सरिता विशेष

ज्ञान का युग कहलाने वाले इस दौर में मध्यवर्ग परिवारों में हर कोई अपने बच्चों को ऊंची शिक्षा दिलाना चाहता है. इस के लिए वह अपने बच्चों को देश के सब से बेहतर शिक्षा संस्थान में ही नहीं, विदेश में भी भेजने की इच्छा रखता है लेकिन उच्च शिक्षा पाना मध्यवर्ग परिवारों के सदस्यों के लिए बड़ा संकट बनता जा रहा है. शिक्षा के बाजार में ऊंची डिगरियां खरीदना इस वर्ग के लिए मुश्किल हो रहा है क्योंकि शिक्षा बहुत ही महंगी हो गई है. शिक्षा पाने के बाद न तो नौकरी की गारंटी है और न ही व्यवसाय की सफलता की, इसलिए यह आर्थिक संकट और भारी पड़ रहा है.

ग्लोबलाइजेशन के मद्देनजर करीब2 दशकों से उच्च शिक्षा का विस्तार हुआ है. उदारीकरण के दौर में उच्च शिक्षा के प्रति मध्यवर्गीय परिवारों में न केवल उत्सुकता जागी, ये आगे बढे़. आर्थिक तौर पर सामर्थ्य न होते हुए भी उधार पाने में पीछे न रहे. अधिकांश परिवारों में पढ़ाईलिखाई कर्ज पर चल रही है. इस के लिए मांबाप बैंकों से एजुकेशन लोन, व्यक्तिगत लोन ले रहे हैं या अपनी कंपनी अथवा विभाग से कर्ज ले कर लाड़ले या लाड़ली को पढ़ा रहे हैं. कई तो अपनी जमीनजायदाद बेच कर या गिरवी रख कर बच्चों की शिक्षा पर खर्च कर रहे हैं. 40-50 हजार से डेढ़ लाख रुपए तक कमाने वाला अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाना चाहता है, परिवार में चाहे एक कमाने वाला हो या मियांबीवी दोनों.

इस दौर में उच्च शिक्षा के निजीकरण का ट्रैंड इसलिए विकसित हुआ क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा बढ़ने लगी. विश्व में नौलेज सोसायटी क्रिएट करने की जरूरत महसूस हुई लेकिन इस से दक्ष, शिक्षित वर्कर नहीं, केवल नौलेज वर्कर तैयार हो रहा है.

भारत में करीब 50.5 करोड़ युवा 25 वर्ष से कम उम्र के हैं. वर्तमान में एक करोड़़ 10 लाख युवा उच्च शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं. यह 17 से 23 साल की उम्र का 11 प्रतिशत है. सरकार को उम्मीद है कि यह संख्या 2017 तक बढ़ कर 21 प्रतिशत हो जाएगी.

उच्च शिक्षा के लिए अधिकांश बच्चों को अपने घर से दूर रहना पड़ता है. कालेज होस्टल या निजी घर किराए पर ले कर रहना और खानेपीने का खर्च किसी भी शहर में सस्ता नहीं है. ऐडमिशन से ले कर कोर्स फीस और अन्य तरहतरह के चार्ज व डोनेशन बहुत भारी पड़ते हैं. बच्चे को जेब खर्च चाहिए, वह अलग.

विदेशी शिक्षा का मोह इन सालों में जरूरत से ज्यादा बढ़ा है और आवश्यक हो या न हो, एक विदेशी विश्वविद्यालय की डिगरी विवाह और नौकरी दोनों के लिए आवश्यक बनती जा रही है. यह डिगरी न सस्ती है और न आसानी से मिलती है. उद्योग चैंबर की एक रिपोर्ट के अनुसार, 4 लाख 50 हजार छात्र विदेशों में पढाई पर 13 खरब रुपए खर्च कर रहे हैं. सब से अधिक छात्र अमेरिका में हैं. इस के बाद इंगलैंड, आस्ट्रेलिया, कनाडा, न्यूजीलैंड, चीन, रूस आदि देशों में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं.

एसोचैम का एक सर्वे बताता है कि ज्यादातर मांबाप की कमाई का 65 प्रतिशत बच्चों की शिक्षा पर खर्च हो रहा है. मांबाप हाईस्कूल से कालेज तक की पढ़ाई पर 18 से 20 लाख रुपए खर्च कर रहे हैं. मध्यवर्ग में ज्यादातर वेतनभोगी उच्च शिक्षा पर खर्च कर रहा है. शिक्षा का खर्च 28 से 32 प्रतिशत बढ़ता जा रहा है जबकि अभिभावकों की आमदनी में इतनी वृद्धि नहीं हो पाती.

