सरिता विशेष

हिमाचल प्रदेश और गुजरात विधानसभाओं के चुनाव भाजपा के लिए अग्निपरीक्षा सरीखे हैं. अपने विकास के दावों पर उसे खरा उतरना है. वह बचाव की मुद्रा में है.  कांग्रेस के पास खोने को अधिक नहीं है. हिमाचल प्रदेश में तो दोनों पार्टियां 5-5 साल बारीबारी से लूटपाट करती रही हैं. गुजरात में 22 वर्षों से सत्तारूढ़ भाजपा को पराजय की आशंका सता रही है. इन चुनावों में अगर भाजपा हारती है तो यह उस के लिए बड़ा झटका होगा.

देश की भाजपा सरकार देशविदेश में अपनी कथित उपलब्धियों का ढोल पीटती रही है और विकास करने के बड़ेबड़े दावे करती नहीं अघाती. गुजरात को वह मौडल स्टेट के तौर पर प्रचारित करती आई है. पर, कुछ महीनों से गुजरात से निकलते गुस्से को देख कर वह सहमी हुई है. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने अक्तूबर में जब दौरे शुरू किए और उन की सभाओं में अप्रत्याशित भीड़ दिखने लगी तो गुजरात को अपनी जागीर समझ रही भाजपा भयभीत दिखाई देने लगी.

सहमी भाजपा

गुजरात में 22 वर्षों से एकछत्र राज करने वाली भाजपा को इस चुनाव में पसीने छूट रहे हैं. मोदी और भाजपा का करिश्मा फीका नजर आ रहा है. मोदी और भाजपा द्वारा गुजरात को विकास का पर्याय बताया गया पर राज्य में इस तथाकथित विकास को ले कर आम जनता आक्रोशित दिखाई दे रही है. और गुजरातवासियों के इस आक्रोश को भुनाने का कांग्रेस कोई मौका नहीं गंवाना चाहती.

भाजपा द्वारा दावा किया जाता रहा है कि प्रदेश में खूब विकास हुआ है जबकि राज्य के हालात ठीक नहीं हैं. पिछले 2 वर्षों से यहां 3 बड़े जातीय आंदोलन चल रहे हैं-पाटीदार आरक्षण आंदोलन, ओबीसी आंदोलन और दलित आंदोलन. इन के अलावा किसान, आदिवासी, विमुक्त जातियां भी सरकार से नाखुश हैं. समयसमय पर ये वर्र्ग भी रैलियों, सभाओं के जरिए अपना आक्रोश व्यक्त कर चुके हैं पर सरकार ने इन लोगों की मांगों को गंभीरता से नहीं लिया और इन वर्गों की आवाज तथाकथित विकास के नगाड़ों के शोर में दब कर रह गई.

गुजरात इस बार जातीय समीकरणों की रस्साकशी में उत्तर प्रदेश, बिहार सा बन गया है. सत्तारूढ़ भाजपा और कांग्रेस दोनों पाटीदारों, पिछड़ों और दलितों को अपनेअपने पाले में करने में जुटी हैं. कांग्रेस ने राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को पहले ही गुजरात में इंचार्ज बना कर भेज दिया था. गहलोत पिछड़े वर्ग से आते हैं और पिछड़े बहुल गुजरात को लुभाने के लिए कांग्रेस ने ऐसे ही और जातीय लुभाऊ नेताओं की फौज भेज दी है. दलितों और मुसलमानों के एकसाथ आने से भाजपा की चिंता बढ़ गई है.

जातियों का खेल

गुजरात में 40 प्रतिशत ओबीसी, 11 प्रतिशत क्षत्रिय, 7 प्रतिशत दलित, 14.75 प्रतिशत आदिवासी, 12 प्रतिशत पटेल, 9 प्रतिशत मुसलमान हैं. ओबीसी में 22 प्रतिशत कोली, 20 प्रतिशत ठाकोर और 58 प्रतिशत अन्य जातियां हैं. इन में मुसलमानों को छोड़ कर दोनों दल इन जातियों को लुभाने में जुटे हैं.

जातियों का खेल पहली बार 1985 में कांग्रेस नेता माधव सिंह सोलंकी ने क्षत्रिय, हरिजन, आदिवासी और मुसलिमों (खाम) को साध कर खेला था और 149 सीटें जीती थीं.

उधर, भाजपा ने भी देशभर से अपने दलित, पिछड़े, आदिवासी मंत्रियों, सांसदों व अन्य नेताओं की खेप गुजरात में पसार दी है. समूचा गुजरात इस बार जातीय रणक्षेत्र में तबदील होता दिखाई दे रहा है. करीब 32 वर्षों बाद प्रदेश एक बार फिर जातीय दलदल के भंवर में फंसा है.

पिछले 2 वर्षों में प्रदेश में हुए 3 बड़े जातीय आंदोलनों ने प्रदेश सरकार की जड़ें हिला दीं. इन आंदोलनों से हुए नुकसान को कम करने के लिए केंद्र और गुजरात सरकारों ने हिमाचल प्रदेश के चुनाव की तारीख घोषित किए जाने के बाद से गुजरात में घोषणाओं की झड़ी लगा दी. इस में पाटीदार आंदोलनकारियों के 400 से अधिक मुकदमे वापस लेने का फैसला, सफाईकर्मचारियों की अनुकंपा नियुक्ति, एसटी कर्मचारियों के लंबित एचआरए भुगतान के फैसले सहित करीब 35 घोषणाएं शामिल हैं.

