प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात विधानसभा के चुनाव प्रचार के आखिरी दिन प्रशासन द्वारा रोड शो रखने की अनुमति न मिलने पर अहमदाबाद में साबरमती नदी से अंबाजी के लिए घबराहट में सीप्लेन से उड़ान भरी थी, उन्हें गुजरात के भावी नतीजों का एहसास हो गया था कि इस रण में उन के लिए विजय आसान नहीं है. हालांकि, भाजपा गुजरात को बचाने में कामयाब रही पर 150 सीटें जीतने का दावा कर रही पार्टी 100 से नीचे पर ही सिमट गई.

दूसरे राज्य हिमाचल प्रदेश में वह कांग्रेस से सत्ता छीनने में सफल तो रही पर प्रदेश में पार्टी के सेनापति मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार प्रेमसिंह धूमल और पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सतपाल सत्ती दोनों ही परास्त हो गए. इसीलिए चुनाव नतीजों के बाद भाजपा मुख्यालय में प्रैस कौन्फ्रैंस में बैठे पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के चेहरे पर अधिक खुशी नहीं थी. वे गुजरात नतीजों के बजाय हिमाचल पर अधिक फोकस कर रहे थे.

गुजरात में कांग्रेस भले ही जीत नहीं पाई पर उस ने 22 वर्षों पुराना भाजपा का आसन हिला दिया, भाजपाई दिग्गजों के पसीने छुड़ा दिए. हालांकि, अपने गढ़ को बचाने में भाजपा कामयाब रही है.

इन चुनावों पर सब की नजरें थीं. विकास के मुद्दे से शुरू हुआ चुनाव प्रचार अभियान चुनावों की तारीख आतेआते राजनीतिक नीचता की तमाम हदें लांघ गया. दोनों राज्यों में धर्म, जाति, सैक्स सीडी, मंदिर, पाकिस्तान, कीचड़युक्त जबान का घालमेल और गंदगी का माहौल दिखाईर् देने लगा था जिस में नैतिकता, जवाबदेही और तमाम लोकतांत्रिक मर्यादाओं की धज्जियां उड़ती दिखीं.

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कड़ी चुनावी टक्कर

पिछले 3 सालों में हुए विधानसभाओं के चुनावों में गुजरात चुनाव सब से रोचक, रोमांचक रहा. भाजपा इस बार कड़े संघर्ष में फंस गई थी. उसे पिछले 2012 की 115 सीटों के मुकाबले 99 सीटें ही मिल पाईं. चुनाव में सब से ज्यादा चर्चा हार्दिक पटेल फैक्टर की थी. हार्दिक पटेल की अगुआई में हुए पाटीदार आंदोलन के चलते माना जा रहा था कि भाजपा को बड़ा नुकसान हो सकता है. जिस तरह हार्दिक ने भाजपा का विरोध और कांग्रेस के समर्थन का ऐलान किया, उसे देखते हुए भाजपा को बड़े नुकसान की आशंका जताई जा रही थी पर नतीजों से साफ है कि सौराष्ट्र, कच्छ को छोड़ कर प्रदेश के बाकी सभी क्षेत्रों में पटेलों ने भाजपा का ही साथ दिया.

भाजपा ने गुजरात में पूरी ताकत झोंक दी थी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह का गृहराज्य होने के कारण गुजरात चुनाव उन के लिए प्रतिष्ठा का सवाल था.

कांग्रेस सत्तारूढ़ दल की तरह लड़ी. राहुल गांधी हार कर भी कामयाब हो गए. गुजरात चुनाव के दौरान राहुल गांधी में एक परिपक्व नेता के लक्षण पहली बार दिखाईर् दिए. वे लड़ाई को प्रतिद्वंद्वी खेमे में ले गए और उन्हें गंभीरता से लेने पर मजबूर कर दिया. वे नोटबंदी से ले कर जीएसटी और विकास के मामले में भाजपा को घेरने व उसे निरुत्तर करने में कामयाब रहे. उन्होंने इस बार आक्रामक और महत्त्वाकांक्षी नेता के तौर पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई.

