बीसीआई की निरंकुश नीतियों और बेलगाम रवैए के चलते देशभर में कई विधि महाविद्यालय बंदी के कगार पर हैं. कुछ राज्यों में तो कई महाविद्यालयों पर ताला भी लग चुका है. जाति व राजनीति का चश्मा पहने बीसीआई की तानाशाही कानून और कानूनी शिक्षा के भविष्य के लिए कोई अच्छा संकेत नहीं है.

‘‘अगर हालात यही रहे और जल्द कुछ न किया गया तो साल 2014 तक मध्य प्रदेश में विधि महाविद्यालयों की तादाद 15 भी नहीं रह जाएगी. अभी तक 47 में से  25 कालेजों की मान्यता रद्द की जा  चुकी है और इस का जिम्मेदार  बीसीआई यानी बार काउंसिल औफ इंडिया को ही ठहराया जाएगा.’’ ऐसा मध्य प्रदेश के शिवपुरी शहर में स्थित एसएमएस स्नातकोत्तर महाविद्यालय की जनभागीदारी समिति के अध्यक्ष अजय खेमरिया बेहद तल्ख लहजे में कहते हैं.

कानून और कानूनी शिक्षा के लिहाज से बात वाकई चिंता की है. इस का सारा खमियाजा छात्रों को उठाना पड़ रहा है. राज्य में धड़ल्ले से बंद हो रहे विधि महाविद्यालयों की चिंता किसी को है, ऐसा भी नहीं लग रहा.  बीसीआई की खलनायकी भूमिका क्या है और इस के माने क्या हैं, इस से ज्यादा दिलचस्पी की बात यह है कि विधि महाविद्यालयों का आर्थिक संचालन राज्य सरकार उच्च शिक्षा विभाग के जरिए करती है लेकिन विधि महाविद्यालयों के मानक तय करने का हक उस के पास नहीं है. तमाम कोशिशों व इन पर पानी की तरह पैसा बहाने के बाद भी उच्च शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार क्यों नहीं आ रहा, इस यक्ष प्रश्न का जवाब मध्य प्रदेश के बंद होते विधि महाविद्यालय इस लिहाज से भी हैं कि शिक्षा की गुणवत्ता तय करने वाली एजेंसियां बेलगाम हो कर नियम व शर्तें थोपती हैं. बीसीआई उन का अपवाद नहीं है.

कानून की पढ़ाई में बहुत ज्यादा तामझाम की जरूरत नहीं पड़ती है. एलएलबी करने वाले 50 प्रतिशत छात्र भी वकालत को व्यवसाय के रूप में नहीं अपनाते. जाहिर है अधिकतर छात्र कानून जानना चाहते हैं और यह जरूरी भी है कि ज्यादा से ज्यादा लोग कानून पढ़ कर उन्हें जानें ताकि पुलिस और अदालतों की तकलीफदेह कार्यवाही से निबटने के लिए उन के पास जरूरी महत्त्वपूर्ण जानकारियां हों.  आजादी के पहले उच्च घरानों के युवा ही कानून की पढ़ाई कर पाते थे. विदेशों से कानून की डिगरी ले कर आए मध्यवर्गीय युवा जल्द ही उच्च वर्ग में शुमार होने लगते थे क्योंकि उन्हें भारीभरकम फीस और समाज व राजनीति में सम्मानजनक स्थान मिलता था. पर  70 के दशक से यह सिलसिला टूटा तो हर कोई एलएलबी कर वकील बनने लगा.

