सरिता विशेष

सवाल
मैं एक सैनिक की पत्नी हूं. विवाह को 3 साल हो चुके हैं. मेरे पति 6 महीने बाद घर आते हैं. मुझे अभी तक मातृत्व का सुख नहीं मिला. मुझे माहवारी कभी 3 महीने बाद आती है, तो कभी 5 महीने बाद. मेरे मां न बनने के लिए कहीं यही तो वजह नहीं है?

जवाब
अनियमित माहवारी के लिए आप को स्त्रीरोग विशेषज्ञा से परामर्श लेना चाहिए. विवाह के 3 सालों के बाद भी आप को संतानसुख प्राप्त नहीं हुआ है, तो इस बार जब आप के पति आएं तो उन के साथ किसी परिवार कल्याण केंद्र में जा कर जांच कराएं. पतिपत्नी दोनों की जांच करने के बाद ही पता चलेगा कि अब तक आप संतानसुख से वंचित क्यों हैं, संतानोत्पत्ति की कितनी संभावना है? उस के अनुसार ही आप को उपचार यदि आवश्यक हुआ तो दिया जाएगा.

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माहवारी नहीं बीमारी

किशोरावस्था लड़कियों के जीवन का वह समय होता है जिस में उन्हें तमाम तरह के शारीरिक बदलावों से गुजरना पड़ता है. इस दौरान लड़कियां अपने शरीर में होने वाले बदलावों से अनजान होती हैं, जिस की वजह से उन्हें तमाम तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जिस में उलझन, चिंता और बेचैनी के साथसाथ हर चीज के बारे में जानने की उत्सुकता रहती है. लड़कियों को उन के परिवार के सदस्यों द्वारा न ही बच्चा समझा जाता है और न ही बड़ा. ऐसे में उन के प्रति कोई भी लापरवाही घातक हो सकती है.

लड़कियों में किशोरावस्था की शुरुआत 9 वर्ष से हो जाती है, जो 19 वर्ष तक रहती है. जब लड़की किशोरावस्था में प्रवेश करती है तो उस के प्रजनन अंगों में तमाम तरह के परिवर्तन बड़ी तेजी से होते हैं. इसी दौरान लड़कियों में माहवारी की शुरुआत होती है, जो उन के प्रजनन तंत्र के स्वस्थ होने का संकेत देती है.

किशोरावस्था की शुरुआत में परिवारजनों की जिम्मेदारी बनती है कि वे बेटी की उचित देखभाल करने के साथसाथ उसे भलेबुरे का भी परामर्श देते रहें, क्योंकि यह एक ऐसी उम्र है जिस में लड़की सपनों की दुनिया बुनने की शुरुआत करती है. ऐसे में लड़कियां उचित देखभाल व परामर्श न मिलने से गलत कदम भी उठा सकती हैं.

हर लड़की के मातापिता को चाहिए कि वे तमाम शारीरिक परिवर्तनों के बारे में उसे पहले से अगवत कराएं, जिस से वह अपने शारीरिक बदलाव का मुकाबला करने में सक्षम हो पाए. किशोरावस्था में लड़की के प्रजनन अंगों से अचानक खून आना उसे मानसिक रूप से विचलित कर सकता है, इसलिए यह जरूरी है कि इस के बारे में लड़की को पहले से ही जानकारी हो. जिस से माहवारी में अस्वच्छता से होने वाली बीमारियों व संक्रमण से उस का बचाव किया जा सके.

