रेमंड शूटिंग्स के विज्ञापनों की एक खास बात जो हर किसी के जेहन में जानेअनजाने में दर्ज हो जाती है वह है रिश्तों के तानेबाने को भुनाना. रेमंड के विज्ञापनों में अपने उत्पाद की सीधी तारीफ नहीं होती, बल्कि दिखाया यह जाता है कि एक कामयाब पूर्ण पुरुष कैसा होता है. सफलता के पीछे नातेरिश्तों और उन की भावुकता के साथसाथ परिधान का संबंध एक मिनट से भी कम वक्त में दिखा कर बाजार में छा जाने और बाजार लूट ले जाने वाले रेमंड के पूर्व चेयरमैन और संस्थापक विजयपत सिंघानिया इस साल प्रमुख सुर्खियों में रहे.

वे सुर्खियों में इसलिए नहीं रहे कि उन्होंने कोई नया ब्रैंड लौंच किया था या फिर हवा में उड़ते वर्ल्ड रिकौर्ड बनाते  कोई नया कारनामा दिखाया था, बल्कि इसलिए कि जिन रिश्तेनातों की भावुकता को वे अपने विज्ञापनों में परोसा करते थे वह एक क्रूरता की शक्ल में हकीकत बन उन के सामने आ खड़ी हुई थी. इस क्रूरता को जब वे अकेले बरदाश्त नहीं कर पाए तो मीडिया के जरिए अपनी व्यथा साझा करते दिखे. 79 वर्षों की अपनी जिंदगी में वे पहली दफा इतने सार्वजनिक हुए कि रेमंड का इश्तहार और उस की ब्रैंडिंग बगैर किसी खर्च के हो गई. लेकिन जिस तरीके से हुई उस ने उद्योग जगत और समाज को हिला कर रख दिया. जिस ने भी देखासुना उस ने विजयपत सिंघानिया से हमदर्दी जताई. वे हमदर्दी के हकदार थे भी.

गुलाबी रंगत के रोबदार चेहरे पर हलकी सफेद दाढ़ी रखने वाले विजयपत की गिनती माह अगस्त तक वाकई कंपलीट मैन्स में शुमार होती थी. ऐसी उम्मीद किसी को न थी कि कल तक अरबोंखरबों की जायदाद के मालिक विजयपत सिंघानिया, जिन्हें कारोबारी दुनिया में विजयपत बाबू के नाम से ज्यादा जाना जाता है, पाईपाई की मुहताजी का अपना दुखड़ा मीडिया के जरिए रो कर हमदर्दी व इंसाफ मांगने को मजबूर होंगे.

विजयपत सिंघानिया कामयाबी का दूसरा नाम है, यह कहना अतिशयोक्ति की बात इसलिए भी नहीं होगी कि उन्होंने अपने पूर्वजों के कारोबार को आसमान की बुलंदियों तक पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. उन में समझ थी और जोखिम उठाने का माद्दा भी. लिहाजा, एक वक्त में टाटा और बिड़ला के बाद सिंघानिया का नाम तीसरे नंबर के उद्योगपतियों व रईसों में शुमार किया जाने लगा था.

80 के दशक के भारतीय पुरुष को अपने ड्रैसिंग सैंस के प्रति अगर किसी ने सजग किया था तो इस का श्रेय रेमंड को ही जाता है जिस के कंपलीट मैन के माने थे एक ऐसा भावुक पुरुष जो अपने परिवार का पूरा ध्यान रखता है, वह पत्नी और बच्चों सहित मातापिता को भी चाहता व उन का खयाल रखता है. तब हर किसी की ख्वाहिश ऐसा ही कंपलीट मैन बन जाने की हो चली थी तो बात कतई हैरत की नहीं थी. विजयपत सिंघानिया की कारोबारी समझ की इसे खूबी कहा जाएगा कि वे परिधान के जरिए भारतीय घरों में झांके और इस तरह छा गए कि एक समय ऐसा रहा कि भारतीय दूल्हों के पास कुछ और हो न हो पर उन के शरीर पर रेमंड का सूट होना एक अनिवार्यता सी हो गई थी.

व्यथा एक पिता की

विजयपत सिंघानिया की जिंदगी अब किसी हिंदी पारिवारिक फिल्म सरीखी हो गई है जिस में पिता ने बेशुमार दौलत और नाम दोनों कमाए पर जब अशक्त हो गया और मोह के चलते सबकुछ बेटे को दे दिया तो कथित कलियुगी बेटे ने उसे पाईपाई का मुहताज बनाते घर से बेघर कर डाला.

