सरिता विशेष
दुनिया एक बार फिर विश्वयुद्ध के कगार पर है. विश्व के देशों में आईएस से निबटने की रणनीति तैयार की जा रही है. दूसरे विश्वयुद्ध की तर्ज पर विभिन्न देशों के  बीच गुटबंदी शुरू हो चुकी है. एकदूसरे पर जबान और हथियारों से हमले किए जा रहे हैं. सामरिक रणनीतियां परवान चढ़ाई जाने लगी हैं. कारण वही है चिरपरिचित, सदियों पुराने सड़ चुके धर्म और तमाम पराकाष्ठाओं को लांघती धर्मों की बर्बर संकीर्ण सोच, जिस के कारण सदियों से इस पृथ्वी पर बड़ीबड़ी लड़ाइयां होती रही हैं. 13 नवंबर को आईएस द्वारा फ्रांस में किया गया हमला एक तरह से दूसरे पर्ल हार्बर पर आक्रमण था. 13 नवंबर के हमले में पेरिस के कंसर्ट हौल में 130 लोगों को जान गंवानी पड़ी. इस हमले के बाद सीरियाई क्षेत्र में स्थित आईएस के ठिकानों पर फ्रांस सरकार के बमवर्षक विमानों की गड़गड़ाहट गूंजने लगी. फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने बदला लेने की बात कहते हुए वहां अपनी सैन्यशक्ति झोंक दी. बदले की इस कार्यवाही के बाद मुसलिम देशों में ही नहीं, अन्य राष्ट्रों में भी युद्ध की भयावहता पर चिंता व्याप्त हो गई. इस कार्यवाही में रूस, ब्रिटेन, अमेरिका भी शामिल हो गए हैं और आईएस पर हमला बोल दिया गया है. दुनियाभर के देशों में हलचल बढ़ गई है. फ्रांस पर हमले के बाद रूस के विमान को तुर्की द्वारा गिरा देने के बाद कुछ देशों के बीच आपसी तल्खी और बढ़ गई. आईएस से मुकाबले के लिए गैरइसलामी देशों के बीच एकता दिखाई देने लगी.
 
पश्चिमी देशों को आशंका सता रही है कि आईएस के पास जैविक हथियार न हों और अगर परमाणु हथियार उन के हाथ लग गए तो दुनिया को भारी विनाश से कोई नहीं रोक पाएगा.लिहाजा, अमेरिका और यूरोपीय देशों के बीच मामले को ले कर गंभीर गुफ्तगू चल रही है क्योंकि आईएस अपने मजहब बहुल वाले देशों में कत्लेआम तो मचाए हुए है ही, पश्चिम के लिए भी खतरा बना हुआ है. रूस ने सीरिया के अपने वायुसेना ठिकाने पर मिसाइल रक्षा प्रणाली तैनात करने का ऐलान कर दिया. उधर, भारत और रूस का साझा युद्धाभ्यास पोखरण क्षेत्र में शुरू हो गया. यूक्रेन ने सभी रूसी विमानों को अपनी हवाई सीमा में प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया. उधर, रूस ने यूक्रेन के लिए गैस की खेप रोकने का ऐलान कर दिया था. यूक्रेन अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बहुत हद तक रूस पर निर्भर है. जापान, जरमनी, आस्ट्रेलिया समेत दूसरे देश भी सतर्क हो गए हैं. इन देशों की सेनाओं ने अपनेअपने हथियार पोंछने, चमकाने शुरू कर दिए हैं. रोचक तथ्य है कि कभी नाटो के सदस्य रहे पाकिस्तान ने आईएस के खिलाफ युद्ध में शामिल होने से इनकार कर दिया. पाकिस्तान का कहना है कि उस के 1 लाख 82 हजार सैनिक पहले से ही अफगानिस्तान की सीमा पर तैनात हैं.
 
