सरिता विशेष

आज आदमी कामयाबी का सोपान कैसे चढ़ रहा है कि जीवन की तमाम खुशियां ही बिखर गई हैं. संतुष्टि का मंत्र कहीं दूर जा कर खो गया है. जीवनपथ पर हर कोई भाग रहा है. चारों ओर स्पर्धाओं की आपाधापी मची हुई है. हर कोई एकदूसरे से आगे निकलने के लिए तत्पर है. महत्त्वाकांक्षा और कामयाबी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. यह निर्विवाद सत्य है कि महत्त्वाकांक्षा और कामयाबी एकदूसरे के पर्याय हैं. महत्त्वाकांक्षा जीवन की संजीवनी बूटी है, जिजीविषा है, लालसा है, शक्ति है, निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा है, उत्साहउमंग का परिचायक है. इस के बिना जीवन निष्क्रिय है, मृतवत है. पर सबकुछ तो नहीं, कि जिस के लिए हम जीना ही भूल जाएं.

कामयाब होना अति उत्तम है पर अति महत्त्वाकांक्षी बन कर थोड़े समय में बहुतकुछ प्राप्त करने की चाहत आज जनून बन कर आम आदमी का सुकून तो नहीं छीन रही है? उस के अनंत सपनों का आकाश, उस के पंखों को काट उड़ने के हौसले तो नहीं छीन रही है? असीम महत्त्वाकांक्षाओं के सागर की लहरें उस के जीवन को डुबो तो नहीं रही हैं? कामयाबी की असीम चाहत उस के जीवन को कही असंतुलित तो नहीं कर रही, जिसे संतुलित करने के सतत प्रयास में वह असंतुलित हो कर जीवन को यज्ञ की वेदी बना कर अपने अमनचैन की आहुति दे रहा है. कुछ ऐसा ही हो रहा है आज. अति महत्त्वाकांक्षी बन कर लोग जीना ही भूल गए हैं. ऐसी भी क्या सफलता जो जीवनसंगीत से सुर, ताल औैर लय ही छीन ले.

डा. एस के खन्ना, जो पटना के बहुत नामी डाक्टर हैं, अपने नर्सिंग होम में सुबह 9 बजे से ले कर रात 2 बजे तक अपने चैंबर में बैठे रहते हैं. थक जाने पर भी निरंतर मरीजों को देखते ही रहते हैं. ज्यादा से ज्यादा कमाई कर लें, यही उन की सोच है. न तो परिवार को समय दे पाते हैं, न स्वयं को ही. कोई सोशललाइफ भी नहीं है. झूठी शानोशौकत के लिए उन की पत्नी और बच्चे पानी की तरह पैसा बहाते हैं. कहने वाले कहते हैं कि कोई आवश्यकता नहीं होने पर भी वे मरीजों को पैसों के लिए नर्सिंग होम में रहने को मजबूर करते हैं.

बहुत बड़ी होती हैं छोटीछोटी खुशियां. अंतर्मन में सकारात्मकता का संचार कर जीवन को सींचती हैं ये खुशियां. जीवन अनमोल है, कामयाबी की भूलभुलैया में इसे न खोएं. स्वास्थ्य ही जीवन है, इसे भूलें नहीं. बड़ीबड़ी खुशियों को तलाशते हुए छोटीछोटी खुशियों को बड़ी उपब्धियों की चाहत में खोना, आदि कितने प्रश्न हैं जिन का समाधान अगर नहीं हुआ तो भौतिक सुखसुविधाओं से सुसज्जित जीवन की धज्जियां उड़ते देर नहीं लगेगी. कामयाबी की चाहत अगर मृगतृष्णा के जाल में फंसी, तो फिर जीवन तनाव, एंग्जायटी और डिप्रैशन जैसी मनोवैज्ञानिक समस्याओं का शिकार बन जाएगा.

पटना में कमल अग्रवाल के 2 ज्वैलरी शोरूम होने के साथ कपड़े और मोटर बेचने का कारोबार है. कुबेरपति हैं पर इतनी भागदौड़ में लगे रहते हैं कि जीवन ही मशीन बन कर रह गया है. अनियमितता के चलते कितनी बीमारियों के शिकार हो गए हैं. सारी सुखसुविधाएं हैं पर उन का कोई भोग नहीं है. घर में इतनी सिक्योरिटी है, फिर भी डरेसहमे रहते हैं. उन से तो सुखी उन के नौकरचाकर हैं, कम से कम अपनों के साथ हंसबोल तो लेते हैं.

