भाजपा की साम्प्रदायिक राजनीति के खिलाफ राजनीतिक दल भले ही सामाजिक मुददों पर चर्चा नहीं कर रहे पर अभी भी कुछ सामाजिक दल कमजोर ही सही पर अपनी आवाज को बुलंद कर रहे हैं. इनको मीडिया का बडा हिस्सा भी हाशिये पर डाल चुका है. इसके बाद भी यह अपनी बात कहने में पीछे नहीं हैं. ऐसे सामाजिक लोगों ने केन्द्र और प्रदेश सरकार के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की है.

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में सामाजिक-राजनीतिक संगठनों के नेताओं ने गांधी भवन में एक चिंतन बैठक की. इसमें बलिया, झांसी, आजमगढ़, बेल्थरा, सिद्धार्थनगर, मुजफ्फरनगर, इलाहाबाद, बलरामपुर, बहराइच, बाराबंकी, फैजाबाद, अंबेडकरनगर, बस्ती, देवरिया, फतेहपुर, जौनपुर, कासंगज, संतकबीरनगर, सीतापुर, लखीमपुर खीरी, मुबारकपुर, सहारनपुर, शाहजहांपुर आदि जिलों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया. बैठक में रिहाई मंच अध्यक्ष मुहम्मद शुऐब ने कहा कि आज एक बार फिर बाबा साहेब के परिनिर्वाण दिवस को कलंकित करने के लिए 6 दिसंबर से राम मंदिर निर्माण का शिगूफा छोड़कर मुल्क को सांप्रदायिकता की आग में झोंका जा रहा है. पर उत्पीड़ित समाज की एकजुटता और एक साथ लड़ने का संकल्प मनुवादी ताकतों के मंसूबों को पूरा नहीं होने देगा.

एनएपीएम की संविधान बचाओ यात्रा से लौटी अरुंधति ध्रुव ने कहा कि संघर्ष के इलाके प्रतिरोध की शक्तियों को न सिर्फ उर्जा देते हैं बल्कि यह भी तय करते हैं कि मुल्क कैसा होगा. बुलेट ट्रेन की राजनीति करने वालों को दिल्ली में पहुंचे किसानों ने बता दिया कि इस देश की राजनीति वो नहीं बल्कि इस देश का मेहनतकश किसान तय करेगा. दिल्ली से आए एनएपीएम नेता विमल भाई ने कहा कि जो जहर बापू की हत्या के बाद बोया गया था आज वो विकराल रुप में हमारे सामने है. इस जहर ने अल्पसंख्यकों की तो सिर्फ जिन्दगी ली पर बहुसंख्यक हिंदू समाज के अन्दर एक हिंसात्मक जेहनियत का निर्माण किया जिसका खामियाज़ा हिंदू समाज को लम्बे समय तक भुगतना पड़ सकता है.

वर्कर्स काउंसिल के संयोजक ओपी सिन्हा ने कहा कि स्वतंत्र नागरिक की राजनीतिक भूमिका इस पूंजीवादी साम्राज्यवादी राज्य सत्ता का अंत कर देगी. नागरिक सत्ता की बहस को जमीन पर ले जाए बगैर इस फासीवादी निजाम से नहीं लड़ा जा सकता. इलाहाबाद से आए सीपीआईएमएल के वरिष्ठ नेता आषीष मित्तल कहते हैं कि इलाहाबाद का नाम प्रयागराज करने वाली राजनीति किसानों, आदिवासी को उनकी जमीन से बेदखल कर रही है. गोरक्षकों द्वारा गोपालकों की हत्या की जा रही है. योगी सरकार आने के बाद सुनियोजित तरीके से दलितों और अल्पसंख्यकों की मुठभेड़ के नाम पर हत्या हो रही है. इलाहाबाद के वरिष्ठ संस्कृतिकर्मी खालिद सिद्दीकी ने कहा कि इलाहाबाद का नाम प्रयागराज करना राजनीतिक दिवालियापन है. किसी क्षेत्र की संस्कृति सरकारी नामों की मोहताज नहीं है इलाहाबाद था और इलाहाबाद ही रहेगा.

