सरिता विशेष

दुनियाभर में बाल मजदूरी के खिलाफ अलख जगाने वाले भारत के कैलाश सत्यार्थी और लड़कियों की तालीम के लिए संघर्ष करने वाली पाकिस्तान की मलाला यूसुफजई को संयुक्त रूप से शांति का नोबेल पुरस्कार दिए जाने के बाद भारतीय उपमहाद्वीप में खुशी का माहौल है. नोबेल पुरस्कार के बावजूद क्षेत्र में न तो शांति का वातावरण है, न ही शिक्षा की राह की अड़चनों में कमी आने की संभावना दिखाई दे रही है. शांति का नोबेल मिलने के बाद इस क्षेत्र में मजहबी हिंसा, मारकाट और आतंकवाद का खौफ घटा नहीं है यानी अशांति कायम है.

15 दिसंबर को नार्वे की राजधानी ओस्लो में जब नोबेल सम्मान समारोह चल रहा था, उस वक्त भारत और पाकिस्तान की सीमाओं पर गोलीबारी हो रही थी. लोग मारे जा रहे थे. आतंक से समूचा क्षेत्र भयभीत था. अवार्ड मिलने के महज एक हफ्ते के भीतर ही सिडनी और पेशावर की 2 बड़ी आतंकी घटनाओं ने दुनिया को दहला दिया था. ये हमले उन्हीं 2 बड़े क्षेत्रों पर अधिक हो रहे हैं जिस के लिए कैलाश सत्यार्थी और मलाला को सम्मान से नवाजा गया था. यानी शिक्षा और बच्चों  पर. इन जघन्य घटनाओं ने घरघर में दहशत, दुख और क्षोभ भर दिया.

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नोबेल पुरस्कार के इतिहास में यह पहला मौका है जब भारत और पाकिस्तान को संयुक्त रूप से यह सम्मान दिया गया है. खास बात यह कि एक हिंदू और दूसरा मुसलिम, एक स्त्री और दूसरा पुरुष, एक हिंदुस्तानी तो दूसरा पाकिस्तानी को मिला है. पुरस्कार को ले कर समूचे क्षेत्र में जश्न मनाया गया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा भी सत्यार्र्थी और मलाला को बधाई दी गई. ग्लोबल मार्च अगेंस्ट चाइल्ड लेबर के चेयरमैन कैलाश सत्यार्थी ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ के जरिए बाल अधिकारों के लिए पिछले 35 सालों से लगातार संघर्ष करते रहे हैं. उन्होंने 83 हजार बाल मजदूरों को मुक्ति दिलाई है.

ओस्लो के सिटी हौल में कैलाश सत्यार्थी ने कहा, ‘‘मैं यहां गुमनामी की आवाज, बेगुनाह चीख और अदृश्य चेहरे का प्रतिनिधित्व करता हूं. मैं यहां अपने बच्चों की आवाज और सपनों को साझा करने आया हूं.’’ पाकिस्तान की मलाला ने तालिबान के हमले के बावजूद पाकिस्तान सरीखे देश में लड़कियों की शिक्षा के लिए अपने अभियान को जारी रखने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जताते हुए साहस दिखाया. वे 15 साल की थीं जब बालिका शिक्षा अभियान की अगुआई कर रही थीं. इस से बौखलाए तालिबान के एक आतंकवादी ने उन्हें सिर में गोली मार दी थी.

नोबेल सम्मान के अवसर पर मलाला ने कहा, ‘‘मैं इसे ले कर खुश हूं कि हम खड़े हो सकते हैं और दुनिया को दिखा सकते हैं कि भारत और पाकिस्तान अमन में एकजुट हो सकते हैं तथा बाल अधिकारों के लिए काम कर सकते हैं. मेरे और देश के लिए इस पुरस्कार को जीतना गौरव की बात है. यह पुरस्कार उन सब बच्चों के लिए है जो अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाते हैं.’’ अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के मुताबिक दुनियाभर में 16.8 करोड़ बाल श्रमिक हैं. माना जाता है कि भारत में बाल श्रमिकों का आंकड़ा 6 करोड़ के आसपास है तो उधर पाकिस्तान में भी 6 करोड़ से अधिक बालिकाएं शिक्षा के अधिकार से वंचित हैं. दोनों के नामों की घोषणा नोबेल शांति पुरस्कार समिति ने 10 अक्तूबर को की थी.

