सरिता विशेष
 
किन्नर और मानवाधिकारवादी सुप्रीम कोर्ट द्वारा मिली किन्नरों को तीसरे लैंगिक समूह की मान्यता पर फूले नहीं समा रहे हैं. वे इस मुगालते में हैं कि इस अदालती फरमान से किन्नरों से भेदभाव बंद हो जाएगा और इन की सामाजिक व आर्थिक स्थितियों में क्रांतिकारी परिवर्तन आएंगे. विभिन्न जाति, वर्ग और धड़ों में बंटे भारतीय समाज में क्या इन्हें स्वीकृति मिलेगी, इस पर संशय व्यक्त कर रहे हैं जगदीश पंवार.
 
सुप्रीम कोर्ट के किन्नरों को तीसरे  लैंगिक समूह की मान्यता दे कर उन्हें मूलभूत अधिकार व सुविधाएं देने के आदेश की खूब वाहवाही हो रही है. कोर्ट ने नया कुछ नहीं किया है. भारतीय संविधान में बराबरी के हक की बात दोहराते हुए सरकारों को निर्देशभर दिया है. कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों से कहा है कि समाज की मुख्यधारा में लाने के लिए इस उपेक्षित समूह को पिछड़ा वर्ग मान कर उस की भलाईर् के लिए विशेष सुविधाएं दिलाई जाएं. इस आदेश से किन्नर और मानवाधिकारवादी खुश हैं.
भारत के किन्नरों के कल्याण के लिए यह आदेश एक बड़ा कदम माना जा रहा है. इस फैसले को सामाजिक रूढि़यों को तोड़ने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है. इसे एक शुरुआत बताया जा रहा है पर सवाल उठता है कि पहले से ही विभिन्न वर्गों, समूहों में बंटे हमारे समाज में कोर्ट की स्वीकृति के बाद भी क्या इस वर्ग को समाज में बराबरी की स्वीकृति मिल पाएगी? कानून समानता का हक दिला पाएगा?
दरअसल, किन्नरों के कल्याण के लिए काम करने वाली संस्था नैशनल लीगल सर्विस, माता नसीब कौर जी वूमैन सोसायटी और किन्नर लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी ने सुप्रीम कोर्ट में किन्नरों की पहचान के साथ उन्हें कानूनी दरजा देने की मांग संबंधी याचिका दाखिल की थी. इसे स्वीकार करते हुए उच्चतम न्यायालय के जस्टिस के एस राधाकृष्णन व ए के सीकरी की पीठ ने 15 अप्रैल को इस समुदाय को बराबरी के अधिकार को जायज बताते हुए उन्हें वे तमाम हक और सुविधाएं मुहैया कराने को कहा जो एक आम नागरिक को प्राप्त हैं. 
कोर्ट ने निर्देश दिए कि किन्नरों की सामाजिक और लिंगानुगत समस्याओं का निराकरण करें. उन्हें चिकित्सा व अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराएं. महिला, पुरुष की तरह इन के लिए अलग टौयलेट बनाए जाएं. शिक्षण संस्थानों में प्रवेश और नौकरियोें में आरक्षण दिया जाए.
कानूनी विभाजन
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान में सभी को बराबरी का दरजा दिया गया है और लिंग के आधार पर भेदभाव की मनाही की गई है. यह मौलिक अधिकार का हनन है. किन्नरों को बराबरी का हक देने के लिए संविधान या कानूनों में किसी तरह के फेरबदल की जरूरत नहीं है क्योंकि भारतीय संविधान में ही सभी नागरिकों के लिए समान अधिकारों का प्रावधान है.  हर किसी को वह सारे अधिकार मिलने चाहिए जो संविधान में बताए गए हैं. संविधान में बराबरी का हक देने वाले अनुच्छेद 14,15,16 और 21 का लिंग से कोई संबंध नहीं है इसलिए यह सिर्फ स्त्रीपुरुष तक सीमित नहीं है. इस में किन्नर भी शामिल हैं.
कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी का लिंग उस की आंतरिक भावना से तय होता है कि वह पुरुष महसूस करता है या स्त्री या फिर तीसरे लिंग में आता है. किन्नर को न तो स्त्री माना जा सकता, न पुरुष. वे तीसरे लिंग में आते हैं. किन्नर एक विशेष सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक समूह है इसलिए इन्हें स्त्रीपुरुष से अलग तीसरा लिंग माना जाना चाहिए.
