सरिता विशेष

विवाह के बाद हनीमून हर पत्नी और पति की एक सुखद अनुभूति होती है, जिस के लिए वे हैसियत के अनुसार एक मनोहारी वातावरण वाले स्थान का चयन करते हैं. पुणे निवासी आनंद कांबले ने भी दीक्षा से शादी हो जाने के बाद हनीमून के लिए महाराष्ट्र के महाबलेश्वर जाने का प्लान बनाया था. उन्होंने इस के लिए तारीख तय की 2 जून, 2018.

आनंद कांबले और दीक्षा खुश थे. उन की यह खुशी तब दोगुनी हो गई जब आनंद का जिगरी दोस्त राजेश बोवड़े और उस की पत्नी कल्याणी बोवड़े भी इस खुशी में शामिल हो गए.

2 जून को अपराह्न 3 बजे ये चारों लोग मारुति सुजुकी कार नंबर एमएच14जी एक्स7171 से सतारा के लिए निकले. अभी ये लोग पंचगनी के पसरणी घाट ही पहुंचे थे कि उन के सारे सपने बिखर कर चूरचूर हो गए. कुछ देर पहले तक हंसतेहंसाते इन जोड़ों के बीच एकाएक मातम पसर गया.

हुआ यह कि पसरणी घाट पर पहुंचते ही आनंद कांबले की पत्नी दीक्षा ने उल्टियां आने की बात कही. पत्नी के कहने पर आनंद कांबले ने कार साइड में रुकवा दी. कार के रुकते ही दीक्षा मुंह पर हाथ रख कर नीचे उतर आई.

उस के साथसाथ आनंद कांबले भी कार से बाहर आ गया था. जिस जगह पर कार खड़ी थी, वह काफी संकरी थी, इसलिए राजेश बोवड़े ने कार थोड़ा आगे ले जा कर खड़ी कर दी और स्वयं भी कार से उतर कर अपनी पत्नी के साथ वहां के मनोहारी दृश्यों को देखने लगा. उस ने पत्नी के साथ कुछ फोटो खींचे.

हालांकि दीक्षा को उल्टियां नहीं हुई थीं, फिर भी आनंद कांबले उस की हालत देख कर घबरा गया था. वह दौड़ कर गया और कार से दीक्षा के लिए पानी की बोतल ले आया.

दीक्षा रोड के साइड में पड़े एक बड़े से पत्थर पर बैठ कर अभी अपने मुंह पर छींटे मार ही रही थी कि तभी वहां एक मोटरसाइकिल आ कर रुकी. उस पर 2 युवक बैठे थे, जो बिना किसी बात के ही वहां खड़े आनंद कांबले से उलझ गए. जब दीक्षा ने पति का पक्ष लेते हुए ऐतराज जताया तो वे लोग दीक्षा के गहने छीनने लगे.

उन्होंने उस का मंगलसूत्र खींच लिया, जिस से दीक्षा के गले पर जख्म भी हो गया. यह आनंद कांबले को बरदाश्त नहीं हुआ. वह उन दोनों से भिड़ गया. तब उन युवकों में से एक ने अपने साथ लाए कांते से आनंद के सिर पर वार कर दिया. अपनी जान बचाने के लिए आनंद वहां से भाग खड़ा हुआ, लेकिन वह कुछ ही दूर जा कर जमीन पर गिर पड़ा.

इधर अपनी सेल्फी और गपशप में मस्त राजेश और उस की पत्नी कल्याणी ने दीक्षा और आनंद कांबले की चीख सुनी तो वे उन की तरफ दौड़े. वे रोड पर आए तो उन्होंने देखा कि 2 युवक आनंद से मारपीट कर रहे हैं, जिन में से एक के हाथ में खतरनाक हथियार था. राजेश दोस्त की जान बचाने के बजाए डर की वजह से पत्नी के साथ कार में जा कर बैठ गया.

हमलावर युवकों ने जब राजेश को देखा तो वे आनंद को छोड़ कर कार के करीब पहुंच गए. कार के दरवाजे बंद थे. एक युवक ने कांते से कार के आगे वाले शीशे पर वार किया. फलस्वरूप शीशा टूट गया, शीशे के टुकड़े राजेश बोवड़े व उस की पत्नी के सिर में लगे, जिस से खून बहने लगा. लेकिन इस की परवाह न करते हुए राजेश ने कार तेजी से भगा दी.

