भले ही देश में लाइट एमिटिंग डियोड्स यानी एलईडी बल्ब का बाजार 10 हजार करोड़ रुपए से ऊपर चला गया है, लेकिन घीरेधीरे यह काले कारोबार में तबदील हो रहा है, जो निश्चितरूप से चिंता की बात है. मौजूदा समय में एलईडी बल्ब का बाजार नकली उत्पादों से भरा पड़ा है. कंपनियां इसे मुनाफा कमाने का एक बड़ा साधन मान कर चल रही हैं.

इलैक्ट्रिक लैंप ऐंड कंपोनैंट मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन यानी एलकोमा की एक रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2010 में एलईडी लाइटिंग का भारतीय बाजार महज 500 करोड़ रुपए का था, जो अब बढ़ कर 10 हजार करोड़  रुपए का हो गया है. यह 22 हजार करोड़ रुपए की पूरी लाइटिंग इंडस्ट्री का लगभग 45 प्रतिशत से भी ज्यादा है. दरअसल, एलईडी बल्ब में विद्युत ऊर्जा की कम खपत होती है और इस की रोशनी पारंपरिक बल्ब से ज्यादा होती है, फिर भी यह आंखों को नहीं चुभती है, जिस के कारण इस की लोकप्रियता में तेजी से इजाफा हो रहा है.

वैश्विक स्तर की ख्यातिप्राप्त एजेंसी नीलसन ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि घरेलू बाजार में उलब्ध एलईडी बल्ब के 76 और एलईडी डाउनलाइटर के 71 प्रतिशत ब्रैंड सुरक्षामानकों के अनुकूल नहीं हैं. गौरतलब है कि ये मानक भारतीय मानक ब्यूरो यानी बीआईएस और इलैक्ट्रौनिक्स एवं सूचना प्रसारण मंत्रालय ने तैयार किए हैं. नीलसन ने अपने सर्वेक्षण में दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद और हैदराबाद में बिजली के उत्पादों की खुदरा बिक्री करने वाली 200 दुकानों के एलईडी बल्बों को नमूने के तौर पर शामिल किया था.

एलकोमा के अनुसार, बीआईएस मानकों के उल्लंघन के सब से ज्यादा मामले दिल्ली में देखे गए हैं. एलकोमा की मानी जाए तो अधिकृत मापदंडों पर खरा नहीं उतरने वाले उत्पादों से उपभोक्ता गंभीररूप से बीमार हो सकते हैं.

अमेरिकन मैडिकल एसोसिएशन यानी एएमए द्वारा 14 जून, 2016 को जारी एक रिपोर्ट के अनुसार एलईडी द्वारा निकलने वाली रोशनी मानवस्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है. नकली उत्पाद से जोखिम की गंभीरता और भी ज्यादा बढ़ जाती है.

दूसरी तरफ नकली उत्पादों को बेचने से सरकार को भारीभरकम राजस्व का नुकसान हो रहा है क्योंकि ऐसे उत्पादों का निर्माण व उन की बिक्री गैरकानूनी तरीके से की जा रही है. देखा जाए तो नकली एलईडी बल्ब के कारोबार से सरकार की ‘मेक इन इंडिया’ संकल्पना को भी नुकसान हो रहा है.

उल्लेखनीय है कि अगस्त 2017 में बीआईएस ने एलईडी बल्ब निर्माताओं को उन के उत्पाद की सुरक्षा जांच के लिए बीआईएस में पंजीकृत कराने का निर्देश दिया था, लेकिन कंपनियां इस आदेश की अनदेखी कर रही हैं. एलईडी बल्ब के काले कारोबार में बढ़ोतरी का एक बहुत बड़ा कारण भारतीय बाजार का चीन के उत्पादों से भरा हुआ होना भी है. आज की तारीख में एलईडी बल्ब बड़े पैमाने पर चीन से भारत गैरकानूनी तरीके से लाए जा रहे हैं.

सर्वेक्षण के मुताबिक, एलईडी बल्ब के 48 प्रतिशत ब्रैंडों पर बनाने वाली कंपनी का पता दर्ज नहीं है, जबकि 31 प्रतिशत ब्रैंडों की पैकिंग पर कंपनी का नाम नहीं लिखा है. साफ है, इन का निर्माण गैरकानूनी तरीके से किया जा रहा है. इसी तरह एलईडी डाउनलाइटर्स के मामले में भी 45 प्रतिशत ब्रैंडों की पैकिंग पर निर्माता का नाम दर्ज नहीं है और 51 प्रतिशत ब्रैंडों के उत्पादों पर कंपनी का नाम नहीं लिखा हुआ है.

नीलसन की रिपोर्ट के अनुसार, सर्वे में शामिल दिल्ली में बिकने वाले एलईडी बल्ब के तकरीबन तीनचौथाई ब्रैंड बीआईएस मानकों के अनुरूप नहीं हैं. एलईडी डाउनलाइटर्स के मामले की भी लगभग ऐसी ही स्थिति है. वर्तमान में घर, बाजार और दफ्तर में धड़ल्ले से एलईडी बल्बों का इस्तेमाल किया जा रहा है. इसी वजह से रोशनी के बाजार में इस की हिस्सेदारी बढ़ कर आज 50 प्रतिशत हो गई है.

हाल ही में सरकार ने ‘उजाला’ योजना के तहत देशभर में 77 करोड़ पारंरिक बल्बों की जगह एलईडी बल्ब इस्तेमाल करने का लक्ष्य रखा है. इस आलोक में ऊर्जा दक्षता ब्यूरो ने आपूर्ति करने वाले निर्माताओं या डीलरों को स्टार रेटिंग वाले एलईडी बल्ब की आपूर्ति करने का निर्देश दिया है ताकि उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़े.

बहरहाल, मौजूदा परिदृश्य में सरकार को नकली एलईडी बल्बों के प्रसार को रोकने के लिए कड़े कदम उठाने चाहिए, खासकर चीन से गैरकानूनी तरीके से आने वाले नकली व बिना ब्रैंड वाले उत्पादों को. नकली या बिना ब्रैंड वाले एलईडी बल्ब ईमानदार कारोबारियों, सरकार व उपभोक्ताओं सभी के लिए नुकसानदेह हैं.