क्या है माहवारी

महिला रोग विशेषज्ञ डा. प्रीति मिश्रा के अनुसार, लड़कियां में मुख्यत: 2 अंडाशय, गर्भाशय व उस को जोड़ने वाली फैलोपियंस ट्यूब नामक 2 नलियां होती हैं. यही आगे चल कर स्वस्थ बच्चा जनने में सहायक होती हैं. लड़की जब जवान होती है तो उस के अंडाशय से हर सप्ताह 1 अंडा फूट कर बाहर आने लगता है, जो बच्चेदानी की भीतरी दीवार पर हर माह जमने वाले खून की परत से जा कर चिपक जाता है. अगर इस दौरान लड़की के अंडे से पुरुष शुक्राणु नहीं मिलते तो बच्चेदानी के अंदर जमी खून की परत टूट जाती है और ये अंडे शरीर से बाहर निकलने लगते हैं, जिसे माहवारी के रूप में जाना जाता है.

माहवारी के पहले दिन से ले कर 2 सप्ताह बाद तक अंडाशय में नया अंडा फूटने के लिए तैयार होने लगता है और गर्भाशय में दोबारा खून की नई परत जमने लगती है. इसी प्रकार यह मासिक चक्र चलता रहता है. महिलाओं में माह के 28वें दिन माहवारी आने का समय होता है, अगर इस से पहले स्त्री का अंडाणु और पुरुष का शुक्राणु मिल जाएं तो गर्भ ठहर सकता है और माहवारी बंद हो जाती है.

माहवारी के दौरान आमतौर पर एक महिला की योनि से 35 से 50 मिलीलिटर खून निकलता है, जो कभीकभी इस मात्रा से अधिक भी हो सकता है. ऐसी अवस्था में कभी भी उसे घबराना नहीं चाहिए. आमतौर पर माहवारी का चक्र 2 से 7 दिन तक चलता है, जिस के शुरुआती दिनों में खून का बहाव तेज होता है और बाद में धीरेधीरे कम व समाप्त हो जाता है. अगर माहवारी के दौरान अधिक रक्तस्राव हो रहा है तो खून की कमी की समस्या हो सकती है. ऐसे में किसी अच्छे डाक्टर से सलाह लेनी चाहिए.

यह आम बात है

लड़कियों के लिए माहवारी के शुरुआती कुछ महीने बेहद संवेदनशील होते हैं, क्योंकि माहवारी के दौरान कई तरह की परेशानियां सामने आती हैं, जिस से लड़कियां मानसिक रूप से परेशान हो सकती हैं. ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि उन्हें माहवारी के दौरान आने वाली परेशानियों के बारे में पूरी जानकारी हो, जिस से वे इन चीजों का  मुकाबला कर पाएं.

माहवारी के दौरान अकसर थकान होने के साथ ही शरीर ढीला हो जाता है और सिर दर्द, चिड़चिड़ापन और स्तनों में कसाव की समस्या देखने को मिलती है. इस दौरान लड़कियों में कब्ज की शिकायत व काम में मन न लगने जैसी समस्या होना आम बात है. इस के अलावा उन्हें कमर व पेड़ू में दर्द की समस्या से भी दोचार होना पड़ता है, जो कैल्शियम व आयरन की कमी से हो सकती है. इस कमी को दूर करने के लिए लड़कियों को नियमित व्यायाम करते रहना चाहिए, जिस से उन्हें राहत महसूस होती है.

कभीकभार माहवारी आने का अंतराल 3 महीने का भी हो जाता है, जो लड़कियों में दबाव या चिंता के कारण होता है. यह कारण किसी अपने से बिछड़ने को ले कर भी हो सकता है. जिन लड़कियों में माहवारी की शुरुआत जल्द हुई हो उन में एकदो साल तक माहवारी चक्र अनियमित होने की शिकायत देखने को मिलती है. ऐसे में अगर किसी लड़की में माहवारी चक्र 21 से 45 दिन का है तो यह सामान्य बात हो सकती है, अगर माहवारी चक्र में अंतराल 2 या 3 महीने का हो और यह लगातार चला आ रहा हो तो ऐसी अवस्था में किसी महिला डाक्टर से सलाह लेना जरूरी हो जाता है.

