सरिता विशेष

बौलीवुड फिल्म ‘जौली एलएलबी’ में पुलिस थानों की नीलामी का एक मजेदार दृश्य दिखाया गया है. फिल्म में एक हवलदार थानों की बोली  लगाता है. हवलदार के सामने कई थानेदार बैठे हैं. थानों की नीलामी के इस दृश्य में हवलदार जिन क्षेत्रों के नाम लेता है वे दिल्ली के थाने हैं. सदर थाने की बोली 20 लाख रुपए से शुरू होती है. इसी तरह दिल्ली यूनिवर्सिटी थाने की. बोली के दौरान थानेदार एकदूसरे के भ्रष्ट चरित्र को ले कर टिप्पणी करते हैं.

फिल्म का यह दृश्य नितांत काल्पनिक नहीं है बल्कि दिल्ली और देश के दूसरे महानगरों, नगरों की हकीकत बयां करता है. इस तरह की नीलामियों में इस देश की जनता के साथ कितना बड़ा धोखा छिपा होता है, आम नागरिक को एहसास नहीं हो पाता.

2जी घोटाले का सच

दरअसल, यूपीए यानी संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के सब से चर्चित घोटालों में से एक 2जी स्कैम मामला 2008 में सामने आया था. यूपीए सरकार के समय कंप्ट्रोलर ऐंड औडिटर जनरल यानी सीएजी विनोद राय ने अनुमान के आधार पर 2जी स्पैक्ट्रम आवंटन में 1.76 लाख करोड़ रुपए के घोटाले की रिपोर्ट दी थी.

रिपोर्ट में कहा गया कि  2जी स्पैक्ट्रम का आवंटन 2001 की दरों पर किया गया. इस में कई अयोग्य कंपनियों को कम दरों पर सुविधा प्रदान की गईर्. अगर नई दरों के आधार पर स्पैक्ट्रम की खुली नीलामी हुई होती तो सरकार को 1.76 लाख करोड़ रुपए की कमाई होती. कंपनियों को नीलामी के बजाय ‘पहले आओ, पहले पाओ’ नीति पर स्पैक्ट्रम दिया गया, जिस के चलते सरकारी खजाने को यह नुकसान हुआ.

यूपीए सरकार में इस कथित घोटाले की बात सामने आई तो सुब्रह्मण्यम स्वामी यह मामला कोर्ट में ले कर गए. सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सरकार से जांच के लिए कहा. सरकार ने मामले की जांच का जिम्मा सीबीआई को सौंपा.

अक्तूबर 2009 में मामला सीबीआई में दर्ज हुआ था. सीबीआई ने तब के दूरसंचार मंत्री ए राजा, द्रमुक सांसद कनिमोझी समेत 34 लोगों को आरोपी बनाया. आरोपियों में 21 व्यक्ति और 13 कंपनियां थीं.  इन में 2 बड़े नौकरशाह तब के दूरसंचार मंत्रालय के सचिव सिद्धार्थ बेहुरा और ए राजा के निजी सचिव आर के चंदोलिया थे. डीएमके प्रमुख एम करुणानिधि की पत्नी दयालु अम्माल भी आरोपियों में शामिल थीं.

खबरें आने लगी कि सरकार के मंत्रियों और अधिकारियों ने मिल कर गैरकानूनी तरीके से 2जी स्पैक्ट्रम लाइसैंस आवंटित किए थे. इस में 3 मामले दर्ज किए गए. पहले मामले में सीबीआई ने तब के संचार मंत्री ए राजा, पूर्व मुख्यमंत्री करुणानिधि की बेटी कनिमोझी, दूरसंचार मंत्रालय के सचिव सिद्धार्थ बेहुरा, ए राजा के निजी सचिव आर के चंदोलिया, स्वान टैलीकौम के प्रमोटर शाहिद उस्मान बलवा और विनोद गोयनका, यूनीटैक लिमिटेड  के एमडी संजय चंद्रा, रिलायंस के अनिल धीरूभाई अंबानी समूह से गौतम दोसी, सुरेंद्र पिपास व हरि नायर के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया था.