कुछ ही दूर आगे पंचगनी का पुलिस थाना था. थाने पहुंच कर राजेश ने इस घटना की जानकारी दी. लेकिन वहां से उन्हें कोई सहायता नहीं मिल सकी. वहां की पुलिस ने यह कह कर पल्ला झाड़ लिया कि घटना वाली जगह वाई पुलिस थाना क्षेत्र में आती है.

जब तक राजेश बोवड़े और उस की पत्नी कल्याणी वाई पुलिस थाने पहुंचे, तब तक वहां की पुलिस को सतारा जिला अस्पताल से इस मामले की जानकारी मिल चुकी थी. फिर भी वाई पुलिस थानाप्रभारी इंसपेक्टर विनायक वेताल ने उन दोनों का बयान नोट किए और घटना की जानकारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों के साथसाथ पुलिस कंट्रोलरूम को दे दी.

उन्होंने अपनी एक पुलिस टीम को घटनास्थल पर भेजा और स्वयं अपने सहायकों के साथ सातारा अस्पताल की ओर रवाना हो गए. वहां जाने पर पता चला कि राजेश बोवड़े और उस की पत्नी कल्याणी बोवड़े के जाने के बाद दोनों हमलावर मोटरसाइकिल से भाग गए थे.

उन के जाने के बाद दीक्षा किसी से लिफ्ट मांग कर आनंद कांबले को सतारा के क्रांति नानासाहेब पाटिल अस्पताल लाई और सारी बात डाक्टरों को बता दी. डाक्टरों ने गंभीर रूप से घायल आनंद कांबले का चैकअप किया तो पता चला कि उस की मौत हो चुकी है. अस्पताल प्रशासन ने इस की जानकारी पुलिस को दे दी. दीक्षा भी मामूली रूप से जख्मी थी. उस का भी प्राथमिक उपचार किया गया.

थानाप्रभारी विनायक वेताल अस्पताल पहुंच कर डाक्टरों से मिले और आनंद कांबले के शव का बारीकी से निरीक्षण किया. आनंद कांबले के शरीर पर गहरे जख्म थे. दीक्षा बयान देने की हालत में नहीं थी, इसलिए थानाप्रभारी डाक्टरों से बात कर के थाने लौट आए.

इस मामले की खबर जब आनंद कांबले के परिवार वालों को मिली तो कोहराम मच गया. परिवार के सारे लोग रोतेबिलखते अस्पताल पहुंच गए. आनंद कांबले के शव का पोस्टमार्टम होने के बाद शव उस के परिवार वालों को सौंप दिया गया.

मामला लूटपाट और हत्या से संबंधित था, जिस की जांच के लिए मौकाएवारदात की गवाह दीक्षा कांबले का बयान जरूरी था. घटनास्थल पर गई पुलिस टीम खाली हाथ लौट आई थी. उसे वहां लूटपाट जैसा कोई सूत्र नहीं मिला था. इस बारे में अब दीक्षा ही कुछ बता सकती थी.

मामूली रूप से जख्मी दीक्षा जब कुछ सामान्य हुई तो थानाप्रभारी विनायक वेताल ने उस का बयान दर्ज करने के लिए उसे थाने बुलाया. चूंकि मृतक आनंद कांबले आरपीआई पार्टी का पुणे शहर का उपाध्यक्ष था, इसलिए पुलिस के लिए यह मामला महत्त्वपूर्ण बन गया था.

आनंद की हत्या की जानकारी पूरे शहर में फैल गई थी. देखते ही देखते पार्टी के हजारों कार्यकर्ता पुणे शहर की सड़कों पर उतर आए थे. मामला तूल पकड़ता, इस के पहले ही सतारा के एसीपी संदीप पाटिल और अजित टिके हरकत में आ गए.

थानाप्रभारी विनायक और क्राइम ब्रांच के पीआई पद्माकर घनवट केस की जांच में जुट गए. दिनरात एक कर के पुलिस ने 24 घंटे के अंदर केस को खोलने में सफलता हासिल कर ली. पुलिस ने अभियुक्तों को भी गिरफ्तार कर लिया.

थानाप्रभारी विनायक वेताल और पीआई पद्माकर घनवट पहले आनंद कांबले को अपनी जांच के दायरे में लिया. क्योंकि उन का मानना था कि आनंद कांबले चूंकि आरपीआई पार्टी का सक्रिय कार्यकर्ता था, इसलिए उस की किसी से अनबन या दुश्मनी हो सकती है. लेकिन जांच में ऐसा कुछ नहीं निकला. आनंद कांबले का चरित्र साफसुथरा था.