ऊंची जाति वालों का दबदबा जो कानून और कानूनी पढ़ाई से टूटा तो आज तक थमने का नाम नहीं ले रहा है. पिछड़े, दलित और आदिवासी युवा भी तेजी से एलएलबी करने लगे. इस की एक बड़ी वजह कानून की पढ़ाई का सुलभ होना और वकीलों की बढ़ती जरूरत होना थी.  छोटे तबके के छात्र और वकील बढ़े तो देखते ही देखते अदालतों का नजारा भी बदल गया. कुछ साल पहले तक जहां ब्राह्मण, कायस्थ और जैन समुदायों के वकील ही दिखते थे वहां उन टेबल, कुरसियों पर बराबरी से पिछड़े वर्ग के वकील भी बैठने लगे. हर जाति का अपना अलग एक नामी वकील होने लगा. नतीजतन, सवर्णों का दबदबा कम होने लगा.

कानूनी पढ़ाई

कानून की पढ़ाई कैसी और कैसे हो,  इस की जिम्मेदारी बीसीआई को मिली तो उस ने भी दूसरी एजेंसियों की तरह सवर्णों के हक में आंखें तरेरनी शुरू कर दीं. सरकारी विधि महाविद्यालयों में आज भी 50 फीसदी छात्र ओबीसी, एससी  या एसटी कोटे के होते हैं जिन्हें  सालाना 15-20 हजार रुपए का खर्च अखरता नहीं. निजी महाविद्यालयों की 40-50 हजार रुपए तक की फीस का भार आज भी इस वर्ग के छात्र नहीं उठा पाते.   बीसीआई ने शासकीय विधि महाविद्यालयों के लिए जो पैमाने बनाए और वक्तवक्त पर उन में बदलाव किए उन का एक बड़ा फर्क यह पड़ रहा है कि फिर से कानूनी शिक्षा और वकालत का पेशा सवर्णों के कब्जे में जा रहा है. विदिशा के एक 90 वर्षीय अधिवक्ता रामनारायण वर्मा की मानें तो, ‘‘बार काउंसिल की उपयोगिता पहले इतनी भर थी कि वह नए विधि स्नातकों को सनद देता था. हम वकीलों को भी खुशी रहती थी कि हमारा कोई राष्ट्रीय संगठन है जो कहने को ही सही वकीलों के हितों का खयाल रखता है.’’

पहले छात्र एलएलबी की डिगरी ले कर कालेज से निकलता था तो उसे सनद हासिल करने में सहूलियत रहती थी. रामनारायण वर्मा कहते हैं, ‘‘मुझे याद नहीं कि 70 के दशक में बहुत ज्यादा वकील छोटी जाति के थे. उस दौरान अधिकांश वकील ऊंची जातियों के हुआ करते थे. वजह, आरक्षित कोटे से आए युवाओं की पहली पसंद सरकारी नौकरी हुआ करती थी जो आरक्षण की सहूलियत के चलते उन्हें स्नातक होने के बाद ही मिल जाती थी. पर जब आरक्षण में भी सरकारी नौकरी मिलना मुश्किल हो गया तो  लोग एलएलबी करने लगे और वकीलों की भीड़ बढ़ने लगी. उस समय एक छोटे  शहर के अधिवक्ता संघ में  50-60 सदस्य भी नहीं होते थे जबकि अब वकीलों की तादाद 2 हजार का आंकड़ा छूने लगी है. लड़कियां भी इफरात से कानून की पढ़ाई करने लगी हैं.’’

जाहिर है बार काउंसिल औफ इंडिया को ताकत और अधिकार वकीलों की बढ़ती संख्या से मिले जो कसबों और देहातों से निकल कर आते हैं. यही बीसीआई बेहद कू्रर और साजिशाना तरीके से, गैर इरादतन ही सही, नए विधि स्नातक और वकीलों को पैदा होने से रोक रही है तो लगता यह भी है कि कहीं इस की वजह जातिगत पूर्वाग्रह तो नहीं. इस संभावना से एकदम इनकार नहीं किया जा सकता.

