सरिता विशेष

मध्य प्रदेश में भोपाल के रातीबड़ इलाके का 24 साला राजू कुशवाहा प्राइवेट स्कूल में टीचर था. इसी साल फरवरी महीने में उस की शादी भोपाल के ही छोला मंदिर इलाके की रहने वाली आस्था नाम की लड़की से हुई थी.

खूबसूरत और पढ़ीलिखी बीवी पा कर राजू बेहद खुश था और आस्था को भी खुश रखने की हरमुमकिन कोशिश करता था.

राजू ने भी शादीशुदा जिंदगी के कई ख्वाब संजो रखे थे, लेकिन ये ख्वाब एक झटके में उस की मौत की वजह भी बन गए.

हुआ यों कि न मालूम किन वजहों के चलते आस्था शादी के कुछ दिन बाद ही मायके चली गई और वापस नहीं आई. राजू ने कई दफा बीवी की बेरुखी की वजह जानने की कोशिश की, पर उस ने कुछ नहीं बताया, तो वह परेशान हो उठा.

अप्रैल महीने की 10 तारीख को राजू घर वालों के कहने पर आस्था को लेने ससुराल पहुंचा, तो भी उस ने साथ जाने से इनकार कर दिया और वजह भी नहीं बताई.

दुखी राजू खाली हाथ घर लौट आया और बीवी के गम में जहर पी लिया. इतना ही नहीं, मरने का जुनून उस के सिर पर इस तरह सवार था कि जहर पीने के बाद उस ने अपने गले में फांसी का फंदा भी लगा लिया.

घर वालों को शक हुआ, तो उन्होंने राजू के कमरे का दरवाजा खटखटाया, पर मरा आदमी भला क्या दरवाजा खोलता, इसलिए घबराए घर वालों ने दरवाजा तोड़ा, तो देखा कि वह फांसी के फंदे पर झूल रहा था. अस्पताल में डाक्टरों ने उस की मौत पर अपनी मुहर लगा दी.

ये करते हैं बीवी से प्यार

राजू जैसे शौहर कितने जज्बाती होते हैं, इस की एक और मिसाल 23 जून, 2017 को मध्य प्रदेश के ही सतना जिले से सामने आई थी, जब 40 साला भगवान सेन ने रेल से कट कर खुदकुशी कर ली थी.

भगवान सेन की तकलीफ यह थी कि कुछ महीने पहले ही उस की बीवी उसे छोड़ कर किसी दूसरे मर्द के साथ रहने लगी थी, जिस से दुखी हो कर उसे अपनी जिंदगी खत्म कर लेना ही बेहतर लगा.

7 जून, 2017 को फैजाबाद के बाबा बाजार के मवई थाना इलाके के गांव दीवाना मजरे भवानीपुर में एक दीवाने रामसूरत ने बीवी के मर जाने पर खुद भी खेत में आम के पेड़ पर फांसी लगा कर अपनी जिंदगी खत्म कर ली.

गांव वालों के मुताबिक, रामसूरत अपनी बीवी को बहुत चाहता था और उस की मौत के बाद गुमसुम रहने लगा था. बच्चा जनने के दौरान हुई बीवी की मौत ने उसे भीतर तक हिला कर रख दिया था.

रामसूरत चाहता तो कुछ दिनों बाद दूसरी शादी कर सकता था, लेकिन बीवी की जगह जो दिल में बन गई थी, उसे किसी और के देने की बात शायद ही उस ने सोची होगी, इसलिए फांसी लगा कर अपना दुख जता दिया.

प्यार और चाहत की ऐसी मिसालें कम ही देखने में आती हैं, जिन में शौहर मरने की हद तक बीवी को चाहता हो. ऐसा ही सोचने के लिए मजबूर कर देने वाला मामला 9 फरवरी, 2017 को बिहार से सामने आया था.

पूर्णिया जिले के गांव रामडेली का लड्डू शर्मा भी अपनी बीवी कोमल पर लट्टू था. राजस्थान की एक प्राइवेट कंपनी में काम करने वाले लड्डू शर्मा को कोमल नाम की एक लड़की से मुहब्बत हो गई थी. दोनों ने शादी कर ली, तो जिंदगी मानो जन्नत सी हो गई.

