सरिता विशेष

देश की गिरती आर्थिक सेहत और रुपए की दुर्दशा पर आंसू बहाने वाली सरकार, जनता और उद्योग जगत को समझना चाहिए कि अर्थव्यवस्था को इस हालत तक पहुंचाने वाले वे खुद ही हैं. वास्तविकता तो यह है कि भारत की कमजोर आर्थिक व्यवस्था हमारी उस संस्कृति का नतीजा है जो सदियों से अकर्मण्यता व निकम्मेपन का संदेश देती रही है. धर्मप्रचारकों का अंधविश्वासी प्रचार, चमत्कार पर निर्भरता और सरकार व जनता का निठल्लापन किस तरह देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ तोड़ रहा है, बता रहे हैं जगदीश पंवार.

देश की गिरती अर्थव्यवस्था को ले कर सरकार चिंतित है. उद्योग जगत निराश है और आम जनता नाखुश है. डौलर के मुकाबले रुपए की रिकौर्ड गिरावट के चलते आयातनिर्यात पर बुरा असर पड़ा है. रोजमर्रा की चीजों की बढ़ती कीमतों से जनता हैरानपरेशान है. प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह संसद में स्वीकार कर चुके हैं कि वास्तव में देश की आर्थिक सेहत ठीक नहीं है. वित्त मंत्री पी चिदंबरम आर्थिक बदहाली के लिए उन से पूर्व वित्त मंत्री रहे प्रणब मुखर्जी के अदूरदर्शी फैसलों को जिम्मेदार बताते हैं. रिजर्व बैंक के गवर्नर रहे सुब्बाराव जातेजाते कह गए कि सरकार की गलत राजनीतिक प्राथमिकताओं के चलते आर्थिक हालात खराब हुए हैं.

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सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद रुपए में मामूली सुधार ही आ पाया पर महंगाई लगातार बढ़ रही है.  थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित महंगाई दर अगस्त में लगातार तीसरे माह बढ़ कर 6.1 फीसदी पहुंच गई. खुदरा महंगाई की दर भी ऊंचे स्तर पर बनी हुई है. आम आदमी सब से ज्यादा परेशान खानेपीने और पैट्रोलडीजल की बढ़ती कीमतों से है. पैट्रोल, डीजल की कीमतें पिछले 3 महीनों में छठी बार बढ़ीं. हालांकि पिछले दिनों पैट्रोल की कीमतें घटाई गईं पर प्याज, टमाटर व अन्य सब्जियां और तेल, दाल और आटा की कीमतें आसमान छू रही हैं. आने वाले दिनों में रसोई गैस व केरोसिन की कीमत में भी इजाफा होने की संभावना है.

दूसरी ओर आर्थिक प्रगति के लिए जरूरी नए उद्योगों व व्यापारों के लिए निवेशक हाथ पीछे खींच रहे हैं. निवेशकों की नजर में भारत में बेलगाम भ्रष्टाचार है. लालफीताशाही हावी है और बुनियादी ढांचे में ठहराव के साथ वित्तीय दबाव है. आयातनिर्यात पर भी असर पड़ रहा है. चालू खाते का घाटा 1991 के पहले के स्तर पर पहुंच गया है और राजकोषीय घाटे में सुधार के कोई लक्षण नजर नहीं आ रहे हैं. यानी आर्थिक सुधार जहां से शुरू हुए थे, यह सरकार वापस वहीं चली गई है. गौरतलब है कि 1992 में मनमोहन सिंह जब नरसिम्हा राव सरकार में वित्त मंत्री थे तब आर्थिक नीतियों की शुरुआत की गई थी. कहा गया है कि भारत के पास अब केवल 7 माह का विदेशी मुद्रा भंडार बचा है और इस के बाद अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से मदद लेने की नौबत आ सकती है.