इस के बाद जब उन का ध्यान कांबले परिवार की नईनवेली दुलहन दीक्षा पर गया तो उन्हें दाल में कुछ काला नजर आया. उन्होंने देखा कि सिर्फ 7 दिन की दुलहन के चेहरे पर दुख के वैसे भाव नहीं थे, जैसे होने चाहिए थे. जहां सारा परिवार आनंद कांबले के गम में डूबा था, वहीं दीक्षा की आंखों और चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी.

दूसरी बात जो पुलिस को खटक रही थी, वह यह थी कि अगर हत्यारे लूटपाट के इरादे से आए थे तो उन्होंने आनंद कांबले की हत्या क्यों की? उन्हें दीक्षा की हत्या करनी चाहिए थी, क्योंकि सारे गहने दीक्षा के शरीर पर थे. जबकि वे सिर्फ उस का मंगलसूत्र ले कर गए थे.

इन सारी कडि़यों को जोड़ने और दीक्षा की कुंडली खंगालने के बाद दीक्षा पुलिस के निशाने पर आ गई. उन्होंने जब दूसरी बार दीक्षा को थाने बुला कर पूछताछ की तो वह संभल नहीं सकी और उस ने अपना गुनाह स्वीकार कर लिया.

24 वर्षीय दीक्षा ओव्हाल देखने में जितनी खूबसूरत थी, उतनी ही हसीन और चंचल थी. महत्त्वाकांक्षी सौंदर्यरूपी दीक्षा को जो एक बार देख लेता था, वह अपने आप उस की तरफ खिंचा चला आता था. लेकिन दीक्षा जिस की तरफ खिंची चली गई थी, वह खुशनसीब निखिल मलेकर था, जो उस के स्कूल का दोस्त था.

26 वर्षीय निखिल मलेकर पुणे के चिखली गांव का रहने वाला था. उस के पिता सुदाम मलेकर पुणे की एक प्राइवेट फर्म में काम करते थे. परिवार साधनसंपन्न था. घर में किसी चीज की कोई कमी नहीं थी.

निखिल मलेकर को पूरा परिवार प्यार करता था, उस की हर मांग पूरा करता था. यही वजह थी कि वह जिद्दी स्वभाव का बन गया था. वह जो चाहता था किसी न किसी तरह हासिल कर लेता था.

दीक्षा के पिता धार्मिक प्रवृत्ति और पुराने खयालों के आदमी थे. उन के लिए समाज और मानमर्यादा ही सब कुछ थी. उन की गिनती गांव के संपन्न काश्तकारों में होती थी. दीक्षा उन की लाडली बेटी थी, जिसे पूरा परिवार प्यार करता था. इसी वजह से परिवार के सामाजिक और रूढि़वादी होने के बावजूद दीक्षा को खुली छूट मिली हुई थी.

निखिल मलेकर और दीक्षा की लवस्टोरी तब से शुरू हुई थी, जब दोनों स्कूल आतेजाते थे. दीक्षा का गांव निखिल मलेकर के गांव के करीब था. दोनों का स्कूल आनेजाने का रास्ता एक ही था. दोनों स्कूल तो साथसाथ आतेजाते ही थे, स्कूल के सांस्कृतिक कार्यक्रमों और पिकनिक पर भी साथसाथ रहते थे.

जब तक दोनों कम उम्र के थे, तब तक उन का व्यवहार दोस्ती जैसा था. लेकिन जैसेजैसे उम्र बढ़ी, वैसेवैसे उन का रंगरूप और खयाल बदले. वक्त के साथ बचपन की दोस्ती ने प्यार का रूप ले लिया. दोनों की पढ़ाई भले ही खत्म हो गई, लेकिन प्यार खत्म नहीं हुआ. उन का मिलनाजुलना पहले जैसा ही चलता रहा.

दोनों जब भी मिलते थे, एकदूसरे को अपने जीवनसाथी के रूप में देखा करते थे. उन्हें ऐसा लगता था, जैसे वे दोनों एकदूसरे के लिए ही बने हैं. जहां दीक्षा और निखिल मलेकर अपने सुनहरे जीवन का सपना देख रहे थे, वहीं दूसरी ओर दीक्षा के मातापिता उस की शादी का तानाबाना बुन रहे थे.

