सरिता विशेष

सवाल
मेरी शादी को 4 साल हो गए हैं. वैसे तो मेरे परिवार में सब का स्वभाव ठीक है लेकिन मेरी भाभी मुझे बातबात पर टोकती रहती हैं. वे हमेशा बड़ों के सामने मुझे नीचा दिखाने की कोशिश करती हैं. इसलिए मेरा उन से बात करने का दिल नहीं करता. मेरे पति मुझे काफी सहयोग करते हैं और कहते हैं कि ज्यादा मत सोचा करो. लेकिन हर समय नजरों के सामने रहने के कारण मैं भाभी की हरकतों को भूल नहीं पाती. आप ही बताएं कि मैं क्या करूं?

जवाब
परिवार में हर सदस्य की सोच आपस में मिले, यह जरूरी नहीं और आप जब अपनी भाभी के स्वभाव से अच्छी तरह वाकिफ हैं तो फिर उन के कारण परेशान रहने की क्या जरूरत है. जब भी वे आप को टोकें तो बस, यही कहें कि भाभी, मैं आप से सम्मान पाने की उम्मीद करती हूं, मेरे मन में भी आप के लिए बहुत आदर है. हो सकता है कि आप की ये बातें उन्हें बदलने पर मजबूर कर दें. लेकिन आप परिवार के लिए हमेशा बेहतर करने की ही कोशिश करें.

आप के साथ तो आप के पति का सहयोग है, इसलिए खुद को अन्य चीजों में व्यस्त रख कर अपने माइंड को फ्रैश करें वरना आप इन्हीं चीजों में उलझ कर रह जाएंगी और पति भी रोजरोज की इन बातों को सुन कर ऊबने लगेंगे.

ये भी पढ़ें…

देवरानी और जेठानी : बदल रहे हैं रिश्तों के माने

आज सुबह से ही मेरी पड़ोसन शोभा के यहां उठापटक हो रही थी. जब सुबह दूध लेते वक्त मेरी उन से मुलाकात हुई तो मैं ने इस उठापटक की वजह पूछी.

वे जोश से भर कर बोलीं, ‘‘आज दोपहर को मेरे जेठजेठानी अपने परिवार समेत आ रहे हैं. बस, हम उन्हीं के स्वागत की तैयारी में बिजी थे.’’

बातों ही बातों में उन्होंने बताया कि कैसे पिछले हफ्ते से ही वे जेठानी के परिवार के हर सदस्य का मनपसंद खाना बनाने और उपहार लाने में मसरूफ थीं.

पड़ोसन की बातें सुन कर मुझे अपनी मां की याद आ गई कि जब ताईजी और ताऊजी आने वाले होते थे तो कैसे मां थरथर कांपने लगती थीं और ताईजी के आने के बाद अपने ही घर में मम्मी की जगह जीरो हो जाती थी, पर आज शोभा की बातें सुन कर नए जमाने की देवरानीजेठानी के रिश्ते की यह नई बहार मेरे मन को बड़ा सुकून दे गई.

हकीकत में आज के इस नए जमाने की बहुएं देवरानीजेठानी के बजाय सहेली और बहनें बन कर रहना ज्यादा पसंद कर रही हैं. पुरानी दकियानूसी सोच को छोड़ कर वे आज एकदूसरे की साथी बन कर समाज में इस रिश्ते को नया रूप दे रही हैं.

आज तकनीक का जमाना है. इस में एकदूसरे से जुड़े रहने के अनेक साधन हैं. इन का इस्तेमाल भी आज की औरतें अपने रिश्तों को मजबूत करने में बखूबी कर रही हैं.

मुंबई की रहने वाली अणिमा की बेंगलुरु में रहने वाली जेठानी खाना बनाने में माहिर हैं. अणिमा अकसर वीडियो कौलिंग कर के अपनी जेठानी से नईनई रैसिपी पूछती रहती है. साथ ही, उस ने कोशिश कर के अपनी जेठानी का कुकिंग का यूट्यूब चैनल भी बनवा दिया है, जिस से जेठानी भी घर बैठे अच्छीखासी कमाई कर लेती हैं. दोनों दूर रह कर भी एकदूसरे की साथी बन गई हैं.

विविधा की ससुराल में 2 जेठानियां और सास थीं. दोनों जेठानियां कम पढ़ीलिखी थीं, जबकि विविधा शादी से पहले ही एक स्कूल में पढ़ाती थी और पीएचडी भी कर रही थी.

कुछ ही दिनों के बाद विविधा ने महसूस किया कि घर का काम खत्म करने के बाद उस की जेठानियां शाम को जेठजी के औफिस से आने तक फ्री रहती हैं इसीलिए सुबहसुबह उस का तैयार हो कर घर से स्कूल चले जाना भी उन्हें रास नहीं आ रहा था.

एक दिन मौका देख कर विविधा ने जेठानियों को बिजी रहने के लिए कुछ करने की सलाह दी. उन की रुचि देख कर उस ने एक को सिलाई और दूसरी को ब्यूटीशियन का कोर्स करवा दिया.

सरिता विशेष

कुछ ही दिनों में विविधा ने खुद कोशिश कर के घर के ही 2 कमरों में दोनों जेठानियों को ब्यूटीपार्लर और बुटीक खुलवा दिया.