एक बड़ी घोषणा, किसानों को 3 लाख रुपए तक का ब्याजमुक्त ऋण देने की है. ज्यादातर किसान पाटीदार, पिछड़े और आदिवासी हैं.

इधर, कांग्रेस जातिगत आंदोलनों को पीछे से समर्थन दे कर इन का साथ जुटाने के प्रयास में है. ओबीसी आंदोलन के बड़े नेता अल्पेश ठाकोर तो कांग्रेस में शामिल हो चुके हैं. पटेल आंदोलन के नेता हार्दिक पटेल भले ही अभी कांग्रेस के साथ नहीं हैं पर वे अपने भाषणों में भाजपा को हराने की अपील कर रहे हैं. अहमदाबाद में राहुल गांधी के साथ मुलाकात के उन के सीसीटीवी फुटेज भी चर्चा में रहे हैं.

उधर, दलित नेता जिग्नेश मेवाणी भी राहुल गांधी से मिले थे. मेवाणी कहते हैं कि वे न तो कांग्रेस में शामिल होंगे, न अन्य किसी पार्टी में और न ही किसी पार्टी के लिए वोट मांगेंगे. हां, वे अपने समुदाय के लोगों से भाजपा को हराने की अपील जरूर करेंगे. हम ने कांग्रेस के सामने 17 मांगें रखी हैं. इन में से 90 प्रतिशत मांगों पर कांग्रेस सहमत हो गई है.

मेवाणी के इस कथन से साफ है कि वे और दलित समुदाय भाजपा को वोट नहीं देंगे, यानी दलित सीधेसीधे कांग्रेस के पक्ष में रहेंगे.

गुजरात में 182 विधानसभा सीटों के लिए 2 चरणों-9 और 14 दिसंबर को हो रहे चुनाव में प्रदेश के करीब 4.33 करोड़ मतदाता मतदान करेंगे.

जातीय आंदोलनों ने यहां का सामाजिक और राजनीतिक माहौल बदला है. सरकार के खिलाफ दलित, पिछड़े, पाटीदार और मुसलमान तो हैं ही, नोटबंदी और जीएसटी के बाद व्यापारी वर्ग भी सरकार से नाराज है और वह सड़कों पर आंदोलन के लिए उतर चुका है. मोदी और अमित शाह इन तमाम वर्गों का गुस्सा भांप चुके हैं और डैमेज कंट्रोल में जुटे हैं. पर इन सभी वर्गों के तेवरों से लगता है कि वे 22 वर्षों से राज करती आ रही भाजपा को गहरा सबक सिखाने की ठान चुके हैं.

भाजपा ने मनोवैज्ञानिक दबाव बनाए रखने के लिए गुजरात में 150 सीटों का मिशन रखा है हालांकि मैदान में आधे से ज्यादा नए चेहरे उतारे जा रहे हैं क्योंकि मौजूदा विधायकों में से 50 के हार जाने के अंदेशे से उन के टिकट काटे जाने की बातें की जा रही हैं.

राहुल के दौरे

कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी लगातार गुजरात दौरे कर रहे हैं और वे जनता को भाजपा के खिलाफ हवा दे रहे हैं. उन्होंने पिछले कुछ दिनों से अपनी छवि को काफी बेहतर कर लिया है. उन्होंने नया कुछ नहीं किया है, केवल जनता की दुखती रग पर हाथ धरा है. वे इस में कामयाब होते भी दिख रहे हैं. राहुल गांधी नोटबंदी, जीएसटी को ले कर मोदी और अरुण जेटली को तो निशाने पर ले ही रहे हैं, गुजरात के विकास पर भी तीखे सवाल खड़े कर रहे हैं.

राहुल गांधी बारबार, ‘विकास लापता है, विकास पागल हो गया है,’ जैसे जुमले उठा कर केंद्र और राज्य दोनों सरकारों पर हमलावर हो रहे हैं. राहुल गांधी के सवालों पर भाजपा नेता बौखलाते दिख रहे हैं. राहुल की सभाओं, रैलियों में भीड़ जुट रही है जबकि अमित शाह और दूसरे भाजपा नेताओं की रैलियों में भीड़ जुटाने के लिए स्थानीय भाजपा नेताओं को पसीने बहाने पड़ रहे हैं.

इस बार कांग्रेस की भाजपा को छकाने की रणनीति से केंद्र और प्रदेश सरकारें बचाव की मुद्रा में दिखाई दे रही हैं. राहुल गांधी के बारबार दौरों से भाजपा की पेशानी पर चिंता की लकीरें साफ दिख रही हैं. राहुल गांधी यहां मंदिरों में गए तो तुरतफुरत मोदी के दौरे हुए और उन्होंने भी मंदिरों की परिक्रमा की. सोमनाथ, अक्षरधाम मंदिर गए और स्वामीनारायण संप्रदाय प्रमुख का जम कर स्तुतिगान किया. पिछड़े समुदाय को खुश करने के लिए वे उन जगहों पर जा रहे हैं जहां यह वर्ग बड़ी तादाद में संत, साधुओं का अनुयायी है. स्वामीनारायण संप्रदाय से प्रदेश का ज्यादातर पिछड़ा समुदाय जुड़ा हुआ है. बड़ी संख्या में पटेल, पाटीदार भी ऐसे आश्रमों के अनुयायी हैं.