अपने आक्रामक तेवरों के जरिए राहुल और कांग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व उन के राजनीतिक सलाहकारों को गुजरात में पिछले 22 वर्षों के शासन की उपलब्धियों, गुजरात मौडल और विकास के मुद्दों पर कठघरे में ला खड़ा किया. राहुल गांधी ने नोटबंदी और जीएसटी को ले कर सवाल खड़े किए. इन सवालों पर भाजपा बचाव की मुद्रा में दिखने लगी. शक्तिशाली भाजपा ने अपना सारा वक्त ऐसे नेता पर हमला करने में लगाया जिस की पार्टी के पास लोकसभा में केवल 46 सीटें हैं और वह गुजरात में पिछले 22 वर्षों से बियाबान में है.

लेकिन जिस तरह से गुजरात चुनाव में राहुल गांधी ने अपनेआप को जनेऊधारी हिंदू के रूप में पेश करने की कोशिश की, उस की जरूरत नहीं थी.

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धार्मिक मुद्दों का सहारा

दूसरी ओर खुद को विकास का सब से बड़ा पैरोकार बताने वाले मोदी बाबर और खिलजी की चर्चा कर सांप्रदायिक मुद्दों का सहारा लेते दिखाईर् दिए. गुजरात में 22 वर्षों की उपलब्धियों की चर्चा नदारद रही. सभी जायज मुद्दे हाशिए पर चले गए और वोटों के ध्रुवीकरण के लिए नफरत की राजनीति हावी हो गई.

चुनाव प्रचार के आखिरी दौर में मोदी ने पाकिस्तान का सनसनीखेज एंगल जोड़ दिया. उन्होंने कहा कि पाकिस्तान गुजरात चुनाव में दखल दे रहा है. चुनाव के दौरान पूर्र्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी और कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर ने पाक उच्चायुक्त और पूर्र्व विदेश मंत्री के साथ बैठक  की. विदेश मंत्रालय की जानकारी के बिना मणिशंकर के घर पर बैठक 3 घंटे चली.

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इस बैठक के अगले ही दिन मणिशंकर अय्यर ने मोदी को कह दिया था कि वे नीच किस्म के हैं, इसलिए वे पटेल और अंबेडकर पर राजनीति करते हैं.

मोदी ने पाकिस्तान के पूर्व महानिदेशक अरशद रफीक द्वारा गुजरात में अहमद पटेल को मुख्यमंत्री बनाने के लिए अपील जारी करने का आरोप भी लगाया.

मणिशंकर अय्यर के इस बयान पर खूब हंगामा हुआ. बाद में राहुल गांधी को मणिशंकर अय्यर को पार्टी से निकालने का ऐलान करना पड़ा.

मणिशंकर अय्यर के बयान के थोड़ी देर बाद ही सूरत की एक रैली में मोदी बोले कि वे हमें नीच जाति का कह रहे हैं. यह गुजरात और यहां के लोगों का अपमान है.

29 नवंबर को राहुल गांधी ने सोमनाथ मंदिर में पूजा की थी. मंदिर के रजिस्टर में उन का नाम गैरहिंदू के तौर पर दर्ज हुआ तो भाजपा ने प्रैस कौन्फ्रैंस कर कहा कि राहुल गांधी ने खुद को गैरहिंदू बताया है. बाद में कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा कि राहुल जनेऊधारी हिंदू हैं और राहुल गांधी ने खुद को शिवभक्त बताया.

बाद में 5 दिसंबर को कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में कह दिया कि राममंदिर मामले की सुनवाई 2019 के चुनाव के बाद हो. इस पर मोदी और अन्य नेताओं को कहने का मौका मिल गया कि राहुल गांधी एक ओर मंदिरमंदिर घूम रहे हैं, दूसरी ओर उन के नेता कपिल सिब्बल राममंदिर की सुनवाई टलवा रहे हैं.

चुनाव प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी 5 मंदिरों में गए तो राहुल गांधी ने 27 मंदिरों की परिक्रमा कर डाली. मोदी ने मां आशापुरा के दर्शन से प्रचार अभियान शुरू किया था और अंबाजी के दर्शन से खत्म.

विकास पागल हो गया

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में मोदी और उन के विकास को कड़ी चुनौती मिली. 60 दिनों तक कांग्रेस ने राज्य में नोटबंदी, जीएसटी, विकास व आरक्षण के मुद्दे खूब उठाए. राहुल गांधी ने पूछा, विकास कहां है, विकास पागल हो गया है. मोदी ने कहा, मैं विकास हूं. आखिर के 11 दिनों में 60 दिनों के मुद्दों को हाशिए पर धकेल दिया गया. गुजरात में हार के बावजूद राहुल गांधी खुद को साबित करने में सफल रहे. प्रदेश में संगठन कमजोर होने के बावजूद राहुल ने चुनाव प्रचार की कमान संभाली. उन्होंने भाजपा का डट कर मुकाबला किया. उस के नेताओं के आरोपों का जम कर जवाब दिया. उन्होंने करीब 150 रैली व जनसभाएं कीं.

