सवाल
मैं 42 वर्षीया महिला हूं. मेरे 2 बच्चे हैं और पति सरकारी बैंक में अच्छी पोस्ट पर कार्यरत हैं. हाल ही में पति का तबादला दिल्ली हुआ है. समस्या यह है कि मेरी सास, जो 84 वर्षीया हैं, हमारे साथ रहने को तैयार नहीं हैं, जिस से हमें काफी दिक्कत होती है. कैसे हम इस समस्या का समाधान करें?

जवाब
ऐसा अधिकांश घरों में देखने को मिलता है कि घर के बड़े अपने बच्चों के साथ रहने को तैयार नहीं रहते, क्योंकि  बच्चों को उन का रोकनाटोकना अच्छा जो नहीं लगता.

दरअसल, बच्चे चाहते हैं कि उन के मातापिता आसपास तो रहें लेकिन साथ नहीं. और जब मातापिता इस बात को महसूस करने लगते हैं तो उन से थोड़ी दूरी बना लेते हैं ताकि वे भी खुश रहें और उन के बच्चे भी आजादी से जीवन व्यतीत कर सकें.

आप के मामले में हो सकता है कि शुरुआत में आप लोग साथ रहते हों और आप लोगों के बीच भी मनमुटाव हुआ हो जिस के कारण वे अब आप के साथ रहने को तैयार नहीं हों. ऐसे में आप दुखी न हों क्योंकि गलती हर इंसान से होती है, बल्कि अगर वे अकेली रह रही हैं तो उन की अच्छे से सेवा करें.

इस से हो सकता है धीरेधीरे उन का आप के प्रति व्यवहार बदले और वे फिर से आप के साथ रहने को तैयार हो जाएं. अगर आप के रिश्ते हमेशा अच्छे रहे हैं तो उन कारणों को जानने की कोशिश करें जिन के चलते वे खुद को अलगथलग महसूस करती हैं. अगर एक बार पूरी स्थिति स्पष्ट हो जाएगी तो आप की समस्या का हल भी निकल जाएगा.

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सास बहू का रिश्ता, मीठा मीठा प्यारा प्यारा

एक लड़की की शादी होती है तो उसे पति के साथ मिलती है एक सास. सास व बहू के बीच पुत्र/पति अहम कड़ी होती है. मानने को तो पति और सास दोनों का एक ही लक्ष्य होता है- उस की खुशी, उस की सेहत, उस की प्रगति अर्थात दोनों उस का भला चाहती हैं. किंतु फिर भी सदियों से सासबहू का रिश्ता कड़वाहट भरा माना जाता है. मन में ललिता पवार और शशिकला के फिल्मी वैम्प किरदारों जैसी आकृतियां उभरने लगती हैं.

यदि दामाद, बेटी के पीछे लगा रहे तो बेहतर. लेकिन यदि बेटा, बहू की बात सुनता रहे तो नालायक. नहीं जनाब, सभी सासें ‘सौ दिन सास के’ फिल्म की खड़ूस सास जैसी नहीं होतीं. कुछ ऐसी भी होती हैं जिन्हें पा कर बहुएं मायके का रास्ता भूल जाती हैं. ‘मम्मी’ शब्द का जिक्र आते ही बहुओं को अपनी सास याद आती हैं, अपनी मां नहीं. कैसे बनता है रिश्ता ऐसा? अपनेआप? जी नहीं, अपनेआप नहीं, बल्कि ऐसा दोनों की समझ के तहत होता है. समझदार हैं वे सासबहू जो इस अनमोल रिश्ते की कीमत और गरिमा को पहचानती हैं और देर होने से पहले ही सही कदम उठा लेती हैं.

हर रिश्ता बनाने में समय, धैर्य और परिश्रम लगता है. हथेली पर सरसों नहीं उगती. इसलिए रिश्तों को समय दें और विश्वास बनाए रखें. रिश्ता मजबूत बनेगा. सास और बहू दोनों ही भिन्न परिवेश से आती हैं तो एकदूसरे को समझने का प्रयास करें. कोशिश करें की पहले आप दूसरे की भावनाएं समझें और बाद में मुंह खोलें. याद रखें शब्दबाण एक बार कमान से निकल गए तो उन की वापसी असंभव है, साथ ही, उन के द्वारा दिए घाव भरना भी बहुत मुश्किल. शब्द रिश्तों को पत्थर सा मजबूत भी बना सकते हैं और कांच सा तोड़ भी सकते हैं. सोचसमझ कर शब्दों का प्रयोग करें. यदि चुप्पी से काम चल सके तो चुप रहें.

