सरिता विशेष

अधिकांश वेतनभोगी कर्मचारी छुट्टियां पाने के लिए लालायित रहते हैं. वे विभाग से मिलने वाली हर तरह की छुट्टी का लाभ लेने की भी कोशिश करते हैं. यानी किसी भी छुट्टी को जाया नहीं करना चाहते.

इस के विपरीत दिल्ली पुलिस के एक अधिकारी ऐसे भी हैं जिन्होंने पिछले 20 सालों से कोई छुट्टी नहीं ली. अर्जित अवकाश, आकस्मिक अवकाश, चिकित्सा अवकाश आदि की बात तो छोडि़ए, उन्होंने शनिवार, रविवार के साप्ताहिक अवकाश भी नहीं लिए.

पिछले 20 सालों से वह सुबह 7 बजे से रात 11 बजे तक लगातार ड्यूटी करते आ रहे हैं. और तो और रिटायर होने के बाद भी वह पहले की तरह अपनी ड्यूटी को अंजाम दे रहे हैं. विभाग में इस अधिकारी को इंसानी रोबोट के नाम से जाना जाता है.

इस इंसानी रोबोट का नाम है बलजीत सिंह राणा. बलजीत सिंह राणा मूलरूप से हरियाणा के सोनीपत ्जिले के कुंडल गांव के रहने वाले श्रीराम राणा के बेटे हैं. उन का जन्म 14 अगस्त, 1952 को हुआ था. श्रीराम राणा आसपास के गांवों में नंबरदार के नाम से जाने जाते थे. उन के 3 बच्चे थे. बेटी शकुंतला, बलजीत सिंह और जगदीश सिंह. इन में बलजीत सिंह मंझले नंबर के थे.

बलजीत सिंह ने 1971 में गांव के ही सरकारी स्कूल से हाईस्कूल की परीक्षा पास की. बलजीत बताते हैं कि दिल्ली पुलिस में उन की भरती मौजमजे में ही हो गई थी. वह दोस्तों के साथ दिल्ली घूमने आए थे. वहां आ कर पता चला कि किंग्सवे कैंप में दिल्ली पुलिस के लिए कांस्टेबल की भरती चल रही है.

बलजीत भी जा कर कतार में खड़े हो गए. शारीरिक रूप से वह हृष्टपुष्ट थे, इसलिए शारीरिक नापतौल में फिट पाए गए. बाद में उन्होंने दिल्ली पुलिस में कांस्टेबल के पद पर भरती की सूचना अपने घर वालों को दे दी. यह बात पहली सितंबर, 1972 की है.

कांस्टेबल की ट्रेनिंग पूरी करने के बाद 1973 में उन की पहली पोस्टिंग राष्ट्रपति भवन में हुई. वहां 4 साल नौकरी करने के बाद उन का ट्रांसफर नई दिल्ली के संसद मार्ग थाने में कर दिया गया. यहां पर इन की ड्यूटी डिप्लायमेंट सेल में लगा दी.

इस सेल में काम करने वालों के साथ चौबीसों घंटे सिरदर्दी बनी रहती है. वीआईपी, वीवीआईपी मूवमेंट, विदेशी मेहमानों की सुरक्षा, रूट निर्धारण, विभिन्न धरनाप्रदर्शनों को शांतिपूर्वक संपन्न कराना, फोर्स का इंतजाम करना आदि जिम्मेदारी इसी सेल की होती है. यहां काम करने वालों की ड्यूटी हर वक्त तलवार की धार पर टिकी रहती है.

बलजीत सिंह ने यहां मन लगा कर काम किया. तत्कालीन पुलिस उपायुक्त बी.के. गुप्ता ने सन 1982 में बलजीत सिंह का प्रमोशन कर हैडकांस्टेबल बना कर उन्हें डिप्लायमेंट सेल का इंचार्ज बना दिया. इंचार्ज बन जाने के बाद उन की जिम्मेदारियां बढ़ गईं.

