सरिता विशेष

जुलाई में प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के हटने के बाद उनकी जगह वजीर-ए-आजम बने शाहिद खाकान अब्बासी से जो थोड़ी-बहुत उम्मीदें लगी थीं कि वह ताकतवर फौजी निजाम के ऊपर नागरिक सत्ता प्रतिष्ठान को कुछ अहमियत दिला पाएंगे, वे आशाएं आतंकवादियों द्वारा मासूम लोगों को मारे जाने और फौज द्वारा इस्लामी कट्टरपंथियों का इस्तेमाल कर हुकूमत को घेरने की घटना से खत्म हो गई हैं.

17 दिसंबर को बलूचिस्तान प्रांत की राजधानी क्वेटा में एक चर्च में दो आत्मघाती दहशतगर्दो ने धमाका करके नौ लोगों को मार डाला, जबकि 35 लोग बुरी तरह जख्मी हुए. तीन साल पहले पेशावर में तालिबानी दहशतगर्दो ने आत्मघाती बमों के इस्तेमाल से आर्मी स्कूल के 132 मासूम बच्चों समेत 148 लोगों को मार डाला था, उसके बाद से ही पूरे पाकिस्तान में अवाम को निशाना बनाने के ये मुख्य हथियार बन गए हैं. लेकिन इन हमलों के मास्टरमाइंड को इंसाफ के कठघरे में घसीट लाने की बजाय पाकिस्तान की सुरक्षा एजेंसियां इस्लामी चरमपंथियों को ही बढ़ावा दे रही हैं.

आतंकी सरगनाओं को कैद से आजाद करके वे ऐसे तत्वों का मनोबल बढ़ा रही हैं. पिछले महीने पाकिस्तानी फौज ने उस समय फिर यह दिखाया कि उसके देश में असली ताकत कहां पर है, जब इस्लामाबाद में इस्लामी कट्टरपंथी आंदोलनकारियों और सरकार के बीच इसने मध्यस्थ की भूमिका निभाई.

कट्टरपंथियों ने कानून मंत्री जाहिद हमीद पर नए सांसदों के शपथ-पत्र में तब्दीली करने संबंधी प्रस्ताव को ईशनिंदा बताते हुए उनके इस्तीफे की मांग की, जिसे कुछ वक्त तक अब्बासी हुकूमत ने नजरअंदाज किया, मगर फिर फौज प्रमुख जनरल बाजवा ने दखल देते हुए दोनों पक्षों में एक समझौता कराया, जिसके तहत न सिर्फ कानून मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा, बल्कि समझौते में बाजवा का शुक्रिया अदा किया गया कि ‘उन्होंने मुल्क को एक बड़ी मुसीबत से बचा लिया है.’

हकीकत में पाकिस्तान की बड़ी मुसीबत है उसकी फौज द्वारा कट्टरपंथियों का इस्तेमाल. जब तक यह स्थिति नहीं बदलती, आतंकवाद को काबू करने का उसका मनसूबा सपना ही रहेगा और उस पूरे क्षेत्र में अस्थिरता बनी रहेगी.