डा. प्रीति मिश्रा के अनुसार अगर लड़कियों में एक ही महीने में 2 बार माहवारी की समस्या है तो डाक्टर की सलाह लेनी जरूरी है, लेकिन कभीकभी बहुत ज्यादा खुशी, चिंता, दुख या डर की वजह से भी माहवारी जल्दी आ सकती है.

माहवारी से जुड़े अंधविश्वास से बचें

सौंदर्य विशेषज्ञ व सामाजिक कार्यकर्ता सुप्रिया सिंह राठौर का कहना है कि युवामन किसी तरह के बंधन में बंध कर नहीं रहना चाहता, ऐसे में उन पर विभिन्न प्रकार की रूढि़वादी परंपराओं को थोपना घातक हो सकता है. अकसर माहवारी को ले कर तमाम तरह की भ्रांतियां व अंधविश्वास देखने को मिलते हैं, जिन्हें लड़कियों पर भी थोपने की कोशिश की जाती है. ये अंधविश्वास और भ्रांतियां लड़कियों के स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह हो सकती हैं.

सुप्रिया सिंह का कहना है कि अधिकतर लोगों की सोच है कि माहवारी के दौरान निकलने वाला खून गंदा होता है, जबकि यह खून हमारे शरीर में उपलब्ध खून की तरह ही होता है जो माहवारी के दौरान योनिमार्ग से बाहर निकलता है. यदि यौनांगों की साफसफाई का ध्यान रखा जाए तो माहवारी के दौरान निकलने वाले खून से किसी प्रकार का संक्रमण नहीं होता.

माहवारी को ले कर सदियों से यह अंधविश्वास बना हुआ है कि माहवारी के दौरान लड़की को खाना नहीं बनाना चाहिए न ही खानेपीने की वस्तुओं, कुओं, तालाबों, नदियों आदि के पास जाना चाहिए. ऐसा करने से सब अशुद्ध हो जाता है, जबकि माहवारी के दौरान इन सब चीजों के छूने से किसी तरह की हानि नहीं होती, यह मात्र अंधविश्वास और भ्रांति के कारण होता है. हां, यह जरूर है कि माहवारी के दौरान अगर खाना बनाने या परोसने का काम किया जा रहा है, तो हाथों को साबुन से भलीभांति धो लेना चाहिए, जिस से किसी तरह का संक्रमण फैलने से रोका जा सके.

माहवारी के दौरान खानपान को ले कर भी तमाम तरह की भ्रांतियां हैं, जिन की वजह से लड़कियों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है. लोगों का मानना है कि माहवारी के दौरान खट्टा पदार्थ खाने से अधिक खून निकलता है जबकि इस दौरान खट्टी चीजें खाने से कोई नुकसान नहीं होता. इस के अलावा दूध, दही और पनीर खाने पर भी रोक लगाई जाती है जबकि माहवारी के दौरान इन पदार्थों के खाने से शरीर को पोषण प्राप्त होता है.

अच्छा खानपान जरूरी

माहवारी के दौरान लड़कियों के खानपान पर खास ध्यान देने की आवश्यकता होती है, क्योंकि किशोरावस्था के दौरान उन के शरीर का विकास तेजी से होता है, ऐसे में माहवारी के दौरान कभीकभी अधिक रक्तस्राव उन में लौहतत्त्वों की कमी का कारण बन सकता है. इसलिए लड़कियों को हरी पत्तेदार सब्जियां, मौसमी फल, दालें, गुड़ के साथ पौष्टिक पदार्थों के खाने पर विशेष जोर देना चाहिए. उन्हें आयरन की गोलियां खाने को दी जानी चाहिए. अकसर यह भी सुनने में आता है कि परिवार वाले उन लड़कियों को धार्मिक स्थलों पर जाने की इजाजत नहीं देते. जिन्हें माहवारी हो रही है. वैसे तो धार्मिक स्थलों पर जाने से कोई फायदा नहीं है पर लड़कियों पर इस तरह की बंदिश ठीक नहीं है.

अकसर लड़कियां माहवारी की जटिलताओं से बचने के लिए अपने अभिभावकों से अपनी समस्याएं साझा करने से हिचकती हैं, जो ठीक नहीं है, क्योंकि इस से आगे चल कर उन के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है. लड़कियों को अपने स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहने के लिए माहवारी के दौरान अपनी साफसफाई का विशेष ध्यान रखना चाहिए. साथ ही खानेपीने की वस्तुओं को छूने से पहले व बाद में साबुन से हाथ धोना नहीं भूलना चाहिए.

28 मई को विश्व माहवारी दिवस मनाया गया जिस में विश्व की महिलाओं द्वारा अलगअलग स्थानों पर जुलूस निकाले गए ताकि लड़कियों को इस बारे में सही जानकारी दी जा सके. साथ ही यह संदेश भी दिया गया कि माहवारी के बारे में चर्चा करना शर्म की बात नहीं है. यह शरीर की एक प्रक्रिया है और अंधविश्वास से इस का कोई सरोकार नहीं है.

लापरवाही बन सकती है संक्रमण का कारण

माहवारी के दौरान की गई लापरवाही संक्रमण का कारण बन सकती है, क्योंकि जानकारी के अभाव में अकसर लड़कियां माहवारी के दौरान गंदे कपड़े का प्रयोग करती हैं, जिस से उन के प्रजनन अंगों में कई तरह के संक्रमण पैदा हो जाते हैं. यह संक्रमण यौनांगों में किसी प्रकार के घाव होने, बदबूदार पानी निकलने, दर्द, दाने या खुजली के रूप में हो सकते हैं. जिन की वजह से असामान्य रूप से स्राव होने लगता है, जो कमर व पेड़ू के दर्द का कारण बनता है. कभीकभार यौनांगों में अधिक संक्रमण की वजह से बदबूदार सफेद पानी भी आने लगता है, जिस की वजह से स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है.

इन बातों का रखें खयाल

माहवारी के दौरान साफसफाई का विशेष खयाल रखना चाहिए. इस दौरान की गई कोई भी लापरवाही लड़की के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकती है. डाक्टर प्रीति मिश्रा के अनुसार माहवारी के दौरान इस्तेमाल किए जाने वाले पैड की स्वच्छता का विशेष खयाल रखना चाहिए. आमतौर पर ग्रामीण लड़कियां माहवारी के दौरान खून को सोखने के लिए पुराने व गंदे कपड़ों के पैड का इस्तेमाल करती हैं, जो उन के प्रजनन तंत्र के संक्रमण का कारण बन सकता है. ऐसी अवस्था में यह जरूरी है कि लड़की सिर्फ सैनेटरी पैड का ही इस्तेमाल करे जो आजकल बेहद सस्ते दामों में बाजार में उपलब्ध हैं.

माहवारी के दौरान प्रतिदिन स्नान करना भी जरूरी होता है. नहाते समय अपने भीतरी कपड़ों को अच्छी तरह से साबुन और साफ पानी से धो कर खुली धूप में सुखाना चाहिए और माहवारी के दौरान प्रयोग किए जाने वाले सैनेटरी पैड को दिन में कम से कम 2 से 3 बार जरूर बदलते रहना चाहिए. सैनेटरी पैड बदलने से पहले और बाद में साबुन से हाथ धोएं.

डा. प्रीति मिश्रा के अनुसार माहवारी के दौरान निकलने वाले खून को सोखने के लिए जिस सैनेटरी पैड का इस्तेमाल किया जाता है वह अलगअलग ब्रैंड्स में उपलब्ध हैं. ऐसी अवस्था में कम पैसे में भी इस की खरीदारी की जा सकती है. यह न केवल आरामदेह होता है बल्कि इस से संक्रामक बीमारियों से भी बचाव होता है. ये सैनेटरी पैड मैडिकल स्टोर, जनरल स्टोर या फिर डिपार्टमैंटल स्टोर पर आसानी से मिल जाते हैं.