सरिता विशेष

8 मई को नई दिल्ली में नक्सल प्रभावित 10 राज्यों के मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह के सुर पहले के मुकाबले काफी बदले हुए थे. उन की बातों में छिपा विरोधाभास साफसाफ चुगली कर रहा था कि सरकार नक्सली समस्या को सिर्फ एक निरर्थक हिंसा के रूप में देखती है जिस से निबटने के लिए वह बंदूक की कार्यवाही के नाम पर छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाके में, तैनात अर्धसैनिक बलों का आधुनिकीकरण करेगी.

राजनाथ सिंह के अनुसार, अब जवानों को बायोमीट्रिक और ट्रैकिंग सिस्टम युक्त स्मार्टगन मुहैया कराई जाएंगी, जवानों के जूतों और बुलैटप्रूफ जैकेट्स में भी बुलैटप्रूफ जीपीएस युक्त ट्रैकर लगाने की बात उन्होंने कही. इस से होगा यह कि नक्सली उन्मूलन अभियान का हिस्सा बने सैनिकों की लोकेशंस के पलपल की जानकारी सरकार को मिलती रहेगी. राजनाथ सिंह ने यह भी माना है कि आमतौर पर माओवादी संगठन सुरक्षा बलों से लूटे हथियारों का ही इस्तेमाल करते हैं.

यही तकनीक माओवादी क्यों न हथिया लेंगे, इस का जवाब शायद राजनाथ सिंह के पास न होगा. गृहमंत्री की बात विरोधाभासी और हास्यास्पद है. इस से यह स्पष्ट नहीं हुआ कि माओवादियों को सुरक्षाबलों से हथियार छीनने से रोका कैसे जाएगा.

अब होगा यह कि सुरक्षाबलों को जो स्मार्ट गनें दी जाएंगी वे भी नक्सलियों के काम आएंगी. रही बात ट्रैकर या जीपीएस ट्रैकर की, तो नक्सली इतने बेवकूफ नहीं है कि इन्हें निष्क्रिय या नष्ट करना न जानते हों.  इस से होगा सिर्फ इतना कि जवान कहां लुटे या मारे गए, यह जल्द पता चल जाएगा.  लेकिन नक्सलियों तक पहुंचना पहले की तरह ही दुष्कर काम रहेगा. माओवादियों को आम जनता का बड़ा समर्थन है और उन्हें सेना व पुलिस के पलपल की खबर रहती है.

सम्मेलन की इकलौती अहम बात राजनाथ सिंह का यह मानना था कि नक्सली हिंसा का हल गोलियां नहीं हैं.  फिर क्यों बस्तर में हथियारों और गोलियों की तादाद व सप्लाई बढ़ाई जाएगी, यह समझ से परे है.

असर सुकमा हमले का

नक्सल प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों और सुरक्षा एजेंसियों के आला अफसरों की 8 मई की मीटिंग दरअसल 24 अप्रैल के नक्सली हमले की सरकारी प्रतिक्रिया थी जिस में सीआरपीएफ के 25 जवान मारे गए थे. उक्त घटना सुकमा में घटित हुई थी. 

सुकमा जिला पूरी तरह नक्सली गिरफ्त में है. यहां के बुर्कापाल से दोकनपाल तक बन रही सड़क की सुरक्षा के लिए भारी संख्या में सैन्यबल तैनात हैं. 24 अप्रैल की दोपहर जब जवान खाना खा कर निकले ही थे, तभी नक्सलियों ने बारूदी सुरंग का जोरदार विस्फोट किया और सुस्ताते जवानों पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी.

जवानों ने संभलते हुए जवाबी हमला किया. उन के मुताबिक, नक्सलियों की संख्या लगभग 300 थी. पहले के हमलों की तरह यह हमला भी सुनियोजित था जिस में एक घायल जवान शेर मोहम्मद का कहना है कि नक्सलियों ने गांव वालों, जिन में औरतें भी थीं, को आगे किया हुआ था, जिस से जवान जवाबी गोलियां, नक्सलियों की तरह, अंधाधुंध तरीके से नहीं दाग सके. फिर भी, 20 नक्सलियों को मार गिराया गया.