अगस्त के दूसरे हफ्ते में देशभर में उस वक्त सनाका खिंच गया जब विजयपत सिंघानिया ने मीडिया के जरिए अपने बेटे गौतम हरि सिंघानिया, जो अब रेमंड के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरैक्टर हैं, पर यह आरोप लगाया कि साल 2015 में उन्होंने रेमंड के अपने हिस्से के 1 हजार करोड़ रुपए मूल्य के शेयर उसे दे दिए थे लेकिन गौतम ने बेटे का फर्ज नहीं निभाया.

अपने वकील दिनयार मदान के जरिए विजयपत ने यह रोना भी रोया कि गौतम ने उन से कार और ड्राइवर भी छीन लिए हैं. सो, वे अब सड़क पर पैदल चल रहे हैं.

एक लंबेचौड़े लेकिन पेचीदे पारिवारिक व कारोबारी विवाद को संक्षेप में समेटते विजयपत ने अभिभावकों से एक आग्रह यह कर डाला कि अपने जीतेजी बेटे को सबकुछ मत दीजिए. जरूरी नहीं कि बेटा आप का खयाल रखे. बकौल विजयपत, लोग परिवार से प्यार करते हैं लेकिन बच्चों के प्रति एक कमजोरी पैदा कर लेते हैं और इसी कमजोरी के किसी क्षण में उन्होंने एक हजार करोड़ रुपए के शेयर बेटे के नाम कर दिए थे.

गौरतलब है कि वे इन दिनों दक्षिण मुंबई की एक सोसायटी ग्रांड पराडी के फ्लैट में किराए पर रह रहे हैं. जिस का किराया 7 लाख रुपए महीना रेमंड कंपनी दे रही थी. साल 2007 तक सिंघानिया  परिवार जेके हाउस में रहा करता था. रेमंड कंपनी ने इसे रिनोवेट कराने के नाम पर सभी से खाली कराया और लिखित अनुबंध किया कि इस में रह रहे सभी वारिसों को एकएक ड्यूप्लैक्स मकान

9 हजार रुपए प्रति वर्गफुट की दर पर दिया जाएगा. लेकिन साल 2015 आतेआते गौतम की नीयत बदल गई और वे मकान देने के अपने वादे से मुकर गए. इस की एक वजह जमीनों की कीमतों में हजार गुना तक की बढ़ोतरी हो जाना थी. यानी, रेमंड कंपनी अनुबंध की गई दरों पर ड्यूप्लैक्स देती तो उसे करोड़ों रुपयों का नुकसान होता.

इतना ही नहीं, बेटे ने उस फ्लैट का किराया तक देना बंद कर दिया जिस में रेमंड से हुए एक करार के मुताबिक वे रह रहे थे. जब पैसों की तंगी होने लगी तो लाचार और बेबस हो चले इस पिता ने मुंबई हाईकोर्ट में बेटे पर मुकदमा दायर कर दिया. इस में उन्होंने बेटे से जेके हाउस में अपना ड्यूप्लैक्स मकान भी मांगा, जिस के बाबत साल 2007 में सिंघानिया परिवार के सदस्यों के बीच एक अनुबंध हुआ था.

विजयपत सिंघानिया को मजाक में खानदानी मुकदमेबाज भी कहा जाता है तो इस की अपनी अलग वजहें और उदाहरण हैं जिन से समझ आता है कि सिंघानिया खानदान ने केवल कारोबार में ही रिकौर्ड तरक्की नहीं की, बल्कि जायदाद को ले कर मुकदमेबाजी में भी वे अव्वल हैं.

ये सब बातें अब उघड़ कर सामने आ रही हैं तो इस की एक बड़ी वजह गौतम सिंघानिया हैं जिन के बारे में विजयपत ने यह भी कहा कि जो मांबाप जीतेजी जायदाद बच्चों को देते हैं उन की हालत लगभग भिखारियों सरीखी हो जाती है. झल्लाए विजयपत ने बेटे गौतम को बदतमीज बताया तो सहज यह भी समझ आया कि लड़ाई व्यावसायिक ज्यादा है. बकौल विजयपत, बेटे को प्यार करिए, मगर आंख बंद कर के नहीं. वरना आप पाईपाई के लिए मुहताज हो सकते हैं.