उधर, 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद मोदी ने उत्तर प्रदेश समेत 17 राज्यों में चुनावी रैलियां कीं पर उन्होंने गुजरात जितनी रैलियां किसी भी राज्य में नहीं कीं. मोदी ने गुजरात में आखिरी 11 दिनों में सब से अधिक रैलियां कीं. उन्होंने पूरा चुनावी माहौल बदल दिया. नोटबंदी, जीएसटी, महंगाई, बेरोजगारी, विकास जैसे मुद्दे गायब हो गए. हिंदुत्व, राममंदिर, गुजराती अस्मिता, पाकिस्तान और आतंकवाद बड़े मुद्दे बन गए.

हार्दिक, अल्पेश, जिग्नेश

कांग्रेस ने गुजरात चुनाव में आंदोलनों से निकले हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकोर और जिग्नेश मेवाणी पर दांव खेला. पर पार्टी को एकतरफा पाटीदार, ओबीसी और दलित वोट नहीं मिल पाए और  सत्ताविरोधी लहर वोट में तबदील नहीं हो पाई.

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राज्य में 40 फीसदी ओबीसी वोट हैं. चुनावों के दौरान अल्पेश ठाकोर तो कांग्रेस में शामिल हो गए पर हार्दिक और जिग्नेश ने भाजपा को हराने व कांग्रेस का समर्थन करने की बात कही. इन्होंने कांग्रेस के लिए पूरा जोर लगाया. जिग्नेश मेवाणी  और अल्पेश दोनों जीत गए. मेवाणी निर्दलीय के तौर पर खड़े हुए. उन्होंने बनासकांठा जिले की वडगाम सीट पर 28,150 वोटों से जीत दर्ज की. वडगाम आरक्षित सीट है. मेवाणी का मुकाबला भाजपा के विजय चक्रवर्ती से था. मेवाणी उस समय चर्चित हुए जब ऊना में दलित युवाओं को गौरक्षकों ने बुरी तरह मारापीटा था. इस कांड को ले कर मेवाणी ने प्रदेश में आंदोलन शुरू किया.

उधर, अल्पेश ठाकोर ने पाटन के राधनपुर से चुनाव लड़ा. उन का मुकाबला भारतीय जनता पार्टी के लाविंगजी ठाकोर से था.

हालांकि पाटीदारों के गढ़ सौराष्ट्र में भाजपा को नुकसान हुआ पर उस की भरपाई उसे दूसरे क्षेत्रों से हो गई. सौराष्ट्र-कच्छ की 54 सीटों में भाजपा 24 सीटें ही जीत सकी जबकि कांग्रेस को 30 सीटें मिलीं. यह वही क्षेत्र है जहां हार्दिक पटेल का पाटीदार आंदोलन तेज हुआ था.

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टिकट वितरण में जातीयता

अहमदाबाद और उस के आसपास के मध्य गुजरात में भाजपा ने दबदबा कायम रखा. यहां की 61 में से 40 सीटें उस ने जीतीं. कांग्रेस को 19 सीटें मिलीं. जीएसटी से दक्षिण गुजरात में भाजपा को नुकसान की आशंका थी पर पार्टी ने यहां 35 सीटों में से 24 पर जीत दर्ज की है.

दोनों ही पार्टियों में जातीय आधार पर टिकट बांटे गए. कांग्रेस ने 41 पाटीदारों को टिकट दिए तो भाजपा ने 40 को दिए. कांग्रेस ने 60 ओबीसी मैदान में उतारे तो भाजपा ने 58. कांग्रेस ने 14 दलितों को टिकट दिए तो भाजपा ने 13 को दिए. मुसलिम बहुल 18 सीटों में से 9 पर भाजपा और 7 पर कांग्रेस जीती है. कांग्रेस ने 6 मुसलिमों को टिकट दिए थे उन में से 3 जीते हैं. भाजपा ने एक भी मुसलिम को टिकट नहीं दिया. इस तरह दोनों दलों की यह सोशल इंजीनियरिंग काम नहीं आई.