सत्यार्थी का संघर्ष

सत्यार्थी की वैबसाइट मुताबिक, बाल श्रमिकों को छुड़ाने के दौरान उन पर कई बार जानलेवा हमले हुए. 17 मार्च, 2011 को दिल्ली की एक कपड़ा फैक्टरी पर छापे के दौरान उन पर हमला किया गया. इस से पहले 2004 में ग्रेट रोमन सर्कस से बाल कलाकारों को छुड़ाने के दौरान उन पर हमला हुआ था. नोबेल से पहले उन के कार्यों के कारण उन्हें विभिन्न राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया. उन्हें 1994 में जरमनी का ‘द एयकनर राइट्स अवार्ड’, 2007 में  ‘मेडल औफ इटेलिया सीनेट’  और 2009 में अमेरिका के ‘द डिफैंडर्स औफ डैमोके्रसी’ अवार्ड मिल चुके हैं. 60 वर्षीय कैलाश सत्यार्थी ने 1980 में बचपन बचाओ आंदोलन की स्थापना की थी. वे विश्वभर में 144 देशों के हजारों बच्चों के अधिकार की रक्षा के लिए काम कर चुके हैं. उन के कार्यों के कारण ही 1999 में अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन द्वारा बालश्रम की निकृष्टतम श्रेणियों पर संधि सं. 182 को स्वीकार किया गया जो अब दुनियाभर की सरकारों के लिए इस क्षेत्र में प्रमुख मार्गनिर्देशक है.

मलाला की मुहिम

पाकिस्तान के  खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के स्वात जिले के मिंगोरा कसबे में खुशाल पब्लिक स्कूल की 8वीं की जमात की छात्रा थीं मलाला. मलाला के पिता जियाउद्दीन शिक्षण संस्थान से जुड़े हैं और कवि भी हैं. मलाला के 2 छोटे भाई और मां हैं. वे शुरू से ही लड़कियों के लिए तालीम के खिलाफ कट्टरपंथियों के फतवों से परेशान रहती थीं. उन्हें खुद अपनी पढ़ाईलिखाई का हर्जाना भुगतना पड़ा था. औरतों की पढ़ाईलिखाई, टैलीविजन देखने, गीतसंगीत सुनने, नाचनेगाने और बाजारों में खरीदारी के लिए जाने पर पाबंदियां लगा दी गई थीं. इलाके में लड़कियों के दर्जनों स्कूलों को तोड़फोड़ दिया गया और सैकड़ों स्कूल बंद करा दिए गए. इन में मिंगोरा के तमाम स्कूलों समेत मलाला का स्कूल भी था.

लड़कियों के प्रति तालिबान की इस तानाशाही से मलाला बहुत दुखी हुईं. उन्होंने इस के खिलाफ लड़ना तय किया. उन के पिता उन के साथ खड़े हो गए और मलाला अंधेरे के खिलाफ चिराग ले कर निकल पड़ीं. लड़कियों की शिक्षा के लिए वे जान की बाजी लगा कर जुट गईं और लोगों को भी जगाना शुरू कर दिया. मलाला ने तहरीक-ए-तालिबान की तानाशाही हुकूमत के बारे में बीबीसी उर्दू पर एक छद्म ‘गुल मकई’ नाम से ब्लौग में अपना दर्द जाहिर करना शुरू किया. वे इलाके की लड़कियों से आतंकवादियों के खतरे के बावजूद तालीम जारी रखने का आह्वान करने लगीं. शिक्षा की  इस मुहिम के नतीजे में मलाला को डिस्ट्रिक्ट चाइल्ड एसैंबली, स्वात का चैयरपर्सन बनाया गया था. यह एसैंबली यूनिसेफ के सहयोग से खपल कोर फाउंडेशन ने बनाई थी. यह बच्चों की शिक्षा के अधिकार पर आवाज उठाती है. मलाला ने इंस्टिट्यूट फौर वार ऐंड पीस रिपोर्टिंग के ‘ओपन माइंड’ कार्यक्रम में भी भाग लेना शुरू कर दिया था. यह संस्था पाकिस्तान में पत्रकारिता और प्रशिक्षण पर विचारविमर्श करती है. इस कार्य से अनेक लड़के और लड़कियां प्रेरित होने लगे थे. 2012 में मलाला ने गरीब लड़कियों को स्कूल भेजने के लिए मलाला एजुकेशन फाउंडेशन की शुरुआत की थी. इस तरह के काम के लिए उन्हें 2011 में पाकिस्तान का पहला युवा शांति पुरस्कार मिला था. संयुक्त राष्ट्र की ओर से डेशमंड टूटू ने शांति पुरस्कार के लिए उन का नाम नामांकित किया था.   

मलाला की शिक्षा की इस मुहिम की लोकल अखबारों, टैलीविजन चैनलों में खबरें आने लगीं. तालिबान को मलाला की यह मुहिम रास नहीं आ रही थी और वे खासे खफा रहने लगे तथा मलाला को अपनी हिटलिस्ट में सब से ऊपर ले लिया.