भाजपा की रैलियों में भीड़ नहीं है. खाली कुरसियां देख कर बड़े नेता सभाओं में मंचों पर जा नहीं रहे हैं. पार्टी ने हिंदुत्व के फायरब्रैंड नेता और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी को भी गुजरात भेजा और रैली कराई गई पर यह रैली भी फ्लौप सिद्ध हुई. रैली में जनता नहीं जुटी. यही हाल हिमाचल प्रदेश में भाजपा के बड़े नेताओं की रैलियों व सभाओं का रहा. वहां भी राजनाथ सिंह की सभा में कुरसियां खाली रहने की वजह से उन्हें वहां जाने से रोक दिया गया और स्थानीय नेताओं को अपने भाषणों से ही जनता को बहलाना पड़ा.

हिमाचल की उदासीनता

68 विधानसभा सीटों के लिए हुए चुनाव में हिमाचल प्रदेश में कुल 349 उम्मीदवार मैदान में थे.  दोनों पार्टियों के कई नेता भ्रष्टाचार के मामलों में फंसे हैं. सत्तारूढ़ कांग्रेस के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह तो जमानत पर हैं. उन के परिवार के सदस्य भी आरोपी हैं. 3 बार केंद्रीय मंत्री और 7वीं बार मुख्यमंत्री बनने का दावा करने वाले प्रदेश के इस मुखिया पर आय से अधिक संपत्ति के कई मामले दर्ज हैं. उन के पुत्र और शिमला ग्रामीण विधानसभा सीट से उम्मीदवार विक्रमादित्य सिंह पर अचानक 1 करोड़ से सीधे 84 करोड़ की संपत्ति बना लेने का आरोप है.

सत्तासीन कांग्रेस के 10 मंत्री और 8 कैबिनेट सचिव भी दोबारा मैदान में हैं. कुल 338 प्रत्याशियों में से केवल 19 महिलाओं को ही टिकट दिया गया है.

उधर, 2 बार मुख्यमंत्री रहे प्रेमकुमार धूमल पर भी घोटालों का कलंक है. फिर भी भाजपा ने उन पर दांव लगाया है. पूर्व केंद्रीय मंत्री और भ्रष्ट शिरोमणि कांग्रेसी नेता पंडित सुखराम अपने पुत्र अनिल शर्मा समेत भाजपा में शामिल हो कर पुत्र को पार्टी का टिकट दिलाने में बाजी मार गए.

हिमाचल में इस बार चुनावों को ले कर मतदाताओं में कोई उत्साह नहीं रहा. राजनीतिक दलों में भी पहले जैसी गहमागहमी और भागमभाग नहीं दिखाई दी. प्रदेश की जनता दोनों प्रमुख दलों के प्रति खामोश व उदासीन नजर आई.

बागी उम्मीदवारों की समस्या से कांग्रेस व भाजपा दोनों को ही समानरूप से दोचार होना पड़ा है. भाजपा के 9 तो कांग्रेस के 11 बागी नेताओं ने मैदान में पार्टी के अधिकृत उम्मीदवारों के खिलाफ खम ठोका.

भाजपा को हिमाचल में मोदी लहर और एंटी इंकंबैंसी का फायदा मिलने की उम्मीद है तो कांग्रेस को केंद्र की मोदी सरकार की नीतियों और फैसलों के चलते जनता की नाराजगी का लाभ मिलने की आस है. कांग्रेस के नेताओं का कहना है कि नोटबंदी, जीएसटी और बुलेट ट्रेन चलाने जैसे फैसलों से लोगों में नाराजगी है. दावा है कि भाजपा और उस के सहयोगी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा हिंदुत्व एजेंडे को ले कर समाज में नफरत फैलाने के प्रयासों के कारण कांग्रेस फिर से सत्ता में आ जाएगी.

यहां भी भाजपा को नोटबंदी और जीएसटी जैसे मुद्दों पर बचाव का सामना करना पड़ा. केंद्र की सत्ता की ताकत को अगर देखा जाए तो भाजपा में मौजूदा समय में कोई भी ऐसा नेता नहीं है जिस का प्रदेश के सभी 68 निर्वाचन क्षेत्रों में प्रभाव हो. पार्टी मोदी के नाम के सहारे चुनावी वैतरणी पार करना चाहती है.

2012 में हुए विधानसभा चुनावों में मात्र 5 प्रतिशत मतों के अंतर ने ही भाजपा को मिशन रिपीट के लक्ष्य को पराजय में बदल दिया था. उस चुनाव में कांग्रेस ने जहां 42.81 प्रतिशत मत के साथ 36 विधायकों को ले कर सरकार बनाने में सफलता पाई थी, वहीं तब की सत्तारूढ़ भाजपा को 38.47 प्रतिशत मतों के साथ 26 विधायकों को ले कर विपक्ष में  बैठना पड़ा था.

अगर 2014 के लोकसभा चुनाव को देखें तो वह चुनाव एकतरफा दिखाईर् दिया. भाजपा को उस चुनाव में प्रदेश की सभी चारों संसदीय सीटों पर जीत हासिल हुई थी.