गुजरात में 66 विधानसभा सीटों में मुसलिम 10 से 60 प्रतिशत तक हैं. इन में भाजपा ने 52 प्रतिशत और कांग्रेस ने 45 प्रतिशत सीटें जीती हैं. एक सीट निर्दलीय को मिली है.

यहां दोनों पार्टियों ने 22 महिलाओं को टिकट दिया था. इन में से भाजपा ने 12 और कांग्रेस ने 10 को टिकट दिए थे. दोनों ओर से 12 महिलाएं जीत कर आई हैं. इन में 7 भाजपा और 5 कांग्रेस की हैं.

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नाराजगी मगर वोट भाजपा को

जीएसटी लागू होने के बाद यह पहला चुनाव था, इसलिए भाजपा को चिंता थी कि जीएसटी की वजह से उसे कहीं नुकसान न उठाना पड़े क्योंकि व्यापारी वर्ग नाराज लग रहा था. गुजरात में व्यापारी प्रभावशाली हैं और भाजपा का साथ देते आए हैं पर जिस तरह से सूरत में भाजपा की जीत हुई है वह साबित करता है कि जीएसटी से भाजपा को नुकसान नहीं हुआ. जीएसटी के खिलाफ सूरत से ही आवाज उठी थी. उसी क्षेत्र से भाजपा को 16 में से 15 सीटें मिली हैं. व्यापारी वर्ग, हालांकि, जीएसटी से नाराज है लेकिन फिर भी वोट उस ने भाजपा को ही दिया.

भाजपा मान रही है कि जिस तरह से उत्तर प्रदेश चुनाव में जीत ने मोदी के नोटबंदी के फैसले पर मुहर लगाई, उसी प्रकार गुजरात की जीत ने जीएसटी पर सहमति जताई है.

यह सही है कि गुजरात चुनाव में कांग्रेस की सीटें बढ़ने का एक गणित यह है कि हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकोर और जिग्नेश मेवाणी के साथ आने से भाजपा विरोधीमत किसी हद तक एक हो गए.

चुनाव दर चुनाव

गुजरात में जहां तक भाजपा के उभार का सवाल है, 1995 में पार्टी को 121 और कांग्रेस को 45 सीटें मिली थीं. उसे बड़ा बहुमत मिला पर पार्टी के 2 बड़े नेता शंकरसिंह वाघेला और केशुभाई पटेल के मतभेदों के चलते सरकार नहीं चल पाई और 1998 में चुनाव हुए जिस में भाजपा को 117 सीटें मिलीं. कांग्रेस के हिस्से 53 सीटें आईं. 2001 में भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने नरेंद्र मोदी को मुख्यमंत्री बना दिया.

इस के बाद 2002 के चुनाव में भाजपा को 127 सीटें और कांग्रेस को 51 सीटें मिलीं. गुजरात दंगों के बाद यह चुनाव हुआ था. वह तब तक हुए चुनावों में भाजपा का सब से अच्छा प्रदर्शन था.  2007 में भाजपा को 117 और कांग्रेस को 59 सीटें प्राप्त हुई थीं. इस के बाद 2012 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 115 और कांग्रेस को 61 सीटें हासिल हुई थीं.

2 वर्षों बाद नरेंद्र मोदी लोकसभा चुनाव जीत कर प्रधानमंत्री बन गए. उन के प्रधानमंत्री बनने के बाद गुजरात में पहली बार चुनाव हुए हैं. यहां भाजपा का बहुतकुछ दांव पर लगा था.

2014 के लोकसभा चुनाव के मुकाबले इन चुनावों में भाजपा के वोट कम हुए हैं. गुजरात में  लोकसभा चुनाव में भाजपा को 60 प्रतिशत मत मिले थे पर इस बार वह 49.1 प्रतिशत रह गया. कांग्रेस को 41.4 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए हैं.

प्रदेश में 2012 के चुनाव में भाजपा को 47. 9 प्रतिशत मत मिले थे, इस बार 49.1 प्रतिशत मिले हैं. कांग्रेस को 2012 में 38.9 प्रतिशत और इस बार 42.5 प्रतिशत मत प्राप्त हुए हैं.