कमाने वाला एक संकट अनेक

78 प्रतिशत अभिभावकों का कहना है कि जहां घर में कमाने वाला एक ही हो, वहां यह संकट और ज्यादा है यानी पतिपत्नी दोनों कमाते हैं तो भी मुश्किल है. फिर भी उच्च शिक्षा 10 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है. इन में डाक्टरी, इंजीनियरिंग, मैनेजमैंट, सीए की ओर अधिक आकर्षण है. एक अनुमान के अनुसार, 5 साल के मैडिकल कोर्स में निजी मैडिकल कालेजों में एक छात्र पर 40-45 लाख रुपए खर्च आता है. इस में डोनेशन, फीस, होस्टल आदि खर्च शामिल हैं.

इस के बाद डेढ़ साल का इंटर्न अनिवार्य है. फिर एमडी और एमएस में भी मोटा पैसा खर्च करना पड़ता है. देश में ज्यादातर मैडिकल शिक्षा खर्च सैल्फ फाइनैंस्ड मैडिकल कालेजों में होता है क्योंकि ये कालेज सरकारी सहायता के बिना चलते हैं.

इसी तरह प्राइवेट इंजीनियरिंग कालेजों में 4 साल के कोर्स में 10-12 लाख रुपए का खर्च आता है. सरकारी कालेजों में यह खर्च थोड़ा कम है. एमबीए, सीए में भी 3 से 5 लाख रुपए खर्च हो जाते हैं.

इन तमाम कोर्सों में ऐडमिशन से पहले कोचिंग का मोटा खर्च इन परिवारों की कमर तोड़ रहा है. सर्वे बताते हैं कि शैक्षिक फीस का करीब 25 प्रतिशत ट्यूशन पर खर्च करना पड़ता है. इंजीनियरिंग की ट्यूशन फीस 2 से 3 लाख, मैडिकल की 2 से 3 लाख, सीए की 2 से 3 लाख रुपए है.

शिक्षा जैसे पवित्र पेशे में एक पूरा लूटतंत्र विकसित हो गया है. माफिया, बिचौलिए पैदा हो गए जो देसी, विदेशी विश्वविद्यालयों में ऐडमिशन के नाम पर मोटी कमाई कर रहे है. कंसल्टैंटों की दुकानें चल रही हैं, फ्रैंचाइजीज खुले हैं जो ऐडमिशन और बाद में प्लेसमैंट के नाम पर अभिभावकों की अंटी ढीली करने में लगे हैं. कोचिंग कारोबारी 9वीं क्लास से ही बच्चों के अभिभावकों को फंसा लेते हैं.

दरअसल, उच्च शिक्षा का जो सिस्टम बना हुआ है वह बेहद खर्चीला है. ज्योंज्यों उच्च शिक्षा की दर बढ़ रही है, मध्यपरिवारों के लिए आर्थिक संकट बढ़ता जा रहा है. कालेजों, विश्वविद्यालयों में फीस वसूलने के कई तरीके हैं, इन में विदेशी/एनआरआई कोटा, मैनेजमैंट कोटा, मैरिट आदि शामिल हैं. पिछले साल सरकार ने आईआईटी की फीस में 80 फीसदी की बढ़ोतरी की थी.

इंडियन बैंक एसोसिएशन के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2010 में उच्च शिक्षा के लिए सार्वजनिक  बैंकों से कर्ज लेने वाले 18 लाख लोग थे जबकि 2001 में केवल 3 लाख थे. इन में करीब 75 फीसदी लोग वे थे जिन्होंने छोटा यानी 4 लाख रुपए तक का लोन लिया था. लोन के लिए रिश्वत चुकानी पड़ती है, वह अलग.

घूस का बोलबाला

निजी उच्च शिक्षा संस्थान भ्रष्टाचार से अछूते नहीं हैं. पिछले दिनों कुछ मैडिकल कालेज की सीटें बढ़वाने से ले कर मान्यता पाने तक में मैडिकल काउंसिल को मोटी घूस देने के मामले सामने आए थे. यह पैसा भी अभिभावकों से ही वसूला जाता है.

