प्यार की बदलती परिभाषा

युवाओं का दिल भले ही पहले जैसा धड़कता हो लेकिन अब प्रेम में समर्पण और झुकने के बजाय बराबरी, स्वच्छंदता और गिव ऐंड टेक की नीति ने घुसपैठ कर ली है.

सरिता विशेष

21 वर्षीया सीमा होंठों पर प्यारी सी मुसकान लिए और हाथों में गुलाब का बड़ा सा गुलदस्ता लिए दिल्ली के आईटीओ बस स्टैंड पर किसी का इंतजार कर रही है. उसे देख यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि वह किस का इंतजार कर रही है. भले यह वैलेंटाइन डे की शाम न हो फिर भी उस के हावभाव कह रहे हैं, वह अपने दिलदार का इंतजार कर रही है. सीमा के हाथ में खूबसूरत से लिफाफे में बंद एक बड़ा डब्बा भी है, जो शायद उस के बौयफ्रैंड के लिए बर्थडे गिफ्ट होगा.

पिछले कुछ सालों में सीमा जैसी युवतियों की संख्या में काफी इजाफा हुआ है. हालांकि प्यार चाहे आदिम युग में किया गया हो या इंटरनैट युग में, वह कभी नहीं बदला. लेकिन पिछले कुछ सालों में जिस तरह हर क्षेत्र में आमूलचूल ढंग से परिवर्तन देखने को मिले हैं, प्यार भी इन बदलावों से अछूता नहीं है. आज इजहार का तरीका बदल गया है, इकरार के अंदाज बदल गए हैं. इंटरनैट युग में हर चीज तुरतफुरत वाली हो गई है. ऐसे में भला प्यार कैसे पीछे रह सकता था? अब न कोई लड़का प्रेम प्रस्ताव देने के लिए कई दिनों का इंतजार करता है और न ही कोई लड़की उस की हामी में वक्त लगाती है.

अगर कहा जाए कि आज की तारीख में प्यार पहले की तुलना में ज्यादा वास्तविक हो गया है तो कतई गलत नहीं होगा. जी, हां. लैलामजनू, हीररांझा जैसे प्यार अब बमुश्किल ही देखने को मिलते हैं. इस का मतलब यह कतई नहीं है कि प्यार पहले के मुकाबले अब लोगों में कम हो गया है या फिर अब वादों और इरादों की जगह खत्म हो गई है. दरअसल, प्यार अब गिव ऐंड टेक की पौलिसी बन चुका है. बेशक ये शब्द थोड़े रूखे हैं लेकिन वास्तविकता यही है. ऐसा नहीं है कि यह बदलाव एकाएक देखने को मिल रहा है. पिछले कुछ सालों में धीरेधीरे चल कर यह बदलाव यहां तक पहुंचा है.

इस में सब से बड़ी वजह महिलाओं का आत्मनिर्भर होना है. इन बातों को बहुत समय नहीं गुजरा है जब प्रेमी जोड़े एकसाथ बाहर घूमने जाया करते थे, लड़कियां आमतौर पर लड़कों पर पूरी तरह निर्भर होती थीं. यहां तक कि कहां घूमने जाना है, क्या खाना है जैसे सारे फैसले लड़के ही करते थे. मगर अब ऐसा नहीं है.

आज लड़कियां पढ़ीलिखी हैं, समझदार हैं और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हैं. आर्थिक रूप से मजबूत होने के कारण ही अब वे किसी और पर फैसले नहीं छोड़तीं और न ही दूसरे के फैसले खुद पर लदने देती हैं. कहीं जाना हो, कुछ खाना हो या कोई तोहफा खरीदना हो तो वे मन मार कर नहीं रहती हैं. वे बिंदास हो कर इन बातों को अपने बौयफ्रैंड से साझा करती हैं.

यही कारण है कि अब प्यार बेफिक्री का नाम भी हो गया है. लड़कियों में बढ़ती आत्मनिर्भरता के कारण लड़कों में भी बेफिक्री की आदत आ गई है. बदलते दौर के प्यार के कारण लड़कों में बचपना भर गया है. अब तक माना जाता रहा है कि जिंदगी से जुड़े तमाम फैसले सिर्फ लड़के को ही करने होते हैं. आखिर वह भविष्य में घर का मुखिया बनता है. इसलिए जवानी के दिनों से ही उसे गंभीर होना होता है. यही वजह है कि वह हमेशा अपने संबंधों में भी गंभीर ही रहता था. लेकिन लड़कियों के फैसले लेने की ताकत ने लड़कों को बेफिक्र कर दिया है. ऐसा नहीं है कि लड़कियां परेशानियों और फैसले करने के बोझ तले दबती जा रही हैं. लड़कों ने इस संबंध में लड़कियों का हाथ बराबरी देने के लिए थामा है.

