उस दिन जुलाई, 2017 की 18 तारीख थी. बिहार के गोपालगंज के फुलवरिया के बसवरिया मांझा गांव में लालबाबू  राय के घर तेरहवीं का भोज था. इस भोज में शहर के बड़ेबड़े लोग आए थे. हथुआ चौनपुर गांव के रहने वाले भारतीय जनता पार्टी के कद्दावर नेता कृष्णा शाही भी इस आयोजन में शामिल होने आए.

कृष्णा शाही लालबाबू राय के पोते आदित्य राय को दिल से चाहते और मानते थे, इसलिए उन के दादाजी के इस कार्यक्रम में उन का शामिल होना जरूरी था. करीब 20 सालों से दोनों परिवारों के बीच घरेलू संबंध थे और सुखदुख में एकदूसरे के यहां आनाजाना था.

खैर, आयोजन संपन्न हुआ तो नातेरिश्तेदारों को छोड़ कर सभी लोग अपनेअपने घर लौट गए. कृष्णा शाही रात को वहीं रुक गए. रात साढ़े 10 बजे उन की पत्नी शांता शाही ने फोन किया तो उन्होंने पत्नी को बताया कि आदित्य ने उन्हें अपने घर रोक लिया है. सुबह जल्दी घर लौट आऊंगा, क्योंकि पार्टी के काम से पटना जाना है. उन्होंने ड्राइवर सुनील को सुबह आने को कह दिया.

कृष्णा शाही को उस दिन पार्टी के काम से पटना जाना था. उन का ड्राइवर मुंहअंधेरे ही उन्हें लेने पहुंचा. लेकिन आदित्य राय ने बताया कि नेताजी तो रात को ही चले गए थे. ड्राइवर ने वापस लौट कर यह बात कृष्णा शाही की पत्नी शांता को बताई तो वह चौंकीं. उन्होंने पति को फोन किया. लेकिन उन के दोनों फोन बंद मिले. इस से शांता घबरा गईं. उन्होंने पति से बात करने की कई बार कोशिश की, लेकिन हर बार उन का फोन बंद मिला. जब शांता की समझ में कुछ नहीं आया तो उन्होंने यह बात अपने जेठ उमेश शाही को बताई और उन से पति के बारे में पता लगाने को कहा.crime story

उमेश शाही ने अपने छोटे भाई के मोबाइल पर फोन किया तो उन्हें भी फोन बंद मिला. उमेश के घर से आदित्य राय का घर 4-5 किलोमीटर दूर था. उमेश शाही बडे़ भाई दिनेश तथा कुछ अन्य लोगों को साथ ले कर आदित्य के घर बसवरिया मांझा गांव जा पहुंचे.

वहां पहुंच कर उन्होंने आदित्य राय को बुला कर पूछा, ‘‘कृष्णा कहां है आदित्य? अभी तक घर नहीं पहुंचा और उस का फोन भी बंद है?’’

‘‘नेताजी तो रात में ही यहां से घर चले गए थे.’’ आदित्य ने बताया.

‘‘यह क्या कह रहे हो तुम, कृष्णा रात में ही घर चला गया था तो अब तक पहुंचा क्यों नहीं?’’

यह सुन कर आदित्य भी चौंका.

इस के बाद आदित्य और उमेश के बीच कृष्णा शाही को ले कर बहस छिड़ गई. धीरेधीरे वहां गांव के लोग जुटने लगे. कृष्णा शाही कोई मामूली आदमी नहीं थे. वह बीजेपी के नेता और प्रदेश भाजपा व्यवसायी प्रकोष्ठ के अध्यक्ष थे, साथ ही अपने क्षेत्र में काफी लोकप्रिय भी थे.