इराक व सीरिया से भाग रहे और मारे जा रहे लोगों के हालात विश्वयुद्ध जैसे ही हैं. इन घटनाक्रमों को विश्वयुद्ध का आगाज माना जा रहा है. आमतौर पर जनमानस की धारणा है कि अमेरिका, फ्रांस जैसे देशों पर आतंकवादियों के हमले इसलाम के नाम पर कट्टरपंथियों का काफिरों यानी गैर मुसलमान देशों पर हमला है. इस संघर्ष में एक तरफ कट्टर इसलामी संगठन और भीतरी तौर पर उन की पैरोकार सरकारें तथा दूसरी ओर बाकी धर्मों के मानने वाले देश शामिल हैं. आतंकियों के निशाने पर प्रगतिशील, उदार विचारों वाले मुसलिम और उन के देश भी हैं. इराक, सीरिया, लेबनान, तुर्की, सऊदी अरब, सूडान, लीबिया, अफगानिस्तान, पाकिस्तान और भारत समेत कई देश आईएस के निशाने पर हैं. आईएस इन देशों को इसलामिक राज्य घोषित करना चाहता है और फिर यहां इसलामिक शरीया कानून थोपने की सोच रहा है. यह बात आईएस कई बार जाहिर कर चुका है. यह कट्टरपंथी संगठन मध्यपूर्व की प्राचीन धरोहर को नष्ट करने में लगा है. वह दूसरे धर्मों के स्थलों को नेस्तनाबूद कर रहा है. सैकड़ों लड़कियोें को अपहृत कर वह उन के साथ बलात्कार, जबरन शादी करता है उन का और धर्म परिवर्तन करा रहा है. वह सीरिया केकुछ हिस्से पर कब्जा कर चुका है जहां उसी की हुकूमत चलती है. अब वह लीबिया में घुस रहा है. पश्चिम एशिया में मजहब बड़ी समस्या है. राज्य की पहचान स्थापित करने मुसलमानों और उस की ताकत दिखाने में वहाबी मुसलमानों और शिया मुसलमानों द्वारा इसलाम के इस्तेमाल किए जाने का वहां इतिहास रहा है. क्षेत्र में संस्कृति बहुल के लिए कोई विशेष जगह नहीं रही है कि शिया, सुन्नी, यजिदी, कुर्द, तुर्क, ईसाइयों के विभिन्न पंथ हाशमी, बेडूइन और यहूदी शांतिपूर्ण रहे हों. फ्रांस और ब्रिटेन सहित यूरोप द्वारा उपनिवेश बनाने तथा अमेरिका के हाल के हमले का यहां इतिहास रहा है.
 
एशिया एकमात्र महाद्वीप है जो दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान जापान में हुए परमाणु हमले का घाव झेल चुका है. चिंता इस बात की है कि एशिया में कईर् देशों के पास परमाणु हथियार हैं. रूस, भारत, चीन, पाकिस्तान और उत्तर कोरिया परमाणु हथियारों से लैस हैं. मौजूदा समय में एशिया में शक्ति संतुलन के लिए कई देशों में होड़ लगी है. शीतयुद्ध की महाशक्ति रूस सहित चीन और भारत भी महाशक्ति के तौर पर अपना दावा पुख्ता करने में लगे हैं. 2013 में उत्तर कोरिया के परमाणु परीक्षण करने के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा उस पर प्रतिबंध लगा दिए गए थे. उस के बाद अमेरिका और दक्षिण कोरिया ने सालाना संयुक्त सैन्य अभ्यास शुरू किया जिस के बाद उत्तर कोरिया ने आरोप लगाया था कि अमेरिका इस क्षेत्र में अपनी शक्ति स्थापित करने के लिए उसे जंग की ओर ढकेलना चाहता है. इस क्षेत्र में धर्म की कट्टरता और खूनी नफरत का फैलाव जारी है. इन सब के बीच भारत भी इसलामी आतंकवाद के भय से गैरइसलामी देशों के साथ दोस्ताना ताल्लुकात बढ़ा रहा है. महाभारत युद्ध की तर्ज पर विश्वभर के राजाओं के साथ मिल कर युद्ध में जीत की जमीन तैयार की जा रही है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछले डेढ़ साल में आधी दुनिया को नाप चुके हैं. वे इसलामी आतंकवाद के खिलाफ विश्व के देशों को एकजुट करने की कवायद में जुटे हैं. इस के साथ वे विश्व में रह रहे प्रभावशाली अमीर हिंदू भारतीयों के जरिए कई देशों की सरकारों को वश में करने के प्रयास में हैं.
 