सख्त नियम, कड़ी शर्तें

कानूनी पढ़ाई के अलावा विधि महाविद्यालयों के मामले में बीसीआई ने नियम, शर्तें इतने कठोर बनाए हैं कि व्यवहार में उन का पालन करना असंभव है इसलिए धड़ल्ले से ला कालेजों की मान्यता रद्द की जा रही है.  बीसीआई का पहला पैमाना यह है कि ला कालेज 15 से 18 हजार वर्गफुट क्षेत्रफल में निर्मित होना चाहिए और उस की अलग से इमारत होनी चाहिए.   अगर ऐसा नहीं हो तो कहां का पहाड़ टूट पड़ेगा, इस सवाल का जवाब शायद ही बीसीआई के पास हो. वजह, इस नियम के वजूद में आने से पहले एलएलबी की कक्षाएं स्नातकोत्तर महाविद्यालयों में इतमीनान से चलती थीं और अधिकांश कालेजों में कानून की पढ़ाई शाम को होती थी जब क्लासरूम खाली हो जाते थे. नियमित प्राध्यापकों के अलावा वरिष्ठ अधिवक्ता भी अनुबंध पर पढ़ाते थे पर अब बीसीआई का कहना है कि विधि का प्राचार्य भी अलग होना चाहिए और कम से कम 4 प्राध्यापक होने चाहिए और इतने ही अंशकालिक प्राध्यापक भी होने चाहिए.

कानून की पढ़ाई का कालेज के क्षेत्रफल से कोई खास ताल्लुक नहीं है पर 15 से 18 हजार वर्गफुट क्षेत्रफल थोपने का मतलब है सीधेसीधे कालेज को बंद कर देने का एलान कर डालना. इस शर्त पर भी कई कालेज खरे उतरने लगे तो नया फरमान यह जारी कर दिया गया कि प्राध्यापकों के आवास भी महाविद्यालय परिसर में होने चाहिए.  इस प्रतिनिधि ने भोपाल स्थित विधि महाविद्यालय का मुआयना किया तो यह शर्त मजाक लगी. वजह, राज्य स्तरीय ला कालेज है तो पौश इलाके जहांगीराबाद में लेकिन वहां सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं  है. एक भी आवास उस के परिसर में नहीं है. अलबत्ता भोपाल की ही नैशनल  ला यूनिवर्सिटी (एनएलआईयू) जरूर आवासीय है. मगर इन दोनों में जमीन- आसमान का फर्क है. न तो इन की तुलना की जा सकती और न ही यह उम्मीद की जा सकती कि हर एक ला कालेज एनएलआईयू जैसा हो जाएगा या होना ही चाहिए.

एनएलआईयू दरअसल सरकार ने प्रबंधन कालेजों की तर्ज पर अमीर तबके के छात्रों के लिए खोले हैं जहां पढ़ाई का माध्यम अंगरेजी है और छात्रों का जीवनस्तर औसत कानूनी छात्र से हजार गुना ज्यादा बेहतर है. इस में पढ़ाई का सालाना खर्च 5 लाख रुपए आता है और छात्रों को प्लेसमैंट की भी गारंटी मिलती है.

अब अगर राज्य सरकार इन 2 शर्तों को पूरा करने की सोचे भी तो उसे लगभग  5 अरब रुपए खर्चने पड़ेंगे, जो निहायत ही गैरजरूरी हैं.  उच्च शिक्षा विभाग के एक अधिकारी का नाम न छापने की शर्त पर कहना है, यह बेवकूफी भरी बात है. विभाग वैसे ही तंगी से जूझ रहा है, ऐसे में अरबों रुपए कहां से आएंगे. यहां तो प्राध्यापकों को यूजीसी के मानदंडों के अनुसार वेतनमान देने और एरियर्स देने के लाले पड़े हैं. ला कालेज बंद हों, यह कोई नहीं चाहता लेकिन बीसीआई अगर कर रहा है तो हमें सहूलियत ही है.

