अभिनेता ब्रूस विलिस (बाएं) ने 60 की उम्र में तो प्लेबौय पत्रिका के मालिक ह्यूग हेफनर ने (दाएं) 86 वर्ष की उम्र में शादी कर बता दिया कि प्यार में उम्र की सीमाएं माने नहीं रखतीं. ब्रिटिश ऐक्ट्रैस जोआन कौलिंस को अपना प्यार खुद से उम्र में 32 साल छोटे परसी गिबसन में नजर आया तो उन्होंने परसी को अपना जीवनसाथी बनाने में देर नहीं की.  टीवी व फिल्मों की लोकप्रिय अभिनेत्री सुहासिनी मुले ने 60 साल की उम्र में औनलाइन माध्यम से अपना जीवनसाथी चुना

मातापिता की बात मान कर, अच्छे बच्चों की तरह उन की इच्छा का अनुसरण करते हुए शादी के बंधन में न बंध कर, ‘मुगल ए आजम’ फिल्म का गीत ‘जब प्यार किया तो डरना क्या…’ प्रेम का एक विद्रोही रूप सामने लाता है. ऐसा रूप जो किसी की नहीं सुनता. न परिवार की न समाज की. किसी की परवा किए बगैर वह, वह कर गुजरना चाहता है जो वह खुद चाहता है.

पर क्या ऐसा प्यार सिर्फ जवानी का जोश होता है? जी नहीं, इसी विषय पर जरा दूसरा गाना याद कीजिए – ‘न उम्र की सीमा हो, न जन्म का हो बंधन, जब प्यार करे कोई तो देखे केवल मन…’ हो सकता है ‘केवल मन’ थोड़ा फिल्मी अंदाज हो किंतु उम्र की सीमा को तोड़ कर प्यार और शादी के कई उदाहरण हैं.

हौलीवुड के अभिनेता ब्रूस विलिस ने 60 वर्ष की आुय में 35 वर्षीया मौडल एमा हेमिंग से विवाह किया. इंगलैंड की अभिनेत्री जोआन कौलिंस ने 81 वर्ष की उम्र में अपने से 32 वर्ष छोटे निर्माता परसी गिबसन से शादी की थी. विख्यात पत्रिका ‘प्लेबौय’ के मालिक ह्यूग हेफनर तब 86 वर्ष के थे जब उन्होंने अपने से 60 वर्ष कम, 26 वर्षीया हैरिस से शादी की. अमेरिकी अखबार जगत के बेताज बादशाह, रूपर्ट मर्डोक ने भी 84 वर्ष की उम्र में अपने चौथे विवाह की तैयारी में मौडल जेरी हाल, 59, को करीब 1 लाख पौंड की सगाई की अंगूठी भेंट की.

सिर्फ विदेशों में ही नहीं, भारत में भी ऐसी रीति चलन में है. अभिनेता कबीर बेदी 16 जनवरी को अपने 70वें जन्मदिन पर अपने से 29 वर्ष छोटी 42 साला महिला परवीन दुसांज से शादी करने की खबरों को ले कर सुर्खियों में रहे. कबीर बेदी की यह चौथी शादी है. परवीन और कबीर पिछले 10 वर्षों से साथ रह रहे थे. परवीन उन की पत्नी की हर भूमिका पहले से निभा रही हैं तो फिर अब शादी क्यों? हो सकता है कि कबीर ने परवीन के आगे के जीवन की सुरक्षा हेतु शादी का निर्णय लिया हो या फिर वे दोनों अपने प्यार को आखिरी अंजाम तक पहुंचाना चाहते हों.

मराठी सिनेमा की मशहूर अदाकारा सुहासिनी मुले ने सारे तर्कों को ताक पर रख कर 60 वर्ष की आयु में शादी की, वह भी औनलाइन खोज के जरिए. सुहासिनी जो करीब 20 वर्षों से अकेली रहती आई हैं, ने शादी की उम्मीद ही छोड़ दी थी. लेकिन फिर उन्हें 65 वर्षीय अतुल गुर्तु औनलाइन मिले. अतुल द्वारा पहली पत्नी के अंतिम समय में की गई सेवा की बात ने सुहासिनी को आकर्षित किया. उन के इस निर्णय से सारा परिवार अचंभित था.

