दिल की तनहाइयों में उतरे तो
जाना कितने तनहा हैं हम
यूं तो चलते रहे दुनिया के
रेले में वक्त के साथ
पर तनहा दिल घुटता ही गया
यूं कहें उसे अकेला छोड़ते गए हम

जो कहा, किया, वो दिल को न भाया
कुछ अनकही रही, कुछ अनसुनी रही
कुछ वक्त के साथ छूटी, कुछ मजबूरी में
कुछ पास आ के नहीं आई
कुछ गई दूरी में

कुछ समझा गलत, तो कुछ माना गलत
कुछ हासिल हुआ, कुछ बिसरा भी
कुछ संजोया तो कुछ बिखरा भी
कुछ कहा, तो रहा कुछ अनकहा भी

कुछ को दिल न माना
तो रही कुछ से शिकायतें
और कुछ को अपना
न कह सका ये दिल

बस यूं कहें कि बहुतकुछ रहा ऐसा
कि दिल पर बोझ बढ़ता ही गया
न बोल सका कुछ, न ही कुछ कर सका
अकेला, बस, अकेला होता चला गया

जब दिल की गहराइयों में उतरे तो
जाना कितने तनहा हैं हम.
– नीतू

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