अपने नौकरों की तुलना में पांच फीट और चंद सेंटीमीटर के राजा सिंह चौहान छोटी कद काठी के हैं. वो हमेशा तीन चार लोगों से घिरे रहते हैं. चौहान ग्वालियर में सरकारी पैसों से एक कौशल विकास केन्द्र चलाते हैं. आज वो भगवा कुर्ते पैजामे में इस केन्द्र के बाहर घास पर रखी एक मेज पर बैठे हैं. मैंने उनसे कोई डेढ़ घंटा बातचीत की और इस दौरान लोग लगातार मिलने आते रहे. मिलने वाले सभी स्थानीय मर्द थे. कुछ लोग उनसे राम राम करने आए थे और कुछ लोग सलाह मशवरे के लिए. एक आदमी उन्हें अपने जन्मदिन की पार्टी में बुलाने आया था. हर मुलाकात से पहले चौहान का निजी सचिव आने वाले की जाति का उल्लेख कर पहचान करा रहा था. वो कहता था, “ये शर्मा जी हैं”, पंडित”, “ये अपने तोमर का लड़का है”. हर आगंतुक पहले झुक कर चौहान के पैर छूता और फिर बोलने या बैठने के लिए चौहान की आज्ञा की प्रतीक्षा करता.

राजा राजपूत जात के रसूखदार चौहान समुदाय के हैं. फिलहाल वो किसी हीरो से कम नहीं हैं. 2 अप्रैल के भारत बंद के समय राजा चौहान राष्ट्रीय समाचारपत्रों की सुर्खियों में थे. उस दिन देश भर में दलितों ने सर्वोच्च अदालत के मार्च महीने में दिए फैसले के खिलाफ आंदोलन किया था. सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार रोकथाम अधिनियम को कमजोर करने वाले अपने फैसला में इस कानून के तत्काल गिरफ्तारी वाले प्रावधान को हटा दिया था. इसके बाद बिना किसी राजनीतिक दल की अगुवाई में देश भर के दलितों ने व्यापक प्रदर्शन किया. बहुत सी जगहों पर प्रदर्शनकारी दलित पुलिस भिड़ गए और अन्य कई जगह सवर्णों के विरोध प्रदर्शनों से उनका आमना-सामना हुआ. सवर्णों की भीड़ ने आंदोलनकारियों पर पथराव किया, उन पर लाठियों से हमला किया और गोलियां चलाई. देश भर में पुलिस और सवर्णों की गोलीबारी में कम से कम 9 दलितों की मौत हो गई. उनमें से तीन मौतें अकेले ग्वालियर में हुईं और चार की मौत मध्य प्रदेश के ही भिंड में हुई.

ग्वालियर के गोली चलाने वाला वीडियो देश भर में हेडलाइन बना. वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि दो लोग प्रदर्शनकारियों पर सीधा निशाना लगा रहे हैं. एक वीडियो में राजा को भी देखा जा सकता है. बाद में पता चला कि यह वीडियो ग्वालियर के थाटीपुर इलाके का है जिसमें राजा प्रदर्शकारियों पर गोली चलाते दिखाई दे रहे हैं. उजली सफेद कमीज पहने राजा एक ऊंचे स्थान से प्रदशर्नकारियों पर गोली चलाते हैं और फिर पूरे विश्वास के साथ पिस्तौल को ठीक करते हुए प्रदर्शनकारियों की ओर बढ़ते हैं. उनके पीछे लोगों का झुंड “जय श्री राम” का नारा लगाता हुआ चल पड़ता है.

उस दिन की गोलीबारी में दीपक जाटव और राकेश टमोटिया नाम के दो दलित मारे गए. जाटव को उनके घर गल्ला कोठार में और टमोटिया को भीम नगर कॉलोनी के बाहर लेबर अड्डे में गोली मारी गई. ये दोनों जगहें थाटीपुर में हैं जहां ज्यादातर जाटवों सहित अन्य दलितों की बसावट है. दोनों मृतकों को छाती के पास गोली लगी थी. दोनों एक दूसरे से सिर्फ 500 मीटर की दूरी में मारे गए थे. दोनों ही मामलों में एफआईआर दर्ज है.

महेन्द्र सिंह चौहान को जाटव और टमोटिया की हत्या के लिए गिरफ्तार किया गया. वो तीन महीने तक जेल में रहा और दो महीने पहले जमानत में रिहा हुआ है. इन हत्यों के लिए राजपूत जाति के ऋषभ भदोरिया और ओबीसी जाति के ऋषि गुर्जर को भी महेन्द्र के साथ ही गिरफ्तार किया गया था. दोनों अभी जमानत में बाहर हैं.

राजा का वीडियो देश के तमाम टीवी चैनलों में देखा गया लेकिन पुलिस उनका संबंध हत्या से नहीं जोड़ पाई और उन पर भारतीय दंड संहिता की धारा 308 के तहत हत्या की कोशिश का आरोप लगाया गया है. उन पर एससी/एसटी अधिनियम के तहत भी मामला दर्ज है. बंद के पांच महीने तक राजा भगौड़ा थे. इस दौरान उन्होंने अंतरिम जमानत की अर्जी दायर की जिसे मध्य प्रदेश की सत्र न्यायालय और हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया. फिर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की. 29 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने ना केवल एससी/एसटी की धाराओं को उन पर से हटा दिया बल्कि सत्र न्यायालय को भी आईपीसी की धारा 308 के तहत के मामले पर जमानत की मंजूरी पर विचार करने का भी निर्देश दिया. उन्होंने 5 सितंबर को सत्र न्यायालय के सामने आत्मसमर्पण किया और उसी दिन उन्हें जमानत दे दी गई.

अक्टूबर के मध्य में ग्वालियर की यात्रा के दौरान मैंने राजा से मुलाकात की. महेंद्र मुझसे व्यक्तिगत रूप से मिलने में संकोच रहे थे, लेकिन फोन पर मुझसे बात करने के लिए राजी हो गए. दोनों पुरुषों ने मुझसे यह बात मानी की उन्होंने असल में दलित प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाई थी. राजा ने दावा किया कि उन्होंने चौहान और तोमर परिवारों की भाभियों और बहनों को बचाने के लिए प्रदर्शनकारियों पर “आत्मरक्षा” में गोलिया चलाई थी क्योंकि महिलाएं दलितों के “हिंसक” प्रदर्शन से डर गई थीं. महेंद्र ने भी कहा कि उन्होंने आत्मरक्षा में प्रदर्शनकारियों को गोली मारी थी.

राजा ने बताया कि बंद के एक दिन पहले थाटीपुर के दो शक्तिशाली जमींदार परिवार चैहानों और तोमरों ने दलितों के प्रदर्शन को असफल करने की योजना बनाई थी. सबसे अहम उनका यह दावा है कि केंद्रीय ग्रामीण विकास, पंचायती राज और खान मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने उन्हें गिरफ्तारी से बचाया और और पुलिस को उनका पीछा करने या घर पर रेड करने से रोका. मंत्री तोमर ग्वालियर से लोकसभा के सदस्य हैं और राजपूत भी हैं. राजा ने केंद्रीय मंत्री के साथ अपने परिवार के लंबे समय से चले आ रहे सहयोग की बात भी की. तोमर “अपने लोगों को बचाते हैं“, राजा ने मुझे बताया. “हां उन्होंने मदद की.”