कांग्रेस ने 2012 के विधानसभा चुनाव के मुकाबले इस बार 19 सीटें  अधिक जीती हैं. भाजपा की 16 सीटें कम हो गईं. केवल यही नहीं, 2014 के लोकसभा चुनाव के मुकाबले इस बार उसे 66 सीटों पर नुकसान हुआ है. कांग्रेस को 63 सीटों पर फायदा मिला है.

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हिमाचल रण

 इसी तरह हिमाचल प्रदेश में भाजपा को विधानसभा में 18 सीटें तो बढ़ गईं पर लोकसभा चुनाव के मुकाबले उसे 15 सीटों पर नुकसान हुआ है. कांग्रेस की विधानसभा में 15 सीटें कम हुईं पर लोकसभा के मुकाबले 12 सीटों पर फायदा हुआ है.

68 सीटों वाली हिमाचल विधानसभा में भाजपा ने 44 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत हासिल कर लिया. पार्टी ने 5 वर्षों बाद वहां वापसी कर ली. प्रदेश में बारीबारी से 5-5 साल दोनों पार्टियों का मिलबांट कर खाने का सिलसिला इस बार भी कायम रहा. हिमाचल में 9 नवंबर को मतदान हुए थे. कांग्रेस को यहां 21 सीटें ही मिल पाईं.

कांग्रेस खत्म नहीं

2012 में कांग्रेस के पास 36 सीटें थीं जबकि भाजपा को 26 सीटें मिली थीं. 6 सीटें अन्य के हिस्से थीं. उस चुनाव में भाजपा को 38.5 प्रतिशत वोट मिले थे और कांग्रेस को 42.8 प्रतिशत. इस बार भाजपा का वोट बढ़ कर 48.8 प्रतिशत जबकि कांग्रेस का 41. 8 प्रतिशत है.

भाजपा अब 14 राज्यों में अपने बूते सरकार चला रही है और 5 राज्यों में गठबंधन सरकारों में सहयोगी है. फिर भी, कांग्रेस अभी खत्म नहीं हुई है.

लोकसभा चुनावों के बाद 18 राज्यों में चुनाव हो चुके हैं जिन में से 11 में भाजपा जीती है. कांगे्रस 2 राज्यों में सरकार बनाने में सफल हुई है.

कांग्रेस पिछले 3 वर्षों में, जहां भी विधानसभा चुनाव हुए वहां, सत्ता में वापसी नहीं कर पाई. हालांकि पंजाब और पुड्डुचेरी में वह दूसरी पार्टियों से सत्ता छीनने में जरूर कामयाब रही है. कांग्रेस की अब 29 में से केवल 4 राज्यों कर्नाटक, पंजाब, मिजोरम और मेघालय में सरकारें बची हैं.

लोकसभा के साथ आंध्र प्रदेश और उस से अलग हुए तेलंगाना में चुनाव हुए थे पर दोनों में से किसी भी राज्य में कांग्रेस को सत्ता वापस नहीं मिली. अरुणाचल प्रदेश में उसे जीत जरूर मिली पर बाद में पार्टी टूट गई और दूसरा धड़ा भाजपा के साथ जा मिला.

इस के बाद जम्मूकश्मीर, हरियाणा, झारखंड और महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव हुए. यहां हरियाणा को छोड़ कर कांग्रेस सत्ता में भागीदार थी. हरियाणा में वह अपने बूते सरकार चला रही थी. 2005 में दिल्ली और बिहार में चुनाव हुए. बिहार, में कांग्रेस जनता दल-यू के साथ गठबंधन की सहयोगी थी. नीतीश कुमार के नेतृत्व में सरकार बनी तो कांग्रेस भी उस में शामिल हुई पर डेढ़ साल बाद जनता दल-यू ने भाजपा का दामन थाम लिया और कांग्रेस को विपक्ष में जाना पड़ा.

2016 में कांग्रेस ने केरल और असम गंवा दिया. केरल में कम्युनिस्ट तो असम में भाजपा जीती.

नेतृत्व बनाम नेतृत्व

 कांग्रेस पिछले दौर में निष्क्रिय सी रही. सोनिया गांधी का स्वास्थ्य साथ नहीं देने से वे पूरी तरह चुनावों में ध्यान नहीं दे पाईं. लेकिन इस बार सोनिया गांधी ने चुनाव की बागडोर पूरी तरह से राहुल गांधी को सौंप दी. राहुल गांधी ने खूब संघर्ष किया. पार्टी को सक्रिय बनाए रखा. तमाम नेताओं को जिम्मेदारियां सौंपीं. फीडबैक लेते रहे.