यह सहूलियत है कम कालेज तो कम काम, लेकिन दिख यह भी रहा है कि उच्च शिक्षा विभाग विधि महाविद्यालयों को चलाने की अपनी जिम्मेदारी पर खरा नहीं उतर रहा है. ला कालेजों का वजूद बनाए रखने के लिए विभाग ने 26 अप्रैल को विधि महाविद्यालयों के प्राचार्यों की एक मीटिंग बुलाई थी जिस में चर्चा के केंद्र में बीसीआई ही था. इस मीटिंग में शामिल एक प्राचार्य का कहना है कि माहौल हताशा का था. थोड़ी सी औपचारिक चर्चा के बाद ही मान लिया गया कि विभाग बीसीआई के मानकों के अनुरूप विधि महाविद्यालयों को बदल नहीं सकता.

इस प्राचार्य का कहना है कि बीसीआई की टीम जब निरीक्षण के लिए आती है तो हमें दामादों की तरह उन की आवभगत करने में जेब का पैसा खर्च करना पड़ता है. इस बाबत हमें चंदा भी करना पड़ता है. बीसीआई की टीम को महंगे होटल में ठहराने से ले कर महंगे खानेपीने का इंतजाम करने से हम छोटीमोटी गाज से बच जाते हैं.  इस प्राचार्य का डर यह भी है कि अगर इसी तरह ला कालेज बंद होते रहे तो कानून के प्राध्यापकों का क्या होगा? विभाग तनख्वाह देने पर भले मजबूर होगा पर काम तो तरहतरह के लेगा जो हमारी हैसियत व प्रतिष्ठा से काफी नीचे भी हो सकते हैं.

दरअसल, एक तलवार विधि प्राध्यापकों के सिर पर भी लटक रही है कि कल को उच्च शिक्षा विभाग और यूजीसी मिल कर यह न कहने लगें कि चूंकि अब आप की आवश्यकता नहीं है इसलिए क्यों न आप को अनिवार्य सेवानिवृत्ति दे दी जाए.  बहरहाल, इस मीटिंग में यह तय नहीं हो पाया  कि बीसीआई के कड़े मानदंडों से कैसे बचा जाए या कैसे उन्हें पूरा किया जाए. विधि के एक प्राध्यापक की मानें तो ‘बीसीआई की शर्तें हास्यास्पद और अव्यावहारिक हैं. उन्हें किसी भी सूरत में पूरा नहीं किया जा सकता. अधिकांश विधि महाविद्यालय सालों से चल रहे हैं. नए नियम उन पर लागू करना सरासर  ज्यादती है. इस से तो बेहतर होगा कि बीसीआई ही अपने मानदंड बदले या फिर अपने बनाए मानक पूरे करने के लिए 50 फीसदी पैसा दे या फिर राज्य सरकार विशेष कानून बना कर उस से निरीक्षण करने और मान्यता रद्द करने का अधिकार छीने.’

अगर बात बिहार की करें तो वहां का नजारा भी कुछ अलग नहीं है. पटना के सिविल कोर्ट में भीड़भाड़ और चिल्लपौं के बीच सड़क के किनारे पेड़ के नीचे टेबल और कुरसी लगा कर काला कोट पहन कर बैठे लोगों की लंबी कतारें हैं. कहीं पर 10-12 काले कोट वाले मजमा लगा कर गप्पें हांक रहे होते हैं तो कहीं अकेले में बैठे लोग शून्य में कुछ घूर रहे होते हैं. हर सुबह 10 बजे से ले कर शाम 5 बजे तक काले कोट वालों का ग्रुप इधरउधर घूमता मिल जाता है.