चंद महीने बाद ही कोमल पेट से हो गई, तो लड्डू शर्मा की खुशियों को तो मानो पंख लग गए. पर अकेला लड्डू शर्मा पत्नी की जचगी नहीं करा सकता था, इसलिए उस ने कोमल को रामडेली गांव भेज दिया, जिस से जचगी घर वालों की निगरानी में अच्छे से हो सके.

लेकिन जचगी का वक्त उन दोनों की खुशियों पर ग्रहण बन कर आया. कोमल की मौत हो गई.यह खबर सुन कर लड्डू शर्मा भागाभागा रामडेली गांव पहुंचा. वहां उस ने जहर खा लिया और श्मशान घाट में अपनी जान दे दी, जहां कोमल की लाश जलाई गई थी.

इंदौर, मध्य प्रदेश के 54 साला सोमाजी पटेल ने अपनी बीवी बेबी बाई की मौत के 6 साल बाद फांसी लगा कर खुदकुशी कर ली थी.

कुलकर्णी का भट्टा इलाके के रहने वाले सोमाजी पटेल अपनी बीवी बेबी बाई की मौत के बाद से ही तनाव में थे और उन की कमी महसूस कर रहे थे. जैसेजैसे वक्त गुजरता गया, वैसेवैसे पत्नी की यादें और ज्यादा बढ़ती गईं. 6 साल तो उन्होंने बेटेबहुओं और नातीपोतों के साथ जैसेतैसे गुजार दिए, पर प्यार को यों ही प्यार नहीं कहा जाता, यह सोमाजी पटेल की खुदकुशी से भी साबित हुआ.

खटकती है कमी

इन कुछ मामलों से साफ महसूस होता है कि बीवी की अहमियत एक शौहर की जिंदगी में क्या होती है. साथ ही, यह भी साबित होता है कि सिर्फ औरतें ही जज्बाती नहीं होतीं, बल्कि कई मामलों में मर्द भी उन से कहीं ज्यादा जज्बाती होते हैं.

आमतौर पर मर्दों के बारे में कहा यह जाता है कि वे बीवी के मरते ही या अलग होते ही दूसरी शादी कर के चैन से गुजरबसर करने लगते हैं. यह बात पूरी तरह सच नहीं है.

दूसरी शादी कर के वही लोग सुखी रह पाते हैं, जो दूसरी बीवी में पहली बीवी देखते हैं और दूसरी बीवी भी उन्हें पहली बीवी सरीखा प्यार और सहारा देती है.

यह भी होता है

बीवी की जुदाई में जान देने वाले या घुटघुट कर जीने वाले जरूरी नहीं है कि बीवी को बहुत प्यार करते हों. कई मामलों में तो बीवी शौहर की चाहत र जज्बात को नजरअंदाज करती रहती है, पर मर्द उसे चाहना नहीं छोड़ पाता. भोपाल का राजू कुशवाहा इस की मिसाल है.

वैसे, बीवी की ज्यादतियों से तंग आ कर भी जान देने वाले शौहरों की तादाद कम नहीं है. 1 जुलाई, 2017 को राजस्थान के जोधपुर में रहने वाले

30 साला इंजीनियर दिनेश मांकड़ ने अपनी बीवी की धमकियों और ज्यादतियों से तंग आ कर खुदकुशी कर ली थी.

शादी के 7 साल तो ठीकठाक गुजरे, पर एकाएक ही बीवी ने गिरगिट की तरह रंग बदला और दिनेश पर घर से अलग रहने का दबाव बनाने लगी. घर वालों से अलग होने की कोई मुकम्मल वजह नहीं थी, इसलिए दिनेश ने बीवी को समझायाबुझाया, जिस का कोई असर नहीं हुआ. उलटे बात न मानने पर वह मायके जा कर रहने लगी.

यह दिनेश जैसे शौहरों के लिए बेहद मुश्किल वक्त होता है, जब बीवी अलग होने की जिद पर अड़ जाती है. ऐसे में शौहर की पहली कोशिश यह होती है कि वह बीवी को समझाए कि उस की भी अपने घर वालों के प्रति कुछ जिम्मेदारियां बनती हैं.

