सरिता विशेष

मोहनलालगंज राजधानी लखनऊ से तकरीबन 23 किलोमीटर दूर है. वह विधानसभा और लोकसभा क्षेत्र भी है. राजधानी लखनऊ का एक बड़ा ग्रामीण इलाका इस में आता है. यह लखनऊ और रायबरेली के बीच बसा एक खास इलाका है. इस ब्लौक की प्रमुख विजय लक्ष्मी हैं. साल 2016 में वे ब्लौक प्रमुख चुनी गई थीं. वे तय समय पर अपने दफ्तर में क्षेत्र की समस्याएं सुनती हैं. इस के अलावा गांवगांव दौरा कर के लोगों की परेशानियां हल करने की कोशिश करती हैं.

वे जब तक दफ्तर में रहती हैं तब तक कोई न कोई अपनी फरियाद ले कर उन के पास आता ही रहता है. ज्यादातर लोग राशनकार्ड, आवास, हैंडपंप, खड़ंजा, बिजली, पुलिस और तहसील की अपनी परेशानियां ले कर उन के पास आते हैं. पेश हैं, विजय लक्ष्मी से की गई बातचीत के खास अंश:

आप का राजनीति में कैसे आना हुआ?

मेरी ससुराल गांव बिंदौआ में है. वहां बीडीसी यानी ब्लौक डैवलपमैंट कमेटी के चुनाव होने वाले थे. पंचायत चुनावों में रिजर्वेशन के चलते वह महिला सीट हो गई थी. मेरे पति वकील हैं. उन के कहने पर मैं ने पहले बीडीसी का चुनाव लड़ा. उस में 3 गांवों के लोग वोट डालते हैं. जब मैं ने अपना प्रचार शुरू किया था तो मुझे कोई जानकारी नहीं थी. लोगों से बात करना नहीं आता था. पति और कुछ करीबी लोगों ने इस में मेरी पूरी मदद की. लोगों के बीच बोलना सिखाया.

मैं ने बहुत मेहनत कर के चुनाव लड़ा और जीत गई. ब्लौक प्रमुख का चुनाव आया तो मैं निर्विरोध ब्लौक प्रमुख बन गई.

ब्लौक प्रमुख बनने के बाद आप की जिंदगी में क्या खास बदलाव हुआ?

पहले मैं केवल घरपरिवार और बच्चे ही देखती थी. मेरी 2 बेटियां और एक बेटा है. मैं उन को खुद ही पढ़ाती थी. मेरे बच्चे अपनी क्लास में हमेशा अव्वल आते हैं. अब बच्चों और परिवार के साथ क्षेत्र की जनताभी मेरी जिंदगी में शामिल हो गई है. मैं तय समय पर ब्लौक दफ्तर में बैठती हूं, लोगों से मिलती हूं.

चुनाव लड़ते समय मुझे लगता था कि ब्लौक प्रमुख बन कर मैं बहुत सारी परेशानियां दूर कर दूंगी पर कुरसी पर बैठ कर लगा कि ब्लौक प्रमुख से जनता को जिस तरह की उम्मीदें होती हैं, उन को पूरा करने के लिए ब्लौक प्रमुख को और ज्यादा हक मिलने चाहिए.

आप के पति विधायक कैसे बने?

साल 2017 के विधानसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी ने चुनाव से पहले मेरे पति अंबरीश पुष्कर को टिकट दिया था. विधानसभा में बड़ा क्षेत्र आता है. ऐसे में हम लोगों के पास चुनाव प्रचार का समय कम था. मोहनलालगंज विधानसभा से पहले भी सपा की महिला विधायक थीं. उन का टिकट कट चुका था. ऐसे में पार्टी के कुछ लोग सहयोग नहीं कर रहे थे.

हम सब ने मिल कर चुनाव लड़ा. भारतीय जनता पार्टी की आंधी के बीच हम लोग चुनाव जीते और अंबरीश पुष्कर विधायक बन गए. पति के चुनाव प्रचार का बड़ा जिम्मा मेरे कंधों पर भी था. जीत के बाद अच्छा लगा.

आप की शादी कैसे हुई थी?

शादी के पहले हम लोगों की कालेज में मुलाकात हुई थी. तब हम ने शादी करने का फैसला किया था. हम एक ही जाति से थे, इस के बाद भी बड़ी मुश्किल से परिवार के लोग इस शादी के लिए राजी हुए.

शादी के बाद मेरी पढ़ाई बहुत आगे नहीं बढ़ सकी. मैं ने बीए कर लिया था, पर एमए नहीं कर पाई. शादी के बाद केवल मैं ने ही परेशानियां नहीं उठाईं, अंबरीश ने भी मेरा साथ देने के लिए बहुत मेहनत की. कुछ दिन शादीब्याह और दूसरे अवसरों में विडियोग्राफी भी की. फिर एलएलबी कर के वे मोहनलालगंज तहसील में ही वकालत करने लगे.

अच्छी बात यह है कि वे मुझे पूरा सहयोग करते हैं. राजनीति में वे मेरे पहले गुरु हैं.

परिवार और राजनीति में आप इतना तालमेल कैसे करती हैं?

मैं अपने समय को मैनेज करती हूं. बेटियां और पति मेरा पूरा साथ देते हैं. आज भी मैं घर का खाना खुद बनाती हूं. मुझे घूमने और फिल्में देखने का बहुत शौक है. अब कई बार पति वक्त नहीं निकाल पाते हैं, ऐसे में बच्चों के साथ घूमने चली जाती हूं.

मैं गांव की औरतों के सशक्तीकरण, सेहत और पढ़ाईलिखाई के लिए बहुत काम करना चाहती हूं. सच तो यह है कि गांव की औरतें भी बहुत हुनरमंद हैं पर उन को मौके कम मिलते हैं.

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