3 साल एलएलबी की पढ़ाई करने के बाद वकालत में कैरियर का सपना देखने वाले ज्यादातर युवा वकील के बजाय ‘एजेंट’ बन कर रह जाते हैं. उन का काम है किसी तरह से पट्टी पढ़ा कर क्लाइंट को फांसना और फिर केस जल्द से जल्द खत्म कराने की गारंटी दे कर सालों तक कोर्ट के चक्कर लगवाना. ज्यादातर वकीलों का यही धंधा बना हुआ है. राज्य में 80 हजार लाइसैंसधारी वकील हैं जिन में से  5-6 हजार वकीलों की ही प्रैक्टिस अच्छी चल रही है, 10-15 हजार वकीलों की प्रैक्टिस महज इतनी है कि परिवार चलाने लायक खर्च निकल आता है. इन के अलावा करीब 20 हजार वकील ऐसे हैं जो किसी भी तरह से कुछ कमाई कर लेते हैं, बाकी वकील तो मुकदमे की आस में रोज घर से निकल कर कोर्ट आते हैं और खाली हाथ ही वापस लौट जाते हैं.

पटना हाईकोर्ट के एक सीनियर वकील दबी जबान में कहते हैं कि ला की पढ़ाई का सरकार के द्वारा कोई ठोस इंतजाम नहीं किया गया है और न ही इस में इंजीनियरिंग, मैडिकल, एमबीए जैसा स्कोप और ग्लैमर ही दिखता है. बार काउंसिल औफ इंडिया के दखल और उस के सदस्यों की सियासी महत्त्वाकांक्षा के बीच कानून की पढ़ाई के लिए बने कालेजों और संस्थानों की हालत बदतर है. बार काउंसिल को ला इंस्टिट्यूटों की देखरेख का जिम्मा तो मिला है पर पढ़ाई की क्वालिटी तय करने में उन की दिलचस्पी काफी कम होती है. बार काउंसिल औफ इंडिया के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा पिछली बार कांग्रेस के टिकट पर गोपालगंज जिले के बैकुंठपुर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ कर अपनी सियासी जमीन तलाश चुके हैं.

बिहार में सरकारी लेवल के कुल  26 ला कालेज और इंस्टिट्यूट हैं, जिन में न ठीक तरह से पढ़ाई होती है और न ही परीक्षाएं समय पर होती हैं. सैशन हमेशा लेट चलता है. उन में दाखिला लेने वाले ज्यादातर स्टूडैंट्स पढ़ाई के नाम पर टाइमपास ही करते हैं. कई सीनियर वकीलों का मानना है कि कानून की पढ़ाई का ‘कानून’ ही अजबगजब है. ऐसे संस्थानों के खर्च का काम तो सरकार के जिम्मे है पर उस की गुणवत्ता और पढ़ाई का तौरतरीका तय करने का काम बार काउंसिल करती है, जिस की वजह से ही कानून की पढ़ाई और कैरियर में अराजक हालात बने हुए हैं.

मुंबई में एक बड़ी कंपनी में कानूनी सलाहकार का काम कर लाखों रुपए के सालाना पैकेज की नौकरी कर रहे सोनल वर्मा कहते हैं, ‘‘किसी भी फील्ड में कैरियर बनाने से पहले उस के बारे में जाननेसमझने के साथ उस में रुचि होनी भी जरूरी है, तभी पढ़ाई और कैरियर बढि़या हो सकेगा.’’

एलएलबी की डिगरी लेने के बाद बार काउंसिल से वकालत करने का लाइसैंस लेने के लिए मोटी रकम खर्च करनी पड़ती है. युवाओं को लाइसैंस देने के लिए 10 से 20 हजार रुपए की फीस वसूली जाती है. एलएलबी किए रिटायर सरकारी अफसरों से 40 से 50 हजार रुपए तक वसूले जाते हैं. पढ़ाई में समय और पैसा लगाने के बाद वकालत करने का लाइसैंस लेने में काफी कुछ गंवा चुके हजारों वकीलों का कैरियर अंधेरे में है.

