सरिता विशेष

नवसर्जन अहमदाबाद की एक एन जी ओ है जिसके कर्ता धर्ता कीर्ति राठौर और कांतिलाल परमार डॉक्टर अंबेडकर वचन प्रतिबद्धता समिति से भी जुड़े हैं. इन दोनों ने 16 फुट का एक साबुन तैयार करवाया है जिसे 9 जून को अहमदाबाद में डिस्प्ले किया जाएगा. यह खास साबुन एक खास मकसद से एक खास हस्ती उत्तर प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए खासतौर से वाल्मिक समाज की एक आम महिला से बनवाया गया है. कांतिलाल और कीर्ति की मंशा है कि आदित्यनाथ इस साबुन से नहाकर अपनी शुद्धि कर लें.

यह पहला मामला है जिसमें एक महंत को ही अशुद्ध करार दिया जा रहा है. आमतौर पर मुख्यमंत्रियों को फूल, गुलदस्ते, शॉल, श्रीफल वगैरह भेंट किए जाते हैं पर गुजरात का दलित समुदाय योगी को यह अनूठा साबुन इसलिए देगा कि कुछ दिन पहले ही जब वे कुशीनगर इलाके की दलित मुसहर बस्ती में दौरे पर गए थे तब उनकी तरफ से प्रशासन ने मुसहर दलितों को साबुन, शैम्पू और आजकल का इत्र यानि डियो बांटते यह नसीहत भी मुफ्त दी थी कि वे लोग मुख्यमंत्री के सामने इन खुशबूदार आइटमों को लगाकर ही जाएं. आदित्य नाथ को बदबू से परहेज है या दलितों से यह अफसरों ने नहीं बताया.

बात गुजरात के दलितों को बेइज्जती वाली लगी सो अपनी इज्जत और स्वाभिमान दिखाने उन्होंने 16 फुट के भीमकाय साबुन वाला फैसला ले लिया जिस पर योगी और उनकी सरकार की खासी छीछालेदार हो रही है कि वे भी दलित विरोधी टाइप के हैं. (यह किसी ने न पूछा न सोचा कि वे या कोई और दलित हितैषी थे ही कब)

मुद्दे की बात यह है कि यू पी में दलितों की सामाजिक हैसियत और योगी का रसूख है जो दो ऐसी समान्तर रेखाएं हैं जो कहीं जाकर नहीं मिलतीं. दलित साफ सफाई से नहीं रहते या फिर जन्मना अशुद्ध होते हैं इस पर जरूर हमेशा की तरह एक बार फिर बहस की पूरी गुंजाइश है.  कुशीनगर प्रशासन अगर यह सोचता है कि साबुन से नहाने से दलित पूरी तरह सवर्ण नहीं तो कुछ सवर्णों जैसे हो जाएंगे तो यह तरीका पूरे देश भर में स्व्च्छ भारत अभियान की तरह स्व्च्छ और साफ दलित अभियान की तरह चलाया जाना चाहिए जिससे दलितों को पता चले कि कुछ और भले ही न हुआ हो पर शुद्धि बड़ी सस्ती हो गई है.

धर्मग्रंथों में जो लिखा है वह एक मानवीय त्रुटि है जिसे अब यूं सुधारा जा रहा है. अब यह गुजरात के होनहार और उत्साहित दलितों की जिम्मेदारी है कि वे यह साबित करें कि कोई ब्राह्मण या क्षत्रिय महंत किस बिना पर अशुद्ध होता है इस बाबत वे चाहें तो वेद, पुराण, संहिताएं, उपनिषद और स्मृतियां वगैरह पढ़ सकते हैं और इसके लिए उनके कानों में पिघला शीशा नहीं डाला जाएगा.