आदित्य की बातें सभी को बड़ी अजीब लगीं. उस की जुबान उस का साथ नहीं दे रही थी. उमेश ने यह बात भांप ली. वैसे भी वह समझ नहीं पा रहे थे कि कृष्णा रात को अगर उन के यहां सोया था तो कहां चला गया? मामला संदिग्ध लग रहा था, इसलिए सुबह 8 बज कर 10 मिनट पर उन्होंने कृष्णा शाही के रहस्यमय ढंग से गायब होने की सूचना फुलवरिया थाने को दे दी.

सूचना मिलते ही थानाप्रभारी प्रेमप्रकाश राय ने यह जानकारी एसपी रविरंजन कुमार को दी. एसपी रविरंजन के आदेश पर कई थानों की पुलिस मौके पर पहुंच गई. हथुआ के डीएसपी मोहम्मद इम्तियाज भी वहां आ गए.

भारतीय जनता पार्टी के कद्दावर नेता कृष्णा शाही के रहस्यमय ढंग से गायब होने की सूचना जल्द ही उन के समर्थकों तक भी पहुंच गई. सैकड़ों की संख्या में उन के समर्थक आदित्य राय के गांव मांझा पहुंच गए. कृष्णा शाही की खोजबीन शुरू हुई. जहांजहां उन के ठहरने के अड्डे थे, वहांवहां तलाश की गई, लेकिन उन का कहीं पता नहीं चला. उन की खोजबीन करतेकरते 10-11 बज गए.

गांव का एक युवक यूं ही बड़का शिव मंदिर के पास वाले कुएं में झांकने लगा. भीतर का दृश्य देख कर वह चौंका. कुएं के पानी में एक जोड़ी चप्पल तैर रही थी. युवक उलटे पांव आदित्य के घर की ओर भागा, जहां भीड़ जमा थी.

युवक ने कुएं में चप्पल देखने की बात कही तो सब लोग कुएं की ओर दौड़े. कुएं के भीतर पानी के ऊपर तैर रही चप्पल को देख कर उमेश शाही पहचान गए. वे चप्पलें उन के छोटे भाई कृष्णा की थीं, जो वह घर से पहन कर निकले थे. उन्हें समझते देर नहीं लगी कि किसी ने कृष्णा की हत्या कर के लाश कुएं में फेंक दी है.

3 पुलिसकर्मियों को कुएं के भीतर उतारा गया. काफी खोजबीन के बाद कृष्णा की लाश पानी में नीचे मिल गई. बाहर निकाला गया तो लाश की कमर पर गमछे में भारी पत्थर बंधा मिला.

कृष्णा शाही की लाश मिलते ही वहां का माहौल गरम हो गया. चूंकि पुलिस फोर्स मौके पर मौजूद थी, इसलिए वह स्थिति को नियंत्रित किए हुए थी. कृष्णा का शव मिलने की बात सुन कर हजारों लोग बसवरिया मांझा गांव पहुंच गए. उग्र लोगों ने आदित्य राय के घर में तोड़फोड़ करनी शुरू कर दी. बाहर पड़ी कुर्सियों को तोड़ कर फेंका जाने लगा. घर के सामान उठा कर बाहर फेंक दिए गए. हंगामा कर रहे लोगों को रोकने के लिए कई थानों की पुलिस को तैनात किया गया. एसपी रविरंजन कुमार और डीएम भी घटनास्थल पर पहुंच गए.

स्थिति पर काबू पाने के बाद पुलिस ने सुरक्षा के मद्देनजर आदित्य राय के घर को चारों ओर से कब्जे में ले लिया, ताकि कोई भी अप्रिय घटना न घट सके. पुलिस ने कृष्णा शाही की लाश का मुआयना किया तो मृतक के जिस्म पर कहीं भी चोट का कोई निशान नहीं पाया गया. हां, मृतक का होंठ जरूर नीला पड़ा हुआ था. इस से पुलिस ने अनुमान लगाया कि कृष्णा की मौत जहर से हुई होगी.

मृतक के बड़े भाई उमेश शाही चीखचीख कर कह रहे थे कि सत्ता पक्ष (जनता दल यूनाइटेड) के विधायक अमरेंद्र पांडेय उर्फ पप्पू पांडेय ने साजिश रच कर मेरे भाई की हत्या करवाई है. साजिश में आदित्य भी शामिल है.