सुकमा के इस नक्सली हमले की वजह भी अहम है. सरकार नैशनल हाइवे क्रमांक 30 पर छत्तीसगढ़ और तेलांगना को जोड़ने के लिए जंगलों के बीच से एक सड़क बना रही है, जिस का नक्सली संगठन विरोध कर रहे हैं. इस के पीछे उन के अपने तर्क हैं. केवल इस ही नहीं, आदिवासी इलाकों में बन रही हर सड़क के निर्माण में नक्सली यथासंभव अड़ंगा डाल रहे हैं. जिस के चलते पिछले 10 सालों से सड़कें कछुआ चाल से बन पा रही हैं और उस के लिए भी काफी संख्या में सैन्यबल तैनात हैं. 

इस हमले में भी जवानों को मारने के बाद नक्सलियों ने उन के हथियार व वायरलैस सैट सरीखा दूसरा सामान भी लूटा और हमेशा की तरह इत्मीनान से चलते बने और बेफिक्र हो गए कि अब लंबे वक्त तक सड़क बनने का काम ठप पड़ा रहेगा. क्योंकि, मानसून के वक्त वैसे ही निर्माणकार्य बंद रहते हैं.

इन जवानों को नक्सली हमले का कोई एहसास या अंदाजा नहीं था. गृहमंत्री ने खुफिया विफलता पर चिंता जताई. लेकिन इस का हल क्या है, दूसरी कई बातों की तरह उन्हें यह भी नहीं मालूम. इस इलाके के आदिवासी सरकार के बजाय नक्सलियों पर ज्यादा भरोसा करते हैं और उन्हें अपना हमदर्द व मददगार मानते हैं. ऐसा क्यों है, यह सवाल भी किसी जवाब का मुहताज नहीं कि बस्तर में तैनात जवान तरहतरह से आदिवासियों को तंग करते हैं, प्रताडि़त करते हैं और उन की औरतों की इज्जत लूटते हैं. दूसरे, खुद आदिवासी भी मानते हैं कि सड़कें बनने से उन का कोई विकास नहीं होने वाला, क्योंकि सरकार की असल मंशा उन्हें जंगलों से खदेड़ने की है.

वह उन से जल, जंगल और जमीन का हक छीन कर पूंजीपतियों व उद्योगपतियों को बेचना चाहती है. ऐसा हुआ तो वे जाएंगे कहां? ऐसे कई सवाल आदिवासियों को परेशान किए हुए हैं, जिन का जवाब सरकार कभी नहीं देती. हां, आश्वासनों की उस के खजाने में कमी नहीं.

सरकार की परेशानी

नक्सली हिंसा रोकना सरकार के वश की बात है नहीं, यह बात वे लोग भी मानने लगे हैं जो नक्सली अभियान या माओवाद को नहीं जानते. सुकमा हमले के बाद सरकार वादों, इरादों और दहाड़ने की रस्म निभाती रही तो आम लोगों ने सोशल मीडिया पर नरेंद्र मोदी और राजनाथ सिंह का खूब मजाक बनाया कि इन्होंने निंदा नाम का बम बस्तर में फेंक दिया है, जिस से नक्सली घबरा कर हथियार डाल देंगे.

उलट इस के, नक्सलियों को ले कर सरकार की अपनी मजबूरियां हैं जिन्हें 8 मई की मीटिंग में राजनाथ सिंह ने बताया भी. खुफियातंत्र कमजोर होने के अलावा उन्होंने नक्सलियों की फंडिंग का जिक्र भी किया कि इसे रोके जाने से ही बात बनेगी क्योंकि किसी भी युद्ध को लड़ने में पैसों की भूमिका अहम रहती है. बगैर पैसों के ऐसे अभियान परवान नहीं चढ़ सकते.

नक्सलियों के पास पैसा कहां से आता है दूसरी कई बातों के साथसाथ इस सवाल का ठीकठाक जवाब भी किसी के पास नहीं, सिवा इन अंदाजों और अफवाहों के कि नक्सली वसूली करते हैं और कई बहुराष्ट्रीय कंपनियां उन की आर्थिक मदद करती हैं, जो बस्तर में अपने पांव जमाना चाहती हैं. इत्तफाक से सुकमा हमले के वक्त ही जम्मूकश्मीर में भी आतंकी हिंसा का तांडव मचा रहे थे जिन के बारे में हर कोई जानता व मानता है कि उन्हें पाकिस्तान से पैसा मिलता है. लेकिन नक्सलियों को विदेशों से कोई आर्थिक सहायता मिलती है, इस बात के प्रमाण तो दूर, कोई चर्चा तक नहीं होती.