यह असल में धर्मयुद्ध है. इस पृथ्वी पर धर्मयुद्धों का बहुत पुराना इतिहास रहा है. यूरोप में शताब्दियों पहले दशकों तक चले क्रुसेड्स में करोड़ों लोग धर्म की बलि चढ़ गए थे. प्रथम विश्वयुद्ध की बात करें तो कहने को यह औद्योगिक कारणों से लड़ा गया लेकिन इस के पीछे गुलाम बनाने वाली धार्मिक श्रेष्ठ मानसिकता निहित थी. 1914 से 1918 में लड़े गए इस महायुद्ध में बड़े देश ऐसे उपनिवेश चाहते थे जहां वे कच्चा माल पा सकें और मशीनों से बनाई गई चीजें बेच सकें. इस काम के लिए सैनिक संधियां की गईं. इस से देशों में आपसी अविश्वास और वैमनस्य उत्पन्न हुआ. बहाना बना आस्ट्रिया की गद्दी के उत्तराधिकारी आर्क ड्यूक फर्डिनैंड और उन की पत्नी की हत्या का.
इस वारदात के एक महीने बाद आस्ट्रिया ने सर्बिया के खिलाफ युद्ध का ऐलान कर दिया. फ्रांस, रूस और ब्रिटेन ने सर्बिया की मदद की और जरमनी, आस्ट्रिया की तरफ हो गया. कुछ समय बाद ब्रिटेन, जापान की ओर से व तुर्की, जरमनी की ओर से युद्ध में शामिल हो गया. युद्ध यूरोप, एशिया और अफ्रीका-3 महाद्वीपों में लड़ा गया. शुरू में जरमनी की जीत हुई. जरमनी ने कई व्यापारी जहाजों को डुबो दिया. इस से अमेरिका, ब्रिटेन की तरफ से युद्ध में कूद पड़ा पर रूसी क्रांति के बाद रूस अलग हट गया. 1918 में ब्रिटेन, फ्रांस और अमेरिका ने जरमनी व दूसरे देशों को हरा दिया. इस महायुद्ध में करीब 1.6 करोड़ लोगों को जान गंवानी पड़ी थी. प्रथम विश्वयुद्ध का आधार 13वीं शताब्दी में ही तैयार हो गया था. तब ओटोमन साम्राज्य तमाम मुसलिम राष्ट्रों से बड़ा था. वहां ज्यादातर लोग मुसलमान थे या परिवर्तित थे. 13वीं सदी से ही उन में पड़ोसी ईसाइयों से वैरविद्वेष था. इन मुसलिम देशों की सेनाएं यूरोप केखिलाफ सैनिक मार्च निकालती थीं. सेना में उलेमा, धर्मगुरु भी होते थे. 1481 के बाद तुर्क शासन ग्रीक और बाल्कन समेत एशिया में स्थापित हो गया. तुर्क इसलामिक शासन स्थापित करना चाहते थे. उन के शासन में यहूदी दूसरे दरजे में आते थे पर वे इसलाम धर्म अपनाकर शासक वर्ग में शामिल हो सकते थे.