उन्हीं दिनों विजयपत का एक फोटो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था जिस में वे बेहद दुबलेपतले, कमजोर और थकेहारे नजर आ रहे थे. आमतौर पर जींस पर हाफ शर्ट या टीशर्ट पहनने वाले इस भूतपूर्व खरबपति की दयनीय हालत देख उन पर हर किसी को दया आई थी. पर जब कुछ और बातें उजागर हुईं तो अक्तूबर आतेआते उन के बारे में लोगों की राय बदलने लगी. कहा यह जाने लगा कि विजयपत सिंघानिया अपनी करनी की सजा भुगत रहे हैं.

अक्तूबर में ही उन का अपनी पत्नी आशा देवी सहित एक वीडियो भी वायरल हुआ था जिस में पतिपत्नी दोनों एक गाना गा रहे हैं- ‘जाने वे कैसे लोग थे जिन के प्यार से प्यार मिला, हम ने तो बस कलियां मांगीं, काटों का ताज मिला….’ लेकिन पहले के फोटो और इस वीडियो के विजयपत में काफी फर्क था. वीडियो में उन के चेहरे की रंगत पहले जैसी दिखाई दे रही थी और उन का ड्राइंगरूम भी भव्य दिख रहा था. मुमकिन है कि यह किसी फाइवस्टार होटल का कमरा रहा हो. पर, संपन्नता विजयपत और आशा दोनों के चेहरों से टपकी रही थी.

बेटे को कोसकोस कर विजयपत मीडिया और आम जनमानस की दिलचस्पी व सुर्खी बन गए. कभी प्रचार जिस शख्स का मुहताज होता था वही अगर प्रचार का मुहताज हो चला था तो जाहिर है बात बापबेटे की जायदाद की लड़ाई भर नहीं है. सिंघानिया परिवार के गौरवशाली इतिहास की झलक के साथसाथ यह भी दिख रहा है कि पारिवारिक कलह झुग्गीझोंपडि़यों से ले कर आलीशान महलों तक में है और हिंसा व क्रूरता की हद तक है. इस

की एक झलक दिखलाते किसी खास मंशा से विजयपत ने एक टीवी इंटरव्यू में कहा था कि एक बार गौतम ने उन के भाई (बड़े भाई मधुपति सिंघानिया) की हत्या कर देने की बात तक कही थी.

पीढ़ी दर पीढ़ी तरक्की

सिंघानिया परिवार एकाएक ही इतना रईस नहीं हुआ कि मुंबई के वीआईपी इलाके मालाबार हिल्स में जेके हाउस बना डाला जो आज भी देश के शीर्ष उद्योगपति मुकेश अंबानी के घर ‘एंटीलिया’ से कहीं ऊंचा है. जेके हाउस 1960 में बना था तब यह 14-मंजिला था लेकिन बाद में इसे और ऊंचा कर के 37 मंजिला कर दिया गया.

सिंघानिया घराने के संस्थापक यानी विजयपत के दादा लाला जुग्गीलाल राजस्थान के शेखावटी इलाके के गांव सिंघाना से आ कर कानपुर में बस गए थे. तब वे कपास की गांठों का कारोबार करते थे. अपने बेटे कमलापत के साथ उन्होंने इस कारोबार को और बढ़ाया और खुद के और बेटे के नाम के पहले अक्षरों को ले कर जेके समूह की स्थापना की.

कमलापत के 3 बेटे पदमपत, कैलाशपत और रमेशपत हुए. ये तीनों भी पिता और दादा की तरह मेहनती व व्यावसायिक बुद्धि के धनी थे. 40 के दशक में इस परिवार ने व्यवसाय बढ़ाए और देखते ही देखते उन की गिनती न केवल कानपुर, बल्कि देश के शीर्ष औद्योगिक घरानों में होने लगी. जेके समूह अब टायर से ले कर टैलीविजन व कागज से ले कर सीमेंट तक बनाने लगा. पर इस की शुरुआत एक कपास मिल और बर्फ की फैक्टरी से हुई थी.

तीसरी पीढ़ी में शांतिपूर्वक यानी बगैर किसी बड़े विवाद के बंटवारे हो गए थे. कैलाशपत के 2 बेटे अजय और विजयपत हुए. बंटवारे के बाद और आजादी के 3 वर्षों पहले  कैलाशपत ने मुंबई आ कर तब के मशहूर उद्योगपति वाडिया से रेमंड कंपनी खरीदी थी. रेमंड का नाम पहले ईडी ऐंड कंपनी था जिस के 2 डायरैक्टर्स अलबर्ट और अब्राहम रेमंड के नाम पर उस का यह नाम रखा गया था. कानुपर में पैदा हुए और पलेबढ़े विजयपत बाद में मुंबई आ कर बस गए और फैब्रिक कारोबार में रम गए.