कांग्रेस जबजब सक्रिय दिखाईर् दी, उसे सफलता मिली, जैसे पिछला पंजाब विधानसभा चुनाव जहां पार्टी ने कैप्टन अमरिंदर सिंह का नाम नेता के तौर पर पहले से ही तय कर दिया था. उत्तर प्रदेश में वह खास सक्रिय नहीं रही तो भाजपा, बसपा और सपा को राज मिलता रहा. बिहार में वह बियाबान में है.

गुजरात और हिमाचल दोनों राज्यों में भाजपा की जीत से यह साबित हुआ है कि पार्टी केवल मोदी के भरोसे है. मोदी की छवि हावी है. भाजपा देश की सब से बड़ी पार्टी जरूर बनी है और उस ने कांग्रेस की जगह ले ली है पर श्रमिक, किसान परेशान हैं. दलित आंदोलन की राह पर हैं. शिक्षण संस्थाएं, विश्वविद्यालय, शिक्षा प्रणाली और आर्थिक नीतियां गहरे तक प्रभावित हुई हैं.

कट्टर विचारधारा की जकड़न

 देश में आज जनता को गोलबंद कर उन्हें लोकतंत्र को खत्म करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है. हिंदूराष्ट्रवादी विचारधारा ने देश को जकड़ लिया है. इसे सरकार का समर्थन प्राप्त है. इस एजेंडे को लागू करने में आम लोगों की भागीदारी बढ़ाने की कोशिश की जा रही है. इस से स्पष्ट है कि देश खतरनाक स्थिति की ओर जाएगा. समाज में विभाजन बढ़ेगा.

हिंदूराष्ट्रवादी विचारधारा का वर्चस्व तेजी से बढ़ा है. राममंदिर, गौरक्षा, लव जिहाद जैसे पहचान से जुड़े मुद्दों का समाज में बोलबाला हो गया है. गौरक्षा के नाम पर देश में मुसलमानों की हत्याएं हुईं. मवेशियों के व्यापार से जुड़े लोगों ने अपनी जानें गंवाईं. दलितों की पिटाईर् हुई. कश्मीर में अतिराष्ट्रवादी नीतियों के कारण बड़ी संख्या में लोगों की जानें गईं और घायल हुए.

2018 में कर्नाटक (कांगे्रस), मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ (भाजपा) राज्यों में चुनाव होने हैं. अब भाजपा के लिए इन राज्यों में भी राह आसान नहीं है. गुजरात की जीत भाजपा के लिए चेतावनी है. अब, 2019 की राह भी उस के लिए कांटोंभरी होगी. भाजपा को इस जीत पर जश्न मनाने की नहीं, मंथन करने की ज्यादा जरूरत है.

राहुल गांधी को कांग्रेस की कमान

47 वर्षीय राहुल गांधी निर्विरोध रूप से कांग्रेस के नए अध्यक्ष चुन लिए गए. वे 132 साल पुरानी कांग्रेस का नेतृत्व करेंगे. राहुल गांधी को यह पद संघर्ष से नहीं मिला. अब तक के उन के पार्टी उपाध्यक्ष और सांसद के तौर पर किए गए कार्यों को उल्लेखनीय नहीं माना गया. उन की अंगरेजीदां अभिजात्य छवि बनी रही है. राहुल गांधी हाल में पार्टी की हिंदूवादी छवि पेश करते दिखाई दिए हैं.

गुजरात विधानसभा के चुनाव में वे मंदिरों की परिक्रमा करते दिखाई दिए. स्वयं को जनेऊधारी हिंदू प्रचारित करते रहे. ऐसा कर के वे समूचे देश के नेता के तौर पर नहीं, खुद को महज हिंदुओं का नेता साबित कर रहे थे. उधर, भाजपा हिंदुत्व को अपनी मिल्कीयत समझती रही है. केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली कह चुके हैं कि कांग्रेस के पास तो हिंदुत्व का क्लोन है. यानी असली माल उन के पास है. भाजपा एक तरह से कह रही है कि हिंदुत्व पर उस का कौपीराइट है, कांग्रेस तो नक्काल है. इस से लगता है कि कांग्रेस आज हिंदुत्व की पिछलग्गू दिखाई देती है. इस तरह तो कांग्रेस हिंदुत्व की बी नहीं, ए टीम दिखाई दी है.