दूसरे मामले में एस्सार गु्रप के प्रमोटर रवि रूइया, अंशुमन रूइया, लूप टैलीकौम के प्रमोटर किरण खेतान, आई पी खेतान, एस्सार समूह के निदेशक विकास आरोपी थे. सीबीआई ने ए राजा, कनिमोझी, शाहिद बलवा, विनोद गोयनका, आसिफ बलवा, राजीव अग्रवाल, करीम मोरानी, शरद समेत 19 आरोपियों के खिलाफ मनी लौंडिं्रग के मामले भी दर्ज किए थे.

प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी ने तीसरे मामले में डीएमके के प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री एम करुणानिधि की पत्नी दयालु अम्माल समेत कई लोगों को आरोपी बनाया था. उन पर आरोप था कि उन्होंने एसटीपीएल प्रमोटर्स के जरिए डीएमके द्वारा चलाए जाने वाले कलईनार टीवी को 200 करोड़ रुपए का भुगतान किया. उन से कई दिनों तक ईडी ने पूछताछ भी की थी.

नियमों में हेरफेर

सीबीआई जांच में दूरसंचार मंत्री ए राजा पर लगे आरोप में कहा गया कि कटऔफ तारीख 1 अक्तूबर, 2007 की थी पर जब 525 आवेदन आ गए तो अचानक कटऔफ तारीख 25 सितंबर कर दी गई. इस से 400 आवेदन खारिज हो गए. ‘पहले आओ, पहले पाओ’ नीति को बदल कर ‘पहले आओ, पहले चुकाओ’ कर दिया गया. नई समयसीमा के भीतर जो आवेदक लाइसैंस फीस का ड्राफ्ट ले कर आए, केवल उन्हीं आवेदकों के आवेदनों पर विचार किया गया.

ए राजा और कनिमोझी को कई महीने जेल में रहना पड़ा था. कनिमोझी पर आरोप था कि अपने चैनल के लिए उन्होंने 200 करोड़ रुपए की रिश्वत डीबी रियल्टी के शाहिद बलवा से ली और बदले में स्पैक्ट्रम दिलाया था.

मामले में 8 कंपनियों के 122 लाइसैंस सुप्रीम कोर्ट के आदेश से रद्द कर दिए. फरवरी 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने स्पैक्ट्रम आवंटन को ‘असंवैधानिक और विवेकाधीन’ घोषित कर दिया था. कोर्ट ने अपने आदेश में सरकार से कहा कि वह 2007 से 2009 के बीच जारी 122 लाइसैंसों को रद्द कर दे और इन लाइसैंसों को फिर से सही नियमों के अनुसार आवंटित किया जाए.

पूर्व दूरसंचार सचिव सिद्धार्थ बेरा, राजा के पूर्व निजी सचिव आर के चंदोलिया पर आरोप लगे कि सरकारी पद का दुरुपयोग करते हुए इस आपराधिक साजिश में शामिल हो कर भ्रष्टाचार किया. अदालत ने ताजा फैसले में साफ किया कि एजेंसी ने अपनी चार्जशीट में सरकारी कर्मचारियों पर आरोप तो लगाए पर उस ने इन्हें साबित करने के लिए कोई सुबूत नहीं पेश किया.

अफवाह इस कदर फैली कि देश में राजनीतिक उथलपुथल मची. मामले को ले कर राजनीति गरमाई. जनता में घोटालों के प्रति आक्रोश फैला. घोटाले के बाद लोकपाल मुद्दे पर जन आंदोलन शुरू हुआ और सत्ता का तख्त पलट गया. दूरसंचार मंत्री को हटाने के लिए संसद की कार्यवाही विपक्ष ने ठप कर दी थी. बाद में ए राजा को इस्तीफा देना पड़ा.

चुनावी मुद्दा

सीएजी की रिपोर्ट को भाजपा ने हाथोंहाथ लिया और भ्रष्टाचार के मामले में कांग्रेस पर जमकर हमला बोला था. मामले को खूब उछाला गया. चुनावों में नरेंद्र मोदी समेत भाजपा नेताओं ने यूपीए सरकार के घोटालों को खूब भुनाया. देश में हर बड़ी रैली में 2जी मुद्दे पर कांग्रेस को आड़े हाथों लिया. उन चुनावों में भ्रष्टाचार सब से बड़ा मुद्दा बना. मनमोहन सरकार को संसद से ले कर सड़क तक बदनाम किया गया.