मैंने राजा और उनके लोगों से बात की जिनमें से एक ने कहा कि वह राजा के कानूनी सलाहकार हैं. साथ ही, मैंने पुलिस अधिकारियों और ट्रायल कोर्ट के न्यायाधीश से भी बात की. इन बातचीत और जाटव और टमोटिया की हत्या की एफआईआर, पोस्ट मॉर्टम रिपोर्ट और अदालत के आदेशों और अन्य दस्तावेजों की जांच करने से पता चलाता है कि राजा की जाति ने उनके पक्ष में काम किया और अगड़ी जाति के पुरुषों की ताकत और प्रभाव ने दोनों को अपराध से बचने में मदद की.

थाटीपुर में राजा का घर और व्यवसाय चौहान प्याऊ नाम की जगह पर है. इस जमीन में कई किराए के मकान हैं और एक बड़ा सा शाॅपिंग परिसर. राजा के अनुसार 30000 वर्ग यार्ड भूमि उनके पिता भैय्या सिंह चौहान और उनके चाचाओं के नाम है. चौहान प्याऊ से 500 मीटर की दूरी पर भीम नगर स्थित है और गल्ला कोठार यहां से 500 किलोमीटर दक्षिण पश्चिम पर है.

चौहान प्याऊ के साथ की जमीन पर तोमर (राजपूत) परिवार रहते हैं. राजा ने बताया कि ये दोनों समुदाय भूमि विवाद के चलते कई बार झगड़ा कर चुके हैं. लेकिन जब दोनों ने अप्रैल में दलितों के प्रदर्शन की बात सुनी तो एक हो कर “चमारों” को भगाने की ठानी. चमार शब्द को राजा ने एक गाली की तरह प्रयोग किया. राजा ने बताया कि हम लोगों ने पहले से ही तय कर लिया था कि इस प्रदर्शन को नहीं होने देना है.” प्रदर्शन से एक रात पहले मैंने अपने पार्षद को बुलाया और एक होकर प्रतिकार करने का निर्णय किया. उन्होंने बताया कि परिवार ने उसी रात लोगों और हथियारों को इकट्ठा किया.

दूसरे दिन प्रदर्शनकारी दलितों की भारी संख्या देख कर दंग रह गए दिया. राजा ने कहा कि उन्हें एहसास नहीं था कि इतनी बड़ी संख्या में दलित प्रदर्शन करेंगे. उनका कहना है कि वीडियो में उनके एक्शन को ही दिखाया गया है. वीडियो में दिखाई पड़ता है कि वो गोलिया चलाते हैं और फिर पिस्तौल हाथों में लिए आगे बढ़ते हैं. उन्होंने स्वीकार किया कि उसके बाद भी उन्होंने कई राउंड फायर किया था. “भगवान की कृपा से वीडियो बना नहीं और आगे, मैंने आगे बहुत फायर ली है.” फिर भी राजा ने दावा किया कि उनकी गोली से कोई प्रदर्शनकारी नहीं मरा क्योंकि वो हवा में गोली चला रहे थे. उन्होंने बताया कि वो अकेले गल्ला कोठार गए और प्रदर्शनकारियों को घरों में घुसेड़ दिया.

राजा की भांति ही महेन्द्र ने भी गोली चलाने की बात स्वीकारी. उनका भी दावा था कि उन्होंने आत्मरक्षा में गाली चलाई. उन्होंने कहा कि वह सिर्फ 308 के तहत दोषी हैं ना कि दोहरी हत्या के.”

बातचीत के दौरान मुझे एहसास हुआ कि राजा दलितों के प्रति घोर पूर्वाग्रहों से भरे हैं जिसकी वजह से उन्होंने वह कृत किया था. राजा ने दावा किया कि एससी/एसटी एक्ट की वजह से अगड़ी जातियों के साथ “ज्यादति” हुई है और यह कानून एससी/एसटी के “तुष्टीकरण” के लिए बनाया गया है. उन्होंने कहा कि जो भी उन्होंने किया उस पर उन्हें गर्व है. “मैंने सही किया और ये करना ही था.” वो कहते हैं, “अगर मैंने ऐसा नहीं किया होता तो उनकी ताकत बढ़ जाती. सरकार ने उन्हें वैसे भी बहुत ताकत दे दी है और उसने उनके सामने हार मान ली है. अगर उनको रोका नहीं जाता तो शायद वे लोग इतने ताकतवर हो जाते की हम लोगों पर हमला करने लगते.” राजा यह दावा उस स्थिति में कर रहे हैं जब दलित कॉलोनी में लोगों के मरने के बावजूद भी उनके परिवार के किसी सदस्य को चोट तक नहीं आई.

राजा ने मुझ से अपने जातीय गौरव और राजपूत पुरखों के बारे में लंबी लंबी बातें की. उन्होंने दावा किया कि उनके पुरखे अंग्रेज शासन से पहले सिंधिया राजाओं के सिपासलार थे. अंग्रेज के शासन के वक्त भी सिंधियाओं का इस क्षेत्र में जबर्दस्त प्रभाव था जो आज भी बना हुआ है. ग्वालियर के अंतिम महाराजा माधवराव सिंधिया कांग्रेस पार्टी के नेता और केन्द्रीय मंत्री रहे और उनके बेटे ज्योतिरादित्य सिंधिया पिछली यूपीए सरकार में केन्द्रीय मंत्री थे. दोनों ही ग्वालियर से लोक सभा के लिए निर्वाचित हुए थे. माधवराव की बहन वसुंधरा राजे 2013 से राजस्थान की मुख्यमंत्री हैं. मध्य प्रदेश में शासन अभी भी सामंति ढांचे की जकड़ में है और समाज में इनके प्रभाव में कोई कमी नहीं आई है.

राजा ने दावा किया कि 1980 के दशक तक उनका परिवार सिंधियाओं का दाहिना हाथ था और वे लोग आज भी ग्वालियर में उतने ही रसूखदार लोग हैं. उनके लिए दलितों का विद्रोह उनके पारिवारिक जातीय शक्ति के लिए खतरा था. पुलिस ने राजा की पिस्तौल को कभी कब्जे में नहीं लिया. राजा ने मुझे गर्व के साथ बताया कि वह बंदूक अभी भी उनके पास ही है और वो “राजपूतों के सम्मान की खातिर उसे फिर चलाने को तैयार हैं.”

1997 में उत्तर प्रदेश में एक राजनीतिक विवाद के बाद बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती ने कल्याण सिंह के नेतृत्व वाली तत्कालीन बसपा-बीजेपी सरकार के खिलाफ राज्यव्यापी आंदोलन का आह्वान किया था. उत्तर प्रदेश के करीब होने की वजह से बंद की आंच ग्वालियर तक भी पहुंची. परिणाम स्वरूप बसपा के समर्थकों ने- जिनमें अधिकांश दलित थे- शहर में प्रदर्शन किया था. राजा ने दावा किया कि उनके पिता भैय्या सिंह चौहान ने 156 राउंड गोलियां आंदोलनकारियों पर चलाई थी. “मेरे पिताजी ने जो फायर किए थे उसके कारतूस आज भी रखे हैं हमारे घर में.” राजा ने कहा, “इतिहास दोहरा दिया इस वक्त हमने. पापा का काम किया.”