इस पद पर रहने से जरा सी गलती का होना दिल्ली और देश में बवाल मचाने वाली खबरों को जन्म देना था. डीसीपी बी.के. गुप्ता ने उन्हें इसी संवेदनशील पद की जिम्मेदारी दे दी. उन्होंने अपनी इस जिम्मेदारी का बखूबी निर्वहन किया.

सन 1992 में तत्कालीन डीसीपी कंवलजीत देओल ने बलजीत सिंह का प्रमोशन कर उन्हें एएसआई बना दिया. अपनी मेहनत के बलबूते वह प्रमोट हो कर सन 1998 में एएसआई से एसआई बन गए. उस समय नई दिल्ली जिले के डीसीपी टी.एन. मोहन और पुलिस कमिश्नर वी.एन. सिंह थे.

सबइंसपेक्टर बनने के बाद तो वह एक तरह से दिल्ली पुलिस के ही बन कर रह गए. उन की पोस्टिंग संसद मार्ग थाने में ही डिप्लायमेंट सेल के इंचार्ज के रूप में रही. वह सुबह 7 बजे अपनी ड्यूटी पर पहुंच जाते और रात 11 बजे तक ड्यूटी पर रहते. घर जाने से पहले वह स्टाफ का अरेंजमेंट कर के जाते थे.

इस के बाद उन का ड्यूटी का यही सिलसिला चलता रहा. उन्होंने किसी भी तरह की कोई छुट्टी नहीं ली. साप्ताहिक अवकाश हो या कोई त्यौहार, वह उस दिन भी अपनी ड्यूटी बखूबी पूरी करते. कहने का मतलब साल के 365 दिन बड़ी ही जिम्मेदारी से अपनी ड्यूटी करते रहे.

बारहों महीने लगातार रोजाना 16 घंटे तक ड्यूटी पूरी करने वाले इस पुलिस अफसर की विभाग में चर्चा होने लगी. अन्य पुलिस वाले इस बात पर आश्चर्यचकित होने लगे कि लगातार इतनी कठिन ड्यूटी करने के बाद वह कभी बीमार नहीं होते. वास्तव में बलजीत सिंह कभी बीमार नहीं हुए.

अपनी ड्यूटी पर पूरी तरह समर्पित रहने वाले बलजीत राणा के सामने कई समस्याएं भी आईं. वह अपने रिश्तेदार या परिचित के शादी समारोह या अन्य सामाजिक कार्यों में भाग नहीं ले पाते थे, अपने बच्चों तक को पर्याप्त समय नहीं दे पाते थे. ऐसे में उन की पत्नी सुशीला ने उन की यह जिम्मेदारी निभाई. वही घर और समाज की सभी जिम्मेदारियां पूरी करती थीं.

सरकारी विभागों में डिपार्टमेंटल सर्विस रिकौर्ड शीट में लिखी गई टिप्पणी बहुत कुछ कैरियर पर निर्भर करती है. बलजीत सिंह ने बताया कि नई दिल्ली जिले के तत्कालीन एडीशनल पुलिस कमिश्नर केशव द्विवेदी ने जैसी उन की एसीआर लिखी, वैसी कम ही मिलती है. उन्होंने लिखा था, ‘मैं ने अपनी सर्विस में ऐसा कोई कर्मचारी नहीं देखा, जिस ने छुट्टी न ली हो. मैं हैरान हूं. राणा ने 24 घंटे और 365 दिन नौकरी को दिए हैं.’

अपनी ड्यूटी के लिए समर्पित रहने वाले बलजीत सिंह राणा विभाग में एक चलतेफिरते बोलने वाले इंसानी रोबोट के रूप में प्रसिद्ध हो चुके थे. वह सन 2012 में सेवानिवृत्त हो गए.

यानी उन्होंने 7454 दिन बिना किसी छुट्टी के रोजाना सुबह 7 बजे से रात 11 बजे तक ड्यूटी की. इसे इत्तफाक ही कहा जाएगा कि जिन आईपीएस अधिकारी बी.के. गुप्ता ने उन्हें नई दिल्ली जिले के डिप्लायमेंट सेल का इंचार्ज बनाया था, उन्हीं बी.के. गुप्ता के पुलिस कमिश्नर के कार्यकाल में बलजीत राणा रिटायर हुए.