खैर, पुलिस ने कृष्णा शाही की लाश पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल गोपालगंज भिजवा दी. इस के साथ ही पुलिस ने आदित्य राय एवं 4 महिलाओं को पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया और थाने लौट आई.

उमेश शाही ने भाई की हत्या में 6 लोगों के खिलाफ लिखित तहरीर दी. इन 6 आरोपियों के नाम आदित्य राय, जदयू विधायक अमरेंद्र पांडेय उर्फ पप्पू पांडेय, सतीश पांडेय, उन के पुत्र जिला परिषद के चेयरमैन मुकेश पांडेय, चौनपुर गांव के निवासी यशवंत राय, सुशील उर्फ राजन थे.

मृतक के भाई उमेश शाही का आरोप था कि आरोपियों ने साजिश कर के उन के भाई कृष्णा की हत्या की है. पुलिस ने तहरीर के आधार पर सभी आरोपियों के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 201 और 120बी के तहत नामजद मुकदमा दर्ज कर लिया.crime story

20 जुलाई को कृष्णा शाही के पोस्टमार्टम की रिपोर्ट पुलिस को मिल गई. रिपोर्ट में उन की मौत की वजह खाने में जहर मिला होना बताया गया था. पुख्ता जांच के लिए विसरा सुरक्षित रख लिया गया था.

हिरासत में लिए गए आदित्य और चारों महिलाओं से कड़ाई से पूछताछ की गई. आदित्य राय हर बार अपना बयान बदलता रहा. कभी वह शाही के घर से पैदल निकलने की बात कहता तो कभी किसी अनजान व्यक्ति का फोन आने पर रात में अकेले ही चले जाने की बात बताता.

कड़ाई के बावजूद महिलाओं ने भी अपना मुंह नहीं खोला. जब पुलिस ने थोड़ी और सख्ती की तो आखिर आदित्य ने घुटने टेकते हुए कह ही दिया, ‘‘हां, मैं ने ही खाने में जहर दे कर शाही की हत्या की है. जब से मैं ने फोन पर उन के और अपनी बहन के प्रेमसंबंध की बातें सुनी थीं, तभी से मेरे तनमन में आग लगी हुई थी. उस ने दोस्ती में जो दगाबाजी की, उसी से नाराज हो कर मैं ने उस की हत्या कर दी. मुझे इस का कोई पछतावा नहीं है.’’

आदित्य के अपराध स्वीकार करने के बाद उस के घर से जिन महिलाओं को हिरासत में लिया गया था, उन्हें छोड़ दिया गया. यह 19 जुलाई, 2017 की बात है.

12 घंटे के भीतर भाजपा नेता कृष्णा शाही हत्याकांड का परदाफाश हो गया था. एसपी रविरंजन कुमार ने अपने औफिस में प्रैस कौन्फ्रैंस कर के पत्रकारों को बताया कि भाजपा नेता कृष्णा शाही की हत्या अवैध संबंधों की वजह से की गई थी.

मामले की जांच के दौरान पुलिस को पता चला कि जिस युवती से कृष्णा शाही के अवैध संबंध थे, वह उन के बेहद करीबी आदित्य राय की तीसरे नंबर की बहन रागिनी (बदला हुआ नाम) थी. इस की जानकारी होते ही आदित्य राय आगबबूला हो गया और भाजपा नेता को सबक सिखाने की फिराक में रहने लगा.

अपने दादाजी के तेरहवीं के मौके पर उस ने अच्छा मौका देख कृष्णा शाही के खाने में जहर दे कर उन की हत्या कर दी और लाश पास के कुएं में फेंक दी. आरोपी आदित्य राय ने पत्रकारों द्वारा पूछे गए सवालों के जवाब में अपना अपराध स्वीकार करते हुए पूरी घटना विस्तार से बता दी.

