सरिता विशेष

कुछ पुराने पत्र मैं
रातभर पढ़ता रहा
एक युग मेरी आंखों में
चलचित्र सा चलता रहा

मैं समझा था समझ लोगे
मगर तुम कब समझ पाए
मगर क्यों दोष दूं तुम को
हम भी तो न कह पाए

जो भेज न पाए जिन्हें
लिखलिख कर मैं रखता रहा
कुछ पुराने पत्र मैं
रातभर पढ़ता रहा

तुझे चाहत तो थी मेरी
मुझे चाहत थी बस तेरी
मगर कर न सका पूरी
वो जो शर्त थी तेरी

धनुष तेरे स्वयंवर का
मैं दूर से तकता रहा
कुछ पुराने पत्र मैं
रातभर पढ़ता रहा.