2012 के चुनावों में तब की भाजपा सरकार के विरुद्ध कोई खास मुद्दा नहीं था, उसी तरह इस बार कांग्रेस सरकार के पिछले 5 सालों के कार्यकाल से भी जनता की कोई खास नाराजगी नहीं दिखी. पिछली भाजपा सरकार अपनी आंतरिक कलह और भितरघात के कारण पिछड़ गई थी उसी तरह के हालात अब कांग्रेस के भी हैं. फिर भी भाजपा और कांग्रेस उम्मीदवारों में सीधी टक्कर होने से इतना तो स्पष्ट है कि प्राप्त होने वाले मतों के प्रतिशत में चाहे बहुत अंतर न हो, पर सीटों पर जीत के मामले में नतीजे अप्रत्याशित हो सकते हैं.

गुजरात का गुस्सा

राज्य की कुल 182 विधानसभा सीटों के लिए 9 और 14 दिसंबर को 2 चरणों में होने वाले चुनावों की सरगरमी तेज है. गुजरात का भाजपाई गढ़ हिलता दिख रहा है. राज्य के 3 जातीय आंदोलन पार्टी को भारी पड़ रहे हैं. हालांकि ये तीनों आंदोलन परस्पर एकदूसरे के खिलाफ दिखाई देते हैं. ओबीसी के नेता अल्पेश ठाकोर ने पाटीदारों को ओबीसी में शामिल किए जाने की मुहिम के खिलाफ आंदोलन शुरू किया क्योंकि ओबीसी जातियां नहीं चाहतीं कि पाटीदारों को आरक्षण दे कर उन का हिस्सा बांट दिया जाए.

उधर, ऊना घटना के आरोपी ओबीसी समुदाय के होने की वजह से दलित आंदोलन ओबीसी के विरोध में हुआ. दलितों का उत्पीड़न अधिकतर पिछड़े समुदाय द्वारा किया जा रहा है. इन दोनों समुदायों में परस्पर आगे बढ़ने की होड़ दिखाई देती है. दोनों ही वर्गों को शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण मिला हुआ है.

पाटीदार आंदोलन

2015 में आरक्षण की मांग को ले कर पाटीदारों ने आंदोलन शुरू किया था. इस आंदोलन में हार्दिक पटेल नेता के तौर पर उभर कर सामने आए. हार्दिक पटेल सहित आंदोलन के युवा नेताओं का पाटीदार समाज के युवाओं पर खासा असर है. यह वर्ग प्रदेश की समृद्धि और भाजपा का समर्थक माना जाता रहा है पर अब यह वर्ग खिलाफ खड़ा है और भाजपा को चुनौती दे रहा है.

हार्दिक पटेल पर मुकदमा कायम कर गुजरात से दरबदर के आदेश दिए गए और पड़ोसी राज्य राजस्थान में 6 महीने के लिए नजरबंद कर रखा गया. इस आंदोलन से निबटने में नाकाम रहने पर आनंदीबेन पटेल को मुख्यमंत्री पद से रुखसत होना पड़ा था.

पिछड़ा वर्ग आंदोलन

पाटीदार आंदोलन के विरोध में ओबीसी आंदोलन शुरू हुआ. इस आंदोलन में नेतृत्व के रूप में अल्पेश ठाकोर का चेहरा सामने आया. ओबीसी नेताओं ने सरकार से कहा कि पाटीदारों को ओबीसी में  शामिल न किया जाए. यह वर्ग इस दौरान गरीबों, मजदूरों, किसानों के मुद्दों पर भी सरकार को घेरता रहा है. अल्पेश ठाकोर अब कांग्रेस में शामिल हो गए हैं.

दलित आंदोलन

ऊना कांड जुलाई 2016 में हुआ था. कथित गौरक्षकों ने मृत पशुओं की चमड़ी उतार रहे दलित युवकों को बेरहमी से पीटा था. मामला सामने आने पर देशभर के दलित समुदाय समेत दूसरे लोगों में भी आक्रोश दिखाईर् दिया. दलित संस्थाएं आगे आईं और मिल कर भाजपा के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया. आंदोलन के अगुआ के रूप में 35 वर्षीय युवा एडवोकेट जिग्नेश मेवाणी सामने आए.

आंदोलन में प्रदेशभर के लाखों दलित जुटे. करीब 20 हजार दलितों को मैला न उठाने, मृत पशुओं को न उठाने की शपथ दिलाई गई.

अब भाजपा और कांग्रेस दोनों ही पाटीदार नेता हार्दिक पटेल और दलित नेता जिग्नेश मेवाणी को अपनेअपने पाले में करने में जुटी दिख रही हैं. भाजपा  पाटीदार आंदोलन के नेताओं को तोड़ने के हथकंडे भी आजमा रही है. कुछ नेताओं को मोटा पैसा देने का लालच देने की खबरें आ रही हैं. पटेल आंदोलन के एक नेता नरेंद्र पटेल को पार्टी में लेने के लिए एक करोड़ रुपए की घूस देने का मामला सामने आया. भाजपा हार्दिक पटेल और राहुल गांधी की होटल में मुलाकात की खुफियागीरी करवा चुकी है.

केंद्र सरकार की नीतियों और फैसलों का राज्यों पर बुरा असर पड़ रहा है. वह चाहे नोटबंदी का फैसला हो या जीएसटी लागू करने का. इन फैसलों से आम जनता पर ही नहीं, छोटेबड़े दुकानदारों पर भी बुरा असर पड़ा. सरकार के इन फैसलों से लाखों कारोबारी बरबाद हो गए.