दुनियाभर में मानवाधिकार संगठनों द्वारा किए जा रहे बराबरी के अधिकारों की मांग के सिलसिले में कुछ अन्य देशों में भी किन्नरों को कानून में समानता का हक दिया गया है पर दुनियाभर में उन की सामाजिक स्थिति कमोबेश एक जैसी ही है. किन्नर सदियों से समाज का ही अंग माने गए हैं लेकिन भेदभाव के शिकार रहे, हमेशा हाशिए पर रहे. उन को समाज की मुख्यधारा से दूर रखा  गया. 
 तीसरे लिंग के रूप में मान्यता दिए जाने के बाद उन के सामाजिक और शैक्षणिक विकास के लिए उन्हें वे सभी सुविधाएं देनी होंगी जो स्त्रियों को अलग से दी जा रही हैं. उन्हें अलग टौयलेट, अलग मैट्रो कंपार्टमैंट, अलग बर्थ, बसों में अलग सीटें, नौकरियों में आरक्षण देने को क्या समाज स्वीकार कर पाएगा? शिक्षा, नौकरी के लिए पहले से ही भेदभाव चला आ रहा है. जाति, धर्म, वर्ग के बीच मारामारी मची हुई है. 
किन्नरों का इतिहास पुराना है. जब से सृष्टि बनी है, स्त्री और पुरुष के अलावा एक ऐसा प्राणी भी पैदा होता रहा है जिस का न स्त्री जननांग होता है, न पुरुष अंग. ऐसे जन को किन्नर या हिजड़ा कहते हैं. पुराणों में भी इन का जिक्र है. महाभारत में पांडवों के सहयोगी शिखंडी का जिक्र है. ब्रहन्नला की भी कहानी है, जिस में अर्जुन को नपुंसक बना दिया जाता है. 
किन्नर पहले सेनाओं में भी होते थे. इतिहास में जिक्र है कि राजा लोग उन्हें अपने हरमों में भी कामकाज के लिए रखते थे. ऐसा इसलिए कि वे उन की रानियों के साथ यौन संबंध न बना सकें.
असल में किन्नर ऐसा इंसान होता है जो लैंगिक विकृति के कारण न नर होता है न मादा. जन्मजात किन्नरों की संख्या बहुत कम है. अधिकतर बाद में बनने वाले हैं. इन के अपने देवीदेवता, मंदिर हैं. जानकारों का कहना है कि  नए बनने वाले किन्नरों का यह समुदाय दीक्षासंस्कार करता है जिस के तहत उस का लिंग, अंडकोश और अंडकोश की थैली हटा दी जाती है. समाज में किन्नरों के प्रति दोहरा रवैया अपनाया गया है. एक तरफ लोग खुशी के मौकों पर इन की मौजूदगी को शुभ मानते हैं, दूसरी ओर ये सामान्य इंसान की तरह रोजगार, शिक्षा हासिल नहीं कर सकते. शिक्षा, रोजगार उन को कोई नहीं देना चाहता. अब समाज में समुचित जगह न मिलने की वजह से किन्नरों को नाचगा कर, भीख मांग कर या वेश्यावृत्ति के जरिए अपना गुजारा चलाना पड़ता है. 1994 में उन्हें यह अधिकार दिया गया था कि वे खुद को स्त्री या पुरुष में से कोई एक विकल्प के रूप में अपनी पहचान कर सकते हैं. पासपोर्ट, ड्राइविंग लाइसैंस जैसे दस्तावेजों में वे अब तक स्त्री या पुरुष के रूप में अपनी पहचान जाहिर करते आए हैं. 2005 में भारतीय पासपोर्ट आवेदन फौर्म में स्त्रीपुरुष के अलावा तीसरा विकल्प दिया गया. 
 कोर्ट का हालिया आदेश समाज का एक और कानूनी विभाजन है. यह वैमनस्य को बढ़ाने वाला होगा. पिछले दिनों केंद्र और उस से पहले कुछ राज्यों में जाट समुदाय को पिछड़ा वर्र्ग में शामिल करने के फैसले से दूसरी पिछड़ी जातियों में वैमनस्य बढ़ा. 