अब अजय को ही लें. 26 साल का अजय 2 साल बाद अपनी गर्लफ्रैंड रैना से शादी करने वाला है. रैना एक मल्टीनैशनल कंपनी में काम करती है. उस की मासिक आय इतनी है कि एक परिवार न सिर्फ गुजरबसर कर सकता है बल्कि ऐश की जिंदगी भी जी सकता है. अजय को आर्थिक रूप से घर के लिए ज्यादा चिंतित होने की जरूरत नहीं है. रैना महत्त्वाकांक्षी है. लेकिन जब से उस की मुलाकात अजय से हुई है तब से रैना की जिंदगी में तमाम बदलाव हुए हैं.

पहले जहां काम के चलते रैना हमेशा परेशान दिखती थी, वहीं अब प्यार ने उस में मिठास भर दी है. उन की जिंदगी से जुड़े सारे फैसले दोनों मिल कर करते हैं. 2 साल बाद शादी का फैसला भी दोनों ने मिल कर किया है. अजय तो अपने भविष्य को ले कर बेफिक्र हुआ ही है, साथ ही रैना को भी अपनी आजादी, अपने फैसलों को लेने में कोई कठिनाई नहीं होती. वह जानती है कि अजय उस का हर मोड़ पर साथ देगा. इस संबंध में वह बिलकुल बेफिक्र है.

यह बात और है कि अब भी ऐसे प्रेमी युगलों की कमी नहीं है जहां फैसले आमतौर पर लड़के ही करते हैं. बावजूद इस के, यह कहने में हमें जरा भी गुरेज नहीं होना चाहिए कि प्यार पहले की तुलना में ज्यादा वास्तविक हो गया है. अब प्यार हवाहवाई नहीं रहा. अब प्रेमी जोड़े वादे करने से हिचकते हैं. क्यों? क्योंकि वे ऐसा कोई वादा नहीं करना चाहते जो उन्हें झूठा साबित करे. अगर कोई वादा करते हैं तो उसे हर हाल में पूरा करने की कोशिश करते हैं.

वास्तव में वे अपनी भावनाओं का सम्मान करते हैं. इसलिए दूसरों की भावनाओं को ठेस पहुंचाने से डरते हैं. कहने का मतलब यह बिलकुल नहीं है कि पहले के लोग दूसरों की भावनाओं का सम्मान नहीं करते थे. असल में पहले प्यार आदर्शवादी किस्म का हुआ करता था. अब वह आदर्शवादी ढांचा टूट चुका है.

लोग अब अपनी जिंदगी को महत्त्व देते हैं. वे नहीं चाहते कि उन के द्वारा लिया गया कोईर् भी फैसला उन के लिए मुसीबत बन जाए. इसलिए कुछ समय साथ गुजारने के बाद अगर वे एकदूसरे के साथ रहना नापसंद करें तो एकदूसरे को हंसतेहंसते अलविदा कह देते हैं. यह आदर्शवादी किस्म का प्यार नहीं है. आप कह सकते हैं यहां तो बात वही हो गई कि तू नहीं कोई और सही, और नहीं कोई और सही…लेकिन समझने की बात यह है कि दूसरों के सामने मिसाल बनने के लिए खुद को सूली पर चढ़ाना सही नहीं है. कुल मिला कर कहने की बात यह है कि आज की तारीख में लड़केलड़कियां दोनों कामकाजी हो गए हैं और बदलती जीवनशैली ने प्यार की परिभाषा भी बदल दी है.

हक चाहती हैं लड़कियां

यह बात कहने और सुनने में बड़ी अजीब लगती है मगर सच यही है कि लड़कों ने लड़कियों को हमेशा दबा कर रखा है. अब से पहले कभी लड़कियों को बराबरी का दरजा नहीं दिया. फिर चाहे वे दोनों एकदूसरे को बेइंतहा क्यों न चाहते रहे हों. एक बार लड़की ने किसी का हाथ थामा, उसी क्षण से उसे अपने फैसले करने का हक जाता रहा. लड़कियों की इच्छाओं को दरकिनार कर दिया जाता था. जी हां, इस किस्म के परिवेश को अभी ज्यादा वक्त नहीं गुजरा है. लड़की भी लड़के की कही हर बात को पत्थर की लकीर समझ कर मान लिया करती थी.

लेकिन अब माहौल में खासा बदलाव आया है. लड़कियां हां और ना में जवाब देने लगी हैं, अपने फैसले सुनाने लगी हैं. यहां तक कि अगर कोई लड़का उसे बीच चौराहे पर छोड़ने का फैसला कर ले तो वे उसे रोकने की जहमत भी नहीं उठातीं. सवाल है, ऐसा क्यों है? क्या लड़कियां अब भावुक नहीं रहीं? नहीं, ऐसा बिलकुल नहीं है. असल में लड़कियां अब दूसरों के फैसलों पर सिर्फ हामी नहीं भरती हैं. प्यार के मसले में भी यह बात सौ फीसदी लागू हो रही है.