गुजरात में युवाओं के लिए नौकरी का मुद्दा भी अहम है. यहां भाजपा की घबराहट का आलम यह है कि जिस दिन चुनाव आयोग ने हिमाचल प्रदेश में चुनाव की तारीखों का ऐलान किया, उस के बाद से ही यहां ताड़बतोड़़ घोषणाएं, शिलान्यास और उद्घाटन किए गए. केंद्र सरकार ने 11 हजार करोड़ रुपए के प्रोजैक्ट की घोषणा कर डाली. केंद्र सरकार जीएसटी में यू टर्न लेती दिखी. करीब 100 वस्तुओं में जीएसटी में छूट देने की बात कही गई. प्रधानमंत्री मोदी ने गुजरात में 650 करोड़ रुपए की रोरो फेरी सेवा का उद्घाटन किया. 78 करोड़ रुपए किसानों को देने की घोषणा की गई. फ्लाईओवर, वाटर ट्रीटमैंट प्लांट, कूड़ा प्रोसैसिंग की करोड़ों रुपए की योजनाओं का ऐलान किया गया.

कहां है विकास?

भाजपा के हिंदुत्व की चाशनी विकास की कुनैन पर हावी दिखाईर् दे रही है. जनता पूछ रही है, कहां है विकास? दलित, पिछड़े, किसान, आदिवासी, व्यापारी वर्ग समेत विपक्षी पार्टियां विकास पर प्रश्न खड़े कर रही हैं. ‘विकास’ को ढूंढ़ा जा रहा है.

पार्टी के हिंदुत्व मुद्दे ने देशभर में नफरत, हिंसा का माहौल पैदा किया. गौरक्षा के नाम पर निर्दोष लोगों को मारा गया. राममंदिर मुद्दा लोगों को फुजूल का लगा क्योंकि भाजपा पिछले करीब 30 सालों से इस मुद्दे को भुनाती आ रही है.

भाजपा किस तरह के विकास की बात कर रही है? विकास का पैमाना क्या है? गुजरात में लोग रोजगार के लिए अब कम जा रहे हैं. उत्तर प्रदेश, बिहार के लोगों का पलायन रोजगार देने वाले राज्यों और शहरों की तरफ देखा गया है पर गुजरात में बिहार के लोग अधिक नहीं हैं. उलटे, महाराष्ट्र की ओर अधिक जा रहे हैं, जो मनसे जैसे दलों की आंख की किरकिरी बने दिखते हैं.

किसी राज्य के विकास का मतलब है उस राज्य की ओर दूसरे पिछड़े राज्यों के लोगों का रुझान, पर गुजरात में ऐसा नहीं दिखता. अब तो खुद गुजरात के छोटेमोटे व्यापारी दूसरे राज्यों में अपना व्यापार तलाश रहे हैं. विकास के नाम पर उजाड़ दिए गए लाखों लोगों को रोजीरोटी मुहैया न करा पाना विकास के दावों की पोल खोलने के लिए काफी है. झुग्गीझोंपड़ी वालों को दूसरी जगह बसा तो दिया गया पर यह नहीं देखा गया कि उन परिवारों को रोजगार मिला कि नहीं, उन के बच्चों को शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी सुविधाएं उपलब्ध हो पा रही हैं या नहीं.

किसी भी पार्टी या सरकार के लिए 22 वर्षों का समय कम नहीं होता. इस अवधि में पूरी एक पीढ़ी जवान हो जाती है. प्रदेश में झुग्गी और कच्ची बस्तियों में रहने वालों की तादाद लाखों में हैं. इन में अधिकतर निचली जातियां और मुसलमान हैं. 22 वर्षों में जवान हो चुके, झुग्गी, कच्ची बस्ती में पलेबढे़ बच्चे, आज भी उन्हीं हालात में देखे जा सकते हैं.

साबरमती के ऊपर से गुजरने वाले नेहरू ब्रिज नाका के सामने चांद सईद की दरगाह है. इस के आसपास करीब 150 कच्चे मकानों में रहने वाले लोगों के हालात आज भी बदतर हैं. इस बस्ती के निवासी नईम मुहम्मद कहते हैं, ‘‘यहां पहले करीब 7 हजार झुग्गियां होती थीं. कुछ झुग्गियां अभी भी ऊंची इमारतों के नीचे रह गई हैं. बाकी झुग्गियों को हटा कर लोगों को बटवा रेलवे क्रौसिंग के पास 4-मंजिले भवन में फ्लैट दे दिए गए, पर अभी तक सभी लोगों को नहीं मिले हैं. जो लोग हटा दिए गए उन के रोजगार पर भी असर पड़ा. सरकार ने इन लोगों की रोजीरोटी का खयाल नहीं रखा. बस, साबरमती को चमकाने के लिए यहां रिवरफ्रंट बना दिया गया. इस तरह विकास के नाम पर लोगों को उजाड़ा गया है. इस तरह के कामों से किस का विकास हुआ है?’’

नईम कहते हैं, ‘‘इस तरह की झुग्गियां खानपुर इलाके में भी हैं. शहर के वडाज इलाके में सब से बड़ी झुग्गी बस्ती के बाशिंदों को मल्टीलैवल फ्लैट बना कर देने का काम चल रहा है.’’

