहित अन्य अधिकारी भी थे.

31 जुलाई को रामदयालु स्थित सीबीआई कैंप कार्यालय में सुबह 11 बजे जांच अधिकारी ज्योति कुमारी पहुंचीं. सीबीआई की पूरी टीम की मौजूदगी में उन्होंने केस से जुडे़ जब्त किए गए सारे दस्तावेज सीबीआई के हवाले कर दिए. उस में 23 जुलाई को जब्त किए गए स्टाफ रजिस्टर, उपस्थिति पंजिका, मीटिंग रजिस्टर, और्डर रजिस्टर, डोनेशन रजिस्टर 2017, डिसपोजल रजिस्टर, गर्ल्स ट्रेनिंग रजिस्टर, आगंतुक रजिस्टर, फोन डायरेक्टरी, 11 फोटोग्राफ सहित कई सामान शामिल थे.

उस के बाद सीबीआई ने बालिका गृह के खुले कमरों को देखा. टीम के सदस्यों ने ब्रजेश के आवास, प्रिंटिंग प्रैस व बालिका गृह के कमरे की हर एंगल से फोटोग्राफी कराई. एसपी जे.पी. मिश्र ने ब्रजेश के घर का बाहर से निरीक्षण करते हुए अखबार के प्रिंटिंग कक्ष के पास बारीकी से पूरे भवन का मुआयना किया. प्रिंटिंग कक्ष में 3 सीढि़यां देख कर चौंक गए. उन्होंने बालिका गृह की बिल्डिंग पर भी आपत्ति जताते हुए कहा कि यह जेल की तरह दिखता है.

सीबीआई जांच में खुलते गए राज सीबीआई ने करीब एक घंटे तक बालिका गृह का निरीक्षण किया और स्थानीय लोगों को बुला कर पूछताछ भी की. उन से ब्रजेश के बारे में हर प्रकार की जानकारी ली. एसपी ने खुद गली में पैदल घूम कर हर मकान में रहने वाले लोगों की जानकारी ली. जिस जगह पर खुदाई की गई थी, उस जगह की भी सीबीआई ने जांच की.

सीबीआई जांच से कई चौंकाने वाले राजों से परदा उठ गया. जांच के दौरान पता चला कि बालिका गृह चलाने वाली संस्था सेवा संकल्प व विकास समिति को पिछले 5 सालों में 60 लाख रुपए समाज कल्याण विभाग की ओर से मिले थे.

यह राशि बालिका गृह में रहने वाली लड़कियों के भोजन, उन के वोकेशनल कोर्स और पढ़ाई के मद में दिए गए. हालांकि टाटा इंस्टीट्यूट औफ सोशल साइंसेज की सोशल औडिट रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ कि यहां रह रही किशोरियों के लिए वोकेशनल कोर्स और पढ़ाई की कोई व्यवस्था नहीं थी. भोजन की गुणवत्ता भी ठीक नहीं थी.

सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक, संस्था को हर साल 12 लाख रुपए भोजन, वोकेशन कोर्स चलाने और शिक्षा के मद में दिए जाते थे. समाज कल्याण विभाग से 1 लाख रुपए का फंड हर महीने जाता था. बालिका गृह में वोकेशनल कोर्स और पढ़ाई के लिए सरकार से फंड दिए जाने का प्रावधान है. बच्चियों ने भी महिला आयोग के सामने बयान दिया था कि वहां पढ़ाई, कोर्स और खाने की व्यवस्था नहीं थी. एनजीओ ने हर महीने बच्चियों की संख्या 50 बता कर सरकार से पैसे लिए, जबकि यहां कुल 44 बच्चियां ही रहती थीं.

बाल संरक्षण के निदेशक देवेश शर्मा ने बताया कि एनजीओ सेवा संकल्प को हर महीने 1 लाख रुपए दिए जाते थे. यह राशि 50 बच्चियों के हिसाब से जोड़ कर दी जाती थी. एक बच्ची पर खर्च के लिए सरकार ने 2 हजार रुपए तय किया था.

विभागीय नियम के अनुसार 2 हजार में से 200 रुपए एनजीओ को अपनी तरफ से खर्च करने होते हैं. बाद में ये 200 रुपए भी हिसाब के समय सरकार की तरफ से ही जोड़ लिए जाते हैं यानी संस्थान का एक पैसा भी खर्च नहीं होता.