भारत में क्यों व्यावसायिक घराने इतने कम वक्त में उम्मीद से ज्यादा तरक्की कर लेते हैं, इस बात पर विदेशी अर्थशास्त्री भी हैरान होते रहते हैं और काफी शोध के बाद उन्हें जवाब यही मिलता है कि दरअसल, पीढ़ीदरपीढ़ी व्यवसाय बढ़ता है और पूरी प्रतिबद्धता से हर पीढ़ी इसे करती है.

पदमपत और रमेशपत के बेटों ने बंटवारे के बाद दिल्ली और कानुपर में अपनेअपने कारोबार संभाले और उन का नाम भी उद्योग जगत में इज्जत से लिया जाता है. यह कम हैरत की बात नहीं है कि पदमपत सिंघानिया महज 30 साल की उम्र में फिक्की जैसे प्रमुख व्यावसायिक संगठन के अध्यक्ष बन गए थे.

जेके समूह से अलग हो कर विजयपत ने अपने भागीदार, सगेभाई अजयपत के साथ रेमंड को चमकाया और साल 1980 में रेमंड की विधिवत कमान संभाली. लेकिन इसी दौरान अजयपत की मृत्यु हो गई तो उन के परिवार की देखभाल का कथित जिम्मा भी विजयपत पर आ गया.

विजयपत ने अपनी यह जिम्मेदारी ईमानदारी से निभाई होती तो तय है अजयपत की पत्नी बीना देवी और भतीजों अनंत व अक्षयपत को जायदाद को ले कर उन पर मुकदमा दायर न करना पड़ता. तब विजयपत पर भाभी और भतीजों की अनदेखी व उन का वाजिब हिस्सा न देने के आरोप लगे थे. ये मुकदमे अभी भी चल रहे हैं,

जिन में जेके हाउस के 2-मंजिला मकान का विवाद भी शामिल है. इस बाबत रेमंड का करार विजयपत और अजयपत के उत्तराधिकारियों से यह हुआ था कि कंपनी उन्हें एकएक 2-मंजिला मकान देगी.

इन सब फसादों के बाद भी विजयपत हवा में उड़ते रेमंड को भी शीर्ष पर ला पाने में कामयाब हो पाए तो इस की वजह उन की तीक्ष्ण व्यावसायिक बुद्धि और धुआंधार भावनात्मक प्रचार शैली थी. साथ ही, रेमंड की गुणवत्ता भी किसी सुबूत की मुहताज नहीं थी.

विजयपत ने कपड़ों को नई पहचान देते गरम सूट बनाने के लिए आस्ट्रेलियाई भेड़ों का ऊन लाना शुरू किया था. लेकिन यह काम खर्चीला था और इस में वक्त भी ज्यादा लगता था, इसलिए उन्होंने खास किस्म की आस्ट्रेलियाई भेड़ों को भारत में ही पालना शुरू कर दिया था जिन के ऊन से बने कपड़े वाकई नरम और गरम होते थे.

साल 1986 में विजयपत ने अपना प्रीमियम ब्रैंड पार्क ऐवन्यू लौंच किया तो उस दौर के युवाओं ने इसे हाथोंहाथ लिया और विजयपत अपने चचेरे भाइयों से ज्यादा चर्चित हो उठे. एक वक्त में रेमंड का कारोबार 12 हजार करोड़ रुपए तक जा पहुंचा था जिसे गौतम ने गिरने नहीं दिया. अपनी शैली में व्यवसाय करते गौतम ने विदेशों तक में कारोबार फैलाया जबकि विजयपत सिर्फ मांग पर और शौकिया तौर पर निर्यात करते थे. जैसा कि आमतौर पर होता है, इन बापबेटों के बीच भी व्यवसाय की शैली और तौरतरीकों को ले कर विवाद होने लगे. लेकिन विजपयत ने कभी गौतम को नए प्रयोग करने से बहुत ज्यादा रोका नहीं.

गौतम से उन का लगाव इस हद तक था कि उस के लिए उन्होंने अपने बड़े बेटे मधुपति को एक तरह से घर से निकाल दिया था. मधुपति साल 1999 में पिता के कारोबार और जायदाद से अपना हिस्सा ले कर सिंगापुर चले गए और अपने पूर्वजों की तरह व्यवसाय में वहां खुद को स्थापित कर लिया था. सिंगापुर जातेजाते मधुपति ने पिता पर पक्षपात का आरोप लगाते कहा था कि वे बड़े के बजाय छोटे बेटे को रेमंड का मुखिया बनाना चाहते हैं और भेदभाव करते हैं.