यहां के आश्रम रोड से रिलीफ रोड जाने के लिए नेहरू ब्रिज चौराहे के एक कोने पर बड़ा सा बोर्ड लगा हुआ है. इस पर लिखा है, ‘हूं छू विकास, हूं छू गुजरात’. बोर्ड पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अमित शाह और मुख्यमंत्री विजय रूपाणी की फोटो लगी हुई हैं पर इसी बोर्ड के नीचे चौराहे से लगभग 100 मीटर के फासले पर 5-7 साल की एक अधनंगी बच्ची फुटपाथ पर बैठी कटोरे में कुछ खा रही थी. पास में चूल्हा और पानी के 2 बरतन रखे हुए थे. चूल्हे के पास ही टूटी हुई चारपाई पर एक आदमी सो रहा था. यह कैसा विकास है?

विकास के बोर्ड को को मुंह चिढ़ाता फुटपाथ पर बैठा यह एक परिवार ही नहीं, इसी पुल से नीचे उतरते ही 5-7 ऐसे और भी परिवार फुटपाथ पर जिंदगी बसर करते देखे गए. पूछने पर बताया गया कि ये परिवार यहां कई सालों से रह रहे हैं.

अस्तव्यस्त गुजरात

रतन पोल, मानेक चौक, गांधी रोड पर अस्तव्यस्त यातायात देखा जा सकता है. सड़कों, गलियों में आड़ेतिरछे वाहन खड़े हैं जो आनेजाने वालों के लिए बाधाएं खड़ी करते हैं. इस इलाके की सड़कें टूटी हुई हैं. रतन पोल के बाजार से हो कर गांधी मार्ग को जोड़ने वाली सड़क का बुरा हाल है. आधाआधा फुट के गड्ढे हैं. दुकानों के आगे कूड़ेकचरे के ढेर लगे हैं. यह अहमदाबाद का सब से व्यस्ततम मार्केट माना जाता है. नवाब सुलतान अहमद शाह के बनाए गए 3 दरवाजे के आसपास फुटपाथ पर छोटीछोटी दुकानों का जमावड़ा बिखरा हुआ है. किसी तरह का नियोजित विकास दिखाई नहीं देता.

यह हाल सिर्फ अहमदाबाद का नहीं, गुजरात में राजस्थान की ओर से प्रवेश करते ही पालनपुर, ऊंझा और मेहसाणा जैसे बड़े शहर आते हैं. इन शहरों में भी घुसते ही विकास की पोल खुलनी शुरू हो जाती है. ऊंचेऊंचे फ्लैटों की बगल की झुग्गियां और कच्चे मकान गुजरात की गरीबी का खुलेआम प्रदर्शन करते हुए विकास के दावों की धज्जियां उड़ाते प्रतीत होते हैं.

गुजरात में जो लोग विकास पर सवाल उठा रहे हैं उन पर राष्ट्रद्रोह के मामले थोपे जा रहे हैं. वे चाहे विस्थापितों के पुनर्वास को ले कर आंदोलन करने वाली मेधा पाटेकर हों, गुजरात दंगा पीडि़तों के लिए लड़ने वाली तीस्ता शीतलवाड़ हों, पूर्व ब्यूरोक्रैट हर्ष मंदर हों, पाटीदार आरक्षण आंदोलन के नेता हार्दिक पटेल हों या ऊना के दलितों पर हुए अमानुष व्यवहार के खिलाफ आंदोलन कर दलितों को एकजुट कर आवाज उठाने वाले दलित नेता जिग्नेश मेवाणी हों. सरकार ने ऐसे लोगों का दमन करने में कोई कसर नहीं छोड़ी.

29 अक्तूबर को जब यह प्रतिनिधि अहमदाबाद में था, यहां के सिविल अस्पताल में 3 दिनों में 24 बच्चों की मौत हो गई. लिहाजा, विकास का ढिंढोरा पीट रहे गुजरात के सत्तारूढ़ नेताओं को नहीं लगता कि यह राज्य भी चिकित्सा सेवाओं की बदहाली के लिए बदनाम उत्तर प्रदेश, झारखंड की श्रेणी में खड़ा है. लोग बताते हैं कि अब भी सरकारी दफ्तरों में घूसखोरी चल रही है, बिना लिएदिए कोई काम नहीं होता.

अहमदाबाद शहर में प्रवेश करते ही बहुमंजिले फ्लैटों के नीचे झुग्गी, कच्ची बस्तियां नजर आती हैं. रिलीफ रोड, गांधी रोड, रतन पोल, तीन दरवाजा एरिया दिल्ली के सब से भीड़भाड़ वाले चांदनी चौक, खारी बावली, नई सड़क, जामा मसजिद जैसे हैं. इन क्षेत्रों में कपड़ा, ड्राईफू्रट्स, नई व पुरानी किताबों व अन्य सामानों का सब से बड़ा मार्केट है पर यहां सड़कें टूटीफूटी हैं, दुकानों के आगे कूड़े के ढेर लगे हैं, बेतरतीब वाहन आजा रहे हैं.

शाम के समय बाजार में भीड़ काफी है पर दुकानदारों का कहना है कि खरीदार कम हैं. नोटबंदी और जीएसटी का बुरा असर पड़ा है. रेडिमेड कपड़ों के व्यापारी रईस अहमद कहते हैं कि बाजार में कुछ लोग घूमने आते हैं, कुछ तफरीह के लिए, कुछ खानेपीने के लिए पर खरीदारी के लिए कम ही ग्राहक हैं. पहले नोटबंदी और फिर जीएसटी ने दुकानदारों की कमर तोड़ दी है.