 
पहले विश्वयुद्ध के समय भारत औपनिवेशिक शासन के अधीन था. भारत के सैनिक भी युद्ध में शामिल हुए थे. युद्ध शुरू होने से पहले जरमनी ने कोशिश की थी कि भारत में ब्रिटेन के खिलाफ आंदोलन शुरू किया जा सके लेकिन रियासतों और कांग्रेस ने इस युद्ध में ब्रिटेन की आर्थिक और सैनिक सहायता की थी. 1933 में जरमनी  का शासक एडोल्फ हिटलर बना और उस ने एक शक्तिशाली सैन्य ताकत के रूप में प्रदर्शन करना शुरू कर दिया. यहूदियों से नफरत दूसरे विश्वयुद्ध का सब से बड़ा कारण था. इस बात से फ्रांस और इंगलैंड चिंतित हो गए जो पिछली लड़ाई में काफी नुकसान उठा चुके थे. उधर, इटली भी इस बात से परेशान था कि जरमनी उस के काम में दखल देगा क्योंकि इटली भी शक्तिशाली बनना चाहता था. इन तमाम बातों के चलते खुद को बचाने के लिए फ्रांस ने इटली के साथ हाथ मिलाया और उस ने अफ्रीका में इथियोपिया को इटली को देने का फैसला कर लिया. यह देश उस के कब्जे में था. हिटलर ने संधि तोड़ी, घोषणापत्रों को दरकिनार किया. इटली ने इथियोपिया पर हमला कर दिया. केवल जरमनी ने इस हमले को सही ठहराया. इस कारण इटली ने जरमनी को आस्ट्रिया पर कब्जा करने की मंशा को हरी झंडी दे दी.
 
वक्त बीतता गया, देशों के बीच तनाव बढ़ता गया और एकदूसरे से ताकतवर बनने की कोशिशें होती रहीं. यूरोप में जरमनी और इटली ज्यादा शक्तिशाली होते जा रहे थे. जरमनी ने 1938 में आस्ट्रिया पर हमला बोल दिया. लेकिन दूसरे यूरोपीय देशों ने इस का विरोध नहीं किया. इस बात से हिटलर उत्साहित होता गया. दूसरे विश्वयुद्ध के समय भी भारत पर अंगरेजों का कब्जा था, इसलिए भारत ने नाजी जरमनी के खिलाफ युद्ध में भाग लिया. गुलाम भारत की ओर से 20 लाख से ज्यादा सैनिक युद्ध के लिए लड़े. इस के अलावा सभी देसी रियासतों ने युद्ध के लिए बड़ी मात्रा में अंगरेजों को धनराशि दी थी. 1939 से 1945 तक चले दूसरे विश्वस्तरीय युद्ध में 70 देशों की सेनाएं शामिल थीं. इन में धर्म ओतप्रोत था. युद्ध में विश्व 2 हिस्सों में बंट गया था. इस में 10 करोड़ सैनिकों ने हिस्सा लिया. यह मानव इतिहास का सब से ज्यादा घातक युद्ध साबित हुआ. इस में 5 से 7 करोड़ लोगों की जानें गईं. इस की शुरुआत नाजी जरमनी द्वारा की गई. यह धार्मिक वैमनस्य की उपज थी. नाजी यहूदियों को खत्म कर देना चाहते थे. जरमनी ने पहले पोलैंड पर हमला बोला. उस के बाद फ्रांस ने जरमनी पर युद्ध की घोषणा कर दी तथा इंगलैंड व दूसरे राष्ट्रमंडल देशों ने भी इस की स्वीकृति दे दी. जरमनी ने 1939 में यूरोप में एक बड़ा साम्राज्य बनाने के उद्देश्य से पोलैंड पर हमला किया था. अंत तक जरमनी ने यूरोप का एक बड़ा भाग अपने अधीन कर लिया था. 1944 और 1945 के दौरान अमेरिका ने कईर् जगहों पर जापानी नौसेना को शिकस्त दी तथा पश्चिमी प्रशांत के कई द्वीपों पर अपना कब्जा जमा लिया. जब जापानी द्वीप समूह पर आक्रमण करने का समय आया तो अमेरिका ने जापान में 2 परमाणु बम गिरा दिए. मध्य युग में 11 से 13वीं सदी के बीच 200 सालों तक यूरोप में धर्मयुद्ध चला. 10वीं सदी के आखिरी वर्षों में इसराईल पर कब्जे के लिए खूनी युद्ध शुरू हो गया था. भारत में 1947 के भारतपाक विभाजन का संघर्ष और जम्मूकश्मीर में दशकों से धर्मयुद्ध चल रहा है. भारतपाकिस्तान के बीच 6 दशक से ज्यादा समय से लड़ाई चल रही है. यह धर्मों की नफरत का ही नतीजा है. 
 