हालांकि सीएजी के नुकसान के आंकड़ों पर भी कई तरह के आरोप थे पर यह एक बड़ा राजनीतिक विवाद बना दिया गया.

और भी घोटाले

उस समय यूपीए की मनमोहन सिंह सरकार का 2जी के अलावा 70 हजार करोड़ रुपए का कौमनवेल्थ घोटाला भी चर्चा में आया. इस के चलते सुरेश कलमाड़ी को त्यागपत्र देना पड़ा. 3 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का कोयला घोटाला सामने आया. इन तमाम कथित घोटालों के चलते मनमोहन सिंह सरकार विपक्ष के निशाने पर थी. इन घोटाले के चलते आम जनता में उस के खिलाफ गुस्सा बढ़ने लगा था और अन्ना हजारे के नेतृत्व में दिल्ली के जंतरमंतर पर आंदोलन शुरू हो गया. कुछ समय बाद लोकसभा चुनाव नजदीक आ गए.

2014 में भाजपा की अगुवाई में एनडीए की सरकार बन गई. कथित घोटालों की बदौलत नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बन गए.

इन कथित घोटालों से देश की अंतर्राष्ट्रीय छवि पर भी असर पड़ा.  घोटाले के आरोपों के बाद टैलीकौम सैक्टर की हालत खराब हो गई. बैंकों का करोड़ों रुपए का लोन डूब गया क्योंकि टैलीकौम कंपनियां बैठ गईं और उन का दिया पैसा डूब गया. उपभोक्ताओं को भी कोई फायदा नहीं हुआ.

2जी स्पैक्ट्रम की नीलामी का मामला भी कुछ ऐसा निकला  जिस में सीबीआई कोई सुबूत पेश नहीं कर पाई और अदालत द्वारा आरोपियों को बरी करना पड़ा.

फिल्म ‘जौली एलएलबी’ की कहानी के अंत में जज एक केस का फैसला सुनाते हुए कहते हैं कि मैं यहां बैठा रहता हूं और इंतजार करता रहता हूं. मुझे जजमैंट देना होता है एविडैंस की बिना पर, लेकिन एविडैंस आता नहीं है और मुजरिम छूट जाता है. मुझे मालूम होता है कि मुजरिम कौन होता है. इस कोर्ट में बैठा हर आदमी जानता है कि मुजरिम कौन है पर सुबूत नहीं आता.

2जी स्पैक्ट्रम घोटाले के फैसले में भी सीबीआई के स्पैशल जज ओ पी सैनी सुबूत के अभाव में आरोपियों को बरी करते हुए लगभग यही शब्द कहते हैं, ‘‘मैं ने 7 वर्षों तक सुबह 10 बजे से ले कर शाम 5 बजे तक लगातार 2जी स्पैक्ट्रम मामले की सुनवाई की. यहां तक कि गरमी की छुट्टियों में भी इसे सुना. मैं इंतजार करता रहा कि कोई तो इस मामले में ठोस सुबूत ले कर आएगा पर सब व्यर्थ. एक भी ऐसा सुबूत सामने नहीं आया. यह मामला लोगों द्वारा फैलाई गई सामाजिक धारणा अर्थात अफवाह से बढ़ कर कुछ नहीं था.’’

जनता के साथ ठगी

अदालत के इस फैसले के बाद देश की जनता ठगी सी महसूस कर रही है पर कांग्रेस और भाजपा दोनों ही पार्टियों को इस ठगी का कोई अफसोस नहीं है.  फैसले के बाद कांग्रेस कठघरे से बाहर निकल कर लड़ने के लिए मैदान में आ खड़ी हुई है. आरोपप्रत्यारोप का खेल जारी है.

सीबीआई ने जांच में हजारों पन्ने रंगे पर इन में सुबूत नहीं थे. 2012 में सीबीआईर् ने इस मामले में 86 हजार पेज की चार्जशीट दाखिल की. कोर्ट ने 2,183 पेज के फैसले में सीबीआई और ईडी दोनों को आड़े हाथों लिया. 7 वर्षों तक चले मामले में सुबूत पेश न किए जाने के कारण सीबीआई की विशेष अदालत को सभी आरोपियों को बरी करना पड़ा.