साबरमती के किनारे बनाया गया रिवरफ्रंट दिखने में अच्छा है पर शाम के वक्त भी यहां बहती नदी का नजारा देखने वाले दिखाई नहीं देते. इस नदी के किनारे पहले 7-8 हजार झुग्गियां थीं पर अब वे यहां से हटा दी गईं. अब यहां पुराने शहर और नए शहर को जोड़ने वाले नेहरू ब्रिज, गांधी ब्रिज, एलिस ब्रिज के पास रिवरफ्रंट बना दिखाई देता है.

प्रदेश में 1967 में पहली विधानसभा से ले कर 1977 तक कांग्रेस का एकछत्र राज रहा. 1980 में जनता पार्टी के टूटने के बाद भाजपा मुख्य विपक्षी पार्टी बन गई. 1985 के बाद से एक बार कांग्रेस और एक बार भाजपा को सत्ता मिलती रही. 1990 में जनता दल के साथ गठबंधन में 58 सीटें जीत कर पहली बार राज्य में भाजपा सरकार बनी थी. तब से वह हिंदुत्व के मुद्दे को भुनाती आ रही है. इस दौरान बाबरी विध्वंस से ले कर गोधरा कांड और गुजरात दंगों का दंश लोगों को झेलना पड़ा. प्रदेश में सांप्रदायिक तनाव का माहौल बना रहा.

2002 में नरेंद्र मोदी भारी बहुमत के साथ जीत कर आए थे. उसी साल फरवरी में गोधरा कांड हुआ था और इस मुद्दे पर हिंदुओं का ध्रुवीकरण करने में वे कामयाब रहे. बाद में 2007 और 2012 के चुनाव मोदी की अगुआई में लड़े गए. 2012 का चुनाव विकास और सौफ्ट हिंदुत्व के एजेंडे पर लड़ा गया. कांग्रेस यहां बुरी तरह से परास्त हुई थी. उस चुनाव के बाद मोदी प्रधानमंत्री पद के दावेदार बन गए थे.

दरअसल, भाजपा के हिंदुत्व के ध्वजवाहक गुजरात में ही नहीं, समूचे देश में पिछड़े वर्ग के  लोग हैं जो अतीत में शूद्र होने के कारण पूजापाठ से वंचित रहते आए थे. अब पिछले 60-70 सालों से यह वर्ग ब्राह्मण बनने की होड़ में जुटा हुआ है. देशभर में बड़ी संख्या में इस वर्ग ने अपने मंदिर, आश्रम बना लिए. अपने पंडेपुरोहित, अपने गुरु, साधु, संत और अपने देवीदेवता गढ़ लिए. इन 6-7 दशकों में इस वर्ग के पास खूब पैसा आया, यह राजनीति में बढ़चढ़ कर उतरा और सत्ता की मलाई में हिस्सा पाने लगा.

लेकिन जो वास्तविक राज है वह अभी भी ब्राह्मणों के हाथों में ही है. नीतियां वही लोग बनाते हैं. इन्हें तो बस थोड़ा सा टुकड़ा फेंक दिया जाता है. इन्हें हिंदुत्व के लठैत के रूप में आगे रखा गया. अब इस वर्ग को लग रहा है कि जिन लोगों को इन्होंने सत्ता में बिठाया, वे उन के लिए कुछ नहीं कर रहे. उन की शिक्षा, नौकरी, व्यापार में तरक्की के बजाय उलटे रोड़े अटकाए जा रहे हैं. इसलिए अब इन वर्गां का गुस्सा बाहर निकलने लगा है.

जो नीतियां बनाई जा रही हैं वे भेदभाव वाली और केवल कुछ लोगों को आगे बढ़ाने वाली हैं. पाटीदारों को लगा कि उन के पास खेती, जमीन तो है पर सरकारी दफ्तरों में उन की संख्या नहीं है. गुजरात में आज भी दलित सामाजिक बहिष्कार के हालात का सामना कर रहे हैं.

इस का असर निश्चिततौर पर 2019 के आम चुनावों पर पड़ेगा. धर्म की कट्टरता और विकास दोनों साथसाथ नहीं चल सकते. जहां धर्म होगा वहां विकास की कल्पना करना बेकार है. हिंदुत्व की लैबोरेटरी से नफरत, भेदभाव, सामाजिक विभाजन, अशांति ही पैदा हो सकती है.

भाजपा को सबक सिखाएंगे : हार्दिक पटेल

पिछले 2 वर्षों से पाटीदार अनामत आंदोलन समिति के बैनर तले पाटीदार समुदाय को आरक्षण दिलाने की मांग को ले कर आंदोलन चला रहे हार्दिक पटेल भाजपा सरकार से बहुत नाराज हैं. वे कहते हैं, ‘‘वे 1985 में आरक्षण का विरोध कर रहे थे पर अब आरक्षण मांग रहे हैं क्योंकि हाल की परिस्थितियां बदल गई हैं. एक समय उन्होंने इन लोगों को सत्ता में बैठाया था और आज ये लोग धमकी व दादागीरी पर उतर आए हैं. कांग्रेस के साथ हमारी बातचीत हुई है. वह कई मांगें मानने को तैयार है.’’

हार्दिक पटेल किसी भी दल को समर्थन या वोट नहीं देने की बात कहते हैं. वे बताते हैं कि उन्हें भाजपा को हराना है. विकास  के सवाल पर हार्दिक का कहना है, ‘‘प्रदेश में 50 लाख युवा बेरोजगार हैं. हर वर्ग का युवा गुस्से में हैं. किसान, आदिवासी परेशान हैं. 80 लाख किसानों पर कर्जा है. खेती के लिए जरूरी डीएपी खाद का भाव पूरे देश की तुलना में गुजरात में 90 रुपए महंगा है.’’