राजा ने बाताय कि गोली चलाने के बाद वो दो महीना अपने घर में ही छिपे रहे और अगले तीन महीने मुंबई में घूमते रहे. एक भी दारोगा उनके घर नहीं आया. “एसपी (पुलिस अधीक्षक) साहब मेरे पिता को फोन पर कहते थे कि ‘अपने बेटे को अब बुला लो, हम लोगों पर दवाब बढ़ रहा है.’ लेकिन मेरे पिता के सामने आईजी और डीआईजी- महानिरीक्षक और उप महानिरीक्षक- सब झुके हुए थे.”

क्षेत्र में परिवार के प्रभाव के अलावा राजा ने केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के साथ अपने परिवार के पुराने संबंधों को कानून से बचने की वजह बताया. उन्होंने दावा किया कि 1970 के दशक से भैय्या सिंह कैबिनेट मंत्री को जानते थे, जब कैबिनेट मंत्री जनसंघ से जुड़े थे और तोमर “थाठीपुर की सड़क में चलने वाला कोई आम आदमी” थे. राजा ने दावा किया कि एक जवान व्यक्ति के रूप में, तोमर भैय्या सिंह के आसपास रहने वाले लोगों में से एक थे. उन्होंने कहा कि ये जवान लड़के अपनी शामें पीने और चिकन खाने में बिताते थे. राजा ने कहा, “तब तोमर को देर रात अपने घर जाने की इजाजत नहीं थी, तो वह मेरे पिता के घर पर पैदल चले आते थे जहां उनको रहने की इजाजत मिल जाती थी.” राजा ने कहा कि तोमर तब कॉलेज छात्र थे और भैय्या सिंह उन्हें “मुन्ना” बुलाते थे और अक्सर उनसे कॉलेज की राजनीति की बात करते थे. राजा ने कहा कि उनको बनाने में मेरे पिता जी का हाथ रहा है. उन्होंने दावा किया कि भैय्या सिंह ने तोमर की राजनीति में पैसों से मदद की.

राजा ने कहा कि तोमर अभी भी चौहान परिवार के करीब हैं और जन्मदिन और पार्टियों में आते रहते हैं. उन्होंने कहा कि कैबिनेट मंत्री के करीब होने के बावजूद उन्होंने कभी सोशल मीडिया पर तोमर के साथ कोई तस्वीर पोस्ट नहीं की क्योंकि उनका मानना ​​था कि यह उनके लिए छोटी बात है. राजा ने कहा, “हमें पता है औकात क्या है तुम्हारी.”

विरोध प्रदर्शन का वीडियो सर्कुलेट होना शुरू होने के बाद थाटीपुर के निवासी देवाशीष जरारिया ने, जिन्होंने पहले उसी स्कूल में पढ़ाई थी जिसमें राजा ने की थी, पहले राजा की पहचान की. जरारिया के मुताबिक, चौहान का आत्मरक्षा का तर्क सही नहीं है, क्योंकि वीडियो में दोनों को प्रदर्शनकारियों पर सीधे फायरिंग करते देखा जा सकता है. जरारिया ने यह भी कहा कि पुरुष अपने घरों या महिलाओं परिवारों की रक्षा नहीं कर रहे थे, बल्कि दलितों की बस्तियों में उन्हें मारने के लिए बंदूक लेकर जा रहे थे. वीडियो में जगह का जिक्र करते हुए जरारिया ने कहा, “उनका घर कम से कम 100-200 मीटर दूर है जहां से उन्होंने पहली गोली चलाई. वो वहां क्या कर रहे थे? वो किसकी आत्मरक्षा की बात कर रहे हैं?”

क्षेत्र के दलित निवासियों का मानना ​​था कि बीजेपी सरकार ने राजा और उनके परिवार की मदद की थी, लेकिन यह सुनिश्चित नहीं था कि तोमर ने हस्तक्षेप किया था या नहीं.

चौहान और तोमर का जिक्र करते हुए, गल्ला कोठार में रहने वाले दलित राम अवतर सिंह ने कहा, “दोनों परिवारों में नगर निगम और राज्य विधानसभा में पार्षद और विधायक हैं. वो बहुत बड़ा परिवार हैं, कभी-कभी वो स्थानीय चुनावों में अपने परिवार से किसी को उतारते हैं या किसी भी ब्राह्मण या राजपूत नेता को अपना समर्थन दे देते हैं.” राजा ने मुझे बताया कि उनके परिवार ने हमेशा बीजेपी उम्मीदवार का समर्थन किया है और दावा किया है कि उनके क्षेत्र में चुनाव के लिए उतरा कोई भी विधायक या नगर परिषद उम्मीदवार उनके परिवार के समर्थन के बिना नहीं जीत सकता. राजा ने कहा, “अगर किसी को भी थाटीपुर में ब्राह्मण और ठाकुर का वोट चाहिए तो उसे गैराज में आना होता है.” गैराज का काम उनका पारिवारिक व्यापार है. उन्होंने मुझे ग्वालियर के मौजूदा विधायक माया सिंह का उदाहरण दिया, जो महिला और बाल कल्याण राज्य मंत्री हैं. फिर कहा, “हर कोई यहीं आता है.” जरारिया के मुताबिक राजा ने तोमर के साथ अपने प्रभाव और संबंध को बढ़ाचढ़ा कर बताया. जरारिया ने कहा, “तोमर इनको ठंडा कर देगा.” कांग्रेस का हिस्सा बनने के पहले इस साल के सितंबर तक जरारिया बीएसपी में थे. उन्होंने कहा, “राजा का भाई पार्षद का चुनाव लड़ रहा था और उसे हराने के लिए नरेंद्र सिंह तोमर ने ग्वालियर में दो रैलियां की और उनका भाई हार गया.” उसने मुझे बताया कि अगर तोमर ने राजा की मदद की है, तो ये “राजनीति” के कारण नहीं बल्कि “जाति” के कारण हुआ होगा. जरारिया ने कहा, “हिंसा जातीय आधिपत्य का विषय बन गई है. दलितों के दृढ़ निश्चय के साथ प्रदर्शन और उसके बाद पुलिस शिकायत से पूरे राजपूत समुदाय ने अपमानित महसूस किया.

मैंने तोमर के ऑफिस में कई बार फोन किया, लेकिन उनसे बात नहीं हो पाई. मेरे ईमेल का भी उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया. थाटीपुर में हुई हत्या के आरोपी महेंद्र ने कहा तोमर से नजदीकी की वजह से राजा बचा हुआ है. महेंद्र का कहना है कि 2 अप्रैल को सिर्फ वही प्रदर्शनकारियों पर गोली नहीं चला रहा था बल्कि चौहान प्याऊ के पास के चौहान और तोमर घरों से गोलियां बरस रहीं थीं.

मैंने गल्ला कोठार और भीम नगर, जो मुख्य रूप से दलित कॉलोनियां हैं, के कई लोगों से बात की. उनकी बातें राजा और महेंद्र के दावों के विपरीत थी. मृतक राकेश के भाई मंगल टमोटिया ने कहा कि हथियार लिए हुए राजपूतों की भीड़ उनके घर और कॉलोनी तबाह करने आ रही थी. मंगल ने कहा कि वे पुलिस के साथ आए थे. उन्होंने हमारे मोहल्ले में कई चीजों को तहस-नहस कर दिया.

वहां के निवासियों ने मुझे बताया कि दूसरे कई लोग भी उस दिन घायल हुए थे. मंगल ने बताया कि आम दिनों की तरह राकेश लबर अड्डे पर बैठा किसी ठेकेदार का इंतजार कर रहा था, लेकिन जैसे ही दंगे शुरू हुए, पुलिस और राजपूतों की भीड़ ने कॉलोनी तक उनका पीछा किया. राकेश को एक गोली लगी थी और उसकी मौके पर ही मौत हो गई.

दीपक जाटव, लेबर अड्डे से लगभग 500 मीटर की दूरी पर गल्ला कोठार में अपने परिवार के साथ रहते थे. इसी जगह पर राजा को हथियार के साथ देखा गया था. दीपक के पिता मोहन जाटव ने बताया कि वे और दीपक 2 अप्रैल को अपने घर पर बैठे थे. तभी राजा और महेंद्र बंदूक लहराते और गोलियां चलाते हुए कॉलोनी में घुसे.  उन्होंने बताया कि उनके बेटे को छाती, बाजू और पेट की साइड में गोली लगी थी. उनके घर के बाहर बंधे एक बैल को भी गोली मारी गई, जिसकी मौत हो गई. परिवार के कई दूसरे लोगों को भी चोटें आई हैं. मोहन ने कहा, ‘किसी के पैर में गोली लगी है, किसी के जांघ में गोली लगी है.’ मेरे भतीजे को गोली लगी. मेरी एक पोती है, उसको भी गोली लगी है.

राकेश के भाई मंगल ने मुझे बताया कि पोस्ट-मॉर्टम के वक्त वे मौजूद थे. उनके भाई के शरीर पर कोई बाहरी चोट नहीं लगी थी. उन्होंने कहा, ‘ये 100 प्रतिशत मालूम है. मैंने अपने भाई को उठाके देखा है.’ उन्होंने बताया कि पुलिस और सरकारी एजेंसियां बोल रही है कि उनके शरीर से कोई गोली नहीं मिली थी. पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में लिखा गया है कि गोली दायीं तरफ से उनकी कॉलरबोन में घुसी और छाती में से होते हुए दायीं बाजू में से बाहर निकल गई.

मृतकों के परिवार से मिलने के बाद मैं थाटीपुर पुलिस स्टेशन के दीवान रणवीर सिंह से मिला. पुलिस इंस्पेक्टर की अनुपस्थिति में रणवीर सिंह स्टेशन इंचार्ज हैं. सिंह ने मुझे बताया कि 2 अप्रैल के बाद तीन महीने में थाने का पूरा स्टाफ बदला गया है. इस मामले में नए जांच अधिकारी छगन सिंह बघेल को नियुक्त किया गया है. बघेल ने मुझे बताया कि जांच जारी है. उन्होंने बताया कि अगर कोर्ट के आदेश होंगे तो वे केवल राजा के हथियार जब्त करेंगे. बघेल ने कहा कि अभी हमारे पास कुछ गवाह हैं, बाकी हम ट्रायल के दौरान देखेंगे. जब मैंने पूछा कि क्या मौके से कोई गोली के कारतूस  बरामद हुए हैं और उन्हें फोरेंसिक जांच के लिए भेजा गया है तो बघेल ने कोई जवाब नहीं दिया. जब मैनें उनसे राजनीतिक दबाव के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि ऐसा कोई दबाव नहीं है. उन्होंने कहा कि पुलिस ने हाई कोर्ट के सामने राजा की जमानत की अपील की है.

मई में ग्वालियर पुलिस अधीक्षक का पद संभालने वाले नवनीत भसीन ने भी कहा कि उन पर कोई राजनीतिक दबाव नहीं है. भसीन ने कहा कि अगर कोर्ट कहेगा तो बघेल राजा के हथियार जब्त करेंगे. साथ ही उन्होंने राजा के पिता और नरेंद्र सिंह तोमर की तरफ से किसी भी प्रकार के दबाव से इनकार किया. भसीन ने कहा, ‘नाम राजा रहने से कुछ नहीं होता. कुछ भी कह सकता है, उसकी मर्जी.’

जब उनसे पूछा गया कि राजा पांच महीने तक बाहर कैसे रहा. इस पर भसीन ने राजा का बचाव करते हुए कहा कि इस मामले में कई बेगुनाह लोगों का नाम आया है. क्या यह हमारा काम नहीं है कि हम इस बात की जांच करें कि कौन दोषी है और कौन नहीं. क्या हम सबको गिरफ्तार कर लें? क्या कानून ऐसे काम करता है?

ग्वालियर रेंज के आईजी अंशुमान यादव ने राजा के दावे को लेकर कहा कि वह कुछ भी कह रहा है. हम पर कोई दबाव नहीं है. ना ही उसका परिवार मेरे संपर्क में है. जब मैंने उनसे पूछा कि राजा अब तक गिरफ्तार क्यों नहीं हुआ तो उन्होंने कहा कि वह फरार था.

पुलिस के बारे में बात करते हुए राजा ने कहा कि ‘डिपार्टमेंट से बहुत मदद मिली.’ महेंद्र सिंह ने कहा, ‘अपने साथ कोई बदसलूकी नहीं हुई है, ना ही थाने में ना ही कोर्ट में और ना ही जेल में.’ दोनों ने कहा कि उन्हें पुलिस, कोर्ट और राज्य सरकार से मदद मिली है क्योंकि उनकी नजर में हमने कुछ गलत नहीं किया.

राजा ने बताया कि न्यायिक अधिकारियों ने भी उसकी मदद की थी. उसने कहा कि उसके वकील प्रशांत शर्मा ने उससे फीस नहीं ली. जिस दिन उसे जमानत मिली, स्थानीय बार एसोसिएशन ने मिठाई बांटी थी. उसने कहा, ‘ट्रायल कोर्ट के जज बीपी शर्मा भी बुहत खुश थे.’ राजा ने कहा कि उन्होंने पुलिस को फटकार लगाते हुए कहा कि अगर वे मुझे हिरासत में रखना या रिमांड में लेना चाहते हैं तो उन्हें सुप्रीम कोर्ट जाना होगा. मैंने शर्मा से फोन पर पूछा कि क्या राजपूत होने की वजह से कोर्ट ने राजा का पक्ष लिया तो शर्मा ने कहा कि मेरा तबादला हो गया है और इस बारे में मैं कुछ नहीं बोल सकता.

दलित कार्यकर्ता सुरेश माने, जो सुप्रीम कोर्ट से संभाजी भिंडे की गिरफ्तारी की मांग कर रहे हैं, ने कहा कि तीन जजों की बेंच के लिए एससी/एसटी एक्ट के आरोप को रद्द करना सामान्य नहीं है वह भी तब जब उन्हीं आरोपों पर ट्रायल और हाई कोर्ट जमानत याचिका को खारिज कर चुके हैं. यह बिल्कुल भी सामान्य नहीं है.

भिंड, जहां एक और दलित प्रदर्शनकारी की मौत हुई थी और ग्वालियर राज्य की चंबल और ग्वालियर एडमिनिस्ट्रेटिव डिवीजन का हिस्सा है. दोनों डिविजन में एससी लोगों की तादाद काफी ज्यादा है. दोनों डिवीजन के आठ जिलों में एससी लोगों की तादाद 20-25 प्रतिशत है. मध्यप्रदेश में बाकी जगहों पर बीजेपी और कांग्रेस के बीच चुनावी मुकाबला होता है लेकिन इन आठ जिलों में मुकाबला बसपा बनाम अन्य का होता है. इससे पहले बसपा इन जगहों पर ऊंची जाति के उम्मीदवार उतारकर राजपूत और ब्राह्मणों के वोट पाती थी, लेकिन 2 अप्रैल के विरोध प्रदर्शन के बाद दलित अनिश्चिंत हैं कि वे किसे वोट करें क्योंकि बसपा ने इन सीटों पर ब्राह्मण और राजपूत उम्मीदवार उतारे हैं. समुदाय के कई लोग बसपा से इसलिए भी नाराज हैं क्योंकि पार्टी ने भारत बंद को खास समर्थन नहीं दिया था. दूसरे सभी समुदाय बीजेपी को वापस सत्ता में लाने के लिए एकजुट दिख रहे हैं. जरारिया ने कहा कि बसपा द्वारा भारत बंद पर स्टैंड नहीं लेने के काऱण उन्होंने कांग्रेस ज्वाइन की है.

