नोटबंदी की मार सबसे अधिक दुकानदार झेल रहा है. ग्राहक के पास पैसे नहीं है. वह केवल बहुत जरूरी चीजों पर ही पैसा खर्च कर रहा है. ऐसे में होटल, जनरल मर्चेन्ट, चाटपूरी के ठेले वाले, पत्रिकाओं और मिठाईयों सबका कारोबार ठप्प है.

नकदी की कमी से नोटबंदी के बाद लोगों की खरीदारी काफी प्रभावित हुई है. बड़े दुकानदारों का भी कारोबार प्रभावित हुआ है. इसमें ज्वेलरी कारोबार, साड़ी, कपड़े और जूतों की दुकाने प्रमुख हैं. लखनऊ सर्राफा एसोसिएशन के विनोद माहेश्वरी कहतें है, जो कारोबार प्रभावित हुआ है उसे पटरी पर आने में देर लगेगा. यह जरूरी नहीं है कि पूरा कारोबार पहले जैसा हो जाये. यह पूरे देश के सर्राफा कारोबार की हालत है. शादी के सीजन के समय भी आभूषण की खरीदारी नहीं हो सकी.

आमतौर पर शादी के सीजन में ज्वेलरी, साड़ी और दूसरे उससे जुड़े कारोबार में तेजी आ जाती थी. नोटबंदी के असर के चलते इस बार पूरा कारोबार ठप्प पड़ा रहा. लखनऊ के चिकन कारोबार, मेरठ का सर्राफा कारोबार, वाराणसी का बनारसी साड़ी और आगरा का जूता कारोबार शादी के सीजन के बाद भी तेजी नहीं पकड़ सका. लखनऊ में सितम्बर माह में चिकन कारोबार में करीब 12 करोड़ का कारोबार हुआ था. नोटबंदी के बाद पूरे माह में 1 करोड़ का कारोबार भी नहीं हो पाया है. यही हाल वाराणसी के बनारसी साड़ी कारोबार का हुआ है. शादी के सीजन के बाद भी साड़ी कारोबार में 70 फीसदी की कमी आई है.

असल में इन कारोबार के ठप्प होने का असर दुकानदारों से ज्यादा मजदूरी करने वालों पर पड़ा है. उत्तर प्रदेश के कुछ शहर अलग अलग कारोबार के लिये मशहूर हैं. मुरादाबाद का पीतल उद्योग, आगरा का जूता और पेठा, फिरोजाबाद की चूड़ी उद्योग, बनारस की साड़ी, मेरठ का सर्राफा और गजक, नोएडा का कपड़ा उ़द्योग प्रमुख है. यहां बड़ी तादाद में दैनिक मजदूर काम करते है. इन कारोबार के प्रभावित होने से यह मजदूर बेकार हो गये हैं. इनके घर परिवार अब अपनी जरूरतों को पूरा नहीं कर पा रहे हैं.

कारोबारी कहते हैं बाजार में छोटे नोटों की कमी है. जिससे छोटी खरीददारी कम हो रही है. बैंक ग्राहकों को बड़े नोट दे रहे हैं. जिनसे छोटी दुकानों पर भुगतान नहीं हो पा रहा. सरकार हर बात के जवाब में यही तर्क देती है कि चेक से भुगतान करें. 200-300 की खरीददारी करने वाले चेक से कैसे भुगतान करे यह व्यवहारिक नहीं है. ऐसे में दुकानदार उधार बेचने को मजबूर हैं.

लखनऊ के गुरूनानक मार्केट में पिछले 50 साल से किताबों, पत्रिकाओं, की दुकान चलाने वाले सुभाष पुस्तक भंडार के राजकुमार छाबड़ा कहते हैं, इतने समय में पहली बार दुकानदारी में इस तरह की गिरावट देखी है. बहुत बार अलग अलग तरह की परेशानियां आई पर पहली बार ग्राहकों की बेहद कमी दिख रही है. उधार बेचने के बाद भी कारोबार को पटरी पर लाना संभव नहीं दिख रहा है.