हालिया खतरनाक आतंकी वारदातों, खासकर राजधानी काबुल की घटना के बाद अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने देश के राजनीतिक अभिजात वर्ग से दलगत भावना से ऊपर उठकर व्यापक देशहित और राज्य प्रायोजित आतंकवाद के खिलाफ एकजुट संघर्ष का जो आह्वान किया है, उस पर संजीदगी से गौर करने की जरूरत है. उन्होंने ट्वीट करके कहा कि ‘जो लोग खुद को मुसलमान या अफगान समझते हैं, उन्हें अब धार्मिक षड्यंत्रकारियों व खुफिया एजेंसियों की बर्बर कठपुतलियों से खुद को सिर्फ बातों में ही नहीं, व्यवहार में भी अलग दिखना होगा.’

पाकिस्तान समर्थित आतंकी गुटों की हालिया बर्बरता की राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सभी स्तरों पर निंदा हुई है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी तालिबान के साथ वार्ता की संभावना से इनकार करते हुए तीखी टिप्पणियां कीं. इस परिप्रेक्ष्य में राष्ट्रपति गनी की अपील बहुत महत्वपूर्ण है. समझना होगा कि राष्ट्रीय एकता और एकजुटता इस वक्त देश की सबसे बड़ी जरूरत है, चुनौती भी. और बात जब आतंकवाद और आतंकवाद के प्रायोजक देशों के खिलाफ युद्ध छेड़ने की आ जाए, तब तो यह सभी अफगानियों के लिए किसी भी भेदभाव से ऊपर उठकर एक हो जाने की बात हो जाती है.

याद करने का वक्त है कि ‘एकता में शक्ति होती है व अलगाव कभी जीतने नहीं देता.’ नहीं भूलना चाहिए कि आतंक के खिलाफ लड़ाई में अग्रणी देश होने के कारण अफगानिस्तान ही नहीं, उसके रणनीतिक साझीदारों को भी अस्थिर करने की कोशिशें जारी हैं. आईएसआई का चेहरा खुलकर सामने आ चुका है.

काबुल के होटल और कंधार आर्मी बेस पर हमले में पाकिस्तान स्थित आतंकी गुटों का जिम्मेदारी लेना बताता है कि आईएसआई कैसा खतरनाक खेल खेल रही है. ऐसे में, किसी अफगान का खामोश रहना राष्ट्रीय अपराध से कम नहीं होगा. यह पाकिस्तान व तालिबान समर्थक तत्वों के खिलाफ निर्णायक युद्ध छेड़ने, उन्हें बेनकाब करने का वक्त है. सबसे ज्यादा जरूरी इस मसले पर सभी दलों में एकता है, जिसके बिना कुछ भी संभव नहीं. नहीं भूलना चाहिए कि देश है, तभी सब कुछ है.

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