दरअसल, सरकार इस बात को हवा दे कर अपनी नाकामी व कमजोरियां ढकना चाहती है कि नक्सलियों को आतंक फैलाने के एवज में विदेशों से मदद मिलती होगी. यह वह दौर है जब दुनियाभर से कम्यूनिस्ट गायब हो रहे हैं. रूस का हाल सामने है और चीन का तो अभी तक नक्सलियों से कोई कनैक्शन होने की बात तक सामने नहीं आई है.

आतंकियों से नक्सलियों की तुलना कर रहे लोगों को भी एहसास है कि ये दोनों समस्याएं भिन्न हैं. नक्सली न तो किसी धर्म को मानते हैं और न ही कर्मकांडों में भरोसा करते हैं. वे मानते हैं कि शोषण अहिंसक तरीके से तो दूर नहीं हो सकता, इसलिए उन के पास हथियार हमेशा रहते हैं.

प्रधानमंत्री या गृहमंत्री ने सुकमा के ताजे हमले के बाद नक्सलियों से बातचीत की कोई पहल नहीं की है तो इस का मतलब साफ है कि सरकार उन्हें राष्ट्रद्रोही मानती है. सिर्फ उन्हें ही नहीं, बल्कि सरकार हर उस शख्स को नक्सली या राष्ट्रद्रोही मानती है जो आदिवासी हितों की बात करता है और उन की मदद करता है. विनायक सेन और सोनी सोरी जैसे समाजसेवी यों ही सरकारी प्रताड़ना के शिकार नहीं हुए थे जो आदिवासी अंचलों में आदिवासियों के हक की बातें कर रहे थे. हर किसी को नक्सली कह कर राष्ट्रद्रोह के आरोप में जेल में ठूंस दिया जाता है, इस बात को रायपुर जेल की डिप्टी जेलर वर्षा डोंगरे ने अपने फेसबुक अकाउंट पर विस्तार देते आदिवासियों की परेशानियां भी बयां की तो छत्तीसगढ़ सरकार ने उन्हेंबरखास्त कर दिया.

सरकार पर आदिवासी भरोसा इसलिए भी नहीं करते कि उन्हें इस बात का कहीं ज्यादा अंदाजा है कि सरकार जनता को भरोसे में ले कर ही उन पर अत्याचार करती है. सभ्य और शहरी इलाकों में यह काम दूसरे ढंग से होता है. सरकारी कागजों के आतंक का शिकार हर कोई है.

किसी स्थानीय निकाय का एक तुड़ामुड़ा नोटिस आम लोगों को रुला देने के लिए काफी होता है. अगर किसी को नगरनिगम का यह बेवजह का नोटिस मिल जाए कि आप का मकान नाजायज तरीके से बना हुआ है तो वह बेचारा झट से जेब में पैसे ठूंसठूंस कर दफ्तर की तरफ दौड़ेगा और नेताओं व अफसरों के सामने गिड़गिड़ाएगा कि हुजूर, बचाओ, मेरे साथ ज्यादती हो रही है.

आदिवासी इलाकों में तसवीर उलट है. जहां नक्सलियों के जरिए ही सही, सरकार की हर ऐसी जोरज्यादती, आदिवासी अब बरदाश्त नहीं करते, वे सीधे बंदूक तानने लगे हैं. जान कर हैरानी होती है कि नक्सलियों के डर से बस्तर में घूसखोरी न के बराबर है. वहां के सरकारी मुलाजिम अपनी जान बचाने के लिए काम करें, न  करें, पर घूस मांगने की जुर्रत नहीं कर पाते. इसीलिए वहां परिस्थितियों से बचने के लिए हर सरकारी अफसर मोटी रिश्वत अपने अफसरों व नेताओं को देने को तैयार रहता है.