यह सच है कि कांग्रेस आजादी के समय हिंदूवादी पार्टी थी. मुहम्मद अली जिन्ना कांग्रेस को हिंदू पार्टी कहते थे. तब के बड़े नेता तनमन से हिंदूवादी थे. कुछ तो वर्णव्यवस्था को ईश्वरीय देन मानने वाले थे. जवाहरलाल नेहरू थोड़े उदारवादी थे पर वे पार्टी के तिलक, जनेऊधारियों की सलाह के खिलाफ जाने का साहस नहीं दिखा पाते थे. वे हिंदुत्व के विपरीत न तो जगजीवन राम जैसे दलित नेता और न ही सरदार पटेल जैसे पिछड़े वर्ग के नेता की सलाह मानने की हिम्मत करते थे.

राहुल गांधी पिछले कुछ समय से काफी सक्रिय दिखाई दिए हैं. उन्होंने गुजरात विधानसभा के चुनाव में जो तेवर दिखाए, उन तेवरों ने 22 वर्षों से गुजरात में एकछत्र शासन कर रही भाजपा को हिला दिया. यह तो ठीक है. उन्होंने जीएसटी पर व्यापारी वर्ग का समर्थन पाने के लिए सभाओं में मोदी सरकार को कोसा, ऐसा उन्होंने व्यापारियों को लुभाने के लिए किया. मंदिरों की परिक्रमा कर के वे ब्राह्मणों का समर्थन पा सकते हैं पर उन के पास देश की बड़ी युवा जनसंख्या के लिए कोई एजेंडा दिखाई नहीं दिया. पिछड़ों, दलितों, अल्पसंख्यकों और औरतों के लिए उन के पास किसी तरह का नया दृष्टिकोण नहीं है.

हालांकि, वे कुछ समय तक दलितों के घरों में जाते रहे. रात को उन के घर में रुकते और उन के घर में खाना खाते. इस से दलितों में किसी तरह का कोई सकारात्मक संदेश नहीं गया.

राहुल गांधी के पूर्वजों की बात करें तो नेहरू समाजवाद लाने की बात करते रहे. इंदिरा गांधी गरीबी हटाने का नारा ले कर आईं. राजीव गांधी गरीबों, गांवों तक एक रुपए में से 15 पैसे पहुंचने की बात कर के उन्हें लुभाते रहे. पर हकीकत में इस देश के गरीबों, दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों के लिए सिवा वादों के कुछ नहीं हुआ. 10 साल तक प्रधानमंत्री रहे मनमोहन सिंह सोनिया गांधी की छत्रछाया में कौर्पोरेट और भ्रष्ट नेताओं के कल्याण में खड़े नजर आए. कांग्रेस पार्टी में अभी जो युवा नेता हैं उन में से ज्यादातर पिता या परिवार की राजनीतिक विरासत से आए हुए हैं. उन की सोच जानीपहचानी है. जमीन से जुड़ाव वाले नेताओं की कांग्रेस में कमी हो रही है. जो हैं वे लकीर के फकीर दिखाई पड़ते हैं.

सफलता हासिल करने के लिए कांग्रेस को हिंदूवादी छवि से मुक्त हो कर सही माने में लोकतांत्रिक समाजवादी नीतियां स्थापित करनी होंगी. सामाजिक क्षेत्र के लिए उन के पास कोई दृष्टिकोण नहीं दिखता. कांग्रेस में किसी भी युवा या पुराने नेता में आज के भारत को नई दिशा देने के लिए ऐसा नजरिया नहीं है, जो देश की समुचित तरक्की के लिए आवश्यक है.

मंदिरों, तीर्थों और विपक्ष की खामियां उजागर करने मात्र से देश किसी नेता का मुरीद नहीं बन सकता. राहुल गांधी को सामाजिक, राजनीतिक बदलाव का कोई नया कारगर क्रांतिकारी एजेंडा पेश करना होगा, पर लगता नहीं, वे देश में सुधार का कोई नया नजरिया पेश कर पाएंगे. आज देश कई तरह की चुनौतियों का सामना कर रहा है. ऐसे में कोई नेता युवा हो पर नीतियां 100 साल पुरानी हों, तो कैसे कोई देश तरक्की कर सकता है.