उसी दिन शाम को पुलिस ने आरोपी आदित्य राय को अदालत में पेश किया, जहां से उसे 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया.

33 वर्षीय कृष्णा शाही मूलरूप से बिहार के गोपालगंज के थाना हथुआ के गांव चौनपुर के रहने वाले थे. 5 भाईबहनों में वह सब से छोटे थे. उन से 2 बड़े भाई दिनेश और उमेश शाही थे. बड़ी बहनों की शादियां हो चुकी थीं. तीनों भाइयों में खूब निभती थी, इसीलिए उन का परिवार संयुक्त था.

कृष्णा शाही के पिता का नाम मैनेजर शाही था. 20 साल पहले 13 जनवरी, 1996 में गांव से थोड़ी दूर स्थित मठिया टोला जाते समय नक्सलियों के माले गु्रप ने उन की बम फेंक कर हत्या कर दी थी. उस समय कृष्णा शाही की उम्र 13 साल के करीब रही होगी. पिता की हत्या का सब से ज्यादा दुख कृष्णा को हुआ था.

मैनेजर शाही चौनपुर इलाके में एक बड़ा नाम था. वह पूरी तरह समाजसेवा के लिए समर्पित थे. चौनपुर गांव से सटे कई गांवों के लोग मुश्किल के समय मैनेजर शाही को याद करते थे. वह बड़ी दिलेरी से उन की समस्याओं का समाधान करते थे. दिन हो या रात, वह बिना परवाह किए फरियादियों के साथ बेहिचक कहीं भी चले जाते थे.

यह बात उन दिनों की है, जब बिहार में नक्सलियों के आतंक की फसल लहलहा रही थी. बंदूकों की तड़तड़ाहट और बमों की दुर्गंध से प्रदेश के नागरिकों का जीना दूभर हो गया था. नक्सलियों के फरमान पत्थर की लकीर की तरह हुआ करते थे. उन के फैसले किसी कीमत पर नहीं बदलते थे. ऐसा ही कुछ मैनेजर शाही के साथ भी हुआ. मैनेजर शाही नक्सलवादियों के फरमान की चिंता किए बगैर उन से लोहा ले रहे थे.

13 जनवरी, 1996 को एक फरियादी की मदद करने के लिए मैनेजर शाही मठिया टोला के लिए घर से निकले थे. मुखबिरों ने नक्सलियों को उन के घर से निकलने की खबर दे दी थी. सूचना मिलते ही नक्सली संगठन मठिया टोला में घात लगा कर बैठ गया. जैसे ही मैनेजर शाही मठिया टोला पहुंचे, उन्होंने बम फेंक कर उन के चिथड़े उड़ा दिए और फरार हो गए.

कृष्णा शाही ने पिता के अधूरे सपनों को पूरा करने की कसम खा ली थी. पिता की मौत के बाद मैनेजर शाही के तीनों बेटे पिता के पदचिह्नों पर चल निकले. तब तक कृष्णा बड़े हो गए थे. शाही परिवार की राजनीति में पैठ थी.

राजनीति की डगर पर पांव रखने के बाद कृष्णा ने रामविलास पासवान की पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी का दमन थाम लिया. वह युवा और ऊर्जावान थे. उन्होंने अपनी जमीनी पकड़ मजबूत बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी. अपनी लगन और मेहनत की बदौलत कृष्णा ने राजनीति में अपनी अच्छी साख बना ली.

सन 2006 में कृष्णा शाही की मेहनत एक बड़ा परिवर्तन लाई. उन के बड़े भाई उमेश शाही ने राजनीति के धुरंधर खिलाड़ी माने जाने वाले विधायक अमरेंद्र पांडेय उर्फ पप्पू पांडेय के कब्जे से हथुआ के चौनपुर की पंचायत सीट झटक ली और सरपंच बन गए. जबकि सन 2000 में पंचायत की इस सीट पर अमरजीत यादव सरपंच थे. अमरजीत यादव अमरेंद्र पांडेय का खास आदमी था. चौनपुर की सरपंच सीट हाथ से निकल जाने के बाद अमरेंद्र बौखला गए. यहीं से अमरेंद्र पांडेय और कृष्णा शाही के बीच दुश्मनी की तलवारें खिंच गईं.

