सरिता विशेष

2001 में कारपोरेट सिस्टम की तर्ज पर काम करते हुए जी टीवी ने फिल्म ‘गदर एक प्रेम कथा’ का निर्माण कर बौलीवुड में हौलीवुड की तर्ज पर कई कारपोरेट कंपनियों यानी कि फिल्म स्टूडियो के शुरू होने का रास्ता साफ कर दिया था. इन स्टूडियो ने जमकर पैसा बांटा, मगर 2008 में पूरे विश्व में आई आर्थिक मंदी के चलते यह ढांचा हिला था. पर फिर संभल गया. 2011 के बाद भारत में डिजनी, फाक्स स्टार जैसे स्टूडियो आए और फिल्म निर्माण में लग गए. लेकिन 2016 में अचानक पांच छह स्टूडियो बंद हो गए. इन सभी ने हिंदी फिल्मों के निर्माण से तोबा कर ली. जो स्टूडियो कार्यरत हैं, उनकी हालत भी पतली है. आखिर इस तरह स्टूडियो के बंद होने के लिए कौन जिम्मेदार है?

इस मसले पर जब हमने ‘‘फैंटम फिल्मस’’ नामक फिल्म प्रोडक्शन कंपनी से जुडे़ और ‘उडा़न’, ‘लुटेरा’ जैसी फिल्मों का निर्देशन करने के बाद प्रदर्शन के लिए तैयार फिल्म ‘‘ट्रैप्ड’’ के निर्देशक  विक्रमादित्य मोटवणे से बात की, तो उन्होंने कहा -‘‘पूरा सच तो मुझे पता नहीं. पर मुझे लगता है कि कहीं न कहीं इन स्टूडियों की फिल्म निर्माण को लेकर जो सोच थी, वह गलत रही. स्टूडियो के कर्ताधर्ता दर्शकों की पसंद भांप नहीं सके. शायद उन्होंने गलत फिल्म, निर्देशक या गलत कहानी चुन ली. गलतियां तो सबसे होती हैं. मुझे लगता है कि कहीं न कहीं गलत निर्णय लेते हुए कलाकारों को जरूरत से ज्यादा पैसे दे दिए गए. देखिए, दर्शक बदल रहा है. सेटेलाइट टीवी खुलने का असर अब नजर आ रहा है. अब दर्शकों के पास हर दिन बहुत कुछ देखने का अवसर है, तो हम फिल्मकारों को भी उतनी ही गति से आगे बढ़ना पड़ेगा.

2008 में जब पूरे विश्व में मंदी आयी थी, उससे पहले सारे स्टूडियो इस तरह पैसा बांट रहे थे, जैसे कि पानी बहा रहे हों. मेरी भी समझ में नहीं आ रहा था कि यह सब क्या हो रहा है? आज जब आर्थिक हालात सामान्य हो गए हैं, तब भी लग रहा है कि कलाकार को या यूं कह लो कि स्टार कलाकार को आज भी ज्यादा पैसे मिल रहे हैं. कहीं न कहीं कलाकारों की पारिश्रमिक राशि में कमी करनी पडे़गी. इस सच को तो मानना पडे़गा कि बाक्स आफिस पर फिल्म का चलना बहुत जरूरी है. यदि फिल्में नहीं चली, तो धीरे धीरे निर्माता गायब हो जाएंगे, तब इन स्टारों को लेकर फिल्म कौन बनाएगा? अब आमिर खान व सलमान खान को यह बात समझ आ गयी है. उनकी समझ में आ गया है कि फिल्म का चलना है, फिल्म नहीं चलेगी,तो क्या होगा?’’