ऐनी चैपमैन, अमेरिकी संगीतकार तथा लोकप्रिय वक्ता, जो स्वयं बहू रहीं और अब सास बन चुकी हैं, ने कई पुस्तकें लिखीं, जैसे ‘द मदर इन ला डांस,’ ‘ओवरकमिंग नैगेटिव इमोशंस,’ ‘10 वेज टू प्रिपेयर यौर डौटर फौर लाइफ’ आदि. वे सासबहू के रिश्ते को सुनहरा बनाने के लिए ये नियम बताती हैं :

–  सास को बहू की तुलना अपनी बेटी से नहीं करनी चाहिए और बहू को सास की तुलना अपनी मां से नहीं करनी चाहिए.

–  सास को चाहिए कि शादी के बाद बेटे को अपनी गिरफ्त से आजाद कर दे ताकि न केवल बेटेबहू का शादीशुदा जीवन सुखमय हो बल्कि सासबहू का रिश्ता भी सुदृढ़ बने.

–  बहू को अपने सैरसपाटे हेतु अपनी गृहस्थी या बच्चों की जिम्मेदारी सास पर न छोड़ने का निश्चय करना होगा.

–  यदि सास या बहू कुछ हठीले स्वभाव की हैं तो दोनों को चाहिए कि वे परस्पर नम्रता बनाए रखें लेकिन साथ ही थोड़ी दूरी भी रखें.

बहू नईनवेली है तो सास भी नवविवाहिता के लिए बहूरानी की भूमिका नई है, जिसे वह अनुभव से सीखेगी और इस के लिए उसे पर्याप्त समयाविधि मिलनी चाहिए. वहीं, सास के लिए भी उन का रोल नूतन है. एक अन्य स्त्री का अपनी गृहस्थी में प्रवेश, अपने बेटे के जीवन में स्वयं से अधिक उपस्थिति आदि के लिए स्वयं को ढाल रही हैं और इस के लिए उन्हें भी समय मिलना चाहिए.

बाटें अनुभव, आएं पास

बहुएं सास की इज्जत करें. उन्हें बुजुर्ग होने के साथ अनुभवी भी मानें. अपनी सास से उन के बचपन की मजेदार बातें सुनें, उन के शादी के बाद के किस्से, बच्चों को पालते समय संबंधित अनुभव आदि. जब एक सास अपनी बीती हुई जिंदगी के अनुभव अपनी नई बहू से बांटेगी तो उस के मन में बहू के प्रति लगाव बढ़ना स्वाभाविक है जिस से उन दोनों का रिश्ता और सुदृढ़ हो जाएगा.

सुझाव लेने में झिझक कैसी

हो सकता है कि आप अपनी सास के हर सुझाव से इत्तफाक न रखती हों, फिर भी उन के अनुभव को देखते हुए उन से सुझाव लेने में कोई हर्ज नहीं है. इस से आप को भिन्न प्रकार के विचार मिलेंगे. लेकिन कभी भी उन के दिए सुझावों को व्यक्तिगत लेते हुए उन पर बहस न करें. सुझाव को मानना आप की इच्छा पर निर्भर करता है, पसंद आए तो मानें वरना सास को अपनी सोच से अवगत करा दें.

घर दूर, फिर भी दिल पास

एक ही घर में रहते हुए दिलों का करीब आना समझ आता है. किंतु आज के परिवेश में जहां नौकरी और प्रगति के कारण बेटाबहू अलग शहर में गृहस्थी बसाते हैं, उस स्थिति में सासबहू का रिश्ता मधुर होने के साथ सुदृढ़ कैसे बने? दोनों एकदूसरे को कैसे समझें, जानें और मजबूत रिश्ता बनाएं? यह सबकुछ संभव है.