यह और ऐसी कई बातें सरकार को स्वाभाविक तौर पर नागवार गुजरती हैं, इसलिए उस की नजर में नक्सली राष्ट्रद्रोही हैं, भले ही वे देश को तोड़ने की बात न करें या फिर असहिष्णुता का रोना न रोएं और न ही राष्ट्रगान या तिरंगे का अपमान करें. नक्सलवाद को सरकार ने एक सामूहिक अपराध घोषित कर रखा है.

सरकारपीडि़त नागरिक हर जगह हैं. उन की प्रतिक्रियाएं और विरोध करने के तरीके अलगअलग हैं. समाजसेवी अन्ना हजारे अनशन पर बैठ जाएं, इस से सरकार को ज्यादा परेशानी नहीं होती क्योंकि ऐसे अनशन अपार जनसमर्थन के बाद भी जल्द खत्म हो जाते हैं या दम तोड़ देते हैं. लेकिन अन्ना हजारे जैसे आंदोलनों के वक्त लोगों में वही भड़ास होती है जो नक्सलियों की रगरग में स्थायीरूप से बस गई है. उन का आंदोलन या अभियान तात्कालिक नहीं है, न ही सरकार उसे खत्म कर पा रही. रही बात नक्सलियों द्वारा लूटपाट की, छिटपुट घटनाओं की तो वे मंदिरों व सरकारी दफ्तरों की लूट के मुकाबले कहीं नहीं ठहरतीं. लूट और घूस के मामले में नक्सली सरकारी मुलाजिमों और पंडेपुजारियों की तरह प्रशिक्षित भी नहीं हैं कि इस में वेविविध ता ला पाएं.  वे सिर्फ एक जिद पर अड़े हैं कि आदिवासियों का शोषण बरदाश्त नहीं किया जाएगा, इस के लिए चाहे उन्हें कुछ भी करना पड़े. हालांकि हिंसा को भी कहीं से भी जायज नहीं ठहराया जा सकता.

नक्सलियों की मंशा

नक्सलियों की मंशा या दर्द बेहद साफ है कि जल, जंगल और जमीन पीढि़यों और सदियों से आदिवासियों के हैं, इन्हें उन से विकास की चालाकी के नाम पर छीना न जाए. नक्सलियों का यह नजरिया कि विकास और जंगलों का सीमेंटीकरण आदिवासियों से उन की मौलिकता व संस्कृति छीन लेगा, एकदम गलत भी नहीं ठहराया जा सकता. आदिवासी खुद को बड़े गर्व से देश का मूल निवासी और वास्तविक प्रकृतिप्रेमी मानते हैं तो वे गलत नहीं हैं.  वे जंगलों से बाहर इसलिए भी नहीं आना चाहते कि सभ्य समाज उन से हमेशा से जानवरों सरीखा बरताव करता रहा है.  उन का स्वाभिमान शहरी और सभ्य लोगों से कहीं ज्यादा और पुख्ता है.

रही बात नक्सली हिंसा की, तो उस से जूझने और लड़ने के बजाय पहले नक्सलियों की बात सुनी जानी चाहिए.  उन की हर बात मानी जाए, यह कतई जरूरी नहीं. लेकिन संवादहीनता हिंसा को और बढ़ावा देने वाली साबित हो रही है. ऐसे में सरकार को अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी समझते इस बाबत पहल करनी चाहिए. वहीं, इसी संविधान का हवाला अकसर नक्सली भी दिया करते हैं कि इस में वर्णित आदिवासियों के अधिकार उन्हें मिलने चाहिए. नक्सली भले ही हिंसक हों, पर बुद्धिजीवी भी हैं. वे बेहतर समझते हैं कि ईसाई और हिंदू आदिवासियों को अपनेअपने धर्मों में शमिल करने के लिए कुछ भी करगुजरने को तैयार हैं. अगर वे एक बार धर्म के फंदे में फंस गए तो जिंदगीभर उस में छटपटाते रहेंगे. फिर दुनिया की कोई ताकत उन्हें नहीं बचा पाएगी.  नक्सली हिंसा अनर्थ है तो इस का अर्थ भी समझना जरूरी है, तभी बात बन पाएगी. वरना सैनिक और नक्सली यों ही एकदूसरे को मारते रहेंगे और आदिवासी इन 2 पाटों के बीच पिसते रहेंगे. 