कालेजों पर लटक रही तलवार

बिहार और मध्य प्रदेश की तर्ज पर महाराष्ट्र और गोआ में इस समय विधि महाविद्यालय की संख्या तकरीबन 112 है, जिन में से 30 को बंद किए जाने के लिए बीसीआई ने नोटिस जारी किए हैं.  मुंबई यूनिवर्सिटी के विधि विभाग के प्रमुख डा. अशोक येंडे बताते हैं कि पहले जब वे मुंबई के सी ला कालेज में प्रमुख थे तो वहां 900 छात्रों पर केवल 3 प्राध्यापक थे जबकि बार काउंसिल औफ इंडिया के मुताबिक वहां 10 प्राध्यापक होने चाहिए. वहां छात्र की फीस 8 हजार रुपए है. अगर प्राध्यापक ज्यादा नियुक्त किए जाएंगे तो उन के वेतन का भार कालेज पर पड़ेगा. नतीजतन, छात्रों की फीस बढ़ानी पड़ेगी, जो शायद संभव नहीं है. इसलिए  32 विजिटिंग प्राध्यापक रखे गए हैं.

ये प्राध्यापक सीरियस नहीं होते. किसी तरह पढ़ा कर चले जाते हैं जबकि कालेज के 3 प्राध्यापकों पर पढ़ाने का भार अधिक होने के चलते वे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं दे पाते. यही वजह है कि ला कालेज से 7 साल की शिक्षा प्राप्त कर के भी छात्र बेरोजगार हो कर इधरउधर भटकते हैं.  बीसीआई के सदस्य एडवोकेट सतीश आबाराव देशमुख का इस बारे में कहना है कि परिषद राज्य सरकार को सारी बातें बताती है पर वह नहीं सुनती. हर ला कालेज में प्राध्यापक कम हैं अगर हैं भी तो प्रशिक्षित नहीं हैं. राज्य सरकार की ओर से कोई सहायता न मिलने की वजह से परिषद को कई बार कड़े कदम उठाने पड़ते हैं. वे कहते हैं कि बीसीआई किसी भी विधि महाविद्यालय को बंद करने के पक्ष में नहीं है.

बात चाहे कुछ भी हो पर इतना सही है कि बीसीआई अपनी करतूत को राज्य सरकार के मत्थे मढ़ रही है लेकिन इस का खमियाजा छात्रों को भुगतना पड़ता है.

सरसुना कालेज पर टेढ़ी नजर

जहां तक पश्चिम बंगाल की बात है तो पूरे बंगाल में 25 सरकारी ला कालेज हैं, जिन में 8 प्राइवेट हैं. बंगाल में बीसीआई के अध्यक्ष अंसर मंडल का कहना है कि इस का कारण यह है कि यहां ज्यादातर ला कालेज सरकारी हैंऔर विश्वविद्यालय परिसर में हैं. कुछ ला कालेजों की अपनी बिल्डिंग हैं जहां आधारभूत ढांचा पूरी तरह से मुकम्मल है. बंगाल में जिन ला कालेजों ने बीसीआई की मान्यता के लिए आवेदन किया?था, 3 महीने पहले उन कालेजों में बीसीआई की ओर से निरीक्षण किया गया और कोई खास समस्या नहीं नजर आई है, सिवा दक्षिण कोलकाता के बेहाल स्थित सरसुना ला कालेज के.

बीसीआई की ओर से निरीक्षण के लिए?भेजी गई टीम के एक सदस्य प्रो. जे के दास का कहना है कि कालेज में आधारभूत सहूलियत बीसीआई के मानदंड के अनुरूप नहीं है. सब से बड़ी समस्या कालेज के प्रधानाध्यापक की नियुक्ति है. प्रो. दास का कहना है कि वे इस पद के लिए उपयुक्त नहीं हैं. एक कालेज के प्रधानाध्यापक के लिए बीसीआई ने जो मानदंड स्थापित किए हैं, कालेज के प्रधानाध्यापक उन पर खरे नहीं उतरते हैं. उन के पास पीएचडी की डिगरी नहीं है.