दलितों की हर कदम पर उपेक्षा हुई : जिग्नेश मेवाणी

दलितों की आवाज बन कर उभरे गुजरात के युवा दलित नेता जिग्नेश मेवाणी देशभर में इस समुदाय पर हो रहे हमलों के लिए भाजपा सरकार को जिम्मेदार ठहराते हैं. वे कहते हैं, ‘‘भाजपा का एजेंडा हिंदुत्व है और इस सरकार के रहते दलितों का भला नहीं हो सकता. गुजरात सरकार ने कुछ वर्षों पहले लैंड सीलिंग एक्ट के तहत ली गई जमीन को भूमिहीन दलितों को देने की योजना बनाई थी. अहमदाबाद के धंधुका तहसील में 1984 में 21 सौ एकड़ जमीन का कागजों में आवंटन कर दिया गया पर हकीकत में यह जमीन दलितों को दी ही नहीं गई. इस साल हम ने इस जमीन के आवंटन के लिए मुख्यमंत्री को घेरा, कलैक्टर को प्रार्थनापत्र दिया पर कोई कार्यवाही नहीं हुई.’’ गुजरात हाईकोर्ट में पेशे से वकील जिग्नेश कहते हैं कि उन्होंने भूमिहीन दलितों को जमीन देने के लिए कई याचिकाएं दायर की हैं.

मेवाणी उस समय राष्ट्रीय फलक पर आए जब ऊना में कथित गौरक्षकों ने दलित युवकों के साथ अमानुषिक व्यवहार किया था. इस मामले को ले कर आंदोलन खड़ा करने वाले 35 वर्षीय जिग्नेश की दलितों के हक की आवाज देशभर में पहुंची. राष्ट्रीय दलित अधिकार मंच के बैनर तले चल रहे इस आंदोलन में गुजरात समेत दूसरे राज्यों के दलित भी आ जुटे. उन्होंने इस हिंसा के विरुद्ध रैली निकाली और 20 हजार दलितों को एकसाथ मरे हुए जानवर न उठाने और मैला न ढोने की शपथ दिलाई. मेवाणी ने कहा था कि दलित अब सरकार से अपने लिए दूसरे काम की बात करेंगे.

जिग्नेश मेवाणी वाईब्रैंट गुजरात का विरोध भी कर चुके हैं. वे कहते हैं, ‘‘सरकार वाईब्रैंट गुजरात के नाम पर औद्योगिक घरानों के साथ हुए करार में उन्हें धड़ाधड़ जमीनें दे रही है पर दलितों को, कानून होने के बावजूद, जमीन का हक नहीं दिया जा रहा है.’’ अब उन्होंने दलितों की उपेक्षा, भेदभाव, अत्याचार को ले कर भाजपा को सबक सिखाने की ठान ली है.

गुजरात की जनता का रुख बदल रहा है: हर्षिल नायक, प्रवक्ता, आम आदमी पार्टी

गुजरात चुनाव में आम आदमी पार्टी कहां है?

हम 2 वर्षों से मेहनत कर रहे हैं. प्रदेश की जनता के हक में 100 से ज्यादा मुद्दों को ले कर धरनेप्रदर्शन किए हैं. रणनीति के तौर पर हम चाहते हैं कि भाजपा हारे. इस के चलते यहां की जनता का रुझान हमारे प्रति है. दिल्ली मौडल लोगों के सामने है, इसलिए हम भाजपा को सीधी टक्कर दे सकते हैं.

क्या भाजपा के प्रति लोगों का गुस्सा है?

 पिछले 22 वर्षों में लोगों ने देखा कि वे जहां थे, अब भी वहीं के वहीं हैं. प्रदेश का पाटीदार व पटेल समुदाय, दलित, पिछड़ा, आदिवासी, किसान, व्यापारी और युवा वर्ग खुद को ठगा हुआ समझ रहा है. युवाओं को रोजगार नहीं मिल रहा. सभी वर्ग परेशान हैं. भाजपा का गुजरात विकास का दावा केवल धोखा है.

जनता के गुस्से को आप की पार्टी कैसे भुनाएगी?

लोगों के सामने दिल्ली सरकार का मौडल है. वहां महल्ला कमेटी समस्याओं के समाधान की अपनी व्यवस्था है. भ्रष्टाचारमुक्त शासन पार्टी का शुरू से ही लक्ष्य रहा है. लोग अब यहां भी बदलाव चाहते हैं और यह निश्चित है.

प्रदेश में नोटबंदी, जीएसटी को ले कर जनता का क्या रुख है?

 इन फैसलों ने अर्थतंत्र की कमर तोड़ दी है. गुजरात व्यापार का हब माना जाता है. फार्मा इंडस्ट्री, कपड़ा जैसे सारे उद्योग ठप हो गए. इन उद्योगों को राहत दिलाने की जरूरत थी. लोग बहुत परेशान हैं. सरकार के ये फैसले भाजपा को ले डूबेंगे.

आप कितने लोगों को टिकट दे रहे हैं?

 अभी कई सीटों पर मूल्यांकन चल रहा है. देखा जा रहा है कि हम कितनी सीटें जीत सकते हैं. करीब 50-60 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेंगे.