सरिता विशेष

उत्तर प्रदेश के निकाय चुनाव में सभी दलों ने अपने अपने स्तर पर पूरी ताकत से चुनाव लड़ा. निकाय चुनाव में 16 नगर निगम प्रमुख यानि मेयर, 1300 नगर निगम पार्षद, 198 नगर पालिका परिषद चेयरमैन, 2561 नगर पालिका परिषद सदस्य, 438 नगर पंचायत अध्यक्ष और 5434 नगर पंचायत सदस्य के लिये चुनाव हुआ.

भाजपा ने इस चुनाव 16 में से 14 मेयर के पदों पर विजय हासिल की. उत्तर प्रदेश में पहले 14 नगर निगम थे. इनमें से 12 भाजपा के कब्जे में थे. इस चुनाव में 2 नये नगर निगम बने. इस चुनाव में भाजपा ने 14 मेयर जीते और 2 मेयर बसपा के जीते. जिससे नगर निगम चुनाव में भाजपा का परचम लहराता दिखता है.

अगर इसका सही विश्लेषण किया जाय तो मेयर पद के लिये भाजपा को पहली बार कड़ी चुनौती मिली. कई शहरों में मेयर के पद पर भाजपा की जीत बहुत कम मतों से हुई है. बसपा ने भाजपा को सहारनपुर, आगरा, अलीगढ़, झांसी और मेरठ में कड़ी टक्कर दी. अलीगढ़ और मेरठ में बसपा ने जीत भी हासिल कर ली.

कांग्रेस ने मेयर चुनाव में मथुरा, वाराणसी, गाजियाबाद, कानपुर और मुरादाबाद में भाजपा को कड़ी टक्कर दी. कई शहरी क्षेत्रों में कांग्रेस ने पहली बार शहरी मतदाताओं को विकल्प दिया है. 8 माह पहले उत्तर प्रदेश की जनता ने जिस तरह से भाजपा को अपना समर्थन दिया था वह कमजोर पड़ता दिख रहा है.

उत्तर प्रदेश के निकाय चुनाव गुजरात विधानसभा चुनाव के पहले थे, इन चुनावों का प्रभाव वहां पड़ सकता है, भाजपा ने इसको ध्यान में रखकर पूरे दम यह चुनाव लड़ा. पहली बार मुख्यमंत्री ने निकाय चुनावों में अलग अलग शहरों पर चुनाव प्रचार किया. भाजपा ने निकाय चुनाव में संगठित होकर चुनाव लड़ा जबकि विपक्ष पूरी तरह से बिखरा हुआ था.

मेयर के बाद नगर पालिका और नगर पंचायत में सपा, बसपा और कांग्रेस ने भाजपा को कड़ी टक्कर दी. शहरी इलाकों में पहली बार बसपा के पक्ष में दलित और मुसलिम गठजोड़ दिखा. कांग्रेस के पक्ष में शहरी मतदाता का झुकाव भी साफ नजर आ रहा था.

राजधानी लखनऊ में मेयर के पद को छोड़ कर केवल बक्शी का तालाब सीट ही भाजपा को मिली. ग्रामीण इलाकों की बाकी सीटों पर समाजवादी पार्टी और निर्दलीय ने जीत हासिल की. अगर सभी पदों की संख्या को देखें, तो भाजपा पहले स्थान पर रही. इसके बाद सपा, बसपा और कांग्रेस रही. भाजपा के खिलाफ जहां लोगों को विकल्प दिखा वहां मतदाताओं ने उसके खिलाफ वोट दिया.

विधानसभा चुनावों में मुसलिम प्रत्याशियों से परहेज करने वाली भाजपा ने निकाय चुनावों में मुसिलम प्रत्याशियों को चुनाव मैदान में उतारा था. निकाय चुनाव एक राजनीतिक संदेश देते नजर आ रहे हैं कि अगर भाजपा को पछाड़ना है तो विपक्षी दलों को तालमेल से चुनाव लड़ना होगा. मुसलिम मतदाताओं ने जिस तरह से सपा को छोड़ बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस का समर्थन किया, उससे समाजवादी पार्टी के रणनीतिकारों को सर्तक हो जाना चाहिये. इन चुनावों में चुनाव आयोग और जिला प्रशासन की खामियों को भी उजागर किया. वोटिंग लिस्ट में नाम न होने की आम शिकायत ने पूरी प्रक्रिया पर सवालिया निशान खड़ा कर दिया.