वर्षा पर क्यों गिरी बिजली

सरकारें नक्सलियों और आदिवासियों के हमदर्दों में कोई फर्क नहीं करतीं. उन की नजर में हर वह आदमी राष्ट्रद्रोही है जो उस की पोल खोलता है. सुकमा हमले के बाद रायपुर जेल की डिप्टी जेलर वर्षा डोंगरे को बरखास्त करने में छत्तीसगढ़ सरकार ने गजब की फुरती दिखाई, निलंबन के कायदेकानूनों को किनारे कर दिया.

वर्षा पर आरोप है कि उन्होंने फेसबुक पर सरकार के खिलाफ टिप्पणियां की जिन में गलत एवं भ्रामक तथ्यों का उल्लेख किया. चूंकि वे अनाधिकृत रूप से कर्तव्य से अनुपस्थित थीं, इसलिए भी उन्हें तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाता है. यहां तक बात ठीक थी कि राज्य सरकार ने वर्षा से 32 पृष्ठों में सवाल पूछते उन का स्पष्टीकरण मांगा था.  हैरानी की बात यह है कि जवाब की समयसीमा खत्म होने के पहले ही उन्हें नौकरी से चलता कर दिया गया. जबकि वर्षा ने अपने 376 पृष्ठीय जवाब में कहा है कि उन्होंने सीबीआई, सुप्रीम कोर्ट और सरकारी दस्तावेजों के हवाले से ही अपनी बात कही है और जवाब देने के पहले ही उन्हें नौकरी से बरखास्त कर दिया गया. जाने क्यों जेल प्रशासन ने प्राथमिक जांच अधिकारी की रिपोर्ट का इंतजार नहीं किया.

वर्षा के पहले भी कई अधिकारी सरकारी ज्यादतियों का शिकार हो चुके हैं. सरकार उन्हें ज्यादा से ज्यादा नौकरी से निकाल सकती है. पर इन से भी बड़ी गाज उन लोगों पर गिरती है जो आदिवासी अंचलों में आदिवासियों के लिए काम कर रहे हैं. राज्य सरकार क्यों वर्षा से घबराई, इस के लिए वर्षा की फेसबुक पर लिखी जो पोस्ट वायरल हुई उसे यहां प्रकाशित किया जा रहा है. इस से यह पता चलता है कि नक्सली अभियान और अभिप्राय वास्तव में है क्या और उसे क्यों बंदूक के जोर पर गलत ठहराने की नाकाम कोशिश सरकार सालों से कर रही है.

‘‘मुझे लगता है कि एक बार हम सभी को अपना गिरेबान झांकना चाहिए, सचाई खुदबखुद सामने आ जाएगी. घटना में दोनों तरफ मरने वाले अपने देशवासी हैं, भारतीय हैं. इसलिए कोई भी मरे, तकलीफ हम सब को होती है.  लेकिन पूंजीवादी व्यवस्था को आदिवासी क्षेत्रों में जबरदस्ती लागू करवाना, उन की जल, जंगल, जमीन से उन्हें बेदखल करने के लिए गांव का गांव जलवा देना, आदिवासी महिलाओं के साथ बलात्कार, आदिवासी महिलाएं नक्सली हैं या नहीं, इस का प्रमाणपत्र देने के लिए उन का स्तन निचोड़ कर दूध निकाल कर देखा जाना कैसा इंसाफ है.

‘‘टाइगर प्रोजैक्ट के नाम पर आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन से बेदखल करने की रणनीति बनती है जबकि संविधान की 5वीं अनुसूची में शामिल होने के कारण सरकार का कोई हक नहीं बनता आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन को हड़पने का… आखिर ये सबकुछ क्यों हो रहा है. नक्सलवाद खत्म करने के लिए लगता नहीं…सच तो यह है कि सारे प्राकृतिक खनिज संसाधन इन्हीं जंगलों में हैं जिन्हें उद्योगपतियों व पूंजीपतियों को बेचने के लिए खाली करवाना है.