तुलिसिया के विधायक अमरेंद्र पांडेय गोपालगंज, हथुआ के नयागांव के निवासी थे. रामाशीष पांडेय के 2 ही बेटे थे सतीश पांडेय और अमरेंद्र पांडेय. गोपालगंज जिले के माफिया डौन सतीश पांडेय की अपने इलाके में तूती बोलती थी. वह ढाई दशक पूर्व उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों की पुलिस के लिए सिरदर्द बने माफिया डौन श्रीप्रकाश शुक्ला गैंग के सक्रिय सदस्य थे. उन्हें राजद के पूर्व मंत्री बृजबिहारी प्रसाद की हत्या में नामजद आरोपी बनाया गया था.  बाद में उन्हें इस केस में जमानत मिल गई थी. बिहार के चर्चित पुरखास नरसंहार में भी उन्हें आरोपी बनाया गया था, लेकिन बाद में वह इस में बरी हो गए थे.

जरायम की काली दुनिया से निकल कर सतीश पांडेय राजनीति के सहारे विधान परिषद तक पहुंचने के ख्वाब देखने लगे थे. उन्होंने सन 2000 के विधानसभा चुनाव में दरौली विधानसभा क्षेत्र से चनुव लड़ा, लेकिन उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा. उस के बाद उन्होंने अपने छोटे भाई अमरेंद्र पांडेय को राजनीति में उतार दिया.

विधायक अमरेंद्र पांडेय की क्षेत्र में अपनी ही सरकार चलती थी. उन के जीवन से जुड़े इतिहास के कई काले पन्ने अतीत में दबे हुए थे. बात 27 मई, 2012 की है. गोपालगंज जिला के हथुआ प्रखंड मुख्यालय में शराब की दुकान चलाने वाले अनिल साह की रात में गोली मार की हत्या कर दी गई थी.

अनिल साह की हत्या के मामले में कुचाईकोट विधानसभा क्षेत्र से जदयू विधायक अमरेंद्र पांडेय, उन के पिता रामाशीष पांडेय, बहनोई जलेश्वर पांडेय, भाभी और पूर्व जिला परिषद अध्यक्ष उर्मिला पांडेय सहित 7 लोगों के खिलाफ स्थानीय थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी.

अनिल साह के परिजनों ने खुल कर आरोप लगाया था कि विधायक अमरेंद्र पांडेय ने साह से 50 लाख रुपए रंगदारी मांगी थी और रुपए न मिलने पर शराब की दुकान बंद करने को कहा था. इस घटना के विरोध में स्थानीय लोगों ने मृतक के शव के साथ हथुआ सड़क को 2 घंटे तक जाम कर रखा था.

बहरहाल, कृष्णा शाही लोक जनशक्ति पार्टी को छोड़ कर बहुजन समाज पार्टी में चले गए. सन 2009 में कृष्णा शाही ने हथुआ विधानसभा से बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ा, जिस में वह हार गए. चुनाव हारने के बाद कृष्णा ने बसपा से नाता तोड़ कर भारतीय जनता पार्टी से नाता जोड़ लिया. भाजपा में आने के बाद कृष्णा शाही ने अपनी पूरी ऊर्जा क्षेत्र के विकास में लगा दी. अपनी मेहनत और लगन की बदौलत वह व्यापारी प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष चुने गए.

इस बीच कृष्णा शाही और विधायक अमरेंद्र पांडेय की दुश्मनी खुल कर सामने आ गई. शाही इस की चिंता छोड़ कर क्षेत्र के लोगों की सेवा में जुटे रहे. सन 2012 में फिर मुखिया का चुनाव हुआ. इस बार चौनपुरा मुखिया सीट को महिला सीट कर दिया गया था, इसलिए इस सीट पर न तो कृष्णा लड़ सके और न उन के बडे़ भाई.