असल में मामले में कोर्ट के समक्ष जो चार्जशीट दायर की गई थी वह तथ्यात्मक रूप से सही नहीं थी. पूरी चार्जशीट आधिकारिक रिकौर्ड की गलत व्याख्या, मामले पर पूरी तरह से अध्ययन न करने, कम अध्ययन करने और अधूरे साक्ष्यों पर आधारित थी. चार्जशीट में कई बातें तथ्यात्मक रूप से सही नहीं थीं. 7 साल में पूरी सुनवाई के दौरान यह समझना बेहद मुश्किल था कि अभियोजन पक्ष अपनी दलीलों से अदालत में क्या साबित करना चाह रहा था. अभियोजन पक्ष बेहद कमजोर दलील पेश कर रहा था और मामले में सुनवाईर् पूरी होने तक अदालत को यह साफ हो गया था कि अभियोजन पक्ष पूरी तरह दिशाहीन हो गया है. इस मामले में नियुक्त स्पैशल सरकारी वकील और सामान्य वकील बिना किसी तालमेल के अलगअलग दिशा में दलील देते पाए गए.

दूरसंचार मंत्रालय द्वारा पेश ज्यादातर दस्तावेज अवस्थित व बेतरतीब थे और मंत्रालय के नीतिगत मुद्दे पूरी तरह मामले को और पेचीदा कर रहे थे. गाइडलाइन स्पष्ट नहीं थी. अव्यवस्थित दस्तावेजों और नीतियों से संदेह पैदा होता है कि मामले को घोटाले का स्वरूप देने के लिए तथ्यों को तोड़मरोड़ कर पेश किया गया जिस के चलते किसी को भी पूरा मामला समझ नहीं आया.

निशाने पर विनोद राय   

इस फैसले के बाद विनोद राय से माफी मांगने की मांग की जा रही है. कांग्रेस नेता आरोप लगा रहे हैं कि विनोद राय ने भाजपा के लिए यह काम किया और उस की सरकार आने पर उन्हें बीसीसीआई में प्रशासक समिति (सीओए) का महत्त्वपूर्र्ण पद दे दिया गया.

इस मामले से यह भी जाहिर है कि किसी के खिलाफ मामला दर्ज करा कर परेशान किया जा सकता है. लेकिन, इस की भरपाई करना मुश्किल है. कांग्रेस ने कहा कि जो घोटाला हुआ ही नहीं, उस के कारण उसे हारना पड़ा.

इस मुद्दे को भाजपा ने खूब भुनाया. लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के इस कथित भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता के बीच जा कर नरेंद्र मोदी ने भाषण दिए. कांग्रेस के खिलाफ घोटालों को ले कर ऐसा माहौल बना दिया गया कि देशभर में लोगों में उस के प्रति गुस्सा फैला. इसी अफवाह की बिना पर भाजपा प्रचंड बहुमत के साथ केंद्र की सत्ता में आ गई.

मामले के झूठ का इतना शोर मचा कि सचाई सुनाई ही नहीं दी. सच की आवाज दब गई. अफवाह और अनुमान का मामला महाभारत युद्ध के दौरान ‘अश्वत्थामा मारा गया’ जैसा ही है.

महाभारत युद्घ में गुरु द्रोणाचार्य हस्तिनापुर राज्य के प्रति निष्ठा के कारण कौरवों के साथ थे. शस्त्र विद्या में निपुण द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा भी युद्घ में सक्रिय थे. वे कौरव सेना के एक सेनापति थे. उन्होंने भीमपुत्र घटोत्कच को परास्त किया. घटोत्कच के पुत्र अंजनपर्वा का वध किया. इन के अलावा द्रुपदकुमार, शत्रुजय, बलानीक, जायाश्रव और राजा श्रुताहु को भी मार डाला था.