‘‘आदिवासी जल, जंगल, जमीन खाली नहीं करेंगे क्योंकि यह उन की मातृभूमि है. वे नक्सलवाद का अंत तो चाहते हैं लेकिन जिस तरह से देश के रक्षक ही उन की बहूबेटियों की इज्जत उतार रहे हैं, उन के घर जला रहे हैं, उन्हें फर्जी केसों में चारदीवारीमें सड़ने को भेजा जा रहा है, तो आखिर वे न्यायप्राप्ति के लिए कहां जाएं. ये सब मैं नहीं कह रही, सीबीआई रिपोर्ट कहती है, सुप्रीम कोर्ट कहता है, जमीनी हकीकत कहती है.

‘‘जो भी आदिवासियों की समस्यासमाधान का प्रयत्न करने की कोशिश करते हैं चाहे वे मानव अधिकार कार्यकर्ता हों, चाहे पत्रकार, उन्हें फर्जी नक्सली केसों में जेल में ठूंस दिया जाता है. अगर आदिवासी क्षेत्रों में सबकुछ ठीक हो रहा है तो सरकार डरती क्यों है. ऐसा क्या कारण है कि वहां किसी को भी सचाई जानने के लिए जाने नहीं दिया जाता.

‘‘मैं ने स्वयं बस्तर में 14 से 16 वर्ष की मडि़या आदिवासी बच्चियों को देखा था जिन को थाने में, महिला पुलिस को बाहर कर, पूरा नंगा कर प्रताडि़त किया गया था. उन के दोनों हाथों की कलाइयों और स्तनों पर करैंट लगाया गया था जिस के निशान मैं ने स्वयं देखे. मैं भीतर तक सिहर उठी थी कि इन छोटीछोटी आदिवासी बच्चियों पर थर्ड डिगरी टौर्चर किसलिए…मैं ने डाक्टर से उचित उपचार व आवश्यक कार्यवाही के लिए कहा.

‘‘हमारे देश का संविधान और कानून कतई हक नहीं देता कि किसी के साथ अत्याचार करें… इसलिए सभी को जागना होगा. राज्य में 5वीं अनुसूची लागू होनी चाहिए. आदिवासियों का विकास आदिवासियों के हिसाब से होना चाहिए.  उन पर जबदरस्ती विकास न थोपा जाए. आदिवासी प्रकृति के संरक्षक हैं. हमें भी प्रकृति का संरक्षक बनना चाहिए, न कि संहारक. पूंजीपतियों के दलालों की दोगली नीति को समझें… किसानजवान सब भाईभाई हैं. सो, एकदूसरे को मार कर न ही शांति स्थापित होगी और न ही विकास होगा. संविधान में न्याय सब के लिए है…इसलिए न्याय सब के साथ हो.

‘‘हम भी इसी सिस्टम के शिकार हुए…लेकिन अन्याय के खिलाफ जंग लड़े, षड्यंत्र रच कर तोड़ने की कोशिश की गई, प्रलोभनरिश्वत का औफर भी दिया गया. लेकिन

हम ने इन के सारे इरादे नाकाम कर दिए और सत्य की विजय हुई…आगे भी होगी. न हम अन्याय करेंगे और न सहेंगे.’’

नक्सली आंदोलन 1967 से 2017 तक

नक्सलवाद की उम्र 50 साल हो रही है पर इस पर काबू पाने में सरकारें नाकाम रही हैं. इस की वजहें हैं जिन का सीधा संबंध एकतरफा विकास से है. आजादी के बाद आम लोगों और किसानों को उम्मीद बंधी थी कि अब गांवगांव तक सड़क, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं और बिजली होगी लेकिन जब ऐसा नहीं हुआ तो यह वर्ग मानने लगा कि पैसे वाले देखते ही देखते पैसे वाले होते जा रहे हैं और गरीब और गरीब होता जा रहा है. 

पर तब ऐसा सोचने वाले असंगठित थे. साल 1967 में  बंगाल के एक गांव नक्सलवाड़ी से इस एकतरफा विकास के खिलाफ पहली सशक्त क्रांति हुई थी. इसलिए इस क्रांति का नाम नक्सलवाद पड़ गया. नक्सलवाद के जनक थे भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के चारू मजूमदार और कानू सान्याल, जिन की मुलाकात इत्तफाक से जेल में हुई थी.  उन दोनों का मानना था कि किसानों और मजदूरों की दुर्दशा के लिए सरकारी नीतियां और लोकतांत्रिक व्यवस्था जिम्मेदार है.