महत्त्वाकांक्षाओं की सीमा

माना कि परिवार, समाज और देश की उन्नति महत्त्वाकांक्षा और इस की कामयाबी पर निर्भर करती है पर इस के सर्वोच्च शिखर तक पहुंचने के लिए अपनी खुशियों की आहुति देने का कोई औचित्य नहीं है. आज जितने व्यक्ति, उतनी महत्त्वाकांक्षाएं और अनंत कामयाबी की राहें. किसी को धनदौलत की चाहत तो किसी को धन लुटाने की होड़. किसी को ज्ञानार्जन की लगन तो किसी को ज्ञानास्रोत की तलाश. सफल वे ही होते हैं जिन की लगन सच्ची होती है. यही सकारात्मक महत्त्वाकांक्षाएं जब अतिशयोक्ति की सीमा का अतिक्रमण करती हैं तो जनून बन कर प्राप्ति और खुशियों के बीच असंतुलन बन कर जीवनरोग बन जाती हैं.

पटना के किदवईपुरी में रहने वाले करोड़पति मठाधीश दंपती की हत्या कर दी गई. कड़ी सिक्योरिटी में रहने के बावजूद धनदौलत के लिए उन की हत्या कर दी गई और यह किसी अपने का ही काम था. उन्होंने एक मठाधीश हो कर कैसे इतनी संपत्ति अर्जित कर ली कि 40 करोड़ रुपए के मकान में रहते थे. अवश्य ही नाजायज ढंग से धन का अर्जन किया होगा. कुबेर का खजाना तो अर्जित कर लिया, पर भोगा तो नहीं. आज समाज और देश में परिवर्तन की क्रांति छाई हुई है जिस की लहरों पर सवार हर व्यक्ति की आकांक्षाएं आकाशमय हो रही हैं. आज देशविदेश में बेहतरीन अवसर हैं. आर्थिक सुविधाओं ने उन अवसरों की प्राप्ति की राहों को सरल बना दिया है जो आज से पहले उपलब्ध नहीं थीं.

सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक परिवर्तन की दौड़ से आम आदमी की सोच प्रभावित है. यही कारण है कि आज नगरोंमहानगरों में लोगों की संस्कृति उपभोक्तावादी बन गई है. शानोशौकत से रहने की प्रबल इच्छा पर नैतिकता कुरबान हो रही है. हर क्षेत्र में एकदूसरे से आगे निकलने की प्रतिस्पर्धा इतनी है कि लोगों के पास पलभर सांस लेने के लिए एक छोटा पल भी नहीं है. धैर्य की बात तो दूर रही. हर कोई अल्प समय में अनंत पा लेना चाहता है चाहे राहें कठिन हों या आसान, गलत हों या ठीक, कोई परवा नहीं. बस, हासिल करना ही लक्ष्य होता है. दिग्भ्रमित हो कर इस पथ के राही बेहाल हैं.

नैतिकता की बलि

2016 में बोरिंग रोड चौराहे पर रहने वाले किसी सरकारी अधिकारी के यहां सीबीआई वालों ने छापा मार कर 2 सौ करोड़ रुपए की संपत्ति जब्त की. नौकरी से भी संस्पैंडैड हैं. फिर भी वे सीना तान कर यों चलते हैं मानो सबकुछ हासिल कर लिया हो. उन्हीं के फ्लोर पर रहने वाले एसबीआई बैंक में काम करने वाले अनिल पांडेय ने अपने फ्लैट को अमेरिकन स्टाइल में बनवाने के लिए बैंक से 1 करोड़ से ज्यादा रुपए का लोन लिया. निश्चित अवधि में लोन नहीं चुका सकने के कारण नौकरी से सस्पैंडैड तो हैं ही, हर 3 महीने में वे परिवार सहित गायब हो जाते हैं क्योंकि उन के फ्लैट में बैंक वाले ताला लगवा जाते हैं. कुछ दिनों के बाद ताला खुल भी जाता है.

