वह आंखों के डाक्टर हैं, लेकिन उनकी आंखें केवल आंखों की बीमारियां ही नहीं ढूंढती हैं बल्कि जिंदगी के रंगों की तलाश में भी लगी रहती हैं. उनका क्लीनिक किसी आर्ट गैलरी से कम नहीं लगता है. रिसेप्शन रूम से लेकर चेकअप रूम और डाक्टर के चैंबर की दीवारों पर उनकी बनाई ढेरों पेंटिग्स यह बता देती हैं कि वे रंगों के कितने बड़े रसिया हैं.

आई स्पेशलिस्ट डाक्टर बी चौधरी का क्लीनिक पटना के आर्य कुमार रोड के दिनकर गोलंबर के पास है. उनके क्लीनिक में आंख की बीमारियां और परेशानियां लेकर पहुंचने वाले हर मरीज का सामना डाक्टर से पहले उनकी पेंटिग्स से ही होता है. आंखों को सकून देने वाली पेंटिंग्स को देखकर ही ज्यादातर मरीज की आधी परेशानी दूर हो जाती है.

लैंडस्केप और पोट्रेट बनाने में माहिर डाक्टर चौधरी अब तक 400 से ज्यादा पेंटिग्स बना चुके हैं. पोट्रेट बनाने में उन्हें काफी मजा आता है. मदर टैरेसा, प्रिंसेज डायना, सोनिया गांधी, अमिताभ बच्चन, बिल क्लिंटन समेत सैंकडों मशहूर शख्सियतों के पोट्रेट बना चुके हैं. लैंडस्केप पेटिंग बनाने के वह लिए ब्रुश का इस्तेमाल नहीं करते हैं. उन्होंने सभी लैंडस्केप नाइफ और उंगलियों से ही किया है. वह बताते हैं कि लैंडस्केप बनाते समय वह खुद को नेचर के काफी करीब महसूस करते हैं. पहाड़ों से गिरते झरनों, जंगलों, हरे-भरे पेड़ों, उगते सूरज, चंद्रमा, नदी, नालों में अजीब सी कशिश होती है, जिसे कैनवास पर उतारने का सुख कलाकार ही समझ सकता है.

साल 1960 में पटना मेडिकल कौलेज से एमबीबीएस की डिग्री लेने वाले डाक्टर चौधरी की मेडिकल प्रैक्टिस और पेंटिंग साथ-साथ चल रही है. वह बताते हैं कि पेंटिंग तो वह बचपन से बनाते रहे हैं, पर पिछले 18 सालों से वह लगातार और जम कर पेंटिंग कर रहे हैं. वह पेंटिंग बना बना कर घर और क्लीनिक की दीवारों पर लटका देते थे. 6-7 साल पहले क्लीनिक में आए किसी मरीज ने डाक्टर से कहा कि वह अपनी पेंटिंग्स की प्रदर्शनी क्यों नहीं लगाते हैं? डाक्टर ने पहले तो इसे यह कह कर टाल दिया कि उनके पास फुर्सत कहां है? बात आई-गई हो गई पर उनके दिमाग में यह बात गहरी पैठ गई कि और उन्होंने मन ही मन प्रदर्शनी लगाने को ठान लिया.

साल 2006 में पटना में उनकी पेंटिग्स की पहली प्रदर्शनी लगी और उसके बाद से अब तक उनकी पेंटिग्स की 8 एकल प्रदर्शनियां लग चुकी हैं. डाक्टर चौधरी बताते हैं कि सुबह को और रात को क्लीनिक से लौटने के बाद वह एक-डेढ़ घंटा पेंटिंग करते हैं. जिस दिन पेंटिंग नहीं कर पाते हैं उस दिन काफी बेचैनी रहती है और कुछ खाली-खाली सा लगता है. डाक्टर साहब के इस शौक को पूरा करने में उनकी पत्नी शांता चौधरी हर तरह से सहयोग देती हैं. डाक्टर साहब की कई पेंटिंग उन्हें इतनी अच्छी लगी हैं कि उसे वह अपने बेडरूम ओैर ड्राइंग रूम में लगा रखा है, उसे प्रदर्शनी में इस डर से नहीं लगने देती हैं कि कहीं वह बिक न जाए.

पेंटिंग की विधिवत ट्रेनिंग नहीं लेने वाले बी चौधरी कहते हैं कि लगातार पेंटिग करके ही उन्होंने पेंटिग की बारीकियां सीखी है. खुद ही स्टूडेंट और खुद ही टीचर रहे. हर पेंटिंग को बनाने के बाद खुद ही उसमें कमियां ढूंढते हैं और उसे दूर करते हैं. वह कहते हैं कि पेंटिंग करना उनके लिए मेडिटेशन की तरह है, जो मन को शांति और दिल को सकून देता है. साल 1989 में इंग्लैंड में ब्रिटिश पेंटर जौन कांस्टबेल की पेंटिंग प्रदर्शनी देखने के बाद उन्होंने पेंटिंग को सीरियसली लिया और तब से आज तक उनका कैनवास और रंगों का खेल जारी है.

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