खैर, मामले की जांच सीबीआई कर रही है. सीबीआई ने जांच के दौरान पाया कि ब्रजेश ठाकुर के एक मंत्री और 2 आईएएस अफसरों से गहरे ताल्लुकात हैं, जिन्होंने ब्रजेश के सारे गलत कामों में अहम भूमिका निभाई थी. वे भी सीबीआई के रडार पर आ गए हैं.

जांच के दौरान ब्रजेश ठाकुर की संस्था को दिए जाने वाले सरकारी फंड को रोक दिया गया. उस के अखबार प्रात:कमल के सरकारी विज्ञापन पर भी रोक लगा दी गई यहां तक कि अखबार की मान्यता भी समाप्त कर दी गई. पुलिस फरार चल रहे सीडब्ल्यूसी के अध्यक्ष दिलीप कुमार वर्मा और मधु की तलाश में जुटी हुई है. दोनों आरोपी अभी भी पुलिस गिरफ्तार से बाहर है.

वहीं जेल में बंद समाज कल्याण विभाग के बाल संरक्षण अधिकारी रवि रोशन की जमानत याचिका को पोक्सो कोर्ट के विशेष न्यायाधीश आर.पी. तिवारी ने 7 अगस्त, 2018 को खारिज कर दिया. रवि रोशन ने अपने वकील के माध्यम से एक पूरक आवेदन कोर्ट में डाला था. जिस में उस ने कहा था कि कार्बन डेटिंग पद्धति से केस डायरी और अन्य रिपोर्ट की जांच होनी चाहिए.

वहीं बच्चियों की मैडिकल जांच रिपोर्ट भी रेप की पुष्टि नहीं करती है. बाल संरक्षण अधिकारी ने यह भी कहा कि मुझे फंसाने के लिए थानाप्रभारी ज्योति कुमारी ने बच्चियों के बयान के साथ डायरी की रिपोर्ट में छेड़छाड़ की है, मैं निर्दोष हूं.

उधर 13 अगस्त को खुदीराम बोस केंद्रीय कारागार में हुई सीबीआई छापेमारी के दौरान बालिका गृह कांड में गिरफ्तार हुए ब्रजेश ठाकुर के पास से बरामद 3 पर्चियों से मिले नंबर से पुलिस ने एक नेता को खोज निकाला है. पटना के अनीसाबाद में नेताजी का ठिकाना है. पर्ची में लिखे सभी नंबरों की काल डिटेल्स पुलिस निकाल रही है. पुलिस इस बात का पता कर रही है कि ब्रजेश ने किस नंबर से जेल में रहते हुए नेता से संपर्क किया था.

इतना ही नहीं, नेता के अलावा और किनकिन नंबरों पर उस ने फोन किया, यह जांच से पता चल सकेगा. जेल से मिले पन्ने पर लेनदेन का जिक्र होने के बाद राहुल से जमीन की बिक्री के बारे में सीबीआई जानकारी लेगी. इस के अलावा ब्रजेश और सेवा संकल्प एवं विकास समिति के खातों के बारे में सीबीआई जानकारी जुटा रही है.

इस मामले में समाज कल्याण विभाग की पूर्वमंत्री मंजू वर्मा के पति चंद्रशेखर वर्मा का नाम आने के बाद सीबीआई का मंत्री दंपति पर लगातार शिकंजा कसता जा रहा है. बेगूसराय के चेरियाबरियापुर थाने में मंजू वर्मा और उन के पति चंद्रशेखर वर्मा के खिलाफ आर्म्स एक्ट के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई है.

बेगूसराय स्थित चेरिया बरियापुर के अर्जुन टोला स्थित उन के घर से सीबीआई ने 17 अगस्त को 50 जिंदा कारतूस समेत अन्य सामान बरामद किए थे.

सीबीआई ने 19 अगस्त को मंजू वर्मा और चंद्रशेखर वर्मा के खिलाफ चेरियाबरियापुर थाने में रिपोर्ट दर्ज करा दी.

बहरहाल, कथा लिखे जाने तक गिरफ्तार आरोपियों के खिलाफ आरोपपत्र न्यायालय में दाखिल किया जा चुका था. बालिका गृह रेप कांड की आगे की जांच सीबीआई ने शुरू कर दी थी. अब देखना यह है कि जांच में कौनकौन से चेहरे बेनकाब होने वाले हैं.

– कथा में पीड़ितों के नाम परिवर्तित हैं. कथा पुलिस सूत्रों, समाचारपत्रों और जनचर्चाओं पर आधारित