आइए, मिलते हैं कुछ ऐसी सासबहू जोडि़यों से जो शादी के बाद अलग शहरों में रहते हुए भी एकदूसरे की भावनाओं को न केवल पहचानती हैं बल्कि परिवार की डोर एक ने दूसरे के हाथों में बखूबी सौंपी है :

देवकी और पल्लवी : डैल कंपनी की सीनियर एडवाइजर, पल्लवी भारद्वाज. दिल्ली की पैदाइश, वहीं पलीबढ़ी, शिक्षा प्राप्त की. उस की शादी हुई केरल के आनंद रामकृष्णन से. विवाहोपरांत दोनों बेंगलुरु में रहने लगे जहां दोनों की नौकरियां थीं. सासससुर फलों व मसालों का अपना बगीचा संभालते हुए अपने गांव त्रिचूर में रहते हैं. भाषा, संस्कृति, खानपान सभी का फर्क था. किंतु पल्लवी ने अपने पति के साथ हर दूसरे माह अपनी ससुराल त्रिचूर जाने का क्रम अपना लिया. दोनों सासबहू हंस कर गले मिलतीं पर बातचीत कैसे हो? पल्लवी को मलयालम नहीं आती थी और देवकी को हिंदी या अंगरेजी. परंतु शादी के 8 वर्षों बाद आज भी दोनों में मधुर रिश्ता है. कैसे?

केरल में मिलने आए बेटाबहू के लिए जब देवकी खाना बनाती थीं तब पल्लवी उन के साथ रसोई में खड़ी रहती थी. वे इशारे से कहतीं कि जाओ अखबार पढ़ लो, टीवी देख लो पर पल्लवी मुसकरा कर उन्हें बताती कि उसे यहीं अच्छा लग रहा है. देवकी को उन्हें अपने हाथ का खाना खिलाना अच्छा लगता तो पल्लवी परोसने में मदद करती. अकेले में भले ही पल्लवी ताली या बिछुए नहीं पहनती पर जब सास से मिलने जाती तो उन की भावनाओं का ध्यान रखते हुए उन की संस्कृति के जेवर पहन लेती. ऐसे ही जब देवकी उन के घर आतीं, तो पल्लवी पहले से ही उन की पसंद का खयाल रखते हुए राशन मंगवा रखती. वे जो चाहे, जैसे चाहे, पकाएं. धीरेधीरे अब देवकी ने पल्लवी को अपनी संस्कृति का भोजन बनाना सिखा दिया है. जब भी दोनों मिलती हैं, एकदूसरे के साथ अधिक से अधिक समय बिताती हैं. भाषा की दीवार होते हुए भी दोनों ने एकदूसरे से न केवल तालमेल बिठा लिया बल्कि आज दोनों एकदूसरे की बात और भावना अच्छी तरह समझती हैं.

समय पर हर काम निबटाने की शौकीन देवकी कहती हैं कि यह उन्होंने अपनी बहू से सीखा कि बच्चे के साथ खेलने का सुख प्राप्त करने के लिए यदि कोई काम थोड़ा टालना भी पड़े तो कोई हर्ज नहीं. मसलन, कपड़े बाद में धुल सकते हैं, या सफाई थोड़ी देर में की जा सकती है. पल्लवी से उन्होंने प्राथमिकता देना सीखा. उन दोनों का रिश्ता जबरदस्ती की बातचीत से ऊपर, संगसाथ की खुशी में है.

बेटा होने के बाद दादी बनी देवकी ने अपने पोते अर्नव को खूब लाड़प्यार दिया. भोजन की जगह चौकलेट खिलाई जो उस के पिता को कतई पसंद नहीं आया मगर पल्लवी ने समझाया कि दादी का लाड़ है, और कुछ दिनों की बात है. रोजाना हम बच्चे को अनुशासनपूर्वक पालते हैं. जब दादी से मिलेगा, तब उन्हें अपनी मरजी का लाड़ देने दें. इसी में उन की संतुष्टि है.

पल्लवी कहती हैं कि आखिर सास भी मां है. और फिर ‘मूल से अधिक सूद प्यारा होता है’ यह कहावत सब ने सुनी है. यदि दादी अपने पोतेपोतियों को थोड़ा बिगाड़ना चाहें, उन्हें देररात तक खेलने दें या पौष्टिक भोजन की जगह उन की पसंद का जंक फूड खिलाएं तो उन्हें ऐसा करने दें. उन की भावनाओं को समझें और उन की कद्र करें.

सरोज, मोना व सुनयना : जयपुर के विद्यास्थली महिला टीचर ट्रेनिंग कालेज की उपप्राध्यापिका डा. सरोज शर्मा ने अपने ज्येष्ठ पुत्र विभाष का विवाह मोना से करवाया. सासबहू में ऐसी घुटी कि उन की शादी के 7 वर्षोंपरांत सरोज के छोटे बेटे की शादी मोना की छोटी बहन सुनयना से स्वत: दोनों परिवारों ने करवाई. आज मोना मुंबई में रहती है और सुनयना हैदराबाद में. मोना और सुनयना बताती हैं कि सरोज सास के रूप में मां से भी अधिक सरल स्वभाव की हैं. जब चाहे सो कर उठो, जो जो चाहे

कपड़े पहनो, अपनी मरजी का पकाओ, मम्मी कभी नहीं टोकतीं. उन का स्वभाव इतना सहज है कि जब एक दुर्घटना के कारण उन का औपरेशन हुआ, और बहुओं ने आग्रह किया कि अब वे साड़ी के बजाय टीशर्टलोअर पहनें तो वे आसानी से मान गईं.