जब मैं जाने के लिए उठा तो राजा ने अपने आदमी से मुझे बाइक पर छोड़ कर आने को कहा. बाइक पर सफर के दौरान पता चला कि राजा का आदमी भी दलितों के खिलाफ पूर्वाग्रहों और नफरत से भरा है. उस आदमी ने मुझे अपना नाम विजय सिंह चौहान बताया और कहा कि उसे मोनू भी बुलाया जाता है. मेरे बिना पूछने के ही उसने बताया कि सरकारी नौकरियों में दलितों के लिए आरक्षण, एससी/एसटी एक्ट से भी ‘खतरनाक’ है. “आरक्षण ने ब्राह्मणों को बर्बाद कर दिया है. पहली गोली मादर$&$& उस भीमराव (भीमराव अंबेडकर) पर चलनी चाहिए.” मोनू ने कहा कि भारत को आजादी मिलते ही पहला काम उसकी (भीमराव अंबेडकर) छाती पर गोली मारने का करना चाहिए था. “यह क्या है कि कोई चमार हमारा संविधान लिख रहा है? क्या चमार भगवान है? बहन$&$& चमार लोग.” आगे उसने कहा कि कई ठाकुर और पंडित है. “पंडितों को सबसे ज्ञानी लोग कहा जाता है. वे ठाकुरों से भी ज्यादा पढ़े-लिखे होते हैं. इसलिए हमारा संविधान लिखने वाला एक ब्राह्मण होना चाहिए था. तब हमें भी कुछ फायदा मिलता.” मोनू कहता है, “मैं होता उस जमाने में तो मैं भीमराव  की छाती में गोली मारता .”

राजा का वीडियो देश के तमाम टीवी चैनलों में देखा गया लेकिन पुलिस उनका संबंध हत्या से नहीं जोड़ पाई और उन पर भारतीय दंड संहिता की धारा 308 के तहत हत्या की कोशिश का आरोप लगाया गया है. उन पर एससी/एसटी अधिनियम के तहत भी मामला दर्ज है. बंद के पांच महीने तक राजा भगौड़ा थे. इस दौरान उन्होंने अंतरिम जमानत की अर्जी दायर की जिसे मध्य प्रदेश की सत्र न्यायालय और हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया. फिर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की. 29 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने ना केवल एससी/एसटी की धाराओं को उन पर से हटा दिया बल्कि सत्र न्यायालय को भी आईपीसी की धारा 308 के तहत के मामले पर जमानत की मंजूरी पर विचार करने का भी निर्देश दिया. उन्होंने 5 सितंबर को सत्र न्यायालय के सामने आत्मसमर्पण किया और उसी दिन उन्हें जमानत दे दी गई.

अक्टूबर के मध्य में ग्वालियर की यात्रा के दौरान मैंने राजा से मुलाकात की. महेंद्र मुझसे व्यक्तिगत रूप से मिलने में संकोच रहे थे, लेकिन फोन पर मुझसे बात करने के लिए राजी हो गए. दोनों पुरुषों ने मुझसे यह बात मानी की उन्होंने असल में दलित प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाई थी. राजा ने दावा किया कि उन्होंने चौहान और तोमर परिवारों की भाभियों और बहनों को बचाने के लिए प्रदर्शनकारियों पर “आत्मरक्षा” में गोलिया चलाई थी क्योंकि महिलाएं दलितों के “हिंसक” प्रदर्शन से डर गई थीं. महेंद्र ने भी कहा कि उन्होंने आत्मरक्षा में प्रदर्शनकारियों को गोली मारी थी.

राजा ने बताया कि बंद के एक दिन पहले थाटीपुर के दो शक्तिशाली जमींदार परिवार चैहानों और तोमरों ने दलितों के प्रदर्शन को असफल करने की योजना बनाई थी. सबसे अहम उनका यह दावा है कि केंद्रीय ग्रामीण विकास, पंचायती राज और खान मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने उन्हें गिरफ्तारी से बचाया और और पुलिस को उनका पीछा करने या घर पर रेड करने से रोका. मंत्री तोमर ग्वालियर से लोकसभा के सदस्य हैं और राजपूत भी हैं. राजा ने केंद्रीय मंत्री के साथ अपने परिवार के लंबे समय से चले आ रहे सहयोग की बात भी की. तोमर “अपने लोगों को बचाते हैं“, राजा ने मुझे बताया. “हां उन्होंने मदद की.”

मैंने राजा और उनके लोगों से बात की जिनमें से एक ने कहा कि वह राजा के कानूनी सलाहकार हैं. साथ ही, मैंने पुलिस अधिकारियों और ट्रायल कोर्ट के न्यायाधीश से भी बात की. इन बातचीत और जाटव और टमोटिया की हत्या की एफआईआर, पोस्ट मॉर्टम रिपोर्ट और अदालत के आदेशों और अन्य दस्तावेजों की जांच करने से पता चलाता है कि राजा की जाति ने उनके पक्ष में काम किया और अगड़ी जाति के पुरुषों की ताकत और प्रभाव ने दोनों को अपराध से बचने में मदद की.

थाटीपुर में राजा का घर और व्यवसाय चौहान प्याऊ नाम की जगह पर है. इस जमीन में कई किराए के मकान हैं और एक बड़ा सा शाॅपिंग परिसर. राजा के अनुसार 30000 वर्ग यार्ड भूमि उनके पिता भैय्या सिंह चौहान और उनके चाचाओं के नाम है. चौहान प्याऊ से 500 मीटर की दूरी पर भीम नगर स्थित है और गल्ला कोठार यहां से 500 किलोमीटर दक्षिण पश्चिम पर है.

चौहान प्याऊ के साथ की जमीन पर तोमर (राजपूत) परिवार रहते हैं. राजा ने बताया कि ये दोनों समुदाय भूमि विवाद के चलते कई बार झगड़ा कर चुके हैं. लेकिन जब दोनों ने अप्रैल में दलितों के प्रदर्शन की बात सुनी तो एक हो कर “चमारों” को भगाने की ठानी. चमार शब्द को राजा ने एक गाली की तरह प्रयोग किया. राजा ने बताया कि हम लोगों ने पहले से ही तय कर लिया था कि इस प्रदर्शन को नहीं होने देना है.” प्रदर्शन से एक रात पहले मैंने अपने पार्षद को बुलाया और एक होकर प्रतिकार करने का निर्णय किया. उन्होंने बताया कि परिवार ने उसी रात लोगों और हथियारों को इकट्ठा किया.