रिश्तों में पनपती साफगोई

ताज्जुब होता है कि कुछ साल पहले तक अगर लड़की को उस का बौयफ्रैंड छोड़ने की बात तक कहता था तो उस का रोरो कर बुरा हाल हो जाता था. लेकिन अब स्थिति ईद का चांद हो गई है. असल में अब रिश्तों में पहले से ज्यादा साफगोई देखने को मिलती है. कोई भी किसी को भी गले की फांस नहीं बनाना चाहता. यही बात लड़कियों के साथ भी है. अगर वह किसी को छोड़ना चाहती है तो बेझिझक एक फोन कौल से, मैसेज से या फिर मेल के जरिए अपने दिल की बात उस तक पहुंचा देती है.

कुछ लोग कह सकते हैं कि अब प्यार मजाक बन कर रह गया है. लोगों में सहनशीलता नहीं है. लोग संवेदनाहीन हो रहे हैं. लोगों में अपने प्यार को बांधे रखने की ताकत खत्म हो रही है. जबकि यह हकीकत नहीं है. अब प्यार में खुलापन आ गया है. प्यार पहले से भी ज्यादा नाजुक हो गया है. जैसा कि पहले ही जिक्र किया गया है कि कोई भी किसी की भी गले की फांस नहीं बनना चाहता है. लड़कियां अब ऐसे लड़के को एक दिन भी बरदाश्त नहीं कर सकतीं जो उन्हें अपने संबंध में बराबरी नहीं दे सकता. यहां यह बताने की जरूरत नहीं है कि लड़कियों को प्यार भीख में नहीं चाहिए. लड़कियां इस बात को सहज ही समझ जाती हैं कि कौन उसे प्यार करता है और कौन उस का इस्तेमाल कर रहा है. आज प्यार का सीधा सा सिद्धांत है, प्यार करोगे तो प्यार पाओगे. लड़कियां अब किसी एक लड़के को अपना सब कुछ नहीं समझ लेतीं. वे आजादीपसंद हो चुकी हैं.

असल में एक बार रिश्ते में बंध जाने के बाद लड़के को लगता है कि उस की प्रेमिका से जुड़े सारे फैसले करने का हक सिर्फ उसे ही है. लेकिन लड़कियों को अब अपनी आजादी का एहसास हो गया है. वे न तो प्यार भीख में लेती हैं और न ही आजादी. लड़कियां इस बात को भलीभांति समझ गई हैं कि आजादी और प्यार दोनों में ही उन का हक है. इन में किसी एक को ज्यादा महत्त्व देना, प्यार से बेमानी होगी.

प्यार एक मीठा एहसास है. प्यार में एकदूसरे के लिए जान लुटाने का माद्दा होता है. लेकिन वहीं प्यार का एक पहलू यह भी है कि इस में बराबरी और सम्मान का एहसास महत्त्वपूर्ण हो गया है. महिलाओं की बदलती आर्थिक स्थिति ने उन्हें यह फैसला करने का हक दिया है कि उन्हें किस के साथ बंधना है, किस के साथ रहना है. हैरानी की बात तो यह है कि लड़कियों के दोस्तों की सूची कितनी लंबी होगी, यह फैसला भी एक जमाने में लड़के ही किया करते थे. मगर अब कहानी पलट गई है. समझौता सिर्फ एक पर आश्रित बन कर नहीं रह गया है. क्योंकि प्यार अब भीख में लीदी जाने वाली चीजभर नहीं है. प्यार जरूरत भी है और चाहत भी.

क्या कहते हैं लड़कियों जैसे ये लड़के…

यह मुंबई का छत्रपति शिवाजी टर्मिनस हो सकता है और राजधानी दिल्ली का कनौट प्लेस भी. यह कोलकाता का सौल्ट लेक हो सकता है और हैदराबाद का बंजारा हिल्स भी. आप को ऐसे दृश्य कहीं भी देखने को मिल सकते हैं जब आप को भ्रम हो जाए कि लड़का कौन है और लड़की कौन है. एक जैसे जूते, एक जैसे ओवरकोट, एक जैसा हेयरस्टाइल. यहां तक कि पैंट और शर्ट में भी अब बहुत फर्क नहीं बचा. जी हां, यह यूनीसैक्स का दौर है. जी हां, यह बराबरी की एक नई दुनिया है.