दरअसल, हमारे कानून ने समाज में विभिन्न विभाजन रेखाएं बना रखी हैं. इस में समाज को  एकाकार नहीं किया गया. बात समानता की लिखी हुई जरूर है पर बंटवारा किया गया है. अनेकता में एकता बिलकुल नहीं है. यह अनेकता बनाई गई है. प्रकृति के भेदभाव को छोड़ दें तो स्वयं हम ने समाज को बांटा है. ऊंचनीच, छोटाबड़ा, स्त्रीपुरुष और अब स्त्रीपुरुष से अलग एक तीसरा लिंग.
धर्म ने किया विभाजन 
समाज का विभाजन धर्म के स्वार्थी लोगों ने किया. स्त्रीपुरुष के बीच भेदभाव सदियों से चला आ रहा है. अलग स्कूल, अलगअलग कालेज, ट्रेनों, बसों में अलग सीटें, अलग डब्बे, अलग टौयलेट, हर कामों के लिए अलग लाइनें. ये विभाजन क्यों? विभाजन की वजह से ही भेदभाव हो रहा है.
क्या दलितों के आरक्षण के साथ जातीय भेदभाव खत्म हो गया? दलितों को शिक्षा और नौकरी में आरक्षण के पीछे संविधान का मूल उद्देश्य इस वर्ग की सामाजिक, आर्थिक तरक्की के साथसाथ जाति व्यवस्था को खत्म करना था. मगर जाति व्यवस्था 60 साल बाद भी पूरे दमखम के साथ जिंदा है. 
अब होगा यह कि किन्नर को कानूनन एक अलग जाति, मजहब की तरह अलग वर्ग के रूप में मान्यता मिल गई है. समाज पहले से ही स्त्री को ले कर भेदभाव से ग्रस्त है. महिलाएं बराबरी के लिए संघर्ष कर रही हैं. उन्हें समानता का अधिकार देने के लिए कई  कानून बनाए गए लेकिन तमाम प्रयासों के बावजूद स्त्री के साथ भेदभाव कम नहीं हो पा रहा.
स्त्रीपुरुष दोनों एक ही हैं. एकदूसरे के पूरक हैं. इन्हें प्रकृति ने एकदूसरे के लिए पैदा किया. किन्नर भी अलग नहीं हैं लेकिन धर्र्म ने स्त्रीपुरुष के बीच भेद उत्पन्न किया. स्त्री को निकृष्ट तो पुरुष को उस से श्रेष्ठ बताने की कोशिशें कीं. फिर कानूनों व सरकारों ने इन्हें अलग किया. बसों, गाडि़यों में इन के लिए अलग डब्बे, अलग सीटें, पढ़नेलिखने के लिए अलग स्कूल, अलग टौयलेट बनाए गए.
इस विभाजन को समाज ने मान्यता दी पर क्या आम घरों में महिलाओं के लिए अलग कमरे, अलग किचन, अलग टौयलेट हैं? घर, परिवार में स्त्रीपुरुष, लड़केलड़कियां एकसाथ रह सकते हैं. एक बाथरूम, एक टौयलेट शेयर कर सकते हैं तो बाहर अलगअलग क्यों? जब प्रकृति ने उन्हें एकसाथ रहने के लिए बनाया है तो सामाजिक, कानूनी स्तर पर विभाजन क्यों?
हमारी प्रवृत्ति भेदभाव की नहीं है. यह जन्मजात नहीं है. बचपन से हमारी सोच में इसे घोला गया है और यह काम धर्म की खाने वालों ने कराया है. धर्म का इतिहास देखें तो इस की फितरत ही एकदूसरे के बीच असमानता की खाई पैदा करने की रही है.
किन्नरों की सामाजिक, आर्थिक दशा सुधरे, इस पर किसी को आपत्ति नहीं होगी पर विभाजन कई परेशानियां उत्पन्न करेगा. यह भेदभाव धर्मजनित है. धर्म ने स्त्रीपुरुष के बीच विभाजन खड़ा किया. पुरुष को स्त्री से श्रेष्ठ साबित करने के लिए अनेक उपदेश गढे़ गए. समाज के दिमाग में गहरे तक भेदभाव की सोच को बैठाया गया. इसी तरह किन्नरों को अलगथलग रखा गया. समाज जानवरों को एकसमान मानता है पर इंसानों को एक नहीं मानता.  