दूसरे दिन प्रदर्शनकारी दलितों की भारी संख्या देख कर दंग रह गए दिया. राजा ने कहा कि उन्हें एहसास नहीं था कि इतनी बड़ी संख्या में दलित प्रदर्शन करेंगे. उनका कहना है कि वीडियो में उनके एक्शन को ही दिखाया गया है. वीडियो में दिखाई पड़ता है कि वो गोलिया चलाते हैं और फिर पिस्तौल हाथों में लिए आगे बढ़ते हैं. उन्होंने स्वीकार किया कि उसके बाद भी उन्होंने कई राउंड फायर किया था. “भगवान की कृपा से वीडियो बना नहीं और आगे, मैंने आगे बहुत फायर ली है.” फिर भी राजा ने दावा किया कि उनकी गोली से कोई प्रदर्शनकारी नहीं मरा क्योंकि वो हवा में गोली चला रहे थे. उन्होंने बताया कि वो अकेले गल्ला कोठार गए और प्रदर्शनकारियों को घरों में घुसेड़ दिया.

राजा की भांति ही महेन्द्र ने भी गोली चलाने की बात स्वीकारी. उनका भी दावा था कि उन्होंने आत्मरक्षा में गाली चलाई. उन्होंने कहा कि वह सिर्फ 308 के तहत दोषी हैं ना कि दोहरी हत्या के.”

बातचीत के दौरान मुझे एहसास हुआ कि राजा दलितों के प्रति घोर पूर्वाग्रहों से भरे हैं जिसकी वजह से उन्होंने वह कृत किया था. राजा ने दावा किया कि एससी/एसटी एक्ट की वजह से अगड़ी जातियों के साथ “ज्यादति” हुई है और यह कानून एससी/एसटी के “तुष्टीकरण” के लिए बनाया गया है. उन्होंने कहा कि जो भी उन्होंने किया उस पर उन्हें गर्व है. “मैंने सही किया और ये करना ही था.” वो कहते हैं, “अगर मैंने ऐसा नहीं किया होता तो उनकी ताकत बढ़ जाती. सरकार ने उन्हें वैसे भी बहुत ताकत दे दी है और उसने उनके सामने हार मान ली है. अगर उनको रोका नहीं जाता तो शायद वे लोग इतने ताकतवर हो जाते की हम लोगों पर हमला करने लगते.” राजा यह दावा उस स्थिति में कर रहे हैं जब दलित कॉलोनी में लोगों के मरने के बावजूद भी उनके परिवार के किसी सदस्य को चोट तक नहीं आई.

राजा ने मुझ से अपने जातीय गौरव और राजपूत पुरखों के बारे में लंबी लंबी बातें की. उन्होंने दावा किया कि उनके पुरखे अंग्रेज शासन से पहले सिंधिया राजाओं के सिपासलार थे. अंग्रेज के शासन के वक्त भी सिंधियाओं का इस क्षेत्र में जबर्दस्त प्रभाव था जो आज भी बना हुआ है. ग्वालियर के अंतिम महाराजा माधवराव सिंधिया कांग्रेस पार्टी के नेता और केन्द्रीय मंत्री रहे और उनके बेटे ज्योतिरादित्य सिंधिया पिछली यूपीए सरकार में केन्द्रीय मंत्री थे. दोनों ही ग्वालियर से लोक सभा के लिए निर्वाचित हुए थे. माधवराव की बहन वसुंधरा राजे 2013 से राजस्थान की मुख्यमंत्री हैं. मध्य प्रदेश में शासन अभी भी सामंति ढांचे की जकड़ में है और समाज में इनके प्रभाव में कोई कमी नहीं आई है.

राजा ने दावा किया कि 1980 के दशक तक उनका परिवार सिंधियाओं का दाहिना हाथ था और वे लोग आज भी ग्वालियर में उतने ही रसूखदार लोग हैं. उनके लिए दलितों का विद्रोह उनके पारिवारिक जातीय शक्ति के लिए खतरा था. पुलिस ने राजा की पिस्तौल को कभी कब्जे में नहीं लिया. राजा ने मुझे गर्व के साथ बताया कि वह बंदूक अभी भी उनके पास ही है और वो “राजपूतों के सम्मान की खातिर उसे फिर चलाने को तैयार हैं.”

1997 में उत्तर प्रदेश में एक राजनीतिक विवाद के बाद बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती ने कल्याण सिंह के नेतृत्व वाली तत्कालीन बसपा-बीजेपी सरकार के खिलाफ राज्यव्यापी आंदोलन का आह्वान किया था. उत्तर प्रदेश के करीब होने की वजह से बंद की आंच ग्वालियर तक भी पहुंची. परिणाम स्वरूप बसपा के समर्थकों ने- जिनमें अधिकांश दलित थे- शहर में प्रदर्शन किया था. राजा ने दावा किया कि उनके पिता भैय्या सिंह चौहान ने 156 राउंड गोलियां आंदोलनकारियों पर चलाई थी. “मेरे पिताजी ने जो फायर किए थे उसके कारतूस आज भी रखे हैं हमारे घर में.” राजा ने कहा, “इतिहास दोहरा दिया इस वक्त हमने. पापा का काम किया.”

राजा ने बाताय कि गोली चलाने के बाद वो दो महीना अपने घर में ही छिपे रहे और अगले तीन महीने मुंबई में घूमते रहे. एक भी दारोगा उनके घर नहीं आया. “एसपी (पुलिस अधीक्षक) साहब मेरे पिता को फोन पर कहते थे कि ‘अपने बेटे को अब बुला लो, हम लोगों पर दवाब बढ़ रहा है.’ लेकिन मेरे पिता के सामने आईजी और डीआईजी- महानिरीक्षक और उप महानिरीक्षक- सब झुके हुए थे.”

क्षेत्र में परिवार के प्रभाव के अलावा राजा ने केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के साथ अपने परिवार के पुराने संबंधों को कानून से बचने की वजह बताया. उन्होंने दावा किया कि 1970 के दशक से भैय्या सिंह कैबिनेट मंत्री को जानते थे, जब कैबिनेट मंत्री जनसंघ से जुड़े थे और तोमर “थाठीपुर की सड़क में चलने वाला कोई आम आदमी” थे. राजा ने दावा किया कि एक जवान व्यक्ति के रूप में, तोमर भैय्या सिंह के आसपास रहने वाले लोगों में से एक थे. उन्होंने कहा कि ये जवान लड़के अपनी शामें पीने और चिकन खाने में बिताते थे. राजा ने कहा, “तब तोमर को देर रात अपने घर जाने की इजाजत नहीं थी, तो वह मेरे पिता के घर पर पैदल चले आते थे जहां उनको रहने की इजाजत मिल जाती थी.” राजा ने कहा कि तोमर तब कॉलेज छात्र थे और भैय्या सिंह उन्हें “मुन्ना” बुलाते थे और अक्सर उनसे कॉलेज की राजनीति की बात करते थे. राजा ने कहा कि उनको बनाने में मेरे पिता जी का हाथ रहा है. उन्होंने दावा किया कि भैय्या सिंह ने तोमर की राजनीति में पैसों से मदद की.

राजा ने कहा कि तोमर अभी भी चौहान परिवार के करीब हैं और जन्मदिन और पार्टियों में आते रहते हैं. उन्होंने कहा कि कैबिनेट मंत्री के करीब होने के बावजूद उन्होंने कभी सोशल मीडिया पर तोमर के साथ कोई तस्वीर पोस्ट नहीं की क्योंकि उनका मानना ​​था कि यह उनके लिए छोटी बात है. राजा ने कहा, “हमें पता है औकात क्या है तुम्हारी.”