मलाला का साहस

9 अक्तूबर, 2012 को मलाला जब  स्कूल से निकल कर अपनी सहपाठी छात्राओं के साथ स्कूल बस में बैठ कर रवाना हुईं तभी 3 नकाबपोश उस बस में घुस आए और पूछा कि मलाला कौन है? मलाला ने खड़े हो कर कहा, ‘मैं हूं मलाला’. तभी एक नकाबपोश ने उसे 2 गोलियां मार दीं. एक गोली सिर में लगी और दूसरी गरदन में. मलाला वहीं गिर पड़ीं. मलाला पर हमले की यह खबर टैलीविजन चैनलों के जरिए दुनियाभर में पहुंच गई. मलाला के लिए विश्वभर से बेहतर इलाज की पेशकश आने लगी. संयुक्त अरब अमीरात के शाही परिवार ने मलाला के इलाज के लिए स्पैशल एअर एंबुलेंस भेजने की पेशकश तो की थी पर ब्रिटेन ने अपने यहां खासतौर से बुलैट इंजुरी के लिए बने अस्पताल में विमान से बुला लिया था. कुछ महीनों बाद मलाला पूरी तरह ठीक हो गईं और फिर से अपनी मुहिम में जुट गईं.

दमन के खिलाफ सम्मान     

नोबेल समिति ने कहा कि यह पुरस्कार बच्चों के लिए शिक्षा और बच्चों व युवाओं के दमन के खिलाफ किए गए उन के संघर्ष के लिए दिया गया है. नोबेल समिति के प्रमुख थोर्बजोर्न जगलांद ने पुरस्कार प्रदान करने से पहले अपने संबोधन में कहा था कि सत्यार्र्थी और मलाला निश्चित तौर पर वही लोग हैं जिन्हें  अलफ्रैड नोबेल ने अपनी वसीयत में शांति का मसीहा कहा था. उन्होंने कहा, एक लड़की और एक बुजुर्ग व्यक्ति, एक पाकिस्तानी और दूसरा भारतीय, एक मुसलिम और दूसरा हिंदू, दोनों उस गहरी एकजुटता के प्रतीक हैं जिस की दुनिया को जरूरत है यानी देशों के बीच आपसी भाईचारा.   

नोबेल समिति की विज्ञप्ति में कहा गया कि वह इसे हिंदुओं और मुसलिमों, भारतीय व पाकिस्तानियों के लिए बहुत ही महत्त्वपूर्ण मोड़ मानती है जहां वे शिक्षा और चरमपंथ के खिलाफ एकजुट हो कर लड़ सकते हैं.                                     यह सही है कि सत्यार्थी और मलाला ने अपनेअपने क्षेत्र में खतरों की परवा किए बिना साहस के साथ काम किया है. लेकिन भारत और पाकिस्तान को जिस क्षेत्र में नोबेल मिला है वह 18वीं सदी का है. भारत तो पहले से ही विश्वगुरु कहलाता है. सर्वोच्च इनाम विश्वगुरु को अब मिला है. क्या इस का संदेश यह नहीं कि शिक्षा और बच्चों की आजादी के मामले में यह क्षेत्र बहुत पिछड़ा हुआ है और अब जा कर शिक्षा और बच्चों की आजादी को ले कर कुछ किया जाने लगा है. वरना तो यहां अशिक्षा और गुलामी का माहौल था.

सम्मान पहले क्यों नहीं

मतलब साफ है कि बच्चों के बुनियादी अधिकार यानी शिक्षा और स्वतंत्रता के मामले में भारतीय उपमहाद्वीप दुनिया से डेढ़ सौ साल पीछे है. इस का अर्र्थ यह भी है कि यह उपमहाद्वीप पश्चिमी देशों से बहुत पीछे है. क्या चीन को आज इस पुरस्कार की जरूरत है? शांति का नोबेल भारत को 100 साल पहले क्यों नहीं मिल जाना चाहिए था. अकसर कहा जाता है कि 1947 के बाद भारत आजाद हुआ, पर 1947 से पहले आम जनता को पढ़ने से कौन रोक रहा था? तब भी लोग विदेशों तक पढ़ने जाते थे. मजे की बात यह है कि भारत को भौतिक, चिकित्सा, साहित्य, अर्थशास्त्र के नोबेल बहुत पहले ही मिल गए.