तब एक सधे बिजनैसमैन की तरह विजयपत ने मधुपति से लिखवा लिया था कि जो उस ने ले लिया, उस के अलावा वह उन की जायदाद से कुछ और नहीं मांगेगा. मधुपति ने कभी ऐसा किया भी नहीं. लेकिन उन की चारों संतानों ने दादा पर मुकदमा ठोंकते हिंदू उत्तराधिकार अधिनयम के उस प्रचलित कानून का सहारा लिया जिस के तहत मातापिता को भी यह अधिकार नहीं कि वे दादापरदादा की जायदाद छोड़ दें या फिर हिस्सा न मांगें. चूंकि ये चारों 1996 के अनुबंध के वक्त नाबालिग थे, इसलिए मधुपति का किया समझौता या करार गलत साबित करते उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया.

औद्योगिक घरानों में जायदाद के झगड़ों के ऐसे मुकदमे आम होते हैं और सालोंसाल चलते रहते हैं पर जब गौतम और विजयपत का विवाद सामने आया तो पता चला कि विजयपत अपनी पत्नी को छोड़ कर परिवार के हर सदस्य से मुकदमा लड़ रहे हैं.

उसी वक्त में यह सवाल भी तेजी से उठा कि जब विजयपत सिंघानिया खुद को पाईपाई का मुहताज बता रहे हैं तो उन के पास इतनी महंगी अदालती लड़ाइयां लड़ने के लिए पैसा कहां से बरस रहा है. इस पर विजयपत खामोश हैं. हालांकि वे गौतम से सुलह के लिए इस मामूली शर्त पर तैयार हैं कि वह अगर तिरुपति बालाजी के मंदिर में चल कर खुद के बेईमान न होने की कसम खा ले, तो वे अपना मुकदमा वापस ले लेंगे

गौरतलब है कि न केवल विजयपत और गौतम, बल्कि पूरा सिंघानिया परिवार तिरुपति बालाजी का अंधभक्त है. ये लोग सालभर में जितना टैक्स सरकार को देते होंगे, शायद उस से कहीं ज्यादा चढ़ावा इस मंदिर में चढ़ाते हैं.

बहरहाल, गौतम ने कसम वाली पेशकश पर ध्यान न देते पिता की ही भाषाशैली में जवाब दिए तो समझ आया कि कहीं न कहीं विजयपत सिंघानिया भी गलत हैं.

गौतम सिंघानिया-शौक बड़ी चीज है

सिंघानिया परिवार में शौक बड़ी चीज मानी जाती है. जहां विजयपत सिंघानिया को हवा में वर्ल्ड रिकौर्ड बनाने का शौक था वहीं उन के बेटे गौतम सिंघानिया, जिन्होंने कथित तौर पर अपने पिता को रोड पर छोड़ दिया है, कम शौकीन नहीं हैं. आजकल लोग भले ही गौतम सिंघानिया को अपने पिता के साथ ज्यादती करने वाले इंसान बतौर देखते हों लेकिन उन की जिंदगी के कुछ रोचक और अनछुए पहलू भी हैं. गौतम सिंघानिया का पूरा नाम गौतम हरि सिंघानिया है और उन का जन्म 9 सितंबर, 1965 में हुआ था. उन्होंने पारसी समुदाय की महिला नवाज मोदी से विवाह किया है जिन से उन की एक बेटी निहारिका है. गौतम रेमंड गु्रप के चेयरमैन और सीईओ तो हैं ही, साथ में कामसूत्र कंडोम भी रेमंड का ही प्रोडक्ट है, जिसे एक अन्य फर्म के साथ जौइंट वैंचर में रेमंड्स ही उत्पादित करता है.

स्वभाव से शौकीन गौतम ने मुंबई के बांद्रा में एक पौपुलर क्लब भी खोला है. पोइजन नाम के इस क्लब में डीजे अकील के साथ गौतम की पार्टनरशिप है. गौतम को महंगी और सुपरफास्ट कारों का भी तगड़ा शौक है, शायद इसलिए उन के कार्स कलैक्शन में दुनिया की सब से महंगी गाडि़यों का अंबार लगा है.