शाही ने अपनी पत्नी शांता शाही को मुखिया पद के लिए चुनाव लड़ाया. शांता भारी मतों से जीतीं और सरपंच बन गईं. शांता की जीत से पांडेय खेमे में भूचाल आ गया, क्योंकि इस से शाही का राजनीतिक कद और बढ़ गया था.

कृष्णा शाही की राजनीति में सक्रियता से विरोधियों की फेहरिस्त लंबी होती जा रही थी. राजनीतिक प्रतिद्वंदिता बढ़ने के साथ अदावत भी बढ़ी. उन की हत्या की आशंका से उन के घर वाले चिंतित भी रहा करते थे. परिजनों का चिंता करना गलत नहीं था. शाही की जान की सुरक्षा को ले कर उन की चिंता तब और बढ़ गई, जब गोरखपुर के कुख्यात अपराधी चवन्नी सिंह को गोपालगंज की पुलिस ने गिरफ्तार किया.

उस से पूछताछ में पता चला कि उसे एक विधायक ने कृष्णा शाही की हत्या की सुपारी दी थी. देखें तो समय रहते पुलिस ने कृष्णा शाही को बचा लिया था. इस के बाद उन पर मंडराते खतरे को देख कर जिला प्रशासन ने उन्हें सुरक्षा के लिए 4 अंगरक्षक दे दिए थे.

इस कहानी की दूसरी कड़ी आदित्य राय से हो कर आगे बढ़ती है. 30 वर्षीय आदित्य राय गोपालगंज के फुलवरिया थाना के बसवरिया मांझा गांव का रहने वाला था. उस के पिता अवधेश राय विदेश में नौकरी करते थे. अवधेश राय के 5 बच्चों में बेटा आदित्य राय एकलौता था.

आदित्य राय की सगी बुआ कृष्णा शाही के गांव चौनपुर में ब्याही थीं. उन्हीं के यहां आनेजाने में आदित्य की जानपहचान शाही परिवार से हुई थी, यह 17-18 साल पहले की बात है. तब आदित्य की उम्र 15-16 साल थी. दोनों परिवारों के बीच घनिष्ठ रिश्ता बन गया था, जो अभी तक चलता चला आ रहा था.

आदित्य के पिता भले ही विदेश में नौकरी करते थे, लेकिन उन का परिवार गांव में ही रहता था. आदित्य के अलावा उस की 4 बहनें थीं. अवधेश राय की अनुपस्थिति में उन के परिवार की देखभाल कृष्णा शाही के घर वाले करते आ रहे थे. ये लोग दुखसुख की हर घड़ी उन के परिवार के साथ खड़े रहते थे. शाही की अनुपस्थिति में उन की पत्नी शांता को कहीं जाना होता या कोई जरूरी काम पड़ जाता तो आदित्य उन के लिए तैयार रहता.

इतना ही नहीं, आदित्य और उस की 2 बहनों की शादी भी कृष्णा के घर वालों ने ही कराई थी. कृष्णा शाही का आदित्य के यहां रातोदिन का उठनाबैठना था. इसी उठनेबैठने में कृष्णा शाही की नीयत रागिनी को देख कर डोल गई. सामान्य कदकाठी और साधारण नैननक्श की रागिनी कृष्णा शाही के दिल में उतर गई. वह उस से प्रेम करने लगे. रागिनी भी सयानी थी. मर्दों की नजरों की भाषा वह समझने लगी थी. उस ने शाही की नजरों को पढ़ लिया था.

रागिनी जान गई थी कि कृष्णा शाही उस पर फिदा हैं. वह भी उन्हें अपना दिल दे बैठी. मौका मिलते ही उन्होंने अपनेअपने प्यार का इजहार  कर दिया. इस के बाद वे छिपछिप कर मिलने लगे. यह सिलसिला सालों तक चलता रहा. किसी को कानोंकान इन के प्यार की खबर नहीं लगी.