बलिया से आए वंचित समाज के आंदोलनों के नेता बलवंत यादव ने कहा कि बेरोजगारी, पलायन, उत्तर भारतीयों पर बढ़ते हमले के इस दौर में विपक्ष घुटने टेक चुका है. सरकारें मंदिर-मस्जिद की आड़ में देश में आग लगाने पर आमादा हैं और विपक्ष ध्रुवीकरण के डर से चुप्पी साधे बैठा है. जो विपक्ष खुद को बचा नहीं सकता वो आम आदमी को क्या बचाएगा. 2 अप्रैल को भारत बंद के दौरान जेल गए मुजफ्फरनगर के आशू चौधरी ने कहा कि योगी सरकार में लगातार उनका ज़िला निशाने पर है. पुरवालियान में बच्चों के क्रिकेट मैच को लेकर हुए तनाव के बाद पुलिस ने भाजपा सांसद संजीव बालियान के दबाव में न सिर्फ मुस्लिम समुदाय के निर्दोषों पर मुकदमा कायम किया बल्कि तीन लोगों पर रासुका भी लगा दिया. ठीक इसी तरह बुढ़ाना में सांप्रदायिक तनाव के बाद भाजपा विधायक उमेश मलिक ने प्रशासन को निर्देष दिया था कि एक घंटे मुसलमानों पर लाठियां चलवाओ.

स्वराज अभियान के नेता राजीव ध्यानी ने कहा कि यह संकट दीर्घकालिक है और हमें राजनीतिक हस्तक्षेप करना पड़ेगा. सांप्रदायिकता की आड़ में संसाधनों का बेतहाशा दोहन हो रहा है. फासीवादी विरोधी मोर्चा के नेता कृपाशंकर ने कहा कि वर्तमान सरकार में जगह-जगह सांपद्रायिक हिंसा अंजाम देने वालों को खुली छूट देकर पूरे मुल्क को आग में झोकने का काम किया जा रहा है. इसका ज्वलंत उदाहरण है कि बहराइच में सांप्रदायिक तनाव जैसी घटना के बाद अल्पसंख्यकों पर यूएपीए लगा दिया जाता है.

बैठक में प्रो0 रुप रेखा वर्मा, नीति सक्सेना, ममता सिंह, शकील कुरैषी, वीरेन्द्र गुप्ता, तारिक दुर्रानी, रॉबिन वर्मा, गुफरान सिद्दीकी, गुंजन सिंह, एडवोकेट संतोष सिंह, राजकुमार, शाहरुख अहमद, अतुल, पंकज यादव, रोहित सिंह, आफाक, सचेन्द्र यादव, दुगेश चौधरी, अजय शर्मा, आशीष यादव, हफीज, खालिद, चंद्रिका, अखतरुल इस्लाम, एहसानुल हक मलिक, षिवनारायण कुषवाहा, उदय प्रताप, चौधरी फिरोज, प्रो0 जमाल नुसरत, कमर सीतापुरी, कृष्ण प्रताप यादव, तारिक शफीक, सागर यादव, विवेक यादव, विमल चौधरी, उदय राज शर्मा, रजीउद्दीन, अतहर, सदफ, परमानंद तिवारी, डीएन बौद्ध, सुभाष गौतम, मलिक शाहबाज, गुफरान चौधरी, जेपी सिंह, आरिफ, एसएस हुसैन, एडवोकेट नजमुस्स साकिब, एडवोकेट जमाल, आरती, एमडीखान, रफी खान, केके शुक्ला, नासिर अली, गनेश, धर्मपाल सिंह, रमेश साहनी, राजीव यादव विभिन्न सामाजिक राजनीतिक संगठनों के लोगों ने हिस्सा लेकर अपनी बात को रखा.

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