उच्च शिक्षण संस्थान गैरलाभकारी उद्देश्य से नहीं चलते. वे विशुद्ध तौर पर कारोबारी मुनाफे की नींव पर बने हैं. इन का बगैर मेहनत, बगैर जवाबदेही के मोटे मुनाफे का व्यापार है. निजी क्षेत्र की शिक्षा का मानदंड अभी तक यही है कि संस्थान का भवन कितने एकड़ में फैला है, कितने कमरों में एअरकंडीशनर लगे हैं, कितने कंप्यूटर हैं. समाचारपत्रों के पन्नों के पन्ने इन के विज्ञापनों से भरे रहते हैं और यह तो स्पष्ट ही है कि इन विज्ञापनों का भुगतान छात्रों को ही करना होता है.

इन में शिक्षा कमजोर है. यहां से निकलने के बाद कोईर् गारंटी नहीं कि छात्र को रोजगार मिल ही जाएगा. कमजोर उच्च शिक्षा, कमजोर रोजगार ही दे सकती है. भारीभरकम खर्च के बावजूद गुणवत्ता से भरी शिक्षा की कमी है. यही कारण है कि उच्च शिक्षा पा कर भी छात्र मनमुताबिक नौकरी, कामधंधा नहीं कर पा रहा है. कोर्स से इतर वह राजनीति या अन्य धंधे की ओर जा रहा है.

इन सब के बावजूद अध्ययन बताते हैं कि उच्च शिक्षा आर्थिक विकास के लिए महत्त्वपूर्ण साबित नहीं हो रही है. उच्च शिक्षा पाने के बाद लोग दूसरे पेशे में जा रहे हैं. जो योग्य हैं वे विदेश जा रहे हैं और इस तरह प्रतिभा पलायन नहीं रुक रहा है. उच्च शिक्षा से गरीबी कम नहीं हो रही है. इस का संबंध मानव विकास से भी नहीं जुड़ पा रहा है.

चीन की बात करें तो उच्च शिक्षा के क्षेत्र में वहां कई सुधार हुए हैं. चीन में ट्यूशन फीस नहीं है. छात्र के रहनसहन का खर्च अभिभावकों पर अधिक नहीं है. इसे सरकार देख रही है. प्रतिभा पलायन वहां ज्यादा नहीं है. अमेरिका में शिक्षा की गुणवत्ता के लिए एक आयोग का गठन किया गया है जो अमेरिका को उच्च शिक्षा में विश्व का गुरु बनाने पर ध्यान केंद्रित कर रहा है.

हमारे यहां शिक्षा की गुणवत्ता जांचने पर कोई ध्यान नहीं है. स्तरहीनता है. कोई जवाबदेही नहीं है. स्टैंडर्ड मेंटेन करने के लिए कोई रैगुलेटरी सिस्टम नहीं है. इस मामले में हम पूरी तरह फेल हैं.

यह हकीकत है कि भारत का युवा आज जिन इंजीनियरिंग उपकरणों, गैजेट्स का इस्तेमाल कर रहा है, अधिकतर विदेशी हैं. सरकार को रक्षा सामग्री से ले कर दूसरी तमाम चीजें विदेशों से आयात करनी पड़ती हैं. हमारे यहां ज्यादातर बड़े शिक्षा संस्थान या तो राजनीतिबाजों द्वारा चलाए जा रहे हैं या छुटभैये व्यापारियों के द्वारा, जो जमीन खरीद सकते हैं और मान्यता प्राप्त करने में सही व्यक्ति को रिश्वत दे सकते हैं.

आंकड़ों के अनुसार, वैज्ञानिक अनुसंधान में भारत का हिस्सा मात्र 2.1 प्रतिशत है जबकि चीन की बात करें तो वह हम से बहुत आगे है. चीन का हिस्सा 14.7 प्रतिशत है. यह जानकारी यूनेस्को की रिपोर्ट ने दी है.

हमारी रिसर्च पर आएदिन सवाल खड़े होते रहे हैं. विश्वविद्यालयों में नकली थीसिस, नकल की हुई किताबें अपने नाम से छपवाने की घटनाएं ताजा हैं.

यही नहीं, हमारे छात्र देश में पढ़ रहे हों या विदेश में, भेदभाव का शिकार हो रहे हैं. सामाजिक गैर बराबरी पीछा नहीं छोड़ पा रही है. मध्यवर्गीय परिवारों को आर्थिक शोषण के साथसाथ सामाजिक विषमता को भी झेलना पड़ रहा है. विदेशों में आएदिन भारतीय छात्रों के साथ हिंसा, भेदभाव की घटनाएं सामने आती हैं. अमेरिका, आस्ट्रेलिया से ले कर दिल्ली के औल इंडिया मैडिकल इंस्टिट्यूट  यानी एम्स तक में नस्लीय, जातिगत भेदभाव का हल्ला उठता रहता है. देश के हर विश्वविद्यालय, कालेजों में इस तरह की समस्याएं बरकरार हैं.

