सरिता विशेष

राहुल गांधी का कांग्रेस अध्यक्ष बनना लगभग तय ही था. जब पार्टी के अध्यक्ष पद के लिए चुनाव की घोषणा हुई, उससे भी बहुत पहले से. हालांकि अभी सिर्फ नामांकन पत्र ही दाखिल हुए हैं, कई औपचरिकताएं बाकी हैं, लेकिन अब यह सब ज्यादा महत्व नहीं रखता, क्योंकि इस मैदान में अब वे अकेले ही हैं. एक दूसरी तरह से देखें, तो कांग्रेस पार्टी में राहुल गांधी उपाध्यक्ष पद पर रहते हुए इस समय वही भूमिका निभा रहे हैं, जो पार्टी अध्यक्ष को निभानी चाहिए. स्वास्थ्य या किन्हीं अन्य निजी कारणों से पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी अब पहले की तरह सक्रिय नहीं हैं.

गुजरात में चल रहे विधानसभा चुनावों को ही देखें, तो वहां के तूफानी दौरे पार्टी के बड़े नेताओं में सिर्फ राहुल गांधी ही कर रहे हैं. सिर्फ भूमिका और सक्रियता के स्तर पर ही नहीं, बल्कि पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं में स्वीकार्यता के लिहाज से भी वे इस समय देश के सबसे पुराने और दूसरे बड़े राजनीतिक दल के सबसे बड़े नेता तो हैं ही. और बात सिर्फ कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं की ही नहीं है, विरोधी दलों के सर्वोच्च स्तर के नेता इस समय जिस तरह उन पर टिप्पणियां कर रहे हैं, वह यही बताता है कि उन्हें सभी ने कांग्रेस के सबसे बड़े नेता के रूप में स्वीकार कर लिया है.

बेशक, उन्हें अध्यक्ष बनाए जाने की टाइमिंग पर सवाल जरूर उठाए जा सकते हैं. लेकिन यह भी सच है कि उन्हें जब भी अध्यक्ष बनाया जाता, टाइमिंग का सवाल उठना ही था. इतना जरूर है कि इस समय इसे गुजरात चुनाव से जोड़कर देखा जाएगा. हालांकि पार्टी के लिए यही उपयुक्त समय भी है, क्योंकि चुनाव के बाद अगर उन्हें अध्यक्ष बनाया जाता, तो उसे चुनाव की सफलता-असफलता से जोड़कर देखा जाता. उन्हें पार्टी अध्यक्ष बनाया जाना भले ही एक औपचारिकता हो, लेकिन उनके सामने जो चुनौतियां खड़ी हैं, बहुत महत्वपूर्ण हैं.

सबसे बड़ी चुनौती तो यही है कि उन्हें उन लक्ष्यों की ओर बढ़ना है, जो पिछले कुछ साल में पार्टी के हाथ से फिसल गए हैं. बहुत से उस दौर में ही फिसले हैं, जब वे खुद पार्टी के उपाध्यक्ष थे. वे उस दौर में पार्टी में सक्रिय हुए हैं, जिसे कांग्रेस का पतझड़ काल कहा जा सकता है. पतझड़ के इस घनीभूत दौर से पार्टी को नई बहार की ओर ले जाना फिलहाल तो असंभव सा दिखता है. राजनेताओं की असली परीक्षा असंभव को संभव बनाने में ही होती है. खुद राहुल गांधी भी समझते होंगे कि यह बहुत आसान नहीं है. वह भी उस दौर में, जब देश का राजनीतिक यथार्थ काफी बदल चुका है.

देश के बड़े राज्यों में कांग्रेस जिस जमीन पर खड़ी होती थी, वह अब उसके पांवों के नीचे से खिसक चुकी है. यानी पुरानी स्थिति पर पहुंचने के लिए कांग्रेस को नए सिरे से अपनी जमीन तैयार करनी है.उम्मीद है कि इन चुनौतियों के साथ ही राहुल गांधी को यह एहसास भी होगा कि सोशल मीडिया पर चलने वाली छवि निर्माण की लड़ाई में उनकी पार्टी न सिर्फ काफी पिछड़ चुकी है, बल्कि उसे एक हद तक शिकस्त भी मिल चुकी है.

खुद राहुल गांधी को उपहास का पात्र बनाने के यहां नित नए प्रयास होते हैं और पार्टी उनका माकूल जवाब देने में नाकाम रही है. अब पार्टी अध्यक्ष के तौर पर उन्हें अपना कद इतना बढ़ाना होगा कि ये सारे उपहास बौने पड़ जाएं. कांग्रेस अगले या उससे अगले आम चुनाव में सत्ता में आती है या नहीं, हमारे लिए यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है. भले ही कांग्रेस विपक्ष में रहे, लेकिन एक अखिल भारतीय दल के रूप में अगर वह मजबूत होती है, तो यह हमारे लोकतंत्र के लिए एक शुभ संकेत होगा. क्या राहुल गांधी इस चुनौती को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं?