सम्मान और सफलता समाज में व्यक्ति की हैसियत की मोहताज नहीं होती. मेहनत और लगन ही उस की जिंदगी की सच्ची तस्वीर बनाते हैं. रांची के साधारण से औटोचालक शिवनारायण ने कहां सोचा था कि वो कभी अपनी बिटिया को पद्मश्री अवार्ड से सम्मानित होते हुए देखेंगे. सिर्फ पद्मश्री ही नहीं, उन्हें 2012 में खेल से जुड़ा दूसरा सब से बड़ा अवार्ड, अर्जुन अवार्ड समेत और भी कई सम्मान मिल चुके हैं.

रांची से 15 किमी दूर, एक छोटे से गांव में रहने वाली दीपिका कुमारी ने तीरंदाजी के क्षेत्र में महिलाओं का परचम लहराया है. औटोचालक पिता और नर्स मां की बेटी दीपिका कुमारी बचपन में पेड़ से आम तोड़ती और लकड़ी के बने तीर धनुष से निशाने लगाती थीं. आज वह छोटी सी उम्र में ही इतनी बड़ी तीरंदाज बन गईं कि उन का नाम फोर्ब्स पत्रिका के ‘30 अंडर 30’ की फेहरिश्त में शामिल हो चुका है.

वर्ष 2013 में उन्होंने मेडिलिन के आर्चरी वर्ल्ड कप में देश के लिए गोल्ड मैडल जीता था और नवंबर 2015 में सिल्वर मैडल हासिल किया. हाल ही में उन्हें पद्मश्री अवार्ड हेतु दिल्ली बुलाया गया. बेटी की सफलता से गदगद मांबाप के लिए यह सब एक सपने जैसा था. अपनी बेटी का अवार्ड थामे मातापिता गत 30 मार्च को गरीब रथ एक्सप्रेस ट्रेन से रांची स्टेशन पर उतरे तो उन की सादगी देखते ही बनती थी. पिता स्वयं औटो चला कर घर की तरफ रवाना हुए और पीछे बेटी के मैडल को संभाले मां बैठी थीं. दीपिका कुमारी दिल्ली से ही तुर्की जा चुकी थी.