घटना से 15 दिनों पहले यानी 3 जुलाई, 2017 को आदित्य के दादा लालबाबू राय की मौत हो गई थी. अंतिम संस्कार में कृष्णा शाही ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया था और आर्थिक मदद भी की थी. इस के अगले दिन आदित्य कमरे में कोई काम कर रहा था, तभी उस ने रागिनी को किसी से फोन पर बातें करते सुना. रागिनी उस से प्यारमोहब्बत की बातें कर रही थी. उस की बातें सुन कर आदित्य का पारा सातवें आसमान पर जा पहुंचा. इस के बावजूद कुछ कहने के बजाय वह परदे की ओट से उस की बातें ध्यान से सुनने लगा.

रागिनी भाजपा नेता कृष्णा शाही से प्यार की बातें कर रही थी. उस की बातें सुन कर आदित्य गुस्से से पागल हो उठा. वह यह सोच कर परेशान था कि शाही ने उस के साथ दोस्ती में दगा की है. बस उसी दिन से वह भाजपा नेता कृष्णा शाही को सबक सिखाने की योजना बनाने लगा. यह बात उस ने अपने तक ही सीमित रखी, ताकि शाही को निपटाने के बाद पुलिस उस पर शक न कर सके.

18 जुलाई, 2017 को आदित्य राय के दादा लालबाबू की तेरहवीं थी. शाही उस दिन पूरे समय आदित्य के साथ थे. उन्हें देख कर आदित्य को गुस्सा तो बहुत आ रहा था, पर उसे मौके की तलाश थी. क्योंकि वह जानता था कि शाही को किसी भी तरह का नुकसान पहुंचाने का हश्र क्या हो सकता है. वह कोई मामूली आदमी नहीं थे, इसलिए जो भी कदम उठाना था, सोचसमझ कर उठाना था.

7 बजे शाम तक कृष्णा शाही आदित्य के घर रहे. मेहमानों को भोजन कराने के बाद वह जरूरी काम की बात कह कर चले गए. जातेजाते रागिनी से कह गए थे कि वह रात को आएंगे, तभी खाना भी खाएंगे. यह बात आदित्य ने सुन ली थी. बस, उस ने रात में ही उन का काम तमाम करने का निर्णय ले लिया. उन के जाने के बाद आदित्य बड़का गांव बाजार गया और कीटनाशक दवा की एक शीशी खरीद लाया. रात साढ़े 10 बजे कृष्णा शाही अपनी कार से आदित्य के यहां पहुंचे. उन्होंने ड्राइवर को यह कह कर घर भेज दिया कि सुबह आ कर उन्हें ले जाएगा.

आदित्य उन्हें देख कर खुश हुआ. वह उन्हें पुराने घर न ले जा कर नए घर ले गया. उन्हें वहां बैठा कर आदित्य पुराने घर से एक थाली में खाना परोस कर लाया. उसी खाने में उस ने बाजार से लाया कीटनाशक मिला दिया. शाही खाना खा कर सो गए. सोते समय ही उन की मौत हो गई.

रात में सब सो गए तो आदित्य उन की लाश को कंधे पर लाद कर घर से कुछ दूरी पर स्थित कुएं पर ले गया, जहां उस ने उन की कमर से एक भारी पत्थर बांध कर लाश को कुएं में फेंक दिया. इस के बाद उस ने उन की लाल रंग की हवाई चप्पल भी ला कर कुएं में फेंक दी और घर जा कर आराम से सो गया.

सुबह 4 बजे कृष्णा शाही का ड्राइवर सुनील उन्हें ढूंढते हुए आदित्य के घर पहुंचा और उसे जगा कर कृष्णा शाही को जगाने के लिए कहा. क्योंकि उन्हें किसी काम से पटना जाना था. लेकिन आदित्य ने कहा कि वह तो यहां आए ही नहीं थे, जबकि सुनील खुद ही उन्हें छोड़ कर गया था.

