नेपाल में आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को कारण बताओ नोटिस जारी कर ही दिया कि उसने ब्लैक मार्केटिंग के अलावा कुछ अन्य सामाजिक अपराधों से जुड़े कानूनों और पनिशमेंट ऐक्ट- 1975 में संशोधन क्यों किया? सर्वोच्च न्यायालय ने यह नोटिस एडवोकेट जगन्नाथ मिश्र की मई 2016 में दायर याचिका की सुनवाई करते हुए जारी किया है.

अपनी याचिका में मिश्र ने आरोप लगाया है कि सरकार जान-बूझकर कालाबाजारियों के खिलाफ नरमी बरत रही है. हालांकि कानूनों में संशोधनों का मकसद कारोबार को मदद पहुंचाना है, ताकि नेपाल के आर्थिक विकास को गति मिल सके, लेकिन अनैतिक कारोबार को मदद पहुंचाने का लाभ सिर्फ कालाबाजारियों को होगा.

सरकार राजनीतिक लाभ लेने के इरादे से कानूनों में संशोधन नहीं कर सकती, ऐसे में जगन्नाथ मिश्र जैसे जन-हितैषी लोगों की सराहना करनी ही चाहिए. लंबे वक्त से निजी क्षेत्र के प्रतिनिधि सांसदों से यह मांग करते आ रहे हैं कि ऐसे कानूनों में संशोधन किए जाएं, जो स्वस्थ कारोबारी प्रतिस्पर्धा में बाधक हैं या फिर उद्योगों के मुफीद नहीं हैं.

अप्रैल 2016 में नेपाल चैम्बर ऑफ कॉमर्स (सीएनआई) के प्रेसिडेंट राजेश काजी श्रेष्ठ ने सरकार से अपील की थी कि ब्लैक मार्केटिंग ऐक्ट में सुधार की जाए. इस साल 9 नवंबर को सीएनआई के मौजूदा प्रेसिडेंट हरि भक्त शर्मा ने इस बात को लेकर काफी अफसोस जताया था कि पिछले 25 वर्षो से व्यवसायों व अर्थव्यवस्था से जुड़े कानूनों की गहन समीक्षा नहीं हुई है.

विदेशी निवेशकों की यही शिकायत है कि निवेश के लिहाज से नेपाल बेहद मुश्किल जगह है. नेपाल के एकमात्र खरबपति बिनोद चौधरी ने काठमांडू पोस्ट से अपनी पीड़ा व्यक्त की थी कि अपना कारोबार बढ़ाने के लिए उन्हें किस तरह से एनआरआई स्टेटस हासिल करने की जरूरत थी, पर कानून किसी भी नेपाली कंपनी को विदेश में निवेश से रोकता है.

हालांकि, आर्थिक विकास के लिए कारोबार और निवेश से जुड़े कानूनों में सुधार की दरकार है, लेकिन ब्लैक मार्केटिंग ऐक्ट के संशोधन से ऐसा कतई नहीं होने वाला. इससे सिर्फ चंद बेईमान उद्योगपतियों को ही लाभ पहुंचेगा.