अब जेठानियां बिजी रहने के साथसाथ कमाई भी करने लगी हैं. वे इस के लिए विविधा का गुणगान करते नहीं थकतीं. अब वे तीनों मिल कर घरबाहर का सारा काम चुटकियों में कर लेती हैं.

अपनी तीनों बहुओं का तालमेल देख सास व परिवार के मर्द भी चैन की सांस लेते हैं.

मंजू और उस की देवरानी अंजू ने अपनी समझदारी का परिचय देते हुए भाइयों की आपसी दुश्मनी को दरकिनार कर अपने संबंधों को जब सामान्य कर लिया तो दोनों भाइयों का मनमुटाव भी खुद ही खत्म हो गया.

हुआ यों कि मंजू के देवर शादी से पहले बड़े भाई के साथ ही रहते थे. सो, शादी के बाद देवरानी भी उसी घर में आ गई. शुरुआत में तो सब ठीकठाक रहा, पर कुछ दिनों के बाद ही दोनों में छोटीछोटी बातों को ले कर तनातनी होने लगी.

देवरानीजेठानी से शुरू हुई बात भाइयों तक पहुंचतेपहुंचते बतंगड़ बन गई और एक दिन गरम स्वभाव के दोनों भाइयों ने अलग होना ठीक समझा. नतीजतन, दोनों भाई एक ही महल्ले में अलगअलग रहने लगे.

कुछ समय बाद पढ़ीलिखी और समझदार मंजू को जब एक सामाजिक कार्यक्रम में देवरानी अंजू मिली तो वह बोली, ‘‘एक ही शहर में रह कर भी अगर हम जरूरत पड़ने पर एकदूसरे

के काम न आएं तो हमारी पढ़ाईलिखाई किस काम की. अपने ही सगे भाई से अहंकार पाल कर क्यों दूसरों को बातें बनाने का मौका दें.

‘‘अच्छा है कि हम पिछला सब भुला कर एक नई शुरुआत करें और मिलजुल कर रहें.’’

समझदार देवरानी को भी जेठानी की बात जंच गई और अगली दीवाली सब ने एकसाथ मनाने का तय किया. दोनों बहुओं की थोड़ी सी कोशिश से पिछले 3 सालों से बनी दिलों की दूरियों को मिटा कर आज अलग रहने के बाद भी दोनों भाई बड़े ही प्यार से रहते हैं और जरूरत पड़ने पर एकदूसरे का भरपूर साथ भी देते हैं.

आजकल इस हाथ दे उस हाथ ले का जमाना है. गरिमा और उस की देवरानी रीना का परिवार भी साल में एक बार जरूर साथ घूमने का प्रोग्राम बनाते हैं.

वह कहती है, ‘‘हम दोनों पैसों के मामले में पूरी साफगोई रखते हैं क्योंकि पैसा ही संबंध बिगड़ने की बहुत बड़ी वजह बन जाता है.

‘‘ऐसे प्रोग्राम में न कोई छोटा है और न कोई बड़ा. हम दोनों पूरे खर्च को

2 बराबर हिस्सों में बांट लेते हैं ताकि किसी भी तरह का मनमुटाव न हो और हमारे द्वारा चलाया गया यह सिलसिला हमारे बाद हमारे बच्चे भी चलाते रहें.

‘‘एकसाथ घूमने जाने से हम बच्चों और दूसरे मामलों में बेफिक्र तो रहते ही हैं, साथ ही हमारे बच्चों के संबंध भी मजबूत होते हैं जो उन के भविष्य के लिए बहुत जरूरी है.’’

आज की देवरानीजेठानी ज्यादा समझदार हैं और प्रैक्टिकल भी. वैसे तो तनाव, तकरार और मनमुटाव के मुद्दे आज भी वही हैं, पर पढ़ाईलिखाई का असर और सोच के बड़े नजरिए के चलते वर्तमान समय की देवरानीजेठानी इन सब से अपने पारस्परिक संबंधों को कम से कम प्रभावित होने देती हैं.

कुछ साल पहले जहां आपसी मनमुटाव के चलते सालोंसाल तक भाइयों के परिवार आपस में बातचीत तक नहीं करते थे, वहीं आज की बहुएं अच्छी तरह समझती हैं कि वर्तमान समय में परिवार छोटे हैं जिस में सदस्यों के नाम पर महज 3 या 4 लोग ही होते हैं. ऐसे में सभी को कभी न कभी एकदूसरे की जरूरत पड़ती ही है, तो क्यों न अपने ही भाई के परिवार से तालमेल बिठा कर रखा जाए. इस से अपनेपन के साथसाथ रिश्ते की मजबूती बढ़ती है.

वक्तबेवक्त जरूरत पड़ने पर दूसरों से मदद ले कर अहसानमंद होने के बजाय अपने ही भाई के परिवार से मदद ली जाए. पहले जहां मान और पद की गरिमा को बहुत ज्यादा अहमियत दी जाती थी वहीं आज की बहुएं मानती हैं कि न कोई छोटा है और न बड़ा.

एक मल्टीनैशनल कंपनी में मैनेजर गरिमा के देवर की जब शादी हुई तो सभी उसे जेठानी बनने की बधाई दे रहे थे.

इस पर वह बोली, ‘‘आंटी, न कोई देवरानी है, न जेठानी. बस, सब एक परिवार के सदस्य हैं और मैं खुश हूं कि हमारे परिवार में एक सदस्य आ रही है.’’

गरिमा की यह सोच आज की नई पीढ़ी की सोच को बखूबी बयान करती है.