धर्मग्रंथों में जिहाद
 
असल में इन देशों में धर्म पर आधारित कानून बने हुए हैं जो दूसरे धर्म के साथ भेदभाव करने वाले होते हैं. ज्यादातर अरब देशों में मजहबी किताबों में लिखी गई बातों को ही कानून बना दिया गया है. इन किताबों में जिहाद की शिक्षा दी गई है. बताया गया है कि  काफिरों को खत्म कर देना चाहिए. ऐसा करना ऊपर वाले का हुक्म है. लिहाजा मुसलिम देशों में बच्चों के खून में जिहाद बहने लगता है. धर्र्म के लिए वे कुछ भी करगुजरने को तैयार रहते हैं. लोकतंत्र को धर्म पनपने नहीं देता. धर्म व्यक्ति पर तानाशाही थोपता है. लोकतंत्र दरअसल लोगों की स्वतंत्रता की पैरवी करता है, इसलिए मजहबी देशों में मानव अधिकारों का हनन अधिक होता है. धर्मग्रंथों में जिहाद का जिक्र है. 11वीं सदी के आरंभ में क्रुसेडरों ने जब यरुशलम के लिए मोरचाबंदी की तो पहली बार मुसलमानों को जिहाद के लिए इकट्ठा किया गया. सीरिया को एकजुट कर मुसलमानों ने ईसाइयों को खदेड़ कर इसलामिक गणराज्य बनाया. इस के बाद से जिहाद और बड़े पैमाने पर दुनिया में फैलने लगा. ईसाइयों ने अपनी पवित्र भूमि फिलिस्तीन और उस की राजधानी यरुशलम स्थित ईसा की मजार पर कब्जा करने के लिए 1095 और 1291 के बीच धर्मयुद्ध किए. उस वक्त उस जमीन पर इसलाम की सेना ने कब्जा जमा रखा था. लेकिन कहा जाता है कि इस भूमि पर मूसा ने अपने राज्य की स्थापना की थी. इस भूमि पर यहूदी भी अपना अधिकार चाहते थे. यह युद्ध धर्मों का युद्ध था. ईसाई, मुसलमान और यहूदी आज भी यहां युद्ध जारी रखे हुए हैं.
धर्म की इस सोच के कारण ही आईएस, तालिबान, जैश-ए-मोहम्मद जैसे खूंखार आतंकवादी संगठन कामयाब होते रहे हैं. विश्व में बड़ी संख्या में युवा इन संगठनों में भरती होने को लालायित दिखाई देते हैं. इन में अनपढ़ ही नहीं, पढे़लिखे लोगों की तादाद भी ज्यादा है. ये लड़ाके यूरोप, अमेरिका जैसे समृद्ध देशों में जा कर उन पर हमला कर के धर्म का मकसद पूरा करने में जुटे हैं. एक धर्म को दूसरा धर्म फूटी आंखों नहीं सुहाता. इसलिए मुसलिम देशों के ये आतंकी कभी अमेरिका, कभी ब्रिटेन, कभी फ्रांस तो कभी अन्य धर्म वाले देशों में खूनखराबा करते हैं. ये संगठन भावी विश्वयुद्ध का कारण बनेंगे. युद्ध हमेशा बरबादी ले कर आता है. पहले से ही गरीब, पिछड़े, भुखमरी के शिकार देशों की हालत और खराब होगी. सीरिया, इराक से भाग कर यूरोप, अमेरिका, जरमनी जैसे देशों में शरण लेने के लिए समुद्र में डूबते, भूख, बीमारी से मरते लोगों को देख कर धर्मयुद्धों के दृश्य ताजा हो रहे है. आईएस के हमलों में हजारों लोग मारे जा चुके हैं, लाखों बेघर हो चुके हैं.
 