स्पष्ट है कि लड़कियों की शिक्षा, बालश्रम जैसे अहम विषयों को ले कर हमारी सामाजिक सोच विज्ञान के आविष्कारों की रफ्तार के आगे बहुत पीछे है. भले ही हमारे पैर चांद और मंगल तक पहुंच रहे हों. यह उस तरह का है जैसे चर्च अपनी धारणा को वैज्ञानिक गैलीलियो के यथार्थ को नका कर झूठ को सच के तौर पर फैलाता रहा और बाद में उस वैज्ञानिक को मौत के घाट उतार दिया था. भारतीय भूभाग सदियों से शिक्षा और आजादी से वंचित अंगरेजों द्वारा नहीं, अपनों द्वारा ही रखा गया. इस की सब से बड़ी वजह धर्म की व्यवस्था रही है.

पाकिस्तान में मलाला ने बालिका शिक्षा की एक मामूली चिंगारी सुलगाई थी कि मजहबी कट्टरपंथियों को वे बौद्धिक गिरोह की सरगना लगने लगीं. पाकिस्तान में शिक्षा अभी धर्र्म के धंधेबाजों के शिकंजे में है. वहां के स्कूलों पर तालिबानी सोच हावी है. इसी सोच वाले धर्म के खोखलेपन को उजागर करने वालों को बौद्धिक गिरोह कहते हैं. मलाला ने यह सवाल ठीक उठाया कि हम उन देशों को मजबूत कैसे कह सकते हैं जो युद्ध करने के लिए तैयार हैं पर शांति लाने में कमजोर हैं क्योंकि दुनिया में हथियार देना आसान है पर किताबें बांटना मुश्किल है. मलाला की बात ठीक है. क्यों टैंक बनाना आसान है पर पढ़ाई के लिए स्कूलों का निर्माण मुश्किल है. हम चांद पर पहुंच चुके हैं और जल्दी ही मंगल पर कदम रख देंगे लेकिन 21वीं सदी में हमें यह भी संकल्प लेना होगा कि सब को शिक्षा के अधिकार का सपना साकार हो.

धर्म के धंधेबाज हावी

धर्म ने शिक्षा का अधिकार हरेक को दिया ही नहीं. व्यक्ति की आजादी धर्म के धंधेबाजों के हाथों में रही. पढ़नालिखना, कामधंधा, बोलना, चलना और सोचना सबकुछ धर्म के दायरे में बांध दिया गया. पश्चिमी देशों ने इस तरह की बेडि़यां बहुत पहले ही उतार फेंकीं और पहनने से इनकार कर दिया. वे स्वतंत्र तौर पर सोचने लगे, बोलने गे पर भारतवर्ष धार्मिक गुलामी से मुक्त नहीं हो पाया. आश्चर्य है कि विश्व, विज्ञान के आधुनिकतम युग में जा पंहुचा है, शिक्षा में विश्व कहां से कहां पहुंच गया है पर वह  सभ्य नहीं बन सका है. अभी भी वह मानवता, शांति की तलाश में है. इस तलाश में आधी से अधिक दुनिया और अधिक संघर्ष व युद्धों में डूबती जा रही है. एक धर्म दूसरे से कम, अपने में ही युद्धरत है. एक धर्म के लोग अलगअलग पंथों में बंटे परस्पर लड़ रहे हैं. देश आपस में कलहरत है. जातियां असभ्य, जंगली कबीलों की तरह मरकट रही हैं.

विश्व के सामने आज बड़ी चुनौतियां हैं. सब से बड़ा संकट तो यह है कि धर्म के नाम पर भय और असहिष्णुता मानवता के दरवाजे पर खूनी खंजर, तबाही मचाने वाले बम के साथ आ खड़ी हुई है. यही शिक्षा और आजादी की सब से बड़ी दुश्मन है. भारत व पाकिस्तान दोनों देशों में अशिक्षा और बाल मजदूरी का कारण गरीबी है और गरीबी की मुख्य वजह मजहब, जाति व्यवस्था है. इस व्यवस्था ने पढ़नेलिखने नहीं दिया और न पढ़नेलिखने के कारण ही बच्चों को मजदूरी पर जाना पड़ता है. गरीब मांबाप बच्चों को स्कूल भेजने के बजाय काम पर भेजते हैं. लिहाजा, अशिक्षा के कारण गरीब हमेशा गरीब ही रह जाते हैं.

ऐसे में नोबेल की इच्छा के मुताबिक विश्व के देशों में शांति का लक्ष्य प्राप्त किया जाना बहुत मुश्किल है. यह लक्ष्य विश्व से धर्मों के खात्मे से ही पाया जा सकता है. धर्म ही युद्धों का सब से बड़ा कारण है. मानव कल्याण, आजादी और तरक्की के तमाम रास्ते अटके पड़े हैं.

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