आम आदमी का क्या?

सैलिब्रिटीज के तो किस्से खूब हैं. वे जब चाहें तब शादी करते रहते हैं. सवाल है कि आम घरों में, आम आदमी के लिए बड़ी उम्र में विवाह करना क्या संभव है? जी, बिलकुल है. समाज बदल रहा है. अंगरेजी की एक कहावत है- ‘इट्स वन लाइफ.’ आखिर सब को एक जीवन मिलता है. यदि समय पर विवाह न हुआ, या जीवनसाथी की आकस्मिक मृत्यु हो गई तो ऐसे में दूसरे को अपना बाकी जीवन अकेले क्यों काटना पड़े? जब जागो, तभी सवेरा.

समय का पहिया थोड़ा पीछे मोडें़ तो हम पाते हैं कि जीवनसाथी के गुजर जाने या तलाक हो जाने पर, बाकी की उम्र अकेले ही गुजारनी पड़ती थी. बढ़ती उम्र में बिना किसी साथी के चुपचाप सी जिंदगी. अपनी बात कहने को कोई नहीं, सिर्फ एक खामोश अकेलापन. उस उम्र में घर वालों की देखरेख करो, प्रतीक्षारत रहो. लेकिन आज के समय में बढ़ती उम्र में भी अपनी जिंदगी जीने की चाह को ले कर खुलापन आया है. बढ़ती उम्र में भी शादियां हो रही हैं.

सार्थक पहल

मुंबई के कुमार देशपांडे ने अपनी सास की मृत्यु के बाद, अकेले रह गए अपने ससुर की पीड़ा पहचानी. और न केवल देशपांडे ने अपने ससुर की, एक साथी ढूंढ़ने में मदद की, बल्कि इस अनुभव से सीख लेते हुए, आज वे बुजुर्गों के लिए हैदराबाद, कोल्हापुर इत्यादि जगहों पर ‘‘कुमार देशपांडे फांउडेशन’ के नाम से मैरिज ब्यूरो भी चलाते हैं. वे कहते हैं, ‘‘युवाओं को यह समझना होगा कि बुजुर्गों को किसी के साथ की ज्यादा आवश्यकता है. समाज बदल रहा है किंतु धीरेधीरे.’’ ठीक ऐसे ही नाथुभाई पटेल भी एक संस्था चलाते हैं- ‘बिना मूल्य अमूल्य सेवा’. यह संस्था बुजुर्गों के लिए शादी के मेले लगवाती है. उन के अनुसार, ‘‘हो सकता है कि ऐसे मेलों में निश्चित समायावधि में जीवनसाथी न मिल पाए किंतु जागरूकता की वजह से ऐसे मेलों में भागीदारी में वृद्धि हुई है. कुछ लोग बिना संकोच के सामने आते हैं तो कुछ समाज की हिचकिचाहट की वजह से गुपचुप तरीके से शादी करते हैं.’’

जहां चाह, वहां राह

जीवन बीमा निगम के सेवानिवृत्त अध्यक्ष पुणे के जयंत जोशी ने बेंगलुरु की लीना से 2005 में शादी की थी. जयंत की बहू तथा लीना का बेटा सारी तैयारियों में आगे थे. जयंत कहते हैं, ‘‘74 वर्ष की उम्र में मैं अपने लिए दुलहन खोज रहा था. पत्नी के देहांत के 11 वर्ष बाद मैं ने दूसरे विवाह के बारे में सोचा. यह उसी की इच्छा थी कि मैं अकेला न रहूं.’’