इसलामिक स्टेट का हो खात्मा
 
विश्वयुद्ध के लिए विश्वभर में जनमत तैयार होने लगा है. यूरोप के अधिकांश देशों में मुसलमानों को शक की निगाहों से देखा जाने लगा है और उन से भेदभाव बढ़ने लगा है. इसलामिक स्टेट की बर्बरता का जवाब यूरोप या अमेरिका में रह रहे आम मुसलमानों के प्रति अपमानजनक व्यवहार किया जाना नहीं है पर कट्टरपंथी चाहते हैं कि ऐसा हो ताकि दुनिया इसलामी और गैरइसलामी खेमों में बंट जाए ताकि हथियारों में कमजोर मुसलिम आत्मदाह को हथियार बना कर पश्चिमी देशों में भयंकर भय का वातावरण बना सकें. अब के युद्ध में और पिछले युद्धों में फर्क यह है कि अब यूरोप और अमेरिका अपने नागरिकों की जान की बहुत परवा कर रहे हैं. पिछले युद्धों में सरकारों ने सैनिकों की जानों की कोई चिंता न की थी. दूसरी तरफ मुसलिम देशों में जिहाद का प्रचार खूब हो रहा है और धर्म के नाम पर मुसलमान मरने को तैयार हैं. क्या यूरोप, अमेरिका अपनी तकनीक के सहारे इसलामिक स्टेट को समाप्त कर पाएंगे? यह न भूलें कि बहुत सी तकनीकें तो पहले से ही इसलामिक स्टेट के हाथों में हैं.

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भारत की स्थिति इस युद्ध में अजीब है. यहां के मुसलिम फिलहाल इसलामिक स्टेट में रुचि नहीं दिखा रहे क्योंकि वे जानते हैं कि यह इसलामिक स्टेट अरबियों का है और भारतीय मूल के मुसलमान एक धर्म के होने के बावजूद उन्हें यानी अरबियों को पसंद नहीं हैं. भारत सरकार को आतंकवाद से निबटने के लिए अमेरिका, यूरोप के साथ जाना होगा पर किस हद तक और कब, यह अभी अस्पष्ट है. अमेरिकी जनता को इसलामविरोधी युद्ध की डोज रोज रिपब्लिकन पार्टी के संभावित उम्मीदवार डौनल्ड ट्रम्प से मिल रही है जिसे कट्टरपंथी ईसाई कहा जा सकता है. अमेरिका में अब आर्थिक समस्याओं से उपजे भेदभाव की जगह धार्मिक आतंक से उपजी समस्याओं ने ले ली है और बराक ओबामा को पश्चिम एशिया में सक्रिय होने पर सोचना पड़ रहा है. वरना 2016 में होने वाले राष्ट्रपति पद के चुनावों में उन की डैमोके्रटिक पार्टी के उम्मीदवार की हार पक्की है. डौनल्ड ट्रंप कतई इस युद्ध में सभी तरह के हथियार अपनाने से न हिचकिचाएगा, ऐसा उस की सिरफिरी बातों से लगता है. धर्र्म और आतंकवाद अलग नहीं हो सकते. धर्म का नफरत, बैर, अशांति, कलह, हिंसा और युद्ध से हमेशा से नाता रहा है. यही धर्म की फितरत है. धर्म शांति का वाहक कभी रहा ही नहीं है. न कभी हो सकता है. धर्म कहां सहिष्णुता की सीख देता है. धर्म की उपस्थिति जहां भी रहेगी, वहां लड़ाई की पक्की गारंटी है. दुनिया में शांति, प्रेम, भाईचारा धर्मों के खात्मे से ही स्थापित हो पाएगा, यह पक्का है. अगर इस धरती पर धर्म मौजूद रहा तो धरती का खात्मा तय है. मानवता के बचाव के लिए धर्मों का त्याग करना ही रास्ता है.
 
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