विरोध प्रदर्शन का वीडियो सर्कुलेट होना शुरू होने के बाद थाटीपुर के निवासी देवाशीष जरारिया ने, जिन्होंने पहले उसी स्कूल में पढ़ाई थी जिसमें राजा ने की थी, पहले राजा की पहचान की. जरारिया के मुताबिक, चौहान का आत्मरक्षा का तर्क सही नहीं है, क्योंकि वीडियो में दोनों को प्रदर्शनकारियों पर सीधे फायरिंग करते देखा जा सकता है. जरारिया ने यह भी कहा कि पुरुष अपने घरों या महिलाओं परिवारों की रक्षा नहीं कर रहे थे, बल्कि दलितों की बस्तियों में उन्हें मारने के लिए बंदूक लेकर जा रहे थे. वीडियो में जगह का जिक्र करते हुए जरारिया ने कहा, “उनका घर कम से कम 100-200 मीटर दूर है जहां से उन्होंने पहली गोली चलाई. वो वहां क्या कर रहे थे? वो किसकी आत्मरक्षा की बात कर रहे हैं?”

क्षेत्र के दलित निवासियों का मानना ​​था कि बीजेपी सरकार ने राजा और उनके परिवार की मदद की थी, लेकिन यह सुनिश्चित नहीं था कि तोमर ने हस्तक्षेप किया था या नहीं.

चौहान और तोमर का जिक्र करते हुए, गल्ला कोठार में रहने वाले दलित राम अवतर सिंह ने कहा, “दोनों परिवारों में नगर निगम और राज्य विधानसभा में पार्षद और विधायक हैं. वो बहुत बड़ा परिवार हैं, कभी-कभी वो स्थानीय चुनावों में अपने परिवार से किसी को उतारते हैं या किसी भी ब्राह्मण या राजपूत नेता को अपना समर्थन दे देते हैं.” राजा ने मुझे बताया कि उनके परिवार ने हमेशा बीजेपी उम्मीदवार का समर्थन किया है और दावा किया है कि उनके क्षेत्र में चुनाव के लिए उतरा कोई भी विधायक या नगर परिषद उम्मीदवार उनके परिवार के समर्थन के बिना नहीं जीत सकता. राजा ने कहा, “अगर किसी को भी थाटीपुर में ब्राह्मण और ठाकुर का वोट चाहिए तो उसे गैराज में आना होता है.” गैराज का काम उनका पारिवारिक व्यापार है. उन्होंने मुझे ग्वालियर के मौजूदा विधायक माया सिंह का उदाहरण दिया, जो महिला और बाल कल्याण राज्य मंत्री हैं. फिर कहा, “हर कोई यहीं आता है.” जरारिया के मुताबिक राजा ने तोमर के साथ अपने प्रभाव और संबंध को बढ़ाचढ़ा कर बताया. जरारिया ने कहा, “तोमर इनको ठंडा कर देगा.” कांग्रेस का हिस्सा बनने के पहले इस साल के सितंबर तक जरारिया बीएसपी में थे. उन्होंने कहा, “राजा का भाई पार्षद का चुनाव लड़ रहा था और उसे हराने के लिए नरेंद्र सिंह तोमर ने ग्वालियर में दो रैलियां की और उनका भाई हार गया.” उसने मुझे बताया कि अगर तोमर ने राजा की मदद की है, तो ये “राजनीति” के कारण नहीं बल्कि “जाति” के कारण हुआ होगा. जरारिया ने कहा, “हिंसा जातीय आधिपत्य का विषय बन गई है. दलितों के दृढ़ निश्चय के साथ प्रदर्शन और उसके बाद पुलिस शिकायत से पूरे राजपूत समुदाय ने अपमानित महसूस किया.

मैंने तोमर के ऑफिस में कई बार फोन किया, लेकिन उनसे बात नहीं हो पाई. मेरे ईमेल का भी उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया. थाटीपुर में हुई हत्या के आरोपी महेंद्र ने कहा तोमर से नजदीकी की वजह से राजा बचा हुआ है. महेंद्र का कहना है कि 2 अप्रैल को सिर्फ वही प्रदर्शनकारियों पर गोली नहीं चला रहा था बल्कि चौहान प्याऊ के पास के चौहान और तोमर घरों से गोलियां बरस रहीं थीं.

मैंने गल्ला कोठार और भीम नगर, जो मुख्य रूप से दलित कॉलोनियां हैं, के कई लोगों से बात की. उनकी बातें राजा और महेंद्र के दावों के विपरीत थी. मृतक राकेश के भाई मंगल टमोटिया ने कहा कि हथियार लिए हुए राजपूतों की भीड़ उनके घर और कॉलोनी तबाह करने आ रही थी. मंगल ने कहा कि वे पुलिस के साथ आए थे. उन्होंने हमारे मोहल्ले में कई चीजों को तहस-नहस कर दिया.

वहां के निवासियों ने मुझे बताया कि दूसरे कई लोग भी उस दिन घायल हुए थे. मंगल ने बताया कि आम दिनों की तरह राकेश लबर अड्डे पर बैठा किसी ठेकेदार का इंतजार कर रहा था, लेकिन जैसे ही दंगे शुरू हुए, पुलिस और राजपूतों की भीड़ ने कॉलोनी तक उनका पीछा किया. राकेश को एक गोली लगी थी और उसकी मौके पर ही मौत हो गई.

दीपक जाटव, लेबर अड्डे से लगभग 500 मीटर की दूरी पर गल्ला कोठार में अपने परिवार के साथ रहते थे. इसी जगह पर राजा को हथियार के साथ देखा गया था. दीपक के पिता मोहन जाटव ने बताया कि वे और दीपक 2 अप्रैल को अपने घर पर बैठे थे. तभी राजा और महेंद्र बंदूक लहराते और गोलियां चलाते हुए कॉलोनी में घुसे.  उन्होंने बताया कि उनके बेटे को छाती, बाजू और पेट की साइड में गोली लगी थी. उनके घर के बाहर बंधे एक बैल को भी गोली मारी गई, जिसकी मौत हो गई. परिवार के कई दूसरे लोगों को भी चोटें आई हैं. मोहन ने कहा, ‘किसी के पैर में गोली लगी है, किसी के जांघ में गोली लगी है.’ मेरे भतीजे को गोली लगी. मेरी एक पोती है, उसको भी गोली लगी है.

राकेश के भाई मंगल ने मुझे बताया कि पोस्ट-मॉर्टम के वक्त वे मौजूद थे. उनके भाई के शरीर पर कोई बाहरी चोट नहीं लगी थी. उन्होंने कहा, ‘ये 100 प्रतिशत मालूम है. मैंने अपने भाई को उठाके देखा है.’ उन्होंने बताया कि पुलिस और सरकारी एजेंसियां बोल रही है कि उनके शरीर से कोई गोली नहीं मिली थी. पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में लिखा गया है कि गोली दायीं तरफ से उनकी कॉलरबोन में घुसी और छाती में से होते हुए दायीं बाजू में से बाहर निकल गई.