वर्ष 1991 में आर्थिक संकट इतना गहरा था कि पी वी नरसिम्हा राव सरकार को अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से भारत का 67 टन सोना गिरवी रख कर 2.2 बिलियन डौलर का आपात कर्ज लेने के लिए बाध्य होना पड़ा था. आर्थिक हालात के बदतर होने के लिए सरकार की नीतियों को दोषी ठहराया जा रहा है लेकिन क्या वास्तव में हमारे देश के खराब आर्थिक हालात के कारण सिर्फ सरकारों की नीतियां ही हैं? क्या इस देश का हर नागरिक, हर संस्था देश के आर्थिक उत्पादन में मदद कर रहे हैं? क्या हर नागरिक अपना कर्तव्य निभा रहा है? किसी भी देश की अर्थव्यवस्था में कमोबेश हरेक नागरिक का योगदान होता है लेकिन क्या यहां जनता अर्थोपार्जन कर अपने घर, परिवार, समाज और देश के विकास में सहायता कर रही है? क्या यहां का हरेक व्यक्ति आर्थिक तौर पर आत्मनिर्भर है? क्या नागरिक उत्पादकता में वे अपनी भागीदारी दे रहे हैं?

असल में देश की 1 अरब 30 करोड़ की आबादी में से केवल 10 प्रतिशत लोग ही कमाने वाले हैं. बाकी किसी न किसी के कंधे पर लटके हुए हैं. यानी दूसरों पर निर्भर हैं. उद्यमशीलता अवरुद्ध है. यहां मांग कर खाना या मुफ्त का खाना शर्म की बात नहीं, धर्म माना गया है. दरअसल, भारत की अर्थव्यवस्था की दिक्कतें अर्थशास्त्र से नहीं, सामाजिक व्यवस्था से जुड़ी हुई हैं.

हमारी जो संस्कृति है वह अकर्मण्यता, निकम्मापन का संदेश देने वाली है. हमारे यहां पर किसी व्यक्ति को परिश्रम का पाठ पढ़ाया ही नहीं जाता. यहां निकम्मेपन का गुणगान किया गया है. निकम्मों का मानसम्मान किया गया है. काम करने का जिम्मा संपूर्ण समाज को नहीं, एक वर्ग को दिया गया. बाकी को उस पर निर्भर छोड़ दिया गया.

धर्म ने समाज को वर्णव्यवस्था के नाम पर बांट दिया. जिस में ब्राह्मण, क्षत्रिय को अर्थोपार्जन का काम नहीं दिया गया. ब्राह्मण सिर्फ पढ़नेपढ़ाने, पूजापाठ करनेकराने का काम करेगा, क्षत्रिय की जिम्मेदारी सिर्फ  रक्षा करने की होगी. अर्थाेपार्जन का काम केवल वैश्य का होगा. यानी व्यापार, वाणिज्य वैश्य करेगा. शूद्र को इन तीनों वर्णों की सेवा का जिम्मा दिया गया. दलित तो अछूत थे, समाज के अंग ही नहीं थे.

काम के बंटवारे की सदियों पुरानी इस सामाजिक व्यवस्था का असर अभी तक देखा जा सकता है. इस व्यवस्था की वजह से ही हमारे देश में लाखों पंडेपुजारी, साधुसंत, गुरु, महंत, प्रवचक, शंकराचार्य, मंडलेश्वर, महामंडलेश्वर, ज्योतिषी, तांत्रिक, ओझा, मुल्ला, मौलवी, पादरी, गं्रथी किसी तरह की उत्पादता से दूर, निठल्ले बैठ कर मेहनतकश लोगों की कमाई पर ऐश कर रहे हैं.

इस देश में छोटेबड़े तकरीबन 5 करोड़ धर्मस्थल हैं. इन धर्मस्थलों के बाहर बगैर काम कर के खाने वाले कोई लाखों भिखारी बैठे हैं. जो इन धर्मस्थलों की महिमा गाते हैं और मुफ्त में खाने के हक को भगवान का दिया हक बताते फिरते हैं.

हमारे धर्मों और संस्कृतियों ने मेहनत के बजाय भिक्षावृत्ति का खूब गुणगान किया है. भीख मांगने वाले को आदर, सम्मान दिया गया. निकम्मों को ऊंचा ओहदा मिला. शूद्र अगर मेहनत कर शिल्प का काम करता है तो भी उसे सम्मान के काबिल नहीं माना गया. यानी हम मेहनतकश नहीं, बेकार लोगों की जमात पैदा कर रहे हैं जो इस देश, समाज और व्यक्ति पर बोझ बनी हुई है.