पितापुत्र दोनों ने महाभारत युद्ध में पांडव सेना को तितरबितर कर दिया था. पांडवों की सेना की हार देख कर कृष्ण ने युधिष्ठिर से कूटनीति का सहारा लेने को कहा. इस योजना के तहत यह अफवाह फैला दी गई कि अश्वत्थामा मारा गया. जब द्रोणाचार्य ने धर्मराज युधिष्ठिर से अश्वत्थामा के मारे जाने की सचाई जाननी चाही तो उन्होंने जवाब दिया, ‘अश्वत्थामा मारा गया पर हाथी…’

कृष्ण ने उसी समय शंखनाद कर दिया, जिस के शोर में द्रोणाचार्य आखिरी शब्द सुन नहीं पाए. अपने प्रिय पुत्र की मौत की बात सुन कर द्रोणाचार्य ने हथियार डाल दिए. वे युद्धभूमि में आंखें बंद कर शोक अवस्था में बैठ गए. द्रोणाचार्य को निहत्था जान कर द्रौपदी के भाई द्युष्टद्युम्न ने तलवार से उन का सिर काट डाला. सेनापति अश्वत्थामा के मरने की झूठी अफवाह से कौरव सेना हताश हुई और पांडव सेना में जोश भर गया. द्रोणाचार्य की निर्मम हत्या के बाद पांडवों की जीत होने लगी. इस तरह महाभारत युद्ध में अर्जुन के तीरों और भीम की गदा से कौरवों का नाश हो गया.

अफवाह फैला कर जीत हासिल करना धर्र्म में पुरानी कूटनीति रही है. धर्म के सहारे राज चलाने वाली भाजपा को धर्र्म से ही तो इस तरह की प्रेरणा मिलती रही है. उस के नेता बातबात में धर्र्म के किस्सेकहानियां कहते सुने जा सकते हैं.

यह कैसी शराफत

इसी तरह के झूठ की एक और कथा लाक्षागृह की है. दुर्योधन और शकुनि ने पांडवों से छुटकारा पाने के लिए षड्यंत्र के तहत पुरोचन की मदद से लाक्षागृह बनवाया. लाक्षागृह ज्वलनशील चीजों से बनवाया गया ताकि आग लगने पर वहां कोई जीवित न बचे. धृतराष्ट्र द्वारा पांडवों को सलाह दी गई कि उन्हें आध्यात्मिक खोज के लिए वहां जाना चाहिए. पांचों पांडव भाई अपनी मां कुंती के साथ इस महल में रहने के लिए गए. विदुर को इस गुप्त योजना का पता चल गया था. उस ने पांडवों को गुप्त चेतावनी भेजी और एक आदमी भेजा जिस ने उस महल से सुरक्षित बच निकलने के लिए एक सुरंग बनाई.

पांडव सुरंग के जरिए लाक्षागृह से सकुशल बाहर निकल गए पर पांडवों और उन की मां की जगह महल में एक भील परिवार की स्त्री और उस के 5 बेटों को रखा गया जो जल कर मर गए. दुर्योधन और धृतराष्ट्र समेत सभी कौरवों ने भी शोक मनाने का दिखावा किया और अंत में उन्होंने पांडवों की अंत्येष्टि भी करवा दी.

लाक्षागृह के भस्म होने का समाचार जब हस्तिनापुर पहुंचा तो पांडवों को मरा समझ कर प्रजा को बहुत दुखी होना पड़ा पर प्रजा इस चालाकी व बेईमानी को समझ नहीं पाई.

जनता के साथ ऐसे घोटालों के किस्से पुराणों में भरे पड़े हैं. अफवाहों और षड्यंत्रों के माध्यम से राज हथियाने और दुश्मनों को परास्त करने के नुस्खे पुराणों में हैं. भाजपा इन्हीं से सीख ले कर आगे बढ़ती रही है.

सरिता विशेष

कांग्रेसी खेमे में खुशी

अदालत का फैसला आने के बाद कांग्रेस नेता खुश हैं. पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि 2जी घोटाला हमें बदनाम करने की साजिश थी. कोर्ट के फैसले ने हमारी सरकार के पक्ष को सही साबित किया है.

कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने कहा कि मेरी बात सिद्ध हुई है. कोई करप्शन नहीं हुआ, कोई नुकसान नहीं हुआ. अगर स्कैम है तो झूठ का स्कैम है. विपक्ष और विनोद राय के झूठ का. दोनों को माफी मांगनी चाहिए.