मृतकों के परिवार से मिलने के बाद मैं थाटीपुर पुलिस स्टेशन के दीवान रणवीर सिंह से मिला. पुलिस इंस्पेक्टर की अनुपस्थिति में रणवीर सिंह स्टेशन इंचार्ज हैं. सिंह ने मुझे बताया कि 2 अप्रैल के बाद तीन महीने में थाने का पूरा स्टाफ बदला गया है. इस मामले में नए जांच अधिकारी छगन सिंह बघेल को नियुक्त किया गया है. बघेल ने मुझे बताया कि जांच जारी है. उन्होंने बताया कि अगर कोर्ट के आदेश होंगे तो वे केवल राजा के हथियार जब्त करेंगे. बघेल ने कहा कि अभी हमारे पास कुछ गवाह हैं, बाकी हम ट्रायल के दौरान देखेंगे. जब मैंने पूछा कि क्या मौके से कोई गोली के कारतूस  बरामद हुए हैं और उन्हें फोरेंसिक जांच के लिए भेजा गया है तो बघेल ने कोई जवाब नहीं दिया. जब मैनें उनसे राजनीतिक दबाव के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि ऐसा कोई दबाव नहीं है. उन्होंने कहा कि पुलिस ने हाई कोर्ट के सामने राजा की जमानत की अपील की है.

मई में ग्वालियर पुलिस अधीक्षक का पद संभालने वाले नवनीत भसीन ने भी कहा कि उन पर कोई राजनीतिक दबाव नहीं है. भसीन ने कहा कि अगर कोर्ट कहेगा तो बघेल राजा के हथियार जब्त करेंगे. साथ ही उन्होंने राजा के पिता और नरेंद्र सिंह तोमर की तरफ से किसी भी प्रकार के दबाव से इनकार किया. भसीन ने कहा, ‘नाम राजा रहने से कुछ नहीं होता. कुछ भी कह सकता है, उसकी मर्जी.’

जब उनसे पूछा गया कि राजा पांच महीने तक बाहर कैसे रहा. इस पर भसीन ने राजा का बचाव करते हुए कहा कि इस मामले में कई बेगुनाह लोगों का नाम आया है. क्या यह हमारा काम नहीं है कि हम इस बात की जांच करें कि कौन दोषी है और कौन नहीं. क्या हम सबको गिरफ्तार कर लें? क्या कानून ऐसे काम करता है?

ग्वालियर रेंज के आईजी अंशुमान यादव ने राजा के दावे को लेकर कहा कि वह कुछ भी कह रहा है. हम पर कोई दबाव नहीं है. ना ही उसका परिवार मेरे संपर्क में है. जब मैंने उनसे पूछा कि राजा अब तक गिरफ्तार क्यों नहीं हुआ तो उन्होंने कहा कि वह फरार था.

पुलिस के बारे में बात करते हुए राजा ने कहा कि ‘डिपार्टमेंट से बहुत मदद मिली.’ महेंद्र सिंह ने कहा, ‘अपने साथ कोई बदसलूकी नहीं हुई है, ना ही थाने में ना ही कोर्ट में और ना ही जेल में.’ दोनों ने कहा कि उन्हें पुलिस, कोर्ट और राज्य सरकार से मदद मिली है क्योंकि उनकी नजर में हमने कुछ गलत नहीं किया.

राजा ने बताया कि न्यायिक अधिकारियों ने भी उसकी मदद की थी. उसने कहा कि उसके वकील प्रशांत शर्मा ने उससे फीस नहीं ली. जिस दिन उसे जमानत मिली, स्थानीय बार एसोसिएशन ने मिठाई बांटी थी. उसने कहा, ‘ट्रायल कोर्ट के जज बीपी शर्मा भी बुहत खुश थे.’ राजा ने कहा कि उन्होंने पुलिस को फटकार लगाते हुए कहा कि अगर वे मुझे हिरासत में रखना या रिमांड में लेना चाहते हैं तो उन्हें सुप्रीम कोर्ट जाना होगा. मैंने शर्मा से फोन पर पूछा कि क्या राजपूत होने की वजह से कोर्ट ने राजा का पक्ष लिया तो शर्मा ने कहा कि मेरा तबादला हो गया है और इस बारे में मैं कुछ नहीं बोल सकता.

दलित कार्यकर्ता सुरेश माने, जो सुप्रीम कोर्ट से संभाजी भिंडे की गिरफ्तारी की मांग कर रहे हैं, ने कहा कि तीन जजों की बेंच के लिए एससी/एसटी एक्ट के आरोप को रद्द करना सामान्य नहीं है वह भी तब जब उन्हीं आरोपों पर ट्रायल और हाई कोर्ट जमानत याचिका को खारिज कर चुके हैं. यह बिल्कुल भी सामान्य नहीं है.

भिंड, जहां एक और दलित प्रदर्शनकारी की मौत हुई थी और ग्वालियर राज्य की चंबल और ग्वालियर एडमिनिस्ट्रेटिव डिवीजन का हिस्सा है. दोनों डिविजन में एससी लोगों की तादाद काफी ज्यादा है. दोनों डिवीजन के आठ जिलों में एससी लोगों की तादाद 20-25 प्रतिशत है. मध्यप्रदेश में बाकी जगहों पर बीजेपी और कांग्रेस के बीच चुनावी मुकाबला होता है लेकिन इन आठ जिलों में मुकाबला बसपा बनाम अन्य का होता है. इससे पहले बसपा इन जगहों पर ऊंची जाति के उम्मीदवार उतारकर राजपूत और ब्राह्मणों के वोट पाती थी, लेकिन 2 अप्रैल के विरोध प्रदर्शन के बाद दलित अनिश्चिंत हैं कि वे किसे वोट करें क्योंकि बसपा ने इन सीटों पर ब्राह्मण और राजपूत उम्मीदवार उतारे हैं. समुदाय के कई लोग बसपा से इसलिए भी नाराज हैं क्योंकि पार्टी ने भारत बंद को खास समर्थन नहीं दिया था. दूसरे सभी समुदाय बीजेपी को वापस सत्ता में लाने के लिए एकजुट दिख रहे हैं. जरारिया ने कहा कि बसपा द्वारा भारत बंद पर स्टैंड नहीं लेने के काऱण उन्होंने कांग्रेस ज्वाइन की है.

जब मैं जाने के लिए उठा तो राजा ने अपने आदमी से मुझे बाइक पर छोड़ कर आने को कहा. बाइक पर सफर के दौरान पता चला कि राजा का आदमी भी दलितों के खिलाफ पूर्वाग्रहों और नफरत से भरा है. उस आदमी ने मुझे अपना नाम विजय सिंह चौहान बताया और कहा कि उसे मोनू भी बुलाया जाता है. मेरे बिना पूछने के ही उसने बताया कि सरकारी नौकरियों में दलितों के लिए आरक्षण, एससी/एसटी एक्ट से भी ‘खतरनाक’ है. “आरक्षण ने ब्राह्मणों को बर्बाद कर दिया है. पहली गोली मादर$&$& उस भीमराव (भीमराव अंबेडकर) पर चलनी चाहिए.” मोनू ने कहा कि भारत को आजादी मिलते ही पहला काम उसकी (भीमराव अंबेडकर) छाती पर गोली मारने का करना चाहिए था. “यह क्या है कि कोई चमार हमारा संविधान लिख रहा है? क्या चमार भगवान है? बहन$&$& चमार लोग.” आगे उसने कहा कि कई ठाकुर और पंडित है. “पंडितों को सबसे ज्ञानी लोग कहा जाता है. वे ठाकुरों से भी ज्यादा पढ़े-लिखे होते हैं. इसलिए हमारा संविधान लिखने वाला एक ब्राह्मण होना चाहिए था. तब हमें भी कुछ फायदा मिलता.” मोनू कहता है, “मैं होता उस जमाने में तो मैं भीमराव  की छाती में गोली मारता .”

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