ब्राह्मण, पुरोहितों, पंडों के जवाब में दूसरे वर्ण ने भी अपनेअपने मंदिर, मठ, आश्रम स्थापित कर लिए और अपने पुरोहित बना लिए. यानी जो काम इन वर्गों के लिए धर्म ने निषिद्ध किया था, उन में से कुछ ने उसे अपना लिया. इस का मतलब है परिश्रम करने वाले लोगों की संख्या और सीमित हो गई. बिना काम किए लूटने वाला नया वर्ग पैदा हो गया. नई आर्थिक उदारीकरण की नीतियों के बाद पिछले करीब 2 दशक से काम न करने वालों का एक नया वर्ग पैदा हो गया.

देश के धर्मस्थल हमारे कारखानों, फैक्टरियों, कंपनियों से ज्यादा धन पैदा कर रहे हैं. यहां जिस ने भगवा पहन लिया, देखते ही देखते वह करोड़ोंअरबों में खेलने लगता है. मजे की बात है कि बिना कुछ किएधरे हमारे यहां धर्म का साम्राज्य राज्य से भी ज्यादा समृद्ध और ताकतवर है. यानी आडंबर और पाखंड का कारोबार दिन दूना चमक रहा है. धर्म की अर्थव्यवस्था में मंदी की कभी कोई गुंजाइश नहीं रही.

हमारे देश में धर्म का सालाना कारोबार 50 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का होने का अनुमान है. यह दुनिया के कई छोटे देशों के वार्षिक बजट को मिला कर भी अधिक बैठता है. यह धन मेहनतकश लोगों का है जो धर्म व ईश्वर के नाम पर की जा रही बेईमानी, चालबाजी पर  बड़ी श्रद्धा के साथ चढ़ाया जा रहा है.

महाराष्ट्र के गणपति उत्सव की बात करें तो वहां पूजा के नाम पर केवल 10 दिन में 500 से 700 करोड़ रुपए बिना टैक्स दिए पंडों द्वारा वसूल कर लिए जाते हैं. यह धन देश के किसी एक छोटे राज्य के बजट के बराबर है. यहां हजारों की संख्या में पंजीकृत गणपति मंडल हैं और करीब इतने ही गैर पंजीकृत हैं. 10 लाख से अधिक घरों में गणपति की विधिविधान से पूजा कराने पंडे ही आते हैं. यह संख्या अलग है.

इसी तरह पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा उद्योग 40 हजार करोड़ रुपए सालाना का बताया जाता है. इस में एक हिस्सा स्वार्र्थी लोगों के पास जाता है जिस का कोई टैक्स भुगतान नहीं किया जाता.  इसी तरह बिना हींग, फिटकरी के देशभर में रामलीला उद्योग खूब पनप रहा है. इन धर्मस्थलों के पास लाखों एकड़ उपजाऊ भूमि नाजायज तरीके से हड़पी हुई है. हाल में बलात्कार के आरोप में जेल में बंद आसाराम के कब्जे में देशभर में हजारों एकड़ जमीन है. जिस जमीन पर अन्न उत्पादन या कलकारखाने लगने चाहिए, वहां पाखंड का धंधा चलाया जा रहा है.

देश के मंदिरों में सैकड़ों टन सोना दबाया जा रहा है. देवीदेवताओं के रथ, सिंहासन, घंटे, घडि़याल, छत्र, कंगूरे, दरवाजे, सीढि़यां, चौखटें सोने से सजाई जा रही हैं. गिरती अर्थव्यवस्था के चलते पिछले दिनों वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने जनता से सोने की खरीदारी न करने की अपील की थी लेकिन धर्मस्थलों में धड़ल्ले से पुण्य के बदले सोना चढ़ाया जा रहा है. आंध्र प्रदेश में तिरुपति मंदिर, महाराष्ट्र में शिरडी, मुंबई में सिद्धिविनायक, केरल में पद्मनाभस्वामी जैसे मंदिरों में अकूत सोना दबा है. कहा जाता है कि जितना सोना सरकार के पास नहीं है उस से कई गुना इन धर्मस्थलों में पड़ा है. यानी जो धन लिक्विडिटी में यानी चलन होना चाहिए, वह धर्मों की तिजोरियों में बंद है.

गांवों, कसबों और शहरों में लोग खाली बैठे गपें हांकते, ताश खेलते मिलते हैं. चौपाल में, पेड़ों के नीचे बैठे मिलेंगे, लड़ाईझगड़ा करते और झूठी चौधराहट करते मिलेंगे पर काम करते नहीं. घर में 10 सदस्य हैं तो कमाने वाला एक है. घर के सारे के सारे कमाने वाले नहीं. वे इसी एक की कमाई से ही संतुष्ट हैं. भले ही घर में अभाव हो. यह एक रिवाज, परंपरा सी बनी हुई है और इस पर लोगों को गर्व भी है. भूख, गरीबी में भी काम न करना, है न कमाल की बात.