बहरहाल, अपने पिता के नक्शेकदम पर चलते गौतम के शौक उतने ही नवाबी हैं जितने उन के पिता के रहे हैं. यह अलग बात है कि अब उन के पिता को शौक पूरे करने के लिए गौतम के आगे हाथ फैलाने पड़ रहे हैं.

विजय माल्या की जगह गौतम सिंघानिया

जब तक विजय माल्या बैंकों का मोटा पैसा मार कर देश से भागे नहीं थे तब तक मोटर स्पोर्ट्स की दुनिया में उन का ही सिक्का चलता था. लेकिन अब वह जगह गौतम सिंघानिया लेंगे. गौरतलब है कि एफएमएससीआई भारत में मोटर स्पोर्ट्स की प्रशासक बौडी है और इसे भारत सरकार की मान्यता प्राप्त है. भारत सरकार से मान्यता पाने वाली यह देश की एकमात्र मोटर स्पोर्ट्स संस्था है. फैडरेशन औफ मोटर स्पोर्ट्स क्लब औफ इंडिया यानी एफएमएससीआई ने उद्योगपति और मोटर स्पोर्ट्स के शौकीन गौतम सिंघानिया को फैडरेशन इंटरनैशनल डि औटोमोबाइल यानी एफआईए की वर्ल्ड मोटर्स स्पोर्ट्स काउंसिल यानी डब्ल्यूएमएससीआई में भारत का प्रतिनिधि चुना है. खेल मंत्रालय के एतराज के बाद एफएमएससीआई ने विजय माल्या से पद छोड़ने को कहा था. उस के बाद जुलाई से यह पद खाली था. इस के चुनाव में उन के पक्ष में 7, जबकि विरोध में 1 वोट पड़ा. गौतम सिंघानिया एफएमएससीआई द्वारा डब्ल्यूएमएससीआई के लिए चुने जाने पर बेहद खुश हैं और भारतीय मोटर स्पोर्ट्स के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ देने के तमाम दावे करते हैं. हालांकि, यूरोप में फेरारी चैलेंज में भाग ले चुके गौतम सिंघानिया अपनी घरेलू रेस में ट्रैक से भटकते लग रहे हैं.

विजयपत के रिकौर्ड

  • खेलों का सर्वोच्च पुरस्कार फैडरेशन एयरोनौटिक इंटरनैशनल गोल्ड मैडल, 1994 में.
  • भारतीय वायुसेना की एयर कमोडोर की मानद उपाधि तत्कालीन राष्ट्रपति आर वेंकटरमन द्वारा दी गई.
  • भारतीय वायुसेना के वेटल एक्सेज के स्क्वाड्रन नंबर-7 के इकलौते असैनिक सदस्य.
  • दुनिया के 100 से भी ज्यादा देशों की यात्रा खुद जहाज उड़ा कर करने वाले एकमात्र भारतीय.
  • हवाई खेलों के लिए साल 2008 में भारत सरकार द्वारा पद्मभूषण से सम्मानित.
  • उन्होंने 1994 में 24 दिनों में अपने विमान से 34 हजार किलोमीटर का चक्कर लगाया था.
  • 2005 में सिंघानिया गुब्बारे में बैठ कर 70 हजार फुट या 21,336 मीटर की ऊंचाई तक जाने का नया रिकौर्ड बनाना चाहते थे. इस से पहले यह रिकौर्ड स्वीडन के पेर लिंडस्ट्रांड के नाम था जिन्होंने 19 हजार 811 मीटर की उड़ान भरने का रिकौर्ड 1988 में बनाया था. विजयपत सिंघानिया का गुब्बारा उस रिकौर्ड को तोड़ते हुए 2 घंटे में ही 21 हजार मीटर यानी 21 किलोमीटर की ऊंचाई पर पहुंच गया.

जवाब बेटे का

विवाद जब आम हुआ तो गौतम चुप रहे. लेकिन पिता के बयानों का असर जब कंपनी और कारोबार पर पड़ने लगा तो उन्हें जवाब देना जरूरी हो गया. पहले बयान में उन्होंने पिता पर ताना कसते कहा कि जो लोग झुकते नहीं है वे टूट जाते हैं और अलगथलग पड़ जाते हैं.