बीवियां जब इस बात से इत्तिफाक नहीं रखतीं, तो वाकई शौहरों की जिंदगी नरक हो जाती है. कई दफा तो लोग उन की मर्दानगी तक पर भी उंगली उठाने लगते हैं.

बीवी मायके में क्यों है? कलेजे पर नश्तर से चुभते इस सवाल का जवाब दुनिया को न केवल शौहर, बल्कि उस के घर वालों के लिए भी दे पाना मुश्किल हो जाता है.

अकसर बीवी के मायके वाले भी आग में घी डालने का काम करते हुए अपनी लड़की की गलती छिपाते हैं कि उसे ससुराल में दहेज के लिए मारापीटा जाता था या दूसरी तरह की तकलीफें दी जाती थीं, इसलिए वह ससुराल नहीं जा रही है.

ऐसे लोगों को यह समझाने वाला कोई नहीं होता कि बात अकेले पेट की नहीं होती, बल्कि शादीशुदा जिंदगी की जिम्मेदारियां व कुछ उसूल भी होते हैं, जिन्हें उन की बेटी ढंग से नहीं निभा पा रही है, इसलिए वापस जाने से कतरा रही है.

कहने का मतलब यह कतई नहीं है कि बीवियों पर जुल्म नहीं होते. उन पर जुल्म होते हैं और कहर भी ससुराल वाले ढाते हैं, पर रिश्तेदारी और समाज में ऐसी बातें छिपी नहीं रहतीं. कौन गलत और कौन सही के फैसले के लिए अदालतें हैं, जिन में तलाक के करोड़ों मुकदमे चल रहे हैं.

यहां यह कहना भी बेमानी है कि आज की औरतें ससुराल के जुल्मोसितम घूंघट ढक कर बरदाश्त कर लेती हैं. रोजाना लाखोें शिकायतें शौहर और उस के घर वालों के खिलाफ दर्ज होती हैं और उन पर कार्यवाही भी होती है.

दिनेश ने अपने सुसाइड नोट में जो बातें लिखीं, उन से जाहिर होता है कि समाज, धर्म और कानून के फंदे में शौहर की हालत अधर में लटके शख्स जैसी हो जाती है. वह इन तीनों चक्रव्यूहों को नहीं भेद पाता, इसलिए खुदकुशी कर लेता है.

दिनेश ने अपने सुसाइड नोट में लिखा था कि अगर सरकार और समाज मर्दों के लिए कोई कानून बनाए, तो कुछ बेकुसूरों की जान बच सकती है. हर बार औरत मासूम नहीं होती. वह अकसर औरतों के लिए बने कानून का फायदा उठाती है और अपनी इच्छा पूरी करने के लिए हमदर्दी हासिल करती है.

शौहर को समझें

दिनेश बहुत कम लफ्जों में अपनी तकलीफ और दर्द बयां कर गया, जिसे हर बीवी को समझना चाहिए कि यह शौहर का प्यार ही है, जो सालोंसाल वह उस के घर वापस लौटने का इंतजार करता रहता है. उस के दिल में एक आस होती है कि आज नहीं तो कल बीवी को अक्ल आ जाएगी.

बीवी के मर जाने और मायके जाने की जुदाई में फर्क इतना भर होता है कि पहले मामले में शौहर एकदम नाउम्मीद हो उठता है, जबकि मायके में रह रही बीवी के मामलों में उसे उम्मीद बंधी रहती है.

इसलिए बीवियों को चाहिए कि वे बेवजह छोटीमोटी बातों, खुदगर्जी या सहूलियत के लिए उन शौहरों की परेशानी का सबब न बनें, जो उन्हें प्यार करते हैं. मियांबीवी गृहस्थी की गाड़ी के दो पहिए बेवजह नहीं कहे जाते, इसलिए अपने हिस्से की जिम्मेदारी बीवी को उठानी आनी चाहिए और इस के लिए कुछ समझौते करने हों, तो करने चाहिए. इस से उन्हें अपने शौहर का सौ गुना प्यार मिलेगा.