तत्कालीन पुलिस कमिश्नर बी.के. गुप्ता बलजीत राणा के काम से बहुत खुश थे. उन के रिटायरमेंट के बाद भी वह उन्हें इसी पद पर बनाए रखना चाहते थे. इसलिए वह खुद बलजीत राणा को तत्कालीन उपराज्यपाल के पास ले गए.

कमिश्नर ने उपराज्यपाल से बलजीत राणा को कंसलटेंट पद पर बने रहने की अनुमति देने की सिफारिश की तो उपराज्यपाल ने पुलिस कमिश्नर की सिफारिश पर मोहर लगाते हुए बलजीत राणा को कंसलटेंट के पद पर अस्थाई रूप से बने रहने की अनुमति दे दी. साथ ही उन की 10,570 रुपए प्रतिमाह की सैलरी भी निर्धारित कर दी. लेकिन बलजीत ने बिना सैलरी लिए काम करने की इच्छा जाहिर की.

पिछले 6 सालों से वह लगातार अपने पुराने रूटीन पर ही संसद मार्ग थाने में बिना कोई पैसे लिए ड्यूटी कर रहे हैं. 66 साल के बलजीत राणा का शरीर अभी भी बहुत फुरतीला है. अभी भी उन के अंदर पहले की तरह ऊर्जा है.

जब उन से उन के स्वस्थ रहने का राज पूछा तो उन्होंने बताया कि वह रोजाना 5-6 किलोमीटर की दौड़ पूरी कर के योगा करते हैं. इस के बाद हैवी नाश्ता करते हैं. नाश्ते में ड्राईफ्रूट्स के अलावा रोटी, दाल आदि शामिल रहती है. लंच में वह छाछ या एक किलोग्राम दही लेते हैं और शाम को केवल फ्रूट्स.

बलजीत सिंह राणा ने अपने 35-36 साल की नौकरी में दिल्ली के नौकरशाही सिस्टम को भी बदलते देखा. सन 1970 में जब वह भरती हुए तो उस समय दिल्ली में आईजी सिस्टम था. उस समय लीली सिंह बिष्ट दिल्ली के आईजी थे. कश्मीरी गेट के रिट्ज सिनेमा के पीछे पुलिस मुख्यालय था. जब कमिश्नर सिस्टम शुरू हुआ तो जे.एन. चतुर्वेदी दिल्ली के पहले पुलिस कमिश्नर बने. तब से अब तक 19 पुलिस कमिश्नरों को उन्होंने विदा होते देखा.

बलजीत भले ही अपने परिवार को समय नहीं दे पाए, लेकिन उन की पत्नी सुशीला ने अपने तीनों बच्चों की जिम्मेदारी पूरी करते हुए बच्चों को काबिल बना दिया. उन की बड़ी बेटी नीलम एक एयरलाइंस में है.

वह अपने परिवार के साथ नोएडा में रहती हैं तो वहीं छोटी बेटी आस्ट्रेलिया के मेलबोर्न में टीचर हैं. वह भी पति और बच्चों के साथ आस्ट्रेलिया में रह रही हैं. बेटा संजीव राणा चंडीगढ़ स्थित एबीएन एमरो बैंक में अधिकारी है.

अपने काम के प्रति निष्ठावान और समर्पित रहने वाले बलजीत राणा को इस उपलब्धि पर कई सम्मान भी मिल चुके हैं. सन 2001 और 2012 में उन्हें राष्ट्रपति मेडल, 2015 में दिल्ली पुलिस का एक्सीलेंस अवार्ड के अलावा कई विदेशी सम्मान भी मिल चुके हैं. रिटायर के बाद वह 2 हजार दिनों से ज्यादा काम कर चुके हैं. बलजीत राणा का कहना है कि वह अपने अंतिम समय तक दिल्ली पुलिस में फ्री में सेवा करते रहेंगे.