कुछ लोगों को लग सकता है लड़कों का पतन हो रहा है. कुछ पुराने खयालों के मर्दवादी मन कह सकते हैं आजकल के लड़के तो मर्द जाति के नाम पर धब्बा हैं. लेकिन गौर से सोचें, ध्यान से देखें तो यह व्यवहार में अब दिखने लगी वह बराबरी है जिस की कहे, अनकहे ईमानदारी से सदियों से बातें की जाती रही हैं. शायद यह पहला ऐसा दौर है जब लड़के व लड़कियों में बहुत सारी चीजें एक जैसी होने लगी हैं या फिर यों कहा जाए कि जिंदगी में अब बड़ी सहजता आ गई है.

अभी ज्यादा वक्त नहीं बीता जब पहनावा, बोलनेचालने का ढंग और यारदोस्तों के साथ मौजमस्ती के तमाम रंग लड़के और लड़कियों के बिलकुल अलहदा होते थे. सच बात तो यह थी कि खानेपीने में भी लड़के और लड़कियों का फर्क साफ दिखता था. पिछली सदी के 70, 80 और किसी हद तक 90 के दशक तक लड़के चाटपकौडि़यां खाने से झिझकते थे. लड़कियों की तरह सूंसूं करते मिर्च की चटनी खाते और उंगलियां चाटते लड़के नहीं दिखते थे. गोलगप्पे, पानीपूरी, दहीभल्ले इन से लड़के दूर रहते थे मगर अब बहुतकुछ बदल गया है. लड़के लड़कियों के साथ चाटपकौडि़यों की दुकान में दिखने लगे हैं.

बोलना और यहां तक कि चलना भी एक जमाने में लड़कियों और लड़कों के लिए पूरी भिन्न सीख हुआ करती थी. लड़कियों को बड़े से बड़े संकट में भी अदब से और अव्यक्त शब्दों में मदमाते हुए चलने की सीख दी जाती थी और लड़कों को तेजतेज, बेफिक्र अंदाज में कदम बढ़ाने की सीख दी जाती थी. आज लड़कियां भी लड़कों की तरह लंबेलंबे डग भरते दिख जाएंगी. वे भी उन्हीं की तरह गला फाड़ कर चिल्लाने में गुरेज नहीं करतीं जबकि एक जमाने में ऊंची आवाज में लड़कियों का बोलना बुरा समझा जाता था. माना जाता था ऐसी लड़कियों में लड़कीपन नहीं रहता…तो बदलते दौर में बहुतकुछ बदल रहा है. ये जो लड़कियों जैसे लड़के दिख रहे हैं या लड़कों जैसी लड़कियां दिख रही हैं, उन्हें हम मजाक में कुछ भी कहें, लेकिन सचाई यही है कि यह बदलाव का एक व्यावहारिक व दिखने वाला तरीका है.

प्यार के माने

निधि अजीत से प्यार करती थी और शादी भी उसी से की थी. लेकिन प्यार के सही माने तो उस ने उस से जाने थे जो उसे प्यार तो करता था, लेकिन उस से कहा नहीं था कभी..

गरिमा पंकज | January 22, 2016
सरिता विशेष

उससे मेरा कोई खास परिचय नहीं था. शादी से पहले जिस औफिस में काम करती थी, वहीं था वह. आज फ्रैंच क्लास अटैंड करते वक्त उस से मुलाकात हुई. पति के कहने पर अपने फ्री टाइम का सदुपयोग करने के विचार से मैं ने यह क्लास जौइन की थी.

‘‘हाय,’’ वह चमकती आंखों के साथ अचानक मेरे सामने आ खड़ा हुआ.

मैं मुसकरा उठी, ‘‘ओह तुम… सो नाइस टु मीट यू,’’ नाम याद नहीं आ रहा था मुझे उस का.

उस ने स्वयं अपना नाम याद दिलाया, ‘‘अंकित, पहचाना आप ने?’’

‘‘हांहां, बिलकुल, याद है मुझे.’’

मैं ने यह बात जाहिर नहीं होने दी कि मुझे उस का नाम भी याद नहीं.

‘‘और सब कैसा है?’’ उस ने पूछा.

‘‘फाइन. यहीं पास में घर है मेरा. पति आर्मी में हैं. 2 बेटियां हैं, बड़ी 7वीं कक्षा में और छोटी तीसरी कक्षा में पढ़ती है.’’

‘‘वाह ग्रेट,’’ वह अब मेरे साथ चलने लगा था, ‘‘मैं 2 सप्ताह पहले ही दिल्ली आया हूं. वैसे मुंबई में रहता हूं. मेरी कंपनी ने 6 माह के प्रोजैक्ट वर्क के लिए मुझे यहां भेजा है. सोचा, फ्री टाइम में यह क्लास भी जौइन कर लूं.’’

‘‘गुड. अच्छा अंकित, अब मैं चलती हूं. यहीं से औटो लेना होगा मुझे.’’

‘‘ओके बाय,’’ कह वह चला गया.

मैं घर आ गई. अगले 2 दिनों की छुट्टी ली थी मैं ने. मैं घर के कामों में पूरी तरह व्यस्त रही. बड़ी बेटी का जन्मदिन था और छोटी का नए स्कूल में दाखिला कराना था.

2 दिन बाद क्लास पहुंची तो अंकित फिर सामने आ गया, ‘‘आप 2 दिन आईं नहीं. मुझे लगा कहीं क्लास तो नहीं छोड़ दी.’’

‘‘नहीं, घर में कुछ काम था.’’

वह चुपचाप मेरे पीछे वाली सीट पर बैठ गया. क्लास के बाद निकलने लगी तो फिर मेरे सामने आ गया, ‘‘कौफी?’’

‘‘नो, घर जल्दी जाना है. बेटी आ गई होगी, और फिर पति आज डिनर भी बाहर कराने वाले हैं,’’ मैं ने उसे टालना चाहा.

‘‘ओके, चलिए औटो तक छोड़ देता हूं,’’ वह बोला.

मुझे अजीब लगा, फिर भी साथ चल दी. कुछ देर तक दोनों खामोश रहे. मैं सोच रही थी, यह तो दोस्ती की फिराक में है, जब कि मैं सब कुछ बता चुकी हूं. पति हैं, बच्चे हैं मेरे. आखिर चाहता क्या है?

तभी उस की आवाज सुनाई दी, ‘‘आप को किरण याद है?’’

‘‘हां, याद है. वही न, जो आकाश सर की पीए थी?’’

‘‘हां, पता है, वह कनाडा शिफ्ट हो गई है. अपनी कंपनी खोली है वहां. सुना है किसी करोड़पति से शादी की है.’’

‘‘गुड, काफी ब्रिलिऐंट थी वह.’’

‘‘हां, मगर उस ने एक काम बहुत गलत किया. अपने प्यार को अकेला छोड़ कर चली गई.’’

‘‘प्यार? कौन आकाश?’’

‘‘हां. बहुत चाहते थे उसे. मैं जानता हूं वे किरण के लिए जान भी दे सकते थे. मगर आज के जमाने में प्यार और जज्बात की कद्र ही कहां होती है.’’

‘‘हूं… अच्छा, मैं चलती हूं,’’ कह मैं ने औटो वाले को रोका और उस में बैठ गई.

वह भी अपने रास्ते चला गया. मैं सोचने लगी, आजकल बड़ी बातें करने लगा है, जबकि पहले कितना खामोश रहता था. मैं और मेरी दोस्त रिचा अकसर मजाक उड़ाते थे इस का. पर आज तो बड़े जज्बातों की बातें कर रहा है. मैं मन ही मन मुसकरा उठी. फिर पूरे रास्ते उस पुराने औफिस की बातें ही सोचती रही. मुझे समीर याद आया. बड़ा हैंडसम था. औफिस की सारी लड़कियां उस पर फिदा थीं. मैं भी उसे पसंद करती थी. मगर मेरा डिवोशन तो अजीत की तरफ ही था. यह बात अलग है कि अजीत से शादी के बाद एहसास हुआ कि 4 सालों तक हम ने मिल कर जो सपने देखे थे उन के रंग अलगअलग थे. हम एकदूसरे के साथ तो थे, पर एकदूसरे के लिए बने हैं, ऐसा कम ही महसूस होता था. शादी के बाद अजीत की बहुत सी आदतें मुझे तकलीफ देतीं. पर इंसान जिस से प्यार करता है, उस की कमियां दिखती कहां हैं?

शादी से पहले मुझे अजीत में सिर्फ अच्छाइयां दिखती थीं, मगर अब सिर्फ रिश्ता निभाने वाली बात रह गई थी. वैसे मैं जानती हूं, वे मुझे अब भी बहुत प्यार करते हैं, मगर पैसा सदा से उन के लिए पहली प्राथमिकता रही है. मैं भी कुछ उदासीन सी हो गई थी. अब दोनों बच्चियों को अच्छी परवरिश देना ही मेरे जीवन का मकसद रह गया था.

अगले दिन अंकित गेट के पास ही मिल गया. पास की दुकान पर गोलगप्पे खा रहा था. उस ने मुझे भी इनवाइट किया पर मैं साफ मना कर अंदर चली गई.

क्लास खत्म होते ही वह फिर मेरे पास आ गया, ‘‘चलिए, औटो तक छोड़ दूं.’’

‘‘हूं,’’ कह मैं अनमनी सी उस के साथ चलने लगी.

उस ने टोका, ‘‘आप को वे मैसेज याद हैं, जो आप के फोन में अनजान नंबरों से आते थे?’’