मजे की बात है कि बहाने भी हजार हैं. घर में औरत अकेली है, अकेली औरत को छोड़ना ठीक नहीं, बच्चों को कौन देखे, घर में एक मर्द का रहना जरूरी है, पशुओं को संभाले कौन? यानी इस तरह के बहानों ने गरीबी, भुखमरी, बेकारी और अपराध को खूब बढ़ावा दिया.

कई तो धर्म के प्रचार में दिनरात एक कर रहे हैं. कोई जाति का नेता बना हुआ है, कोई  गोत्र का झंडा उठाए हुए है, कोई देवता का, कोई मजार का. कहीं भजनकीर्तन चल रहा है, कहीं गुरु का प्रवचन तो कहीं भागवत कथा चल रही है. कहीं साईं संध्या तो कहीं माता के जागरण या चौकी में जुटे हैं.

लोग घरों में पूजापाठ, हवनयज्ञ में लगे हुए हैं, तीर्थयात्रा पर हैं. ऐसे करोड़ों लोग हैं जिन्हें देख कर लगता है मानो ये इसी काम के लिए जन्मे हैं. और तो और, लोग इसे अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझ रहे हैं.

गजब का माहौल है. अरे भई, फिर इस देश में काम कौन कर रहा है? ऐसे में जनता क्यों हल्ला मचा रही है कि महंगाई है, भ्रष्टाचार है, सरकार कुछ नहीं कर रही है. आप से पूछा जाए, आप क्या कर रहे हैं? क्या सारे काम सरकार ही करेगी? नागरिकों का कोई दायित्व नहीं?

हमें परिश्रम को छोड़ कर चमत्कारों पर भरोसा करने की सीख दी गई. खाली बैठ कर रामनाम की माला जपने से ही सबकुछ हासिल हो जाने का आश्वासन दिया गया. केवल पूजापाठ, प्रार्थना, हवनयज्ञ और मात्र ईश्वर के दर्शनों से ही मनोकामना पूर्ण होने की गारंटी दी गई.

खाली बैठे लोग नशाखोरी को अनिवार्य मानते हैं. यहां हर कोई किसी न किसी नशे का सेवन करता है. देश में लाखों लोग जुआ, सट्टे की लत के शिकार हैं. जुआ, सट्टा बिना मेहनत किए बैठेबिठाए पैसा कमाने का जरिया हमारी महाभारतकालीन परंपरा का हिस्सा है.

सरकारें धर्मों के विकास पर अरबों रुपए खर्च कर रही हैं. अमरनाथ, हज, वैष्णोदेवी, केदारनाथ जैसी यात्राओं के नाम पर खजाना खुला ही रहता है. इस से लोगों को अकर्मण्यता की ओर धकेला जा रहा है. क्या यह पैसा लोगों को कर्म की ओर प्रेरित करने में नहीं लगाना चाहिए?  होना यह चाहिए कि जो काम नहीं करता उसे खाने का हक भी नहीं.

आज संप्रग सरकार को खाद्य सुरक्षा बिल, रोजगार गारंटी, शिक्षा की गारंटी, निशुल्क स्वास्थ्य जैसे कानून और अरबों की योजनाएं हमारी इसी सदियों पुरानी सामाजिक व्यवस्था के कारण लानी पड़ रही हैं.

इस के विपरीत चीन, जापान, यूरोप के देश तरक्की करते जा रहे हैं. चीन, जापान में हर व्यक्ति को काम करने की प्रेरणा कानूनों और परंपराओं से मिली है. जापान में हर जन के हाथ काम में लगे हैं. उन का अपने देश की अर्थव्यवस्था में योगदान है. यूरोप पुनर्जागरण के बाद तेजी से तरक्की के रास्ते पर चल पड़ा. मार्टिन लूथर ने पोपशाही के खिलाफ बोलने का साहस किया और अमेरिका चर्च के झूठे पाखंडों से हट कर आर्थिक विकास की ओर मुड़ गया. फिर तो दुनिया का इतिहास बदल गया. जंगलों में रहने वाली गोरों की कौम ने दुनियाभर पर राज करना शुरू कर दिया.

क्या हमारे यहां ऐसा कोई शासक आया जिस ने गुरुडम के खिलाफ दो शब्द भी कहने की हिम्मत दिखाई? उलटे तमाम नेता, शासक गुरुओं के चरणों में नतमस्तक दिखाई पड़ते रहे. आंकड़े बताते हैं कि आज 1 चीनी नागरिक 1 भारतीय से तीनगुना ज्यादा अमीर है. 2012 में भारत की प्रति व्यक्ति आय घट कर चीन के मुकाबले सिर्फ

24 प्रतिशत रह गई. अकेला चीन भारत को 54 प्रतिशत माल का आयात कर रहा है. इस में बड़ी संख्या उपभोग की वस्तुओं की है. जबकि आयात किया जाने वाला माल आसानी से भारत में भी बनाया जा सकता है. हमारे यहां निर्यात की तुलना में आयात तेजी से बढ़ रहा है.

हम अपनी सामाजिक, सांस्कृतिक व्यवस्था की वजह से अपनी क्षमता से बहुत कम प्रदर्शन कर पाते हैं. निकम्मापन, आरामतलबी हमारी नसनस में समाई हुई है, इसलिए तरक्की की दौड़ में हम पिछड़ रहे हैं. हमारा धर्म देश में सटोरिए, जुआरी, नशेड़ी, सट्टेबाज, कबूतरबाज, भ्रष्टाचारी, बेईमान और बिना मेहनत किए रातोंरात अमीर बनने की ख्वाहिश रखने वाली पीढि़यां पैदा कर रहा है, उद्यमशील व्यक्ति नहीं. लोगों में निचला, पिछड़ा बनने की होड़ लगी है. समाज इस बात में उलझा है कि लड़की की शादी किस गोत्र में हो.

हमारी यह पुरानी व्यवस्था गरीबी, काम किए बिना धन पाने की मानसिकता पैदा करती है, सो, आर्थिक समानता के बजाय आर्थिक असमानता बढ़ती जाती है. विकास, तरक्की को हमारी जातियों, धर्मों, वर्गों में बंटे समाज ने अवरुद्ध कर रखा है. आएदिन के दंगों, तनावों ने अरबों की संपत्ति को नष्ट किया. रहासहा उत्पादन ठप किया. हम इसी सोच के चलते बारबार अतीत के गीत गाते हैं. लफ्फाजी ज्यादा और काम कम करते हैं. बिना मेहनत किए कथित भगवान से ‘छप्पर फाड़ कर’ पाने की बेकार की उम्मीदें पाले रखते हैं. गरीबी, भुखमरी, बेकारी को हम पूर्व जन्म के कर्मों का फल मान कर कामधाम नहीं करते.

योजना आयोग के एक अध्ययन के अनुसार, उदारीकरण के बाद 1 करोड़ 40 लाख लोग खेती से बेदखल हो गए और विनिर्माण क्षेत्र में 53 लाख लोगों को रोजगार से हाथ धोना पड़ा है. यानी यह जमीन मेहनतकशों से छीन कर निकम्मों को दे दी गई.

सदियों से सरकारें सेना की ताकत बटोरने में ही लगी रहीं. राजामहाराजा हमेशा युद्धों में उलझे रहे. किसी अच्छे उद्देश्य के लिए नहीं, इसलिए ताकि दूसरे की धन, संपदा पर कब्जा किया जा सके.  हमारी सरकार नए पंडों की जमातें बन गईं जो काम नहीं करतीं, काम में रुकावट डालती हैं. पिछले ढाई हजार सालों में जो झंझावात चला वह देश, समाज, व्यक्ति के विकास के लिए नहीं, दूसरों पर वर्चस्व और लूटखसोट के लिए चला.

व्यवस्था गरीबों और आम लोगों को ही नहीं, अमीरों को भी सब्सिडी की रेवडि़यां बांट रही है. खाद्य सुरक्षा  बिल के तहत सरकार 1.20 लाख करोड़ रुपए बांट रही है तो 32 लाख करोड़ रुपए कौर्पोरेट को सब्सिडी के नाम पर भेंट कर रही है. इस दान के बावजूद औद्योगिक उत्पादन लगातार गिरता जा रहा है.