कांग्रेस नेताओं के जवाब में भाजपा के वरिष्ठ नेता व केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली कहते हैं कि कांग्रेस इस तरह बयानबाजी कर रही है जैसे उसे कोई सम्मान मिल गया है. ‘पहले आओ, पहले पाओ’ की पौलिसी को बदल कर ‘पहले पेमैंट करो, पहले पाओ’ कर दिया गया था. यह पूरी तरह भ्रष्ट पौलिसी थी. 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने भी यही कहा था.

नेता झूठी रिपोर्ट देने वाले विनोद राय से माफी की मांग तो कर रहे हैं पर असली माफी तो इस देश की जनता से दोनों ही पार्टियों को मांगनी चाहिए. एक ने झूठ की बिना पर सत्ता हासिल कर ली और दूसरी ने जनता को भ्रम के बीच में फंसाए रखा.

कांगे्रस और भाजपा दोनों ही पार्टियों में कोई भी दूध की धूली नहीं है. दोनों के शासन में घोटाले हुए और दोनों ने अपनेअपने बचाव के रास्ते तलाशे. दोनों ही दल एकदूसरे को फंसाने के लिए तरहतरह के हथकंडे अपनाने में पीछे नहीं रहे.

दोनों पार्टियों के नेता नौकरशाहों से मिल कर पैसा उगाहते रहे हैं. जहांजहां इन दलों की सरकारें हैं, पार्टियों के संगठन में पैसा वहीं से आता है. नौकरशाह योजना बनाते समय अपनों का खयाल रखते हैं. देश में करोड़ोंअरबों की योजनाओं में लाइसैंस, नीलामी, ठेकों में नौकरशाह अपने रिश्तेदारों को पहले ही योजनाओं का खुलासा कर फायदा उठा लेते हैं.

मसलन, राजधानी दिल्ली से सटे नोएडा के पास जेवर में अंतर्राष्ट्रीय हवाईर् अड्डा बन रहा है. योजना का पता सब से पहले नौकरशाही को रहता है. वह अपने रिश्तेदारों को पहले ही बता देती है कि इस जगह पर जमीन खरीद ली जाए. हवाई अड्डा बनते ही वहां की जमीन सोना उगलने लगेगी.

खास बात यह है कि ऐसे मामले भ्रष्टाचार तो हैं पर इन में सुबूत नहीं मिलते. लाइसैंस, ठेका, नीलामी में नौकरशाह और नेताओं की संलिप्तता रहती है. इस तरह के भ्रष्टाचार के अनगिनत मामले हैं पर जब कोई मामला अदालत में जाता है तो उसे सिद्ध करना बहुत मुश्किल होता है.

सुबूतों का अभाव

इस तरह का यह पहला मामला नहीं है. 80 के दशक में विश्वनाथ प्रताप सिंह ने कांग्रेस के खिलाफ बोफोर्स मामले का दैत्य खड़ा किया. इस में भाजपा भी शामिल थी. विश्वनाथ प्रताप सिंह आएदिन कहते थे कि बोफोर्स दलालों के नाम उन की जेब में रखी लिस्ट में हैं पर वे कभी कोईर् नाम उजागर नहीं कर पाए. जनता के सामने कांग्रेस को भ्रष्टाचार के लिए कठघरे में खड़ा किया गया.जैन हवाला कांड भी ऐसा ही था. इन मामलों में आज तक न तो  किसी को सजा हुई, न पैसा वसूल हुआ.

देश में ऐसे अनगिनत मामले होते हैं जिन में नेता और नौकरशाह नीतियां, योजनाएं बनाने से ले कर उन्हें लागू करने तक खुद और नातेरिश्तेदारों के लिए प्रत्यक्षअप्रत्यक्ष तौर पर करोड़ोंअरबों का वारान्यारा करते हैं. वे इस तरह की बेईमानी, भ्रष्टाचार करते हैं जो दिखाईर् नहीं देते और इन का कोई सुबूत नहीं होता, क्योंकि देश में भ्रष्ट सरकारी नौकरों की नीचे से ले कर ऊपर तक एक लंबी कड़ी है. वे एकदूसरे के हित साधने व बचाव करने के लिए हमेशा सतर्क रहते हैं. इस मशीनरी का एक भी पुर्जा ढीला हो तो उसे ठीक कर दिया जाता है.