किन्नर को खुद को स्त्री या पुरुष मानने की आजादी होनी चाहिए. जैसा कि न्यायालय ने स्वयं कहा है कि उसे यह एहसास अंदर से होता है कि वह स्त्री है या पुरुष. फिर तीसरा विभाजन कैसे? क्या अदालत के आदेश में विरोधाभास नहीं है?
इस से पहले अदालत ने समलैंगिकों की शादी और यौन संबंधों को गैरकानूनी करार दिया था. इस तरह के कानून और आदेश व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन करने वाले हैं. ये आजादी पर बंदिश लगाते हैं. हरेक को यह अधिकार होना चाहिए कि वह शादी करे या न करे. जब किसी को शादी न करने का हक है तो उसे यह स्वतंत्रता भी होनी चाहिए कि वह अपना जीवन समलिंगी के साथ बिताए या विपरीतलिंगी के.
व्यक्तिगत मामला
यौन संबंधों और शादी के मामले में जिस तरह जाति, धर्म की बंदिशें धर्म के ठेकेदारों ने खड़ी की हैं वैसी ही समलिंगियों के साथ भी खड़ी ?की हैं. यौन रिश्तों में न जाति, धर्म की दीवार होनी चाहिए न ही लिंग की. एक ही लिंग वाले 2 जने यौन संबंध कैसे बनाते हैं, इस से अदालत और समाज को क्या लेनादेना. यह पंडों, मुल्लाओं जैसा फतवा है. यौन आनंद कोई कैसे लेता है, यह 2 जनों का आपसी निजी मामला होता है. इस के लिए अलगअलग लिंगों का होना बिलकुल जरूरी नहीं है. इस तरह तो क्या हस्तमैथुन को भी अप्राकृतिक मान कर गैरकानूनी घोषित कर देना चाहिए और उन लोगों को ढूंढ़ना चाहिए जो ऐसा करते हैं? कोई कैसे यौन आनंद ले, यह व्यक्तिगत है. इस में धर्म, कानून को बीच में नहीं आना चाहिए. हां, अगर किसी के साथ बिना मरजी के जबरदस्ती यौन रिश्ते बनाए जाएं तो वह ठीक नहीं.   
किन्नर अपने परंपरागत पेशे से बाहर निकल पाएंगे, आसान नहीं होगा. उन के प्रति समाज के नजरिए को बदलना कानूनी अधिकार मिलने से कहीं अधिक मुश्किल है. 
आज समाज में ‘हिजड़ा’ शब्द एक गाली के तौर पर प्रयोग किया जाता है. यानी किसी को अपमानित करना हो तो उसे हिजड़ा कह दो. यह नामर्द का अर्थ देता है.
अदालत के हालिया आदेश के बाद सवाल यह भी उठता है कि समलैंगिकता के बारे में धारा 377 का क्या होगा, जिस में सिर्फ विपरीतलिंगी की शादी को जायज माना गया है. किन्नर क्या आपस में शादी कर पाएंगे, जैसाकि अब तक करते आ रहे हैं? या कोई सामान्य स्त्री या पुरुष इस तीसरे लिंग से वैवाहिक रिश्ता कर पाएगा?
असल में बिना विभाजन के, बिना भेदभाव के स्त्रीपुरुष और किन्नरों के हिलमिल कर रहने की नीति को अमल में लाए जाने पर जोर दिया जाना चाहिए. 
आदर्श समाज वह होगा जहां स्त्रीपुरुष, किन्नर एकमेक हो कर रहें. कोई भेदभाव न हो. तीनों के लिए अलग कुछ न हो. सब कुछ साझा हो. स्कूल, कालेज, घर, नौकरी, बस, ट्रेन, टौयलेट एक ही हों. प्रेम, विवाह, यौन संबंधों में जाति, धर्म की तरह लिंग की भी बंदिशें न हों. ये चीजें विभाजन, भेदभाव को और समाज में वैमनस्य को बढ़ाती हैं, इसलिए इन से बचा जाना चाहिए ताकि एक बेहतर समाज उभर कर निकले जिस में बराबरी ही बराबरी हो, भेदभाव नहीं.
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