सरोज कहती हैं, ‘‘हम जबजब मिलते हैं, मैं अपनी दोनों बहुओं के साथ रसोई में बराबर भागीदारी निभाती हूं, और कुछ देर उन के साथ उन के कमरे में बैठ कर दिनभर की बातें भी करती हूं. लेकिन बेटों के घर लौटते ही मैं अपने कमरे में आ जाती हूं. आखिर पतिपत्नी को भी तो आपसी समय मिलना चाहिए.’’ मोना की शादी के 25 सालों बाद भी तीनों परिवार हर दीवाली साथ मिल कर मनाते हैं- कभी जयपुर, कभी मुंबई तो कभी हैदराबाद में.

सरोज बताती हैं कि दोनों बहुओं को उन की अलमारी से उन की साडि़यां और जेवर पहनने की पूरी छूट है. और बहुएं बताती हैं कि उन की सास उन के पीहर वालों को बराबर की इज्जत देती हैं. चूंकि दोनों परिवार जयपुर में रहते हैं, सरोज हर त्योहार में दोनों बहुओं के मातापिता को भी न्योतती हैं.

सरोज को शुरू से ही काम करने का शौक रहा. अब जब बेटे उन्हें काम करने से मना करते हैं तो उन की उदासी देख बहुएं टोकती हैं, ‘‘मम्मी को काम करना अच्छा लगता है तो क्यों उन्हें अपने मन का नहीं करने देते?’’ ऐसे ही यदि कभी बेटे अपनी पत्नी से कोई शिकायती लहजे में बात करते हैं तो सरोज उन्हें फौरन टोक देती हैं, ‘‘कुछ खास चाहिए तो खुद कर लिया करो. ये कोई मशीन नहीं है, इंसान है.’’

फातिमा और फातिमा : चेन्नई की फातिमा शादी कर के एक भरेपूरे परिवार की सब से छोटी बहू बनी. इत्तफाक से उस की सास का नाम भी फातिमा ही है जो काफी बुजुर्ग हैं और चलनेफिरने में उन्हें बहुत दिक्कत रही है. लेकिन बहू ने जल्दी ही परेशानी का कारण भांप लिया.

सास अशिक्षित होने कारण और कुछ मुसलिम समाज की रिवायतों के चलते घर से बाहर कदम नहीं निकालती थीं. चलनेफिरने की कमी के कारण उन के पैरों की शक्ति क्षीण होती गई. बहू ने उन के लिए व्हीलचेयर का इंतजाम किया और नियमित रूप से उन्हें घुमाने ले जाती रही. आज उन के पैरों में इतनी जान है कि वे अपने रोजमर्रा के काम स्वयं कर सकती हैं.

शादी के एक माह बाद से ही बहू फातिमा अपने पति के कारोबार के चलते दिल्ली में रही. पीछे से सास का ध्यान रखने हेतु बहू ने एक नर्स का भी इंतजाम किया. सास मिलने आती रहती हैं और बहू भी उन से मिलने जाती रहती है. जब भी दोनों साथ होती हैं, सास फातिमा ने बहू फातिमा को बुरका पहने को कभी बाध्य नहीं किया. बल्कि बहू को साड़ी पहनना कुछ खास नहीं भाता जान कर, सास ने उसे सलवारकमीज और यहां तक कि लंबे स्कर्ट पहनने की भी इजाजत दी.

बहू हर ईद पर सास के नए जोड़े सिलवाती है. सास फातिमा को बहू फातिमा पर इतना विश्वास है कि किसी भी चीज की आवश्यकता पड़ने पर वे पूरे परिवार में से केवल फातिमा को ही बताना उचित समझती हैं. कई बार बहू को याद कर के रो भी देती हैं, ऐसा अन्य रिश्तेदार बताते हैं.