देश में हजारोंलाखों भ्रष्टाचारी, सुबूतों के अभाव में अदालतों में ठहरते ही नहीं. आरोपियों को बाइज्जत बरी करने के अलावा अदालतों के पास कोई चारा नहीं होता. जातिवाद, भाईभतीजावाद को बढ़ावा और इन के नाम पर औरों को वंचित कर अपनों को फायदा पहुंचाना भी शासन व प्रशासन का भ्रष्टाचार है. हितों के टकराव जैसे अनगिनत मामले होते हैं जिन्हें अदालतों में सुबूत के साथ प्रमाणित करना बड़ा मुश्किल होता है. ऐसे भ्रष्टाचार समाज की नसनस में व्याप्त हैं.

दरअसल, 2जी स्पैक्ट्रम मामले का फैसला देश की तमाम संवैधानिक संस्थाओं के कामकाज के तरीके पर बड़ा सवाल खड़ा करता है. इस मामले में साफ दिखता है कि हर संस्था अपनी भूमिका को सही और स्पष्ट ढंग से निभाने में नाकाम है. फैसले से कंप्ट्रोलर ऐंड औडिटर जनरल से ले कर सीबीआई, ईडी, दूरसंचार मंत्रालय का निकम्मापन नजर आया.

यह देश की जनता के साथ, दरअसल, धोखाधड़ी है, घोटाला है जिस के आगे अनगिनत शून्य लगते रहे हैं. ,देश की राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक तरक्की के लिए जितनी सचाई, कर्तव्यनिष्ठा राजनीतिबाजों व नौकरशाहों की होनी चाहिए उतनी ही सतर्कता व जागरूकता जनता में भी होनी की आवश्यक है.

जनता के साथ जबरन वसूली

सरकार ने आधारकार्ड के नाम पर इतना कन्फ्यूजन पैदा कर दिया है कि नर्सरी में 3-4 साल के बच्चों से ले कर बैंकों की अलगअलग सेवाओं में इसे लिंक करने के नियम थोपे जा रहे हैं. अभिभावकों की इस परेशानी का फायदा एजेंट्स और आधारकार्ड बनवाने वाले इस तरह उठा रहे हैं कि जिस आधार कार्ड को निशुल्क बनाने का सरकारी नियम है, उस के पैसे लिए जा रहे हैं.

पूर्वी दिल्ली का कृष्णानगर इलाके के मेनमार्केट में ऐसे ही आधारकार्ड बनाने वाले ने एक दुकाननुमा औफिस खोल रखा है जो फोटोकौपी स्कैन करने व औनलाइन टिकट बुक कराने का काम करता है. जब उस के पास बच्चे का आधारकार्ड बनवाने गए तो भीड़ के सामने उस ने यह कह कर मना कर दिया अब 1 महीने से आधारकार्ड बनाने बंद कर दिए हैं जबकि बाद में वह अगले दिन शाम को 6 बजे 350 रुपए ले कर आने को कहता है और बदले में आधारकार्ड बनाने का वादा भी. यह खेल सरकारी लापरवाही व नियमित केंद्र न बनाने की वजह से खेला जा रहा है. अगर सरकार आधारकार्ड के स्थाई केंद्र निर्धारित कर दे तो सरकार की निशुल्क सेवाओं के लिए जनता को अपनी जेब न ढीली करनी पड़े.

इसी तरह आय प्रमाणपत्र, गैस कनैक्शन, राशनकार्ड से ले कर ड्राइविंग लाइसैंस बनाने के सारे काम ऐसे ही जबरन अतिरिक्त पैसे दे कर करवाने पड़ते हैं. सीधे रास्ते और खाली जेब से इन कामों में इतने पेचीदा नियमकानून के अड़ंगे डाले जाते हैं कि आमजन भी पैसा दे कर काम निबटाने में भलाई समझता है. भ्रष्टाचार व जनता के साथ ठगी यहीं से शुरू हो कर बड़ेबड़े घोटालों तक पहुंचती है.