‘‘हां, याद हैं. क्यों? तुम्हें कैसे पता?’’ मैं चौंकी.

‘‘दरअसल, आप एक बार अपनी फ्रैंड को बता रही थीं, तो कैंटीन में पास में ही मैं भी बैठा था. अत: सब सुन लिया. आप ने कभी चैक नहीं किया कि उन्हें भेजता कौन है?’’

‘‘नहीं, मेरे पास इन फुजूल बातों के लिए वक्त कहां था और फिर मैं औलरैडी इंगेज थी.’’

‘‘हां, वह तो मुझे पता है. मेरे 1-2 दोस्तों ने बताया था, आप के बारे में. सच आप कितनी खुशहाल हैं. जिसे चाहा उसी से शादी की. हर किसी के जीवन में ऐसा कहां होता है? लोग सच्चे प्यार की कद्र ही नहीं करते या फिर कई दफा ऐसा होता है कि बेतहाशा प्यार कर के भी लोग अपने प्यार का इजहार नहीं कर पाते.’’

‘‘क्या बात है, कहीं तुम्हें भी किसी से बेतहाशा प्यार तो नहीं था?’’ मैं व्यंग्य से मुसकराई तो वह चुप हो गया.

मुझे लगा, मेरा इस तरह हंसना उसे बुरा लगा है. शुरू से देखा था मैं ने. बहुत भावुक था वह. छोटीछोटी बातें भी बुरी लग जाती थीं. व्यक्तित्व भी साधारण सा था. ज्यादातर अकेला ही रहता. गंभीर, मगर शालीन था. उस के 2-3 ही दोस्त थे. उन के काफी करीब भी था. मगर उसे इधरउधर वक्त बरबाद करते या लड़कियों से हंसीमजाक करते कभी नहीं देखा था.

मैं थोड़ी सीरियस हो कर बोली, ‘‘अंकित, तुम ने बताया नहीं है,’’ तुम्हारे कितने बच्चे हैं और पत्नी क्या करती है?

‘‘मैडम, आप की मंजिल आ गई, उस ने मुझे टालना चाहा.’’

‘‘ठीक है, पर मुझे जवाब दो.’’

मैं ने जिद की तो वह मुसकराते हुए बोला, ‘‘मैं ने अपना जीवन एक एनजीओ के बच्चों के नाम कर दिया है.’’

‘‘मगर क्यों? शादी क्यों नहीं की?’’

‘‘क्योंकि हर किसी की जिंदगी में प्यार नहीं लिखा होता और बिना प्यार शादी को मैं समझौता मानता हूं. फिर समझौता मैं कभी करता नहीं.’’

वह चला गया. मैं पूरे रास्ते उसी के बारे में सोचती रही. मैं पुराने औफिस में अपनी ही दुनिया में मगन रहती थी. उसे कभी अहमियत नहीं दी. मैं उस के बारे में और जानने को उत्सुक हो रही थी. मुझे उस की बातें याद आ रही थीं. मैं सोचने लगी, उस ने मैसेज वाली बात क्यों कही? मैं तो भूल भी गई थी. वैसे वे मैसेज बड़े प्यारे होते थे. 3-4 महीने तक रोज 1 या 2 मैसेज मुझे मिलते, अनजान नंबरों से. 1-2 बार मैं ने फोन भी किया, मगर कोई जवाब नहीं मिला.

घर पहुंच कर मैं पुराना फोन ढूंढ़ने लगी. स्मार्ट फोन के आते ही मैं ने पुराने फोन को रिटायर कर दिया था. 10 सालों से वह फोन मेरी अलमारी के कोने में पड़ा था. मैं ने उसे निकाल कर उस में नई बैटरी डाली और बैटरी चार्ज कर उसे औन किया. फिर उन्हीं मैसेज को पढ़ने लगी. उत्सुकता उस वक्त भी रहती थी और अब भी होने लगी कि ये मैसेज मुझे भेजे किस ने थे?

जरूर अंकित इस बारे में कुछ जानता होगा, तभी बात कर रहा था. फिर मैं ने तय किया कि कल कुरेदकुरेद कर उस से यह बात जरूर उगलवाऊंगी. पर अगले 2-3 दिनों तक अंकित नहीं आया. मैं परेशान थी. रोज बेसब्री से उस का इंतजार करती. चौथे दिन वह दिखा.मुझ से रहा नहीं गया, तो मैं उस के पास चली गई. फिर पूछा, ‘‘अंकित, इतने दिन कहां थे?’’

वह चौंका. मुझे करीब देख कर थोड़ा सकपकाया, फिर बोला, ‘‘तबीयत ठीक नहीं थी.’’

‘‘तबीयत तो मेरी भी कुछ महीनों से ठीक नहीं रहती.’’

‘‘क्यों, क्या हुआ?’’ उस ने चिंतित स्वर में पूछा.