मौजूदा समय में सरकार ने उत्पादन के बजाय सर्विस उद्योग की ओर ध्यान केंद्रित किया पर इस से बिचौलिए, सटोरिए, दलाल पैदा हो गए. बेईमानी अधिक पनपी. लिहाजा, मनमोहन सिंह अब फिर सर्विस से ध्यान हटा कर उत्पादन की बात कहने लगे हैं.

पिछले साल कारोबार के बेहतर माहौल वाले देशों की सूची में भारत का स्थान 132 से फिसल कर 182वें पर आ गया. दिक्कत यह है कि सरकार भी धर्म की राह पर चल रही है. हम दूसरे देशों के बजाय आर्थिक उत्थान वाले कानून नहीं, निकम्मेपन को प्रश्रय देने वाले कानून ज्यादा बना रहे हैं. इन कानूनों में बिना मेहनत किए बैठेबिठाए लोगों को भोजन, मकान देने के पक्के इंतजाम हैं.

हमारे नेताओं का सारा ध्यान अयोध्या में राममंदिर बनाने में, केदारनाथ में पूजापाठ शुरू कराने में, लैपटौप बांटने, बेरोजगारों को भत्ता देने, नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने जैसी बातों में ज्यादा है. बजाय इस के कि इस देश में जो निठल्ली सोच है उस में बदलाव कैसे लाया जाए.

संसद का ज्यादातर समय फालतू की बहसों, मसलन, प्रधानमंत्री को चोर क्यों कहा? सत्ता पक्ष ने विपक्ष को बेईमान क्यों कहा? संसद, विधानसभाओं में प्रतिनिधि काम की ठोस बातें करने के बजाय नदारद रहते हैं या सोए देखे जा सकते हैं या फिर पौर्न वीडियो देखने में मशगूल रहते हैं.

धार्मिक नेताओं, संगठनों को चिंता इस बात की अधिक रहती है कि उन के धर्र्म के लोग दूसरे पाले में तो नहीं जा रहे हैं. दूसरे धर्म के लोग उन की निंदा तो नहीं कर रहे हैं. उन के तीर्थ, मंदिरों का विकास हो रहा है या नहीं. उन्हें चिंता इस बात की नहीं है कि उन के धर्म के लोगों की गरीबी कैसे दूर हो, उन को रोजगार कैसे मिले, वे मेहनत कर रहे हैं या नहीं.

मीडिया इस बात पर बहस करने में ज्यादा रुचि दिखा रहा है कि बलात्कारी आसाराम की जमानत होगी या नहीं, गैंग रेप केआरोपियों को सजा उम्रकैद होगी या मृत्युदंड? अमिताभ बच्चन की फिल्म चलेगी या नहीं? आज आप का दिन अच्छे शकुन से गुजरेगा या नहीं? यात्रा, नौकरी पर जा सकते हैं या नहीं? 300 से अधिक टैलीविजन चैनलों में से 1 में भी ऐसा कार्यक्रम नहीं देखने को मिल रहा जो लोगों को परिश्रम की प्रेरणा देता हो. इन पर नाच, गाने, धार्मिक पूजापाठ, कथाएं, खानेपिलाने और ढोंगी बाबाओं के खोखले प्रवचनों के प्रपंच दिनरात चलते रहते हैं.

ऐसे में इस देश की अर्थव्यवस्था की बेहतरी की बात कौन करेगा माली हालत कैसे सुधरेगी? इस देश में कितने लोग निकम्मे हैं, क्या उन्हें भोजन पाने का हक होना चाहिए? जिन का आर्थिक उत्पादन में कोई सहयोग न हो, उन से काम कैसे कराया जाए, क्या ऐसी किसी सोच पर अमल होगा?

अर्थशास्त्र में भूमि, श्रम, पूंजी और उद्यमिता उत्पादन के मूल साधन माने जाते हैं. क्या हमारी संस्कृति में, जनता और राज की सोच में ये सब चीजें शामिल हैं? किसी भी देश की अर्थव्यवस्था की मजबूती वहां के लोगों के परिश्रम, कर्मशीलता, काम के प्रति ईमानदार सोच, लगन पर निर्भर करती है. देश में विकास की चमक अगर फीकी दिखने लगती है तो इस का मतलब है विकास हवाई महल की तरह है जो हलके झोंके से ही भरभरा कर गिर सकता है. ठोस, मजबूत अर्थव्यवस्था के लिए हर नागरिक के हाथ में काम होना जरूरी है.

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