आदित्य का यह जवाब उसे काफी अटपटा लगा. कुछ कहने के बजाय वह लौट गया और सारी बात शांता शाही को बताई. शांता ने पति के दोनों नंबरों पर फोन किया. दोनों ही नंबर बंद थे. इस के बाद उन्होंने जेठ उमेश शाही को सारी बात बता कर पति के बारे में पता लगाने को कहा. उमेश शाही ने भाई के बारे में पता किया तो उन की लाश कुएं में मिली.

23 जुलाई को कृष्णा शाही की हत्या के मामले में एक नया मोड़ आ गया. शांता शाही ने एसपी के घटना के खुलासे को चुनौती दी कि उन के पति के चरित्र पर जो दाग लगाया गया है, वह सरासर बेबुनियाद है. आदित्य के परिवार से उन का बीसों साल से पारिवारिक संबंध रहा है. उस की 2 बहनों की शादी उन्होंने ही करवाई थी, तब क्यों किसी ने उन के पति के चरित्र पर अंगुली नहीं उठाई? अब कैसे उन का संबंध आरोपी की बहन रागिनी से हो गया. इसे वह पुलिस की मनगढं़त कहानी बता रही हैं.

उन का कहना है कि आदित्य को मोहरा बनाया गया है, जबकि उन के पति की हत्या राजनीतिक विद्वेष की वजह से हुई है. वह पति की हत्या का दोषी जदयू के विधायक अमरेंद्र पांडेय उर्फ पप्पू पांडेय और उन के परिवार को मानती हैं.

पुलिस जो कह रही है कि आदित्य ने उन के खाने में जहर मिला दिया था, यह झूठ है. घटना मंगलवार को घटी थी, उस दिन शाहीजी का व्रत था. व्रत में वह खाना कैसे खा सकते थे. दूसरी बात यह कि शाहीजी का वजन 95-96 किलोग्राम था, जबकि आदित्य काफी कमजोर है. वह अकेला शाहीजी की लाश को कैसे अपने कंधे पर उठा कर ले गया? तीसरी बात घटना वाली रात साढ़े 10 बजे उन की पति से बात हुई थी. उन्होंने बताया था कि आदित्य ने यह कह कर रोक लिया है कि रात काफी हो गई है, वह यहीं सो जाएं.

जबकि आदित्य का कहना था कि शाहीजी उन के वहां आए ही नहीं थे. आखिर उस ने ऐसा क्यों कहा, यह जांच का विषय है. इन तमाम सवालों के जवाब देने में पुलिस प्रशासन विफल है. निश्चय ही शाहीजी की हत्या में आदित्य के साथ और भी कई लोग शामिल थे, जिन्हें पुलिस बचा रही है. इसलिए वह इस घटना की सीबीआई जांच कराने की मांग कर रही हैं.

मृतक के भाई उमेश शाही ने डीजीपी पी.के. ठाकुर से मिल कर घटना की जांच सीबीआई से कराने की मांग की है. कथा लिखे जाने तक सीबीआई जांच की संस्तुति नहीं हुई थी. दूसरी ओर एसपी रविरंजन कुमार का कहना है कि घटना का खुलासा सही किया गया है. हत्या अवैध संबंधों की वजह से ही हुई है. हत्यारे को गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया गया है. बाकी जिन 5 आरोपियों के नाम उमेश शाही की ओर से दिए गए हैं, जिन के बारे में जांच चल रही है. दोषी पाए जाने पर उन के खिलाफ भी काररवाई की जाएगी.

कथा लिखे जाने तक आरोपी आदित्य राय जेल में था. पुलिस अब तक कृष्णा शाही के दोनों मोबाइल फोन के बारे में पता नहीं लगा सकी है.

– कथा परिजनों एवं पुलिस सूत्रों पर आधारित

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