इस के अलावा लंबे समय से सरसुना ला कालेज के प्रबंधन को ले कर भी कुछ समस्या है, जिस को देखते हुए बंगाल उच्च शिक्षा विभाग की ओर सरकार ने कोलकाता विश्वविद्यालय के अंतर्गत आशुतोष कालेजों के डीन डा. शुभ्रांशु शेखर चटर्जी को गवर्निंग बौडी का सदस्य मनोनीत किया है. डा. चटर्जी, जो बंगाल के कई ला कालेज से जुड़े हुए हैं, का कहना है कि सरसुना ला कालेज प्रबंधन ने आज तक कभी उन्हें बैठक में आमंत्रित नहीं किया. दूसरी तरफ वे समस्या से इनकार करते हैं.

मनमानी की मिसाल

ऐसा भी नहीं है कि बीसीआई ईमानदारी से अपना काम कर रही हो अगर उस के निरीक्षण दल की पांचसितारा आवभगत की जाए यानी घूस दी जाए तो यह अपने ही बनाए नियमकायदे ताक पर रखती  हुई मान्यता दे भी देती है. तमाम खामियों, जो उस के नियमों और शर्तों की देन हैं, को भूलने के लिए वह तैयार भी रहती है.  अजय खेमरिया की मानें तो बीसीआई के निरीक्षण दल के सदस्य नामी वकील होते हैं जिन का मान्यता के एवज में रिश्वत खाना साफ दिख रहा है. प्राइवेट ला कालेजों को मध्य प्रदेश में धड़ल्ले से मान्यता दी जा रही है, बावजूद इस के कि वे सरकारी कालेजों के मुकाबले रत्तीभर भी मानदंडों पर खरे नहीं उतरते हैं. चंबल, ग्वालियर इस की बेहतर मिसाल हैं.

बात सच इसलिए भी है कि बीसीआई निरीक्षण टीम की शिकायत ग्वालियर के ब्रिटिश काल से चल रहे एलएलबी कालेज के प्राचार्य ने लिखित में भी दी थी कि उन से मान्यता के एवज में महंगी सुविधाओं की मांग की गई. इस कालेज की मान्यता महज इसलिए रद्द कर दी गई कि कालेज प्रबंधन निरीक्षण दल के सदस्यों को महंगा विदेशी रेजर मुहैया नहीं करा पाया था.

प्राइवेट कालेज घूस का पैसा अपनी जेब से नहीं देते बल्कि फीस बढ़ा कर छात्रों से वसूलते हैं. राज्य में यह चर्चा आम है कि बीसीआई की यह मार अप्रत्यक्ष रूप से  निम्न और मध्यमवर्गीय छात्रों पर पड़ रही है. पर हकीकत में यह छोटी जाति के छात्रों पर पड़ रही है जो बड़े अरमान ले कर कानून की पढ़ाई कर वकालत को अपना पेशा बनाना चाहते हैं.

जहां तक पढ़ाई की गुणवत्ता की बात है तो वह प्राइवेट कालेजों के मुकाबले सरकारी कालेजों में बेहतर इसलिए है कि सरकार नियुक्ति योग्यताओं पर करती है. अधिकांश प्राध्यापक स्नातकोत्तर और पीएचडी हैं पर प्राइवेट कालेजों में एलएलबी पास प्राध्यापक ही पढ़ा रहे हैं.

एक बड़ी दिक्कत की बात इस तानाशाही से गांवों व कसबाई छात्रों से कानून की पढ़ाई की सहूलियत कालेजों के बंद होने से छिनना है. ऐसे में समस्या का इकलौता हल यही दिख रहा है कि बीसीआई की दादागीरी पर अंकुश लगाया जाए, उस से मान्यता का अधिकार छीना जाना चाहिए या फिर क्षेत्रफल, आवास और दूसरी कड़ी शर्तों में ढील देने के लिए दबाव बनाया जाए वरना प्रदेश के सरकारी विधि महाविद्यालय, यूजीसी, उच्च शिक्षा विभाग और बीसीआई के बीच उलझ कर रह जाएंगे.

 

– पटना से बीरेंद्र, मुंबई से सोमा घोष, कोलकाता से साधना शाह