जिंदगी रोज घटती जाए है

आरजू है कि बढ़ती जाए है

बुझ गईं आरजू की कंदीलें

अब तमन्ना भी थकती जाए है

फिर सरेशाम कौन याद आया

दिल में फिर आग लगती जाए है

जलते सीने पे किस ने हाथ रखा

आग पर बर्फ जमती जाए है

उस ने जुल्फें संवार लीं शायद

गर्दिशे वक्त थमता जाए है.

 

– डा. तेजपाल सोढी ‘देव’

 

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