दीक्षा के पिता उस के लिए वर की तलाश में थे. यह बात जब दीक्षा को पता चली तो वह बेचैन हो गई. वह अपने दिल में निखिल मलेकर की छवि समेटे बैठी थी और उसी से शादी करना चाहती थी.

आखिर एक दिन उस ने अपने रूढि़वादी पिता को सारी बातें बता दीं. उस ने कहा कि वह निखिल से प्यार करती है और उस से विवाह करेगी. निखिल का परिवार भी अच्छा है और घर के लोग भी. हम दोनों खुशीखुशी साथ रह सकते हैं.

दीक्षा की बात सुन कर उस के घर वालों के पैरों तले से जमीन खिसक गई. उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि उन की बेटी अपनी आजादी का उन्हें इतना बड़ा तोहफा देगी.

पिता ने दीक्षा की बातों को अनसुना करते हुए कहा, ‘‘देखो बेटा, हम तुम्हारे अपने हैं, हमेशा तुम्हारा भला ही चाहेंगे. हमारी अपनी मर्यादा भी है और समाज में इज्जत भी. इसलिए हम चाहते हैं कि तुम प्यारव्यार का चक्कर छोड़ कर मानसम्मान से जिओ और परिवार को भी अपना सिर उठा कर चलने दो. इसी में सब की भलाई है.’’

अपने परिवार वालों के सख्त रवैए से दीक्षा यह बात अच्छे से समझ गई थी कि जो सपने सच नहीं हो सकते, उन्हें देखने से क्या फायदा. यही सोच कर वह धीरेधीरे निखिल मलेकर को भूल कर उस से दूर रहने की कोशिश करने लगी. लेकिन यह संभव नहीं हो पा रहा था.

एक तरफ जहां दीक्षा का यह हाल था, वहीं दूसरी तरफ निखिल मलेकर भी परेशान था. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि अकसर मिलने और चहकने वाली दीक्षा को अचानक क्या हो गया कि वह खामोश और उदास रहने लगी.

लेकिन कहावत है कि जहां चाह होती है वहां राह जरूर निकल आती है. ऐसा ही दीक्षा के साथ भी हुआ. एक दिन उस ने निखिल को बता दिया कि उस के घर वाले उन दोनों की शादी के खिलाफ हैं और उस की शादी कहीं दूसरी जगह करना चाहते हैं.

दीक्षा ने निखिल से कहा कि वह उसे भूल जाए. दीक्षा की बात सुन कर निखिल के होश उड़ गए. वह बोला, ‘‘दीक्षा, तुम चिंता मत करो. मैं तुम्हारे घर वालों से बात करूंगा. उन के पैर पकड़ूंगा, उन से विनती करूंगा.’’

‘‘इस से कुछ नहीं होगा निखिल, मैं अपने परिवार वालों को अच्छी तरह से जानती हूं. वहां तुम्हारा केवल अपमान ही होगा. इस से अच्छा है कि तुम मुझे भूल जाओ.’’ दीक्षा ने उदासी भरे स्वर में कहा.

‘‘तो क्या तुम मुझे भूल सकती हो?’’ निखिल मलेकर ने सपाट शब्दों में पूछा.

‘‘मैं तुम्हें भूल तो नहीं सकती लेकिन कुछ कर भी तो नहीं सकती.’’ वह बोली.

दीक्षा के काफी समझाने के बाद भी निखिल मलेकर नहीं माना और वह उस के परिवार वालों से जा कर मिला. आखिर वही हुआ जिस का दीक्षा को डर था. निखिल मलेकर को अपमानित कर घर से धक्के मार कर निकाल दिया गया. यह बात दीक्षा से सहन नहीं हुई.

निखिल मलेकर को घर से निकालने की बात ले कर बेटी बगावत न कर दे, यह सोच कर उस के पिता दीक्षा के लिए वर की तलाश में जुट गए. जल्दी ही उन्होंने पुणे के तालुका औंध गांव मंजठानगर के रहने वाले आनंद कांबले से दीक्षा का रिश्ता तय कर दिया.

32 वर्षीय आनंद ज्ञानेश्वर कांबले सुंदर स्वस्थ और मिलनसार युवक था. उस का मातापिता के साथ भाईभाभियों और बहनों का भरापूरा परिवार था. पिता ज्ञानेश्वर कांबले गांव के प्रतिष्ठित काश्तकार थे. संयुक्त परिवार होने के कारण कांबले परिवार में सभी मिलजुल कर रहते और काम करते थे.