आखिर अकेले रह गए बुजुर्गों को पुनर्विवाह की सोच क्यों डराती है? इस पर जयंत कहते हैं, ‘‘बहुत से बुजुर्ग ऐसा सोचते हैं कि दूसरी शादी करना उन के पहले साथी के साथ बेवफाई होगी. लेकिन मृत्यु एक संयोग है और बढ़ती उम्र में साथ की चाह एक जरूरत है.’’ जयंत और लीना अपने बच्चों के आसपास ही रहना चाहते हैं. शोभा की पहली शादी केवल 4 दिन चल पाई. उस के बाद भी ससुराल वालों की प्रताड़ना जारी रही. भाई ने कई सालों तक साथ दिया पर मातापिता की मृत्यु और बढ़ती उम्र के साथ शोभा को लगने लगा कि एक जीवनसाथी की आवश्यकता है. आखिरकार 2012 में एक विवाह मेले में उन की मुलाकात सुभाष लिमकर से हुई. डेढ़ माह की अवधि के बाद दोनों एकदूसरे से शादी करने को राजी थे. परिवारों की सहमति से दोनों की शादी हुई. शादी के समय सुधा की आयु 51 वर्ष थी और सुभाष की 61 वर्ष. सुभाष की पैंशन पर आज दोनों का गुजारा आराम से होता है.

मुंबई के रमेश ककड़े ने एक सड़क दुर्घटना में अपनी पत्नी को खो दिया. उस के बाद 10 वर्ष तक वे अकेले रहे. एक दिन अखबार में अपनी बेटी हेतु वैवाहिक विज्ञापन देखते हुए उन की नजर एक ऐसी संस्था पर गई जो बुजुर्गों की शादियां करवाती थी. उन के परिवार से कोई भी उन के अकेलेपन को न समझता था और न ही उसे दूर करने के बारे में सोचता था. तो रमेश ने स्वयं ही अपने लिए बीड़ा उठाया. उन्होंने अपनी दूर की एक रिश्तेदार, जिस के पति को गुजरे 25 साल बीत चुके थे, के समक्ष शादी का प्रस्ताव रखा. शादी के समय रमेश की उम्र 67 वर्ष थी और पुष्पा की 63 वर्ष.

रमेश कहते हैं, ‘‘मैं इस बात को ले कर बहुत परेशान होता था कि लोग क्या कहेंगे.’’ लेकिन उस संस्था के लोगों से बातचीत कर के उन का निर्णय और भी दृढ़ हुआ. बेटी और बहन के साथ देने पर वे आगे बढ़े.

कुछ बाधाएं भी

सभी औलादें अकेले रह गए पिता या माता के विवाह के बारे में ऐसा सोचें और पुनर्विवाह में साथ दें, यह जरूरी नहीं. कोल्हापुर के भालचंद्र निकरगे ने 65 वर्ष की आयु में मुंबई की 56 वर्षीया सुवर्णा से विवाह किया. सुवर्णा के पूरे परिवार ने उन दोनों के इस निर्णय में उन का साथ दिया किंतु निकरगे के बच्चों को यह स्वीकार नहीं था. निकरगे कहते हैं, ‘‘हालांकि वे सभी शादीशुदा हैं, आर्थिक रूप से समर्थ हैं, मुझ से दूर मुंबई में रहते हैं. यदि वे भी मेरे इस निर्णय में मेरा साथ देते तो मैं अपनी नई जिंदगी में और खुश होता.’’

अपनी जिंदगी के इस नए अध्याय से प्रसन्न निकरगे अब कोल्हापुर में बुजुर्गों के लिए शादी के सिलसिले में मुलाकातें करवाते हैं. वे बताते हैं, ‘‘बच्चों के सपोर्ट से आजकल कई बुजुर्ग मैरिज ब्यूरो में अपना खाता खुलवा रहे हैं.’’

पुणे की ‘अथश्री स्कीम’ हाउसिंग सोसाइटी एक ऐसा उदाहरण है जो खासतौर पर बुजुर्गों के लिए बनाई गई है और जहां कई नए शादीशुदा जोड़े रहते हैं, जिन्हें उन के बच्चों ने इस नए जीवन के लिए प्रेरित किया.

जीवन की सांध्यबेला में बुजुर्गों को एक बोझ न मान कर, उन्हें नीरस जीवन जीने की राय न दे कर, आज की युवा पीढ़ी इस बात का पूरा समर्थन कर रही है कि उन के मातापिता को अकेले जीवन नहीं काटना चाहिए, बल्कि एक साथी के साथ खुश रहते हुए जीवन बसर करना चाहिए.

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