यह जवाब मुकम्मल नहीं था और न ही पिता के आरोपों का खंडन था, बल्कि एक तरह से उन की पुष्टि करता हुआ था, जिस में यह साफ दिख रहा था कि मांबाप दोनों आलीशान ही सही, पर किराए के मकान में रहते बुढ़ापा तनहाई में काट रहे हैं, किसी भी मांबाप के लिए बेहद मानसिक और भावनात्मक यंत्रणा देने जैसी बात है. इस से यह धारणा खंडित हुई कि केवल निम्न और मध्यवर्गीय ही मांबाप को बुढ़ापे में इस तरह अकेला छोड़ देते हैं.

साल 2015 से विजयपत और गौतम में बातचीत बंद थी. इधर जब हमालवर और आक्रामक होते पिता आरोपों के मामले में व्यक्तिगत स्तर पर आ गए तो गौतम का तिलमिलाना स्वभाविक था. यहां तक बात के कोई माने नहीं थे कि विजयपत यह कहें कि गौतम रेमंड को अपनी जागीर समझते चला रहे हैं. पर जब विजयपत ने गौतम की बदमिजाजियों और भाई की हत्या कर देने जैसी बातें बतानी शुरू कीं तो गौतम को शायद समझ आया कि एक पिता जो उंगली पकड़ कर चलना सिखाता है, वह धक्का देने का भी माद्दा रखता है तो वे थोड़ा झुके.

सुलह का इशारा करते हुए गौतम ने कहा कि वे अपने पिता से बात करने को तैयार हैं. इस पर विजयपत का अहं फिर जाग उठा और उन्होंने कथित तौर पर बात करने आए बेटे से मिलना भी मुनासिब न समझा. इस पर गौतम ने कहा कि उन के पिता को निहित स्वार्थों के लिए बहकाया जा रहा है. उन की इस हालत पर उन्हें दुख है.

बचाव की मुद्रा में आते गौतम ने रेमंड के हितों का हवाला देते कहा कि जेके हाउस में ड्यूप्लैक्स मकान वे इसलिए नहीं दे पा रहे क्योंकि ऐसा कंपनी के शेयर होल्डर्स नहीं चाहते और उन के लिए कंपनी और शेयर होल्डर्स के हित सर्वोपरि हैं.

इस के पहले अदालत इन्हें मिलबैठ कर अपना विवाद सुलझाने की सलाह दे चुकी थी. लेकिन पितापुत्र के बीच मध्यस्थता कराने के लिए कोई आगे नहीं आया. गौतम की मुश्किलें उस वक्त और बढ़ गईं जब अक्तूबर के दूसरे हफ्ते में उन के चचेरे भाईबहनों ने जेके हाउस में अपनी दावेदारी को ले कर एक और याचिका दायर कर दी. इन लोगों का आरोप यह है कि गौतम अपने करार और वादे से मुकरते हुए बेवजह जेके हाउस को आलीशान बनाने में कंपनी का पैसा जाया कर रहे हैं, यानी एक तरह से मामला टरकाते जा रहे हैं.

पेचीदे हिंदू उत्तराधिकार कानून के लिहाज से भी सिंघानिया परिवार के मुकदमे काफी दिलचस्प मोड़ पर हैं. वहीं विजयपत सिंघानिया की यह उजागर ख्वाहिश भी शायद ही कभी पूरी हो कि वे चाहते हैं कि एक बार फिर उन का परिवार एकसाथ रहे.

जिंदगीभर कारोबार में व्यस्त रहे और हवा में उड़ने का शौक पूरा करते बुढ़ापे की फुरसत की जलालत काट रहे विजयपत सिंघानिया को अब समझ आ रहा है कि इन्कंपलीट फेमिली की त्रासदी की मार बूढ़ों पर ज्यादा पड़ती है और गौतम को पूरी कंपनी सौंप देना उन की भारी भूल थी.

अब अंत जो भी हो लेकिन एक बात इस विवाद से आईने की तरह साफ हुई कि वाकई पैसों और जायदाद के मामलों में बेटों पर आंख बंद कर भरोसा नहीं करना चाहिए. यह बेटों के प्रति ज्यादती नहीं, बल्कि समझदारी वाली बात होगी कि पैसा अपने पास ही रखा जाए वरना विजयपत सिंघानिया जैसे खरबपति की हालत जब भिखारियों सरीखी हो सकती है तो आम आदमी की बिसात क्या और हैसियत क्या.