आनंद कांबले वाहनों की नंबर प्लेट बनाने का काम करता था. उस की पुणे में आनंद आर्ट्स के नाम से दुकान थी. इस के अलावा वह राजनीति में भी सक्रिय था. वह आरपीआई पार्टी का पुणे शहर का उपाध्यक्ष था. शहर में उस की अच्छी इज्जत थी. उस के भाईबहनों की शादी हो चुकी थी, केवल आनंद कांबले ही अविवाहित था.

26 मई, 2018 को दीक्षा ओव्हाल और आनंद कांबले का विवाह बड़े उत्साह और धूमधाम से हो गया. विवाह में आरपीआई पार्टी के अध्यक्ष रामदास अठावले के अलावा पुणे शहर के सभी कार्यकर्ता और कई प्रतिष्ठित लोग शामिल हुए.

आनंद कांबले दीक्षा को पा कर बहुत खुश था. उस के परिवार वाले भी अपनी सुंदर बहू से बहुत खुश थे. लेकिन दीक्षा वहां पर अपने आप को कैदी की तरह महसूस कर रही थी. उस के दिलोदिमाग पर निखिल मलेकर की छवि हावी थी. वह सारे रस्मोरिवाज के बीच उदास रही. उस की इस उदासी को उस की ससुराल वाले उस के मायके का गम समझ रहे थे.

घर के सारे कार्यक्रमों के हो जाने के बाद भी जब दीक्षा के चेहरे की उदासी नहीं गई तो परिवार वालों ने आनंद कांबले से बहू को कहीं घुमाफिरा कर लाने के लिए कहा.

घर वालों के कहने पर आनंद कांबले ने हनीमून के लिए सतारा के पंचगनी और महाबलेश्वर जाने की योजना बनाई. इस प्रोग्राम में उस ने अपने जिगरी दोस्त राजेश बोवड़े और उस की पत्नी कल्याणी को भी साथ चलने के लिए राजी कर लिया था.

यह बात जब दीक्षा ने अपने प्रेमी निखिल मलेकर को बताई तो वह तिलमिला उठा. उस की प्रेमिका किसी और के साथ सुहागरात के लिए जाए, यह उस से बरदाश्त नहीं हुआ. यही हाल दीक्षा का भी था.

उस ने घर वालों के दबाव में आ कर आनंद कांबले से विवाह जरूर कर लिया था, लेकिन वह आनंद को स्वीकार नहीं कर पा रही थी. वह किसी भी तरह उस से छुटकारा पाना चाहती थी. इस के लिए वह निखिल मलेकर के साथ मिल कर एक खतरनाक योजना बना चुकी थी. योजना बना कर निखिल मलेकर घटना के एक दिन पहले ही पंचगनी चला गया.

घटना के दिन दीक्षा उसी समय से निखिल के संपर्क में रही, जिस समय वह पति के साथ पंचगनी महाबलेश्वर के लिए कार से निकली थी. वह निखिल मलेकर को फोन के जरिए पलपल की जानकारी और लोकेशन बता रही थी.

कार जब पंचगनी पसरणी घाट की तरफ गई तो दीक्षा ने योजना के अनुसार उल्टियां आने का बहाना बना कर कार रुकवा ली. कार को रुके अभी 2-3 मिनट भी नहीं हुए थे कि हत्यारे वहां पहुंच गए और केवल 10 मिनट के अंदर अपना काम कर के निकल गए.

दीक्षा कांबले से पूछताछ कर के पुलिस ने उस का मोबाइल फोन अपने कब्जे में ले कर जांच की तो सारा राज खुल गया. पुलिस ने निखिल मलेकर की सरगर्मी से तलाश शुरू की और 24 घंटे के अंदर उसे पुणे के पिंपरी चिंचवाड़ से गिरफ्तार कर लिया.

विस्तार से पूछताछ में उस ने अपना गुनाह स्वीकार कर लिया. दीक्षा कांबले और निखिल मलेकर से पूछताछ के बाद उन्हें कोर्ट में पेश किया गया, जहां से दोनों को न्यायिक हिरासत में भेज दिया.

कथा लिखे जाने तक पुलिस उन 2 युवकों की तेजी से तलाश कर रही थी, जो आनंद कांबले की हत्या कर के फरार हो गए थे.

– कथा पुलिस की प्रैसवार्ता और समाचारपत्रों पर आधारित