सशस्त्र हिंसा फैली तो देखते ही देखते शोषित और वंचित लोग नक्सलवाद को लाल सलाम ठोंकने लगे. 50 सालों में नक्सली आंदोलन काफी बदला भी है. आज घोषित तौर पर उन का कोई नेता नहीं है और वे खुद कई दलम (दलों) में बंट गए हैं पर उन का मकसद आज भी ज्यों का त्यों है. कुछ वैचारिक मतभेदों के चलते चारू मजूमदार और कानू सान्याल अलग हो गए थे. चारू मजूमदार की मौत 1972 में ही हो गई थी जबकि कानू सान्याल ने साल 2010 में फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली थी.

उम्मीद से कम वक्त में नक्सलवाद पश्चिम बंगाल से होता आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार, झारखंड और ओडिशा में फैला. आज हालत यह है कि आंशिक और पूरी तरह से नक्सलप्रभावित राज्यों की संख्या 10 और जिलों की संख्या 190 है.फर्क इतना है कि कहीं नक्सली गतिविधियां न के बराबर हैं तो कहीं उम्मीद से ज्यादा हैं. 

आज के नक्सली किसी राजनीतिक विचारधारा से प्रेरित नहीं रह गए हैं और न ही पहले की तरह लोकतंत्र को कोसते हैं.  इस की एक बड़ी मिसाल आदिवासी क्षेत्रों में भाजपा को मिलती सफलता है जो 20 साल पहले आदिवासी वोटों के लिए तरस जाती थी. कम्यूनिस्ट विचारधारा के होते हुए भी नक्सली आमतौर पर धार्मिक संगठनों को तंग नहीं करते.

अब नक्सलियों का असल मकसद उन सरकारी योजनाओं में अड़ंगा डालना है जो उन्हें जंगलों को खत्म करती लगती हैं. सड़कें बनेंगी तो आदिवासी जंगलों से बेदखल हो जाएंगे और जंगलों पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों का कब्जा हो जाएगा.  नक्सली अब इसी आशंका में सोते और जागते हैं और जब भी मौका मिलता है, हिंसा को अंजाम दे देते हैं. सरकार ने नक्सलप्रभावित इलाकों को छावनी सा बना दिया है जिस से नक्सलियों को खास चिढ़ है.

उधर, आदिवासी भी सैन्यबलों से परेशान हैं. इसलिए वे नक्सलियों का साथ देते हैं. हर तरह की सूचना नक्सलियों के पास कैसे पहुंच जाती है, यह किसी को नहीं पता और न ही यह कि आम आदिवासी कैसे नक्सलियों को फंडिंग करता है. उलट इस के, सरकार या किसी और को तो रत्तीभर भी नहीं मालूम कि नक्सली किस जगह से अपनी मुहिम को अंजाम देते हैं, अब उन का नेता कौन है और आगे वे क्या करेंगे.

नक्सली हिंसा के अर्थों और अनर्थ से दूर सिरदर्द की बात सरकार के लिए यह है कि वह भले ही लोकतंत्र व समानता का राग अलापती हो, लेकिन अभी तक वह आदिवासियों का भरेसा नहीं जीत पाई है. यह बात बस्तर सहित दूसरे नक्सलप्रभावित राज्यों में साफसाफ दिखती भी है कि अभी तक आदिवासी अंचलों का अपेक्षित विकास नहीं हुआ है. नक्सली इस बात के लिए सरकार को ही जिम्मेदार मानते हैं.

हिंसा की छोटीबड़ी वारदातें होती रहेंगी, नक्सली दहशत कायम रहेगी, बेगुनाह आदिवासी मारे जाते रहेंगे और उन के साथ में जवान भी. लेकिन सरकार कुछ नहीं कर पाएगी. ऐसे में हल क्या है और कैसे होगा, यह कोई नहीं सोचता. सरकार भी हिंसा का जवाब हिंसा से दे कर नक्सलियों को उकसाती ही लगती है.  अब थोक में बेरोजगार आदिवासी युवा और औरतें नक्सली संगठनों में शामिल हो रहे हैं क्योंकि सरकार उन्हें शिक्षा व रोजगार नहीं दे पा रही.