यह कैसी महत्त्वाकांक्षा है कि जिस की पूर्ति में अपनी नैतिकता का परित्याग करना पड़ जाता है. क्या ऐसी मानसिकता से जीवन सुखी हो सकता है? माना कि परिश्रम का कोई विकल्प नहीं है, सफलता की कुंजी है यह, फिर भी अल्प समय में अधिक प्राप्ति की चाह में मशीन न बनें क्योंकि इस से बढ़ रही है अपनों के बीच की दूरी और बढ़ रहा है अकेलेपन का अभिशाप. साथ ही, छूट रहा है अपनों का साथ. भावनात्मक आधार के अभाव के चलते जीवन से खुशियां तिरोहित हो गई हैं. आकांक्षाओं और महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए लोग मशीन बनते जा रहे हैं. एकदूसरे से रहनसहन की प्रतियोगिता में वे असंतुष्ट तो रहते ही हैं, साथ में ये स्थितियां उन्हें आर्थिक व सामाजिक रूप से असुरक्षा की भावना से भी घेरे रहती हैं. दूसरों की सफलता को वे सहन नहीं कर पाते. फिर, ऐसी प्रतिस्पर्धाओं के तनाव से आपसी नजदीकियां समाप्त हो जाती हैं.

स्पर्धा की अग्नि में जीवन की सुखशांति की आहुति कभी नहीं देनी चाहिए क्योंकि कामयाबी के शीर्ष पर आदमी आरूढ़ तो हो जाता है पर अंत में अकेलेपन का शिकार हो कर अवसाद में घिर भी जाता है. सफलता की ओर अग्रसर रहना, उसे उस खास मुकाम पर बनाए रखना भी एक बड़ी चुनौती है. जितना मिलता है, उस से और ज्यादा पाने की पिपासा बढ़ती जाती है. फिर खुशियों का उपवन जलते रेगिस्तान में तबदील हो जाता है और तमाम जिंदगी आदमी अर्जन की मृगतृष्णा में उलझ कर रह जाता है. कामयाबी की दौड़ और दोहरी जिम्मेदारियों को निभाने की चाह रखने वाली महिलाओं में भी अप्रत्याशित बदलाव आए हैं. पारिवारिक स्तर को ऊंचा बनाने के लिए वे भी हर तरह से प्रयत्नशील हैं, सफलीभूत भी हैं. पर घरबाहर की चुनौतीपूर्ण दोहरी जिम्मेदारियों में वे किसी चक्की की पाट की तरह पिस रही हैं. अनंत अपेक्षाएं उन्हें भी शारीरिक व मानसिक रूप से प्रताडि़त कर नाना प्रकार की उलझनें ही पैदा कर रही हैं.

अतीत की धरोहर संयुक्त परिवार के टूटने से उन्हें कोई भावनात्मक आधार भी नहीं मिल पाता. फलस्वरूप, महिलाओं का जीवन भी बिखर रहा है. फिर भी यह जिद है कि कामयाबी को किसी न किसी तरह से हासिल करना ही है. पाने की चाहत में वे वास्तविक सुखों की बली चढ़ा रही हैं.

खुशहाली का मापदंड

हम से कामयाबी है, न कि हम कामयाबी से. छोटीछोटी खुशियां ही दीपमालिका बन कर बड़ी खुशियों का सृजन करती हैं. आज का आदमी इतना व्यस्त है कि छोटीछोटी खुशियों को महसूस करने के लिए उस के पास वक्त ही नहीं है. चुनौतियों से भरी उपलब्धियां कामयाब बना सकती हैं पर खुशहाल नहीं. पाने की तृष्णा असीमित, अछोर और अनंत हैं पर अनमोल जीवन से बढ़ कर कुछ नहीं है. कामयाबी, जो जीवन की खुशहाली का मापदंड बना हुआ है, मात्र भ्रम है. इस की प्राप्ति की राह में कभी विस्मृत नहीं होना चाहिए कि हम से कामयाबी है, न कि हम कामयाबी से. जीवन के संतुलन को हर हाल में बनाए रखना चाहिए. कोहरे में घिरी कामयाबी को आत्मतुष्टि की उष्मा से पिघलते रहना चाहिए ताकि यह जनून बन कर जीवन का सारा सुकून न छीन ले.