बापबेटे और संपत्ति का जानलेवा खेल

पुरानी कहावत है कि झगड़े की 3 प्रमुख वजहें होती हैं. जर, जोरू और जमीन. फिलहाल आज के दौर के ज्यादातर झगड़ों, हत्या और विवादों के पीछे जमीन यानी संपत्ति ही प्रमुख वजह रही है. फिर चाहे वह अमीरों, कौर्पोरेट घरानों का विवाद हो या मध्यम या निचले वर्ग का. संपत्ति विवाद के चलते ही अंबानी बंधुओं का अलगाव हुआ. सिंघानिया परिवार विवाद भी इसी कारण से हो रहा है. नवंबर 2012 में ही विवादास्पद शराब कारोबारी पौंटी चड्ढा और उन के भाई दक्षिण दिल्ली स्थित एक फार्महाउस में उस समय मारे गए जब संपत्ति विवाद को सुलझाने के लिए बुलाई गई बैठक में दोनों पक्षों ने एकदूसरे पर गोलीबारी की. संपत्ति को ले कर पौंटी और उन के भाई हरदीप के रिश्ते तल्ख थे. पौंटी और हरदीप के बीच संपत्ति को ले कर तकरार चली और फिर गोलियां. आज भी ऐसी घटनाएं देखनेसुनने को मिल जाती हैं जहां संपत्ति के लालच में अपने ही अपनों का या तो गला काट रहे हैं या फिर उन्हें रास्ते पर दरदर की ठोकर खाने पर मजबूर कर रहे हैं.

17 अक्तूबर, 2017 : लोग खुशियों और रोशनी के पर्व दीवाली की तैयारियों में जुटे थे. लेकिन एक दंपती के जीवन में उस के बेटों ने ही अंधेरा भर दिया. राजस्थान के अनूपगढ़ तहसील के सुंदर देवी और मनीराम को उन के बेटों व पोते ने धोखे से उन की जमीन अपने नाम करवा ली, घर पर कब्जा कर लिया व मारपीट कर घर से निकाल दिया.

27 जुलाई, 2017 :  होशियारपुर में रोबिन कुमार अपनी पत्नी व अपने पिता विजय कुमार के साथ एक ही घर में रहते थे. विजय कुमार अपनी पुरानी प्रौपर्टी को बेचना चाहता था. इसी को ले कर पितापुत्र के बीच अकसर तकरार हुआ करती थी. तकरार इस कद्र बढ़ गई कि पिता विजय कुमार ने अपनी लाइसैंसी डबल बैरल गन से अपने ही पुत्र रोबिन को गोली मार दी.

22 मई, 2017  :  देश की राजधानी दिल्ली में एक बेटे ने प्रौपर्टी के लिए अपने ही पिता और सौतेली मां को गोली मार दी. मामला आउटर दिल्ली के बाबा हरिदास नगर थाना इलाके का है.

26 सिंतबर, 2017  :  संपत्ति के विवाद में बेटे की हत्या करने के आरोप में कोर्ट ने पिता सहित 4 लोगों को उम्रकैद की सजा सुनाई है. दरअसल, 28 नवंबर, 2010 को घर के लोग विवाद को सुलझाने के लिए बैठे थे. बेटे सुंदर ने उन की बात को मानने से इनकार कर दिया था. इस के बाद पिता गैंदा ने अपने दूसरे बेटे शिव कुमार और परिवार के अन्य लोगों की मदद से सुंदर की हत्या कर दी थी. हत्या के बाद साक्ष्य मिटाने के लिए उस के शव को जला दिया था.

27 सितंबर, 2017 :  उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी के थाना क्षेत्र नीमगांव के गांव पिपरी कलां के छन्नू का जमीन के एक छोटे से टुकड़े के लिए उस का अपने पिता से विवाद हो गया. विवाद कुछ इस कदर बढ़ गया कि छन्नू ने आव देखा न ताव, घर में रखी लोहे की एक रौड से अपने पिता पर वार कर दिया. इस से ओम प्रकाश की मौके पर ही मौत हो गई.

संपत्ति विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

एक तरफ सिंघानिया परिवार में पितापुत्र के बीच संपत्ति को ले कर उठे विवाद के पेंच उलझते जा रहे हैं वहीं इसी परिवार की एक और कड़ी संयुक्त परिवार में अपनी संपत्ति का दावा करती हुई मुकदमा ठोक चुकी है. ऐसे में सितंबर माह में आया सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला गौरतलब है. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि हिंदू अविभाजित परिवार का कोई सदस्य अगर परिवार से अलग होना चाहता है और वह संपत्ति पर दावा करना चाहता है तो उसे यह साबित करना होगा कि उस ने संपत्ति को खुद से अर्जित किया है या फिर वह संपत्ति पैतृक संपत्ति है.