अगर सामाजिक नजरिए से देखें तो इस उच्च शिक्षा के बाद अभिभावकों के समक्ष  शादी जैसी जिम्मेदारी की समस्या भी होती है. बेटे की शादी करनी हो तो आज की तारीख में कम से कम 10 से 15 लाख और बेटी की शादी में 20 से 30 लाख रुपए खर्च होना मामूली बात है. ऐसे में मध्यवर्गीय परिवार के सामने खासा तनाव है.

शिक्षा का कारोबार

समाज को बनाने में शिक्षा का बड़ा महत्त्वपूर्ण योगदान होता है. जिस देश में शिक्षा का उद्देश्य नितांत स्वार्थपूर्ण कारोबार बन जाता है, उस में चोरी, बेईमानी, ठगी होने लगती है. ऐसे में समझा जा सकता है उस समाज का चरित्र कैसा होगा. ऐसे में आने वाले समाज की नैतिकता, युवाओं के संस्कारों पर सवाल मत उठाइए. क्या हम उच्च शिक्षा के लिए युवाओं को सामाजिक, पारिवारिक और राष्ट्रीय दायित्व सिखाने का काम कर रहे हैं?

हमारे यहां उच्च शिक्षा का मतलब न कैरियर से रहा, न ज्ञान प्राप्ति से और न ही एक अच्छे  इंसान से. हमारी उच्च शिक्षा इन सब से कोसों दूर होती जा रही है. उच्च शिक्षा देश, समाज बनाने वालों के हाथों में नहीं, धंधेबाजों, मुनाफाखोरों, लुटेरों के सिपुर्द है.

इस में युवाओं का कोई दोष नहीं है. यह हमारी मौजूदा व्यवस्था की देन है जो पूरी तरह से निकम्मी, भ्रष्ट, अनैतिकता की शिकार है. यही वजह है कि आज के युवा हमारे देश के राजनीतिक, सामाजिक सिस्टम से बेहद खफा हैं और वे बदलाव के लिए आक्रोशित हैं. वे इसे बदल देने पर आमादा दिखाई दे रहे हैं.

असल में हमारे यहां शिक्षा पहले धर्म के शिकंजे में रही. अब सत्ता और कौर्पोरेट ने हथिया ली. इन का उद्देश्य व्यक्ति, समाज, देश की आर्थिक, सामाजिक प्रगति से कतई नहीं रहा. आजादी के बाद शिक्षा में सुधार के लिए कईर् आयोग बने लेकिन वे धूल फांकते रहे. शिक्षा का बजट भी सरकारों ने बहुत कम रखा, वह भी घोटालों की भेंट चढ़ता गया.

शिक्षा पर निर्णय लेने वालों में आज राजनीतिबाज और नौकरशाह प्रमुख हैं. उन पर कौर्पोरेट और मुनाफाखोरों का प्रभाव है, जो एक अच्छे समाज व युवाओं के भविष्य को देख कर नहीं, महज स्वार्थ के लिए फैसले करते हैं. सरकार का नियंत्रण उन से छिटक चुका है. उन पर किसी तरह के कानून, नियमकायदे प्रभावी नहीं हैं. जनता जब शोर मचाती है तब सरकार जागती है पर शिक्षा के ठेकेदारों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं कर पाती. उन पर शिकंजा कस पाने में सरकार पूरी तरह लाचार है. बातबात में शिक्षा माफिया अदालतों की शरण में जा कर सुधार की कार्यवाही को अटका देने में कामयाब हो जाता है. माफिया का गहरा असर समाज से ले कर सरकार और सुप्रीम कोर्ट तक पर है.

शिक्षा जैसे अहम विषय को ठगों व माफिया के हवाले नहीं किया जा सकता. जब तक इसे अच्छे, ईमानदार, उच्च आदर्श वाले शिक्षाविदों को सौंपा नहीं जाएगा तब तक न समाज तरक्की कर पाएगा, न देश. मध्यवर्गीय परिवारों को शिक्षा के आर्थिक बोझ, तनाव से मुक्ति चाहिए. यह ठीक है उच्च शिक्षा पर खर्च होता है पर इतना भी नहीं कि पानी सिर से ऊपर गुजरने लगे. ऐसी शिक्षा का कोई मतलब नहीं जो सबकुछ लुटा देने के बाद भी कुछ न दे पाए.