‘‘बस किडनी में कुछ प्रौब्लम है.’’

‘‘अच्छा, तभी आप के चेहरे पर थकान और कमजोरी सी नजर आती है. मैं सोच भी रहा था कि पहले जैसी रौनक चेहरे पर नहीं दिखती.’’

‘‘हां, दवा जो खा रही हूं,’’ मैं ने कहा.

फिर सहज ही मुझे मैसेज वाली बात याद आई. मैं ने पूछा, ‘‘अच्छा अंकित, यह बताओ कि वे मैसेज कौन भेजता था मुझे? क्या तुम जानते हो उसे?’’

वह मेरी तरफ एकटक देखते हुए बोला, ‘‘हां, असल में मेरा एक दोस्त था. बहुत प्यार करता था आप से पर कभी कह नहीं पाया. और फिर जानता भी था कि आप की जिंदगी में कोई और है, इसलिए कभी मिलने भी नहीं आया.’’

‘‘हूं,’’ मैं ने लंबी सांस ली, ‘‘अच्छा, अब कहां है तुम्हारा वह दोस्त?’’

वह मुसकराया, ‘‘अब निधि वह इस दुनिया की भीड़ में कहीं खो चुका है और फिर आप भी तो अपनी जिंदगी में खुश हैं. आप को परेशान करने वह कभी नहीं आएगा.’’

‘‘यह सही बात है अंकित, पर मुझे यह जानने का हक तो है कि वह कौन है और उस का नाम क्या है’’

‘‘वक्त आया तो मैं उसे आप से मिलवाने जरूर लाऊंगा, मगर फिलहाल आप अपनी जिंदगी में खुश रहिए.’’

मैं अंकित को देखती रह गई कि यह इस तरह की बातें भी कर सकता है. मैं मुसकरा उठी. क्लास खत्म होते ही अंकित मेरे पास आया और औटो तक मुझे छोड़ कर चला गया. उस शाम तबीयत ज्यादा बिगड़ गई. 2-3 दिन मैं ने पूरा आराम किया. चौथे दिन क्लास के लिए निकली तो बड़ी बेटी भी साथ हो ली. उस की छुट्टी थी. उसी रास्ते उसे दोस्त के यहां जाना था. इंस्टिट्यूट के बाहर ही अंकित दिख गया. मैं ने अपनी बेटी का उस से परिचय कराते हुए बेटी से कहा, ‘‘बेटा, ये हैं आप के अंकित अंकल.’’

तभी अंकित ने बैग से चौकलेट निकाला और फिर बेटी को देते हुए बोला, ‘‘बेटा, देखो अंकल आप के लिए क्या लाए हैं.’’

‘‘थैंक्यू अंकल,’’ उस ने खुशी से चौकलेट लेते हुए कहा, ‘‘अंकल, आप को कैसे पता चला कि मैं आने वाली हूं?’’

‘‘अरे बेटा, यह सब तो महसूस करने की बात है. मुझे लग रहा था कि आज तुम मम्मी के साथ आओगी.’’

वह मुसकरा उठी. फिर हम दोनों को बायबाय कह कर अपने दोस्त के घर चली गई. हम अपनी क्लास में चले गए.

अंकित अब मुझे काफी भला लगने लगा था. किसी को करीब से जानने के बाद ही उस की असलियत समझ में आती है. अंकित भी अब मुझे एक दोस्त की तरह ट्रीट करने लगा, मगर हमारी बातचीत और मुलाकातें सीमित ही रहीं.

इधर कुछ दिनों से मेरी तबीयत ज्यादा खराब रहने लगी थी. फिर एक दिन अचानक मुझे हौस्पिटल में दाखिल होना पड़ा. सभी जांचें हुईं. पता चला कि मेरी एक किडनी बिलकुल खराब हो गई है. दूसरी तो पहले ही बहुत वीक हो गई थी, इसलिए अब नई किडनी की जरूरत थी. मगर मुझ से मैच करती किडनी मिल नहीं रही थी. सब परेशान थे. डाक्टर भी प्रयास में लगे थे.

एक दिन मेरे फोन पर अंकित की काल आई. उस ने मेरे इतने दिनों से क्लास में न आने पर हालचाल पूछने के लिए फोन किया था. फिर पूरी बात जान उस ने हौस्पिटल का पता लिया. मुझे लगा कि वह मुझ से मिलने आएगा, मगर वह नहीं आया. सारे रिश्तेदार, मित्र मुझ से मिलने आए थे. एक उम्मीद थी कि वह भी आएगा. मगर फिर सोचा कि हमारे बीच कोई ऐसी दोस्ती तो थी नहीं. बस एकदूसरे से पूर्वपरिचित थी, इसलिए थोड़ीबहुत बातचीत हो जाती थी. ऐसे में यह अपेक्षा करना कि वह आएगा, मेरी ही गलती थी.

समय के साथ मेरी तबीयत और बिगड़ती गई. किडनी का इंतजाम नहीं हो पा रहा था. फिर एक दिन पता चला कि किडनी डोनर मिल गया है. मुझे नई किडनी लगा दी गई. सर्जरी के बाद कुछ दिन मैं हौस्पिटल में ही रही. थोड़ी ठीक हुई तो घर भेज दिया गया. फ्रैंच क्लासेज पूरी तरह छूट गई थीं. सोचा एक दफा अंकित से फोन कर के पूछूं कि क्लास और कितने दिन चलेंगी. फिर यह सोच कर कि वह तो मुझे देखने तक नहीं आया, मैं भला उसे फोन क्यों करूं, अपना विचार बदल दिया.

समय बीतता गया. अब मैं पहले से काफी ठीक थी. फिर भी पूरे आराम की हिदायत थी.

एक दिन शाम को अजीत मेरे पास बैठे हुए थे कि तभी फ्रैंच क्लासेज का जिक्र हुआ. अजीत ने सहसा ही मुझ से पूछा, ‘‘क्या अंकित तुम्हारा गहरा दोस्त था? क्या रिश्ता है तुम्हारा उस से?’’

‘‘आप ऐसा क्यों पूछ रहे हैं?’’ मैं ने चौंकते हुए कहा.

‘‘अब ऐसे तो कोई अपनी किडनी नहीं देता न. किडनी डोनर और कोई नहीं, अंकित नाम का व्यक्ति था. उस ने मुझे बताया कि वह तुम्हारे साथ फ्रैंच क्लास में जाता है और तुम्हें अपनी एक किडनी देना चाहता है. तभी से यह बात मुझे बेचैन किए हुए है. बस इसलिए पूछ लिया.’’

अजीत की आंखों में शक साफ नजर आ रहा था. मैं अंदर तक व्यथित हो गई, ‘‘अंकित सचमुच केवल क्लासफैलो था और कुछ नहीं.’’

‘‘चलो, यदि ऐसा है, तो अच्छा वरना अब क्या कहूं,’’ कह कर वे चले गए. पर उन का यह व्यवहार मुझे अंदर तक बेध गया कि क्या मुझे इतनी भी समझ नहीं कि क्या गलत है और क्या सही? किसी के साथ भी मेरा नाम जोड़ दिया जाए.मैं बहुत देर तक परेशान सी बैठी रही. कुछ अजीब भी लग रहा था. आखिर उस ने मुझे किडनी डोनेट की क्यों? दूसरी तरफ मुझ से मिलने भी नहीं आया. बात करनी होगी, सोचते हुए मैं ने अंकित का फोन मिलाया, मगर उस ने फोन काट दिया. मैं और ज्यादा चिढ़ गई. फोन पटक कर सिर पकड़ कर बैठ गई.

तभी अंकित का मैसेज आया, ‘‘मुझे माफ कर देना निधि. मैं आप से बिना मिले चला आया. कहा था न मैं ने कि दीवानों को अपने प्यार की खातिर कितनी भी तकलीफ सहनी मंजूर होती है. मगर वे अपनी मुहब्बत की आंखों में तकलीफ नहीं सह सकते, इसलिए मिलने नहीं आया.’’

मैं हैरान सी उस का यह मैसेज पढ़ कर समझने का प्रयास करने लगी कि वह कहना क्या चाहता है. मगर तभी उस का दूसरा मैसेज आ गया, ‘‘आप से वादा किया था न मैं ने कि उस मैसेज भेजने वाले का नाम बताऊंगा. दरअसल, मैं ही आप को मैसेज भेजा करता था. मैं आप से बहुत प्यार करता हूं. आप जानती हैं न कि इनसान जिस से प्यार करता है उस के आगे बहुत कमजोर महसूस करने लगता है. बस यही समस्या है मेरी. एक बार फिर आप से बहुत दूर जा रहा हूं. अब बुढ़ापे में ही मुलाकात करने आऊंगा. पर उम्मीद करता हूं, इस दफा आप मेरा नाम नहीं भूलेंगी, गुडबाय.’’

अंकित का यह मैसेज पढ़ कर मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं मुसकराऊं या रोऊं. अंदर तक एक दर्द मेरे दिल को बेध गया था. सोच रही थी, मेरे लिए ज्यादा गहरा प्यार किस का है, अजीत का, जिन्हें मैं ने अपना सब कुछ दे दिया फिर भी वे मुझ पर शक करने से नहीं चूके या फिर अंकित का, जिसे मैं ने अपना एक पल भी नहीं दिया, मगर उस ने आजीवन मेरी खुशी चाही.