बहू फातिमा कहती है, ‘‘हमारे यहां सास को ‘मामी’ कह कर पुकारा जाता है लेकिन मैं ने हमेशा उन्हें ‘मम्मा’ ही कहा. शुरू में मुझे खाना पकाना नहीं आता था. हमारे यहां के रिवाज के हिसाब से पहला खाना, जो मुझे अकेले पकाना था, वह भी मैं ने उन्हीं की देखरेख में पकाया. उन्होंने हमेशा मेरा साथ दिया, कभी भी मेरे खाने में कोई नुक्स नहीं निकाला, बल्कि हमेशा प्रशंसा ही की. उन से सीखतेसीखते मुझे खाना बनाना आ गया. वे पास बैठी सब्जी काट कर दे दिया करतीं और बताती जातीं कि कैसे पकाऊं.’’ सास को टीवी धारावाहिकों में नागिन जैसे कार्यक्रम पसंद आते हैं तो बहू उन्हें फोन पर बताती रहती है कि कब कौन सा हिंदी धारावाहिक तमिल में डब हो कर आएगा ताकि वे देख कर आनंद उठा सकें.

साधना और मेधा : नईनई शादी के बाद जब मेधा अपने मायके जबलपुर आई तो मां ने बिंदी, मांग व बिछिया न देख फौरन टोका, ‘‘कौन कहेगा तेरी नई शादी हुई है? तेरी सास कुछ कहती नहीं?’’ लेकिन यह जानते ही कि उसे बिंदी, मांग व बिछिया में रुचि नहीं है, मेधा की सास साधना ने उस से कहा, ‘‘वैसे रहो जैसे अपने मायके में रहती थी. जो इच्छा करे, वह ड्रैस पहनो. बस, जब किसी रिश्तेदार के घर जाओ तब मांग भर लेना.’’

साधना अपने पति की नौकरी के कारण छत्तीसगढ़ में रहती हैं. मेधा रोज दफ्तर से लौट कर साधना से फोन पर अपने पति की पसंदीदा डिश पूछ लेती है. पति का दिल जीतने में उस की सास उस की बहुत मदद करती हैं.

मेधा हंसती है, ‘‘अकसर मांएं बेटों को बहुओं से बांटने में चिढ़ती हैं किंतु मेरी सास तो खुद ही मुझे मेरे पति की कमजोर नस बताती रहती हैं.’’ यहां तक कि पहले दिन से साधना ने परिवार की हर बात में मेधा की राय ली है. उसे कभी यह नहीं लगने दिया कि वह इस परिवार में नई सदस्य है.

मेधा की रिश्ते की एक बड़ी सास काफी तेजतर्रार हैं. लेकिन साधना की मेधा को सीख, कोई मेहमान कुछ ही दिनों के लिए हमारे घर आता है, उस की कोई बात बुरी भी लगे तब भी उसे उलटा जवाब नहीं देना, ने मेधा को सभी की दृष्टि में सम्मान दिलाया. रिश्तेदारी में नईनवेली बहू को सैटल करना उन्हें भलीभांति आता है.

इन दिनों टीवी के एक धारावाहिक की बात करते हुए साधना प्रसन्न हो कर कहती हैं कि उन की बहू तो रजनीकांत है. स्कूटर वह चला लेती है, कार वह चला लेती है, 15 लोगों का खाना वह बना लेती है. परस्पर प्रेम और सौहार्द्र के कारण अलग शहरों में रहते हुए भी सासबहू दोनों में बहुत अच्छी निभती है.

तो देखा आप ने, इन रीयल लाइफ उदाहरणों ने दिखा दिया कि भिन्न शहरों में रहते हुए भी आपसी समझदारी और थोड़े धैर्य के साथ चलने से, सासबहू का रिश्ता मीठा, मजबूत और मधुर हो सकता है. बस, आवश्यकता है तो साफ मन और सच्ची नीयत की.

सास को बताएं सारी बातें

कोशिश करें कि सास को आप की गृहस्थी की आवश्यक बातों का ज्ञान हो, जैसे आप कोई नई गाड़ी खरीद रही हैं या किसी और मकान में शिफ्ट हो रही हैं. बच्चों की तसवीरें भी उन्हें भेजती रहें. आजकल तो अधिकतर दादियां व्हाट्सऐप पर भी हैं और फेसबुक पर भी. बच्चों के स्कूल में हो रही फैंसी ड्रैस प्रतियोगिता, या आप की रिहाइश के प्रांगण में मन रहे राष्ट्रीय उत्सवों में बच्चों की भागीदारी की फोटो उन्हें अवश्य पोस्ट करें. नन्हें देशभक्त या नन्